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Sunday, March 25, 2018

वर्धा : सात दिवसीय संकाय संवर्द्धन कार्यशाला का प्रतिकुलपति ने किया समापन



वर्धा, 25 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के अंतिम दिन प्रथम सत्र में महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के मेडिसिन विभाग के निदेशक प्रो. उल्हास जाजू ने पिछले चार दशकों के अपने अनुभव के आधार पर सामुदायिक स्वास्थ्य को लेकर किए गए प्रयोग पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि हमारे काम की शुरुआत 40 साल पहले इस संदर्भ में शुरू किया था ताकि स्वास्थ्य सुविधाएं ग्रामीण लोगों तक पहुँच सके और इसी कड़ी में ग्रामीण स्वच्छता का मुद्दा हमारे सामने आया। इस कार्य को पूर्ण करने के लिए हमने गांधी, विनोबा तथा सुशीला नायर आदि के विचारों को अपनाया। जिससे हमने ग्रामीण भारत के साथ जुडने की कला सीखी। इसी कड़ी में हमने जयप्रकाश नारायण के विचारों को भी अपनाया।

उन्होंने आगे कहा कि समता, स्वतंत्रता तथा मैत्री के आधार पर ही अपने ध्येय को प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए सत्ता का विकेन्द्रीकरण आवश्यक शर्त बन जाती है। गांधी के अनुसार ग्रामीणों में सत्ता का विकेन्द्रीकरण ही सच्चा 'हिन्द स्वराज' लाएगा। इसी कड़ी में हमने गांधी-जीवन के आदर्शों को अपनाते हुए श्रम आधारित समाज रचना की स्वीकार्यता को अपनाया। प्रो. जाजू ने आगे कहा कि गांधी ने ग्राम स्वराज का सपना देखा जिसे विनोबा जी ने भूदान-ग्रामदान के जरिये आगे बढ़ाने की कोशिश की थी। विदर्भ के गढ़चिरौली जिले में मेंढ़ा-लेखा इसी तरह का प्रयोग है जो आज भी हमें देखने को मिलता है।
            उन्होंने कहा कि गांधी अंत्योदय से सर्वोदय अर्थात समन्वय की बात करते थे। हमने लाओत्से का निम्न मंत्र अपनाया-
            लोगों की ओर जाओ
            उनके साथ काम करो
            उन्हें समझो
            उनसे सीखें
            उन्हें प्रेम करें
            उनके साथ नियोजन करें
            उनके साथ कार्य करें!
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हुए हमने यह ध्यान रखा कि यह 'for the people' अर्थात जनता के लिए हो। हमें कुछ समस्याओं के साथ भी जूझना पड़ा। यहाँ के लोगों के लिए आज सबसे महंगा स्वास्थ्य खर्च माना जाता है। गांवों की संस्कृति, उनका जीवन अनुभव आदि को समझे बगैर तथाकथित पढ़े-लिखे लोग केवल विकास के नाम पर आउटसाइडर के रूप में काम करने की सोचते हैं। जिसमें उन्हें भीख से ज्यादा नहीं देते, ऐसे में हम इसे समुदाय सहभागिता कैसे कहें! यह एक गंभीर प्रश्न है। अक्सर हम गाँव वालों पर थोंपने की ही कोशिश करते हैं। आज एक ओर विज्ञान नये-नये लक्ष्यों की प्राप्ति की है लेकिन कहीं भी इसको अच्छे उपयोग के लिए नहीं अपनाया गया। इसे ज़्यादातर दुरुपयोग के लिए ही उपयोग में लाया जाता है। विनोबा को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान रथ के घोड़े की तरह है जिसकी लगाम अपने अच्छे लोगों के हाथ में होने की आवश्यकता है।
            उन्होंने कहा कि गांवों में हम ऐसा क्यों समझते हैं कि ग्रामीणों को हम अक्ल सिखाने जा रहे हैं? गांवों के लोगों के विज़डम को भी हमें समझना होगा। एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि गाँव में वट वृक्ष की पूजा करने वाली महिलाओं से यह पूछा गया कि आपने किसकी पूजा की तो उनका उत्तर था पति अर्थात शिव की। मेरे प्रश्न के जवाबी उत्तर में कि क्या किसी देवी की पूजा होती है तो उनका जवाब था 'साहब उनकी पूजा तो रोज ही होती है।' अर्थात 85% महिलाओं को आज भी पति के द्वारा पीटा जाता है, जिसे वे महिलाएं व्यंग्यपूर्वक पूजा कह रही थी।
            उन्होंने आगे कहा कि आम लोगों तक वास्तविक लाभ पहुँचाने के लिए हमें समाज की संरचना को बदलना होगा जिसके लिए राजनैतिक मंशा की आवश्यकता ज्यादा है। अपने प्रयोग पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हमने गांवों में फ्री में कोई भी सेवा नहीं दी और वहाँ के लोगों की सहभागिता के आधार पर ज्वार, धान आदि को इकट्ठा कर उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं दी गई। इस गतिविधि के माध्यम से ग्रामीणों में 'राइट टू डिमांड' के प्रति जागरूकता को बढ़ाने की कोशिश की। उन्होंने ट्रस्टीशिप की भावना के विकास पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत में आज भी स्वास्थ्य पर कुल GDP का मात्र 1.4 फीसदी ही खर्च किया जाता है। जबकि यूएनडीपी के मुताबिक यह 5 से लेकर 10 फीसदी तक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रति व्यक्ति के आधार पर ग्राम सभा के जरिये संसाधनों का बंटवारा हो और ग्रामीण लोगों के हाथों में निर्णय प्रक्रिया हो तभी गांवों का समुचित विकास मुमकिन हो सकता है। साथ ही उन्होंने समुदाय सहभागिता के मूलतत्व बताएं जिसमें से कुछ इस प्रकार है-
            -समुदाय द्वारा स्वीकृति
            -समुदाय द्वारा सहयोग
            -समुदाय द्वारा पार्टनरशिप
            -समुदाय द्वारा सहभागिता
            उन्होंने इसका उदाहरण बताते हुए बताया कि क्रांति सातत्यपूर्ण होती है, नित-नवीनतम होती है। मेंढ़ा-लेखा जैसे गाँव में ग्राम सभा को भूस्वामित्व ग्रामसभा को सौंपने में 35 साल लगे। ऐसे गाँव में सही मायने में ग्रामीण सहभागिता के उक्त सभी मूल तत्वों को देखा जा सकता है। आगे उन्होंने कहा कि हमने गांवों में स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने हेतु जिस तरीके को अपनाया वह यह थी- शुरुआत में हमने घर-घर जाकर ग्राम वासियों को स्वच्छता के बारे में बताना शुरू किया। इस कार्य में ग्रामीणों की सहभागिता के साथ-साथ कुछ संस्थाओं से मदद ली गई। खुले में शौच जाने को खत्म करने हेतु अलग-अलग मोहल्ले में एक-एक टाइलेट बनाया गया लेकिन इसका उपयोग देखा कि लोग लकड़ी, बकरी आदि को रखने के लिए किया जाने लगा। जब हमने वहाँ की वृद्ध महिलाओं से बातचीत की कि ऐसा क्यों हुआ! तब उन्होंने बताया कि 'हर परिवार की महिलाओं को ही दूर-दूर के कुएं से पानी ढोकर लाना होता है। घर के सात लोगों के लिए नहाने, कपड़े धोने से लेकर पीने व रसोई के लिए पानी लेकर वे ही आती हैं। उसमें भी अब आपकी टाइलेट के लिए अलग से पानी लाकर मेरी बहू को मारना है क्या? तब जवाब में मैंने खिसियाहट के साथ कहा कि फिर सुबह-सुबह सलामी देने का शौक क्यों है? वृद्धा ने जवाब दिया कि गीली जमीन, बिजली की कमी तथा बिच्छू, साँप के डर से महिला-पुरुष रास्ते के दोनों अलग-अलग किनारे पर टायलेट के लिए जाते हैं। इस तरह हमने उनसे वहाँ से अक्ल प्राप्त की और विज्ञान का आधार लेते हुए उनकी आवश्यकताओं के अनुसार कम पानी खर्च होने वाला शौचालय बनाया गया। इसे बनाने एवं उपयोग में लाने में पाँच साल लगे। आगे इस परियोजना को गांवों में क्रियान्वित करने के लिए ग्रामीणों के द्वारा ही किये जाने की प्रविधि को अपनाया गया जिसका अंतिम उद्देश्य 'ग्राम स्वराज' था। उन्होंने कहा कि बिना लोकशक्ति के गाँव में कोई भी परिवर्तन नहीं लाया जा सकता है। शक्ति के आधार पर, नैतिकता के आधार पर हमने वहाँ कार्य किया, जाति-धर्म से अलग आर्थिक क्षमताओं के आधार पर सामाजिक संरचना का निर्माण करना। व्यक्ति तथा सामाजिक योगदान को बढ़ावा दिया। श्रमदान, समर्थ की पहचान की गयी इसी से सहभागितापूर्ण नेतृत्व का निर्माण हुआ।
            उन्होंने आगे कहा कि हमने अपने प्रयोगों में से जो पाया वह यह था कि ग्रामीण लोगों के अनुभवों के आधार पर ही उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य होना चाहिए। दान का स्वरूप भीख न हो बल्कि लोकशक्ति के रूप में उसका उभार होना चाहिए। दानकर्ता को ट्रस्टी के रूप में होना चाहिए न कि दाता के रूप में। संसाधन ग्राम सभाओं के हाथ में होने चाहिए। इस पूरे कार्य को करने के लिए तंत्र-मंत्र के साथ-साथ व्रत लेना जरूरी है। हम सब जब व्रती के रूप में सामाजिक जीवन का निर्वहन करेंगे तभी अच्छे समाज का निर्माण होगा। मेंढ़ा-लेखा इस मामले में काफी आगे निकाल चुका है। हम भी समाज का मंगल चाहते हैं तो इस तरह के प्रयोगों को आगे बढ़ाना होगा।

द्वितीय सत्र में ग्रुप प्रस्तुति हुई। अशोक सातपूते, राहुल निकम, गजानन नीलामे, डिसेन्ट कुमार द्वारा लेखा-मेंढ़ा के सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षिक स्थिति के अध्ययन के आधार पर अपना रिपोर्ट प्रस्तुत किया। रिपोर्ट में उन्होंने कहा कि वहाँ की शैक्षिक स्थिति बहुत ही निम्नतर है तथा गाँव में इसको लेकर एक प्राथमिक स्कूल के अलावा दूसरा कुछ संसाधन भी नहीं दिखाई दिया। निकम ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि उस गाँव में दोपहर के अनुचित समय में जाने के कारण ज्यादा जानकारी नहीं प्राप्त हो सकी, किन्तु ग्रामीणों की सहभागिता काबिल-ए-तारीफ़ है। गांवों में कई सारे गलत चीजों पर प्रतिबंध लगाया गया है। वहीं अशोक सातपूते ने मेंढ़ा लेखा के विवाह संस्था का विस्तृत विश्लेषण सबके सामने रखा। अंत में सभी ने सेवाग्राम गाँव की संरचना पर अपनी बात रखी। 
            समृद्धि डाबरे ने अपने ग्रुप का प्रतिनिधित्व करते हुए महिलाओं से संबन्धित समस्याओं पर बात रखी। डॉ. शिव सिंह बघेल ने मेंढ़ा लेखा पर विस्तृत प्रस्तुति दी। साथ ही सेवाग्राम गाँव की महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर बात की। अंत में दोनों की तुलना के आधार पर गांवों के बेहतरी के लिए विकल्प प्रस्तुत किए।
            खेती-किसानी और शिक्षा के मसले पर गठित समूह ने मेंढ़ा-लेखा और सेगांव के शैक्षिक भ्रमण के हवाले से अपने अनुभव साझा किए। इस समूह में डॉ. मुकेश कुमार, डॉ. देवशीष मित्रा एवं डॉ. पार्थसारथी मालिक, नरेश गौतम शामिल थे। इस समूह की तरफ से डॉ. पार्थसारथी ने अपने अनुभव रखते हुए कहा कि पढ़े-लिखे लोग सैद्धान्तिक चर्चा मात्र करते हैं किन्तु गाँव के लोग उसको व्यवहार में उपयोग में लाते हैं। श्याम शर्मा ने भी मेंढ़ा लेखा के अपने अनुभव शेयर किए। उन्होंने गाँव के सांस्कृतिक पहलू को रेखांकित किया। टी. राजु ने भी अपने अनुभव बताए। मेंढ़ा लेखा गाँव में की जा रही बांस की खेती के बारे में भी उन्होंने चर्चा की।
            चर्चा के अंत में प्रो. उल्हास जाजू ने मेंढ़ा-लेखा गाँव के बनने की पूरी प्रक्रिया की संक्षिप्त चर्चा की। उन्होंने बताया कि वनों पर सामुदायिक अधिकार कानून बनाने के साथ-साथ इस गाँव ने सबसे पहले उसे हासिल भी किया। तत्कालीन केंद्रीय वन-पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने उस गाँव में आकार वनों पर सामुदायिक अधिकार की घोषणा की थी। उन्होंने बताया कि तीन वर्ष पूर्व इस गाँव ने अपनी भूमि ग्राम सभा को दान कर दिया है। अब वहाँ भूमि की मिल्कियत पर व्यक्तिगत मालिकी नहीं है। ग्राम सभा ने हर किसी को उस भूमि पर कृषि करने हेतु दे रखी है। श्रमजीवी समाज के लिए इस गाँव ने एक नया आदर्श खड़ा किया।

इस सात दिवसीय कार्यशाला के समापन-सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने की। संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया। उक्त मौके पर प्रो. उल्हास जाजू, विश्वविद्यालय के कुलसचिव कादर नवाज खान, डॉ शंभू जोशी एवं एनसीआरआई के डॉ. डी. एन. दास मौजूद थे। एनसीआरआई के डॉ. डी. एन. दास को प्रतिकुलपति ने अंगवस्त्र, सूत की माला व चरखा भेंट कर सम्मानित किया। समापन सत्र में पूरे कार्यक्रम की संक्षिप्त रिपोर्ट डॉ. मुकेश कुमार ने प्रस्तुत किया। समापन सत्र में दो प्रतिभागियों टी. राजू एवं डॉ. राहुल निकम ने बारी-बारी से अपने अनुभव शेयर करते हुए बताया कि इस कार्यशाला से उन्हें काफी फायदा मिला और ग्रामीण समुदाय को सूक्ष्मता से जानने-समझने का मौका मिला। दोनों ने कहा कि इस किस्म का फ़ैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम एक सप्ताह मात्र न होकर पंद्रह दिनों का होना चाहिए। उक्त मौके पर एनसीआरआई के डॉ. डी. एन. दास ने अपना मत प्रकट करते हुए कहा कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय ने यह आयोजन कर महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने प्रतिकुलपति और कुलसचिव से ग्रामीण समुदाय से लगाव बढ़ाने हेतु इसे पाठ्यक्रम का अंग बनाने में सहयोग का अनुरोध किया। समापन सत्र में ही प्रतिकुलपति एवं कुलसचिव के हाथों सभी प्रतिभागियों के बीच प्रमाण-पत्र वितरित किया गया।

समापन सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने कहा कि ग्रामीण समुदाय पर केन्द्रित महत्वपूर्ण कार्यशाला सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए आप सभी बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि भारत के गाँव तमाम अभावों के बावजूद विशिष्टता लिए हुए हैं। गाँव में आतिथ्य भाव आज भी कायम है। गाँव से आज भी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। गांव में आज सुविधाओं का अभाव है, लोग बड़े पैमाने पर गाँव से विस्थापित हो रहे हैं। उन्होंने महाराष्ट्र के चर्चित मॉडल गाँव हिबरे बाजार के प्रयोग की भी चर्चा की। प्रतिकुलपति ने एनसीआरआई से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में एक स्थायी केंद्र बनाने का भी निवेदन किया, जहां वर्ष भर इस प्रकार के ग्राम केन्द्रित कार्यक्रम संचालित किए जा सकें। समापन सत्र में सभी प्रतिभागियों को कुलसचिव कादर नवाज खान ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, गजानन एस. निलामे एवं डिसेन्ट कुमार साहू.


Thursday, May 18, 2017

मनुष्यता से जुड़ा हुआ है पर्यावरण का मुद्दा: प्रो. मनोज कुमार


तथाकथित विकास से उत्पन्न समस्याओं ने आज पूरे विश्व को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि विकास की इस राह पर ज्यादा दिनों तक चला नहीं जा सकता है। वैसे तो यह सोचते-सोचते 50 वर्ष से भी अधिक का समय गुजर चुका है क्योंकि इसकी शुरुवात 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के स्टाकहोम सम्मेलन से होती है, जहां विकास से उपजे पर्यावरणीय प्रदूषण और संसाधनों के खत्म होने की चिंता को लेकर सौ से अधिक देशइकट्ठा हुए। विकास की इन समस्याओं को देखते हुए 'बुंटलैंड आयोग' ने 'स्थायी विकास' का नारा दिया। तब से लेकर अब तक विभिन्न मंचों से सतत या स्थायी विकास का नारा बुलंद किया जाता रहा है। इस वर्ष के विश्व समाज कार्य दिवस का उद्देश्य भी पर्यावरण और इंसानी अस्तित्व की निरंतरता (Sustainability) को बढ़ावा देना रहा। इसी क्रम में 21 मार्च को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी समाज कार्य अध्ययन केंद्र के द्वारा विश्व समाजकार्य दिवस, 2017 पर एक परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। परिचर्चा इस वर्ष का विषय ग्लोबल एजेंडे का तीसरा स्तम्भ 'सामुदायिक और पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देना' रहा।
केन्द्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि पर्यावरणीय मुद्दे पर दुनिया की तमाम सरकारें एक तरह से सोच रही हैं और जनता दूसरे तरीके से सोच रही है। जब तक हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित नहीं करेंगे तब तक पर्यावरण की सुरक्षा नहीं होगी। आगे उन्होने कहा कि पर्यावरण का मुद्दा मनुष्यता से जुड़ा हुआ है। इस परिचर्चा को आगे बढ़ते हुए सहायक प्रोफेसर श्री आमोद गुर्जर ने कहा कि सतत विकास की अवधारणा व्यक्ति केन्द्रित है जबकि इसे समग्र उपागम (holisticapproach) को अपनाना होगा। हमने मानव अस्तित्व पर संकट आने के बाद ही 'सतत विकास' की अवधारणा अपनाई।डॉ. शिव सिंह बघेल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए यह कहा कि विद्यार्थियों को अपना लक्ष्य ऐसा बनाना चाहिए ताकि वे स्वयं को वैश्विक एजेंडे से जोड़ सके और ग्राम स्तर तक पहुंचाए।
डॉ. मिथिलेश ने कहा कि वैश्विक स्तर तथा भारत में भी संसाधनों के बड़े भाग पर चंद लोगों का आधिपत्य है जबकि एक बड़ा भाग अपना जीवन गरीबी और अभाव में व्यतीत कर रहा है इसलिए हमें संसाधनों के न्याय पूर्ण वितरण पर ध्यान देना होगा। परिचर्चा के दौरान उपस्थित सभी सहभागियों नेइस मुद्दे पर अपनी बात रखी। ज़्यादातर विद्यार्थियों ने अपने आस-पास विकास के नाम पर उत्पन्न हो रहे विसंगतियों को प्रमुखता के साथ रखा।
कार्यक्रम का संचालन नरेन्द्र कुमार दिवाकर ने किया। प्रास्ताविक डिसेन्ट कुमार साहू ने रखा और आभार गजानन निलामे ने किया। इस परिचर्चा में केंद्र के निदेशक प्रो.मनोज कुमार,डॉ. मिथिलेश कुमार, डॉ. शिव सिंह बघेल, सहायक प्रोफेसर श्री आमोद गुर्जर तथा केंद्र केनरेश गौतम, श्याम सिंह, आशुतोष, छविनाथ यादव,विलास चुनारकर, अनुराग पाण्डेय, शीना नेगी, सुधीर कुमार,अदिति, आनीता और शुभांगी सहित बड़ी संख्या में समाज कार्य के शोधार्थी/विद्यार्थी और एन जी ओ प्रबंधन के विद्यार्थी उपस्थित रहे।
नरेंद्र कुमार दिवाकर
शोधार्थी समाजकार्य

Sunday, February 8, 2015

गांधी जी की शहादत का सच

प्रो. मनोज कुमार 
गांधी जी की हत्या के आठ प्रयास हुए। स्वयं गांधी जी ने कहा था कि मैं सात बार इस प्रकार के प्रयासों से बच गया हूँ। मैं इस प्रकार मरने वाला नहीं हूँ। मैं तो 125 वर्ष जीने वाला हूँ। 30 जून 1947 की प्रार्थना सभा में भी उन्होंने कहा कि परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरशः मृत्यु के मुँह से सकुशल वापस आया हूँ। मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहुचाया। मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आता। गांधी जी के 125 वर्ष जीने की इच्छा स. गा. वांगमय में 40 जगहों पर उद्दृत है। जब उनकी इस इच्छा के संबंध में द. अफ्रिका में गांधी जी की सचिव कुमारी श्लेसिन ने पूछा तो गांधी जी ने 1 नवम्बर 1947 को पत्र में लिखा कि मैं ऐसी मूर्खतापूर्ण और असंभव निश्चय कभी नहीं कर सकता। यह मानव की शक्ति से बाहर की बात है। वह केवल इच्छा ही कर सकता है - मेरी इस इच्छा के साथ मानव जाति की सेवा के सतत कार्य की शर्त जूड़ी हुई है। यदि यह कार्य मुझसे न हो सके, जैसा कि भारत में आज दिखाई दे रहा है तो न केवल मुझे उस आयु को प्राप्त करने की इच्छा ही छोड़ देनी चाहिए, बल्कि उसके विपरीत इच्छा रखनी चाहिए जैसा कि मैं इस समय कर रहा हूँ। (पूर्णाहुति, खण्ड 4, पृ. 49) उन्होंने कहा है कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर से प्रार्थना करता हू कि हैवान बने हुए मनुष्य के हत्याकांड का असहाय साक्षी बनने की अपेक्षा वह मुझे इस वेदना के सागर से उबार कर अपनी शरण में ले ले। (पूर्णाहुति खण्ड 4, पृष्ठ 46) उन्होंने एक दूसरे अवसर पर कहा कि जीता जागता साक्षी बनने के बजाय मैं इसे ज्यादा पसंद करूंगा कि मेरी आंख सदा के लिए बंद हो जाय (पूर्णाहुति खण्ड 4, पृष्ठ 126) दरअसल गांधी जी उन दिनों की घटनाओं से काफी व्यथित थे जब विधान चन्द्र  राय ने उनसे कहा कि ‘‘पहले की अपेक्षा अब लोगों को आपके सेवा की अधिक आवश्यकता है।’’ तो गांधी ने उत्तर  दिया था कि उससे क्या? अब मेरी आवश्यकता न तो जनता को है और न सत्तारूढ लोगों को है। इस परिस्थिति में तो मेरे लिए यही उचित है कि मैं या तो कुछ करूं या मर जाउं। मैं काम करते-करते ही मरना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरे अंतिम स्वांस के साथ ईश्वर का नाम निकले। (The last phase, Vol.2, pp. 73-74) उन्होंने कहा कि मेरे फोटो और मुर्तियों को माला पहनाने के लिए तो प्रत्येक व्यक्ति उत्सुक है परन्तु मेरी सलाह वास्तव में कोई नहीं मानना चाहता (पेज 209)। गांधी जी ने एक दिन कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य से कहा - जिस अच्छीनाव ने हमें बंदरगाह तक पहुंचाया, उसे हम अब छोड़ते नजर आ रहे हैं। एक समय था जब भारत अहिंसा से स्वाधीनता प्राप्त कर सकता है इस पर किसी को विश्वास न था। परन्तु अब जब स्वाधीनता सचमुच आ गयी है, तब हम अहिंसा को तिलांजलि देते दिखाई दे रहे हैं। ...यदि अब भारत के लिए अहिंसा का कोई उपयोग नहीं रह गया हो, तो क्या उसके लिए मेरा कोई उपयोग हो सकता है? मुझे जरा भी आश्चर्य नहीं होगा यदि उन सारे सम्मान के बावजूद जो राष्ट्रीय नेता मेरा करते हैं। वे मुझे किसी दिन कह दें - इस बूढे की बात हमने बहुत रक्खी अब वह हमें अपना काम क्यों नहीं करने देता? (बी. भट्टाचार्य, इवोल्यूशन ऑफ गांधी) प्रार्थना प्रवचन में इन्होंने कहा कि मुझे ऐसा जान पड़ता है कि मेरा जीवन कार्य समाप्त हो गया है। मैं आशा करता हूँ कि परमात्मा कृपा करके मुझे और अपमान नहीं सहावेगा । (The last phase, Vol.2, p. 210)         
125 वर्ष जीने की इच्छा का उल्लेख करते हुए मराठी सामयिक अग्रणी पत्रिका में नाथूराम गोडसे ने लिखा कि ‘‘परन्तु (तुम्हें) जीने कौन देगा’’? क्या गांधी जी को आभास हो गया था?
ये बहारें नाम दुनियां चंद रोज । देख ले उसका तमाशा चंद रोज ।
यह गीत दुहराते लगभग रात के सवा नौ बजे 29 जनवरी 1948 को विस्तर पर लेट गये। बापू दिनभर इतना काम करते रहे कि शाम तक काफी थक चुके थे। उनका सिर घूम रहा था। फिर भी लोकसेवक संघ के रूप में कांग्रेस का नया विधान की ओर इशारा करते हुए बोले - मुझे तो उसे आज पूरा कर ही देना चाहिए। 30 जनवरी को नित्य की प्रार्थना के लिए सुबह साढे तीन बजे उठे। उसके बाद काम में लग गये। कमरे से गुजरते हुए कांग्रेस के लिए बनाया गया नया विधान प्यारेलाल जी को देते हुए कहा-इसे देख जाओ। मैंने यह लिखा तब दिमाग पर बहुत तनाव था। इसमें कहीं कोई बात छूट गयी हो तो इसे ठीक कर लेना। मालिस से लौटे तब फिर प्यारेलाल जी से पूछा कि उसे देख लिया? स्नान, भोजन और बंगला पाठ पूरा कर जब बापू निवृत हुए, तब तक प्यारेलाल जी वह विधान ठीक कर ले आये उसको बापू ने ध्यान से देखा। उसे उन्होंने उसी दिन पूर्वाहन में ही कांग्रेस के मंत्री के हाथों सौंप दिया। दुर्भाग्य से यही बापू की आखरी वसीयत बन गयी। वसीयत में बापू ने लिखा - देश का बटवारा होते हुए भी राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा तैयार किये गये साधनों के जरिये हिन्दुस्तान की आजादी मिलने के कारण मौजूदा स्वरूपवाली कांग्रेस का काम अब खत्म हो चुका है। यानी प्रचार के वाहन और धारा सभा की प्रवृति चलानेवाले तंत्र के नाते उसकी उपयोगिता अब समाप्त हो चुकी है। ‘‘शहरों और कस्बों से भिन्न उसके 7 लाख गाँवों की दृष्टि से हिन्दुसतान की सामाजिक, नैतिक और आर्थिक आजादी हासिल करना अभी बाकी है। लोकतंत्र के लक्ष्य की तरफ हिन्दुस्तान की प्रगति के दरमियान सैनिक सत्ता पर नागरिक शक्ति को प्रधानता देने की लड़ाई अनिवार्य है। कांग्रेस को हमें राजनैतिक पार्टियों और साम्प्रदायिक संस्थाओं के साथ की जंगी होड़ से बचाना चाहिए और ऐसी ही दूसरे कारणों से अविलम्ब भारतीय कांग्रेस नीचे दिये हुए नियमों के मुताबिक अपनी मौजूदा संस्था को तोड़ने और लोक-सेवक-संघ के रूप में प्रकट होने का निश्चय करे।’’ दरअसल कांग्रेस आजादी की लड़ाई का एक मिला-जुला राष्ट्रीय मंच था, जिसके लिए भारत की आजादी लक्ष्य था। कइयों को अहिंसा निष्ठा के रूप में नहीं नीति के रूप में स्वीकार थी, लेकिन गांधी तो अब ‘हिन्द स्वराज्य’ को कांग्रंस का वैचारिक घोषणा-पत्र बनाने के लिए प्रयत्नशील थे। ‘हिन्द-स्वराज्य’ भौतिकवादी जीवन मूल्यों का भारतीय संस्कृति से विचार संघर्ष का सजीव चित्रण है।
          कर्मवीर पं. सुन्दरलाल जी 30 जनवरी को सबेरे गांधी जी के पास पहुंचे थे। उन्होंने सेवाग्राम के लोगों के लिए एक पत्र लिखाया। वह पत्र किशोर लाल जी के नाम था। उन दिनों बापू बंगला का अभ्यास कर रहे थे। एक पृष्ठ लिखने के बाद बोले- ‘‘अब तो मेरे बंगला अक्षर सुधड़ होने लगे हैं’’। (पं. सुन्दर लाल संपादन बनारसीदास चतुर्वेदी, विश्वम्भर नाथ पांडे, पृ. 176)। 29 जनवरी 1948 को सुबह किशोर लाल को पत्र में बापू ने लिखा मेरे सेवाग्राम आने की योजना अभी अनिश्चित है... शायद कल इसका फैसला हो जायगा। 30 जनवरी की सुबह मनु बापू के साथ टहलने नहीं गयी क्योंकि रात के लिए दवा नहीं बची थी, वे खांसी में लौंग का चूर्ण लेते थे। बापू ने मनु से कहा कौन जानता है रात पड़ने से पहले क्या होगा अथवा मैं जीता भी रहूंगा या नही? यह भी कहा अगर रात को जीवित रह गया तो तुम आसानी से चूर्ण तैयार कर सकती हो। दरअसल वे रूटीन के पक्के थे। यह पूछे जाने पर कि आपके सेवाग्राम पहुंचने की तारीख का तार भेज दिया जाय। बापू ने कहा तार पर रूपया क्यों बरबाद किया जाय। प्रार्थना प्रवचन में तारीख का घोषित कर दूंगा - अखबार से लोग देख लेंगे। दोपहर को एक पत्रकार द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या आप 1 फरवरी को सेवाग्राम जाने वाले हैं? गांधी जी ने कहा ऐसा कौन कहता है? पत्रकार ने कहा - अखबारों में खबर है। गांधी जी ने कहा अखबारों ने घोषणा की है कि गांधी पहली तारीख को जा रहा है, लेकिन मैं नही जानता कि वह गांधी कौन है?
          गांधी जी 30 जनवरी को सामान्य आदत के विपरित 10 मिनट विलम्ब से प्रार्थना सभा गए थे। बिड़ला भवन से प्रार्थना स्थल पर जाने का छोटा रास्ता चुना कि जल्द पहुंच जाए। दरअसल वे उसके पूर्व सरदार पटले से बातचीत में मशगुल थे। कई  बार मनु ने घड़ी भी दिखई लेकिन गांधी जी का ध्यान नहीं गया। पटेल चले गये। प्रार्थना स्थल पर दौड़कर जाते समय रास्ते में एक सेविका ने उन्हें बताया - काठियाबाड़ के दो कार्यकर्ता मुलाकात का समय मांग रहे हैं - बापू ने कहा - उनसे कह दो प्रार्थना के बाद आ जाए। मै जीवित रहा तो उस समय उनसे मिलूंगा। स्थल पर दौड़ते हुए देर से पहुंचे। 5.17 में इन्हें गोली लगी। प्रणाम की मुद्रा में बीच में रिवाल्वर छिपाए हुए नाथुराम ने गोली मार दी। बापू के निर्जीव शरीर को नन्दलाल मेहता और पं. सुन्दरलाल जी ने सहारा दिया। वल्लवभाई आए। थोड़ी देर बाद जवाहरलाल जी भी आ गए। वे फूट-फूट कर रोने लगे। पटेल जी ने नेहरू जी के पीठ पर हाथ फेरा और ढांढस देकर उठाते हुए कहा - जवाहरलाल बापू के बाद तो अब सारे देश की निगाहें तुम्हारे उपर है। अगर तुम इस तरह अधीर हो जाओगे तो देश के करोड़ों नर-नारियों को कौन सांत्वना देगा? (कर्मवीर पं. सुन्दरलाल, बनारसीदास चतुर्वेदी और विश्वम्भरनाथ पांडे, पृ. 176) इस तरह 30 जनवरी की रक्तरंजित शाम का अंत हुआ।
गांधी जी के हत्या का प्रयास
       25 जून 1934 ई. को पूणे नगरपालिका द्वारा गांधी जी को सम्मानित करने के लिए आयोजित समारोह में जाते समय बम फेका गया। भूल से बम अगली गाड़ी पर लगा। गांधी जी पिछली गाड़ी में थे। इस घटना में नगरपालिका के मुख्य अधिकारी तथा दो पुलिसकर्मी सहित कुल सात लोग गंभीर रूप से घायल हुए। इस समय गांधी अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन चला रहे थे। दरअसल गांधीजी ने छुआछूत के विरूद्ध लोगों को जागृत करने के लिए नवम्बर 1933 से यात्रा प्रारंभ की जो 9 महिने तक चली ओर वाराणसी में समाप्त हुई। 12500 मील की यात्रा में उन्हें 8 लाख रूपये मिले। इसी क्रम में 25 जून 1934 को इनके कार पर बम फेका गया।
       जूलाई 1944 ई. में पंचगणी में जब गांधीजी बीमारी के बाद आराम करने गये, उस समय नाथूराम छूरा लेकर गांधी जी को मारने आया था। मणिशंकर पुरोहित गवाह थे। भिसारे गुरूजी ने ही नाथूराम के हाथ से छूरा छीना था। यह उन्होंने कपूर कमीशन के सामने बयान में भी कहा था। गांधीजी ने उसके तुरन्त बाद नाथूराम को मिलने के लिए बुलाया। परन्तु वह नहीं आया।
       तीसरा प्रयास सितम्बर 1944 में हुआ। गांधी जी मुहम्मद अली जिन्ना से वार्ता के लिए बम्बई जाने वाले थे। उस अवसर पर पूणे का एक ग्रुप वर्धा गया था। इनमें एक व्यक्ति ग. ल. थŸो के पास से पुलिस को छूरा मिला। थत्रे का कहना था कि यह छूरा उसने उस गाड़ी को टायर फोड़ने के लिए रखा था जिसमें गांधी जी जाने वाले थे। गांधी जी के नीजी सचिव श्री प्यारेलाल लिखते हैं कि उस दिन सबेरे उनके पास पुलिस अधिकारी डी.सी.पी. का फोन आया कि प्रदर्शनकारी अमंगलकारी घटना की तैयारी करके  आए हैं। गांधी जी का आग्रह था कि वे अकेले प्रदर्शनकारी के साथ चलते-चलते जायेंगे एवं जबतक प्रदर्शनकारी उन्हें गाड़ी में बैठने की अनुमति नही देंगे तबतक उनके साथ ही चलते रहेंगे। परन्तु पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को पकड़ लिया।
       29 जून 1940 को चैथा प्रयत्न किया गया। गांधी जी एक विशेष रेलगाड़ी द्वारा बम्बई से पूणे जा रहे थे। नेरल और कर्जत स्टेशन केबीच रेलवे लाइन पर बड़े-बड़े पत्थर रखकर गाड़ी को गिराने का षडयंत्र किया गया। रात का समय होने के बावजूद ड्राइवर की सावधानी के कारण दुर्घटना नहीं हुई पर इंजिन को क्षती पहुंचने की बात स्वीकार की गयी है। इस समय गांधी जी ने कहा था कि विभाजन मेरी लाश पर होगा।
 20 जनवरी 1948 ई. को दिल्ली में प्रार्थना प्रवचन के समय ही ठीक 75 फीट की दूरी पर बम विस्फोट हुआ। आकाशवाणी के टेप रेकार्ड में धमाके की आवाज आज भी कैद है। गांधी जी ने उस अवसर पर कहा था ‘‘अगर हम इस तरह की बात पर घबरा जायेंगे तो सचमुच कुछ हो जाने पर हमारा क्या हाल होगा?’’ बम के धमाके से दीवार का एक हिस्सा गिर गया था। मदनलाल पाहवा (25 वर्ष) जो पश्चिम पंजाब का एक निराश्रित था के पास से तलाशी में एक हथगोला मिला पर उसको तनिक भी पश्चाताप नहीं था। गांधी जी ने कहा था कि विस्फोट से घायल होकर गिरने पर भी मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट हो और आक्रमणकारी के प्रति मेरे मन में कोई दुर्भावना न हो (पूर्णाहुति खण्ड 4, पृ. 436)। 29 जनवरी को एक सेवक से इन्होंने कहा था कि यदि मैं लम्बे समय की बीमारी से अथवा किसी फोड़े फुंसी से भी मरूं तो लोगों को नाराज करने का खतरा उठाकर भी संसार के सामने यह घोषणा करना तुम्हारा धर्म होगा कि जैसा ईश्वरपरायण मनुष्य होने का मैं दावा करता था वैसा सचमुच मैं था नहीं। अगर तुम ऐसा करोगे तो मेरी आत्मा का शांति मिलेगी। यह भी याद रखो कि अगर कोई आदमी गोली मार कर मेरे प्राण ले ले, जैसा कि किसी ने उस दिन बम से मेरे प्राण लेने की कोशिश की थी और मैं कराहे बिना उस गोली का सामना करू और रामनाम लेते हुए मेरे प्राण निकल जाय तो ही मेरा दावा सच्चा साबित होगा। (पूर्णाहुति, पृ. 458)
          बाडगे के कथनानुसार 17 जनवरी को नाथूराम गोडसे, सावरकर के अंतिम दर्शन करने बम्बई गया - सावरकर ने कहा सफल होकर लौटना। तात्याराव सावरकर ने भविष्यवाणी की कि अब गांधी जी के सौ वर्ष हो गये हैं और इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारा काम निश्चित सफल होगा। बनावटी नाम से गोडसे और आप्टे दिल्ली आए। उस बीच ये दिल्ली में हिन्दू महासभा भवन से सम्पर्क में रहे वहाँ केन्द्रीय निर्माण विभाग के फाॅरस्ट गार्ड मेहर सिंह ने उसे टोका था - यहाँ क्यों घूम रहे हो?
          20 जनवरी को विस्फोट के बाद बम्बई के रामनारायण रूइया काॅलेज के प्रध्यापक जगदीश चन्द्र जैन ने बम्बई के मुख्य मंत्री श्री बी. जी. खेर से संपर्क कर सूचना दी- ‘‘मैं मदनलाल को जरूरतमंद निराश्रित समझ  कर कई प्रकार की सहायता करता रहा हूँ। उससे मालूम हुआ कि गांधी जी की हत्या के लिए कोई षडयंत्र रचा जा रहा है। उन्होंने कुछ के नाम और इसकी व्यौरे भी बताई। बम्बई से यह सूचना सरदार पटेल को भी दी गयी। बम्बई की जानकारी के आधार पर सरदार पटेल ने प्रार्थना सभा में सुरक्षा देनी चाही लेकिन गांधी जी ने प्रार्थना के समय मानव सुरक्षा में रहने की अनुमति नहीं दी।’’
          आश्चर्य है कि अधिकारियों के पास निश्चित और ठोस जानकारी थी। प्यारेलाल लिखते हैं कि सड़ांध सरकारी सेवाओं की अनेक शाखाओं में फैल चुकी थी पुलिस भी उससे मुक्त नहीं थी। वे अपनी सहानुभूति और सक्रिय सहायता देते थे। (पृ. 444)
          बहुत से भारतीय इतिहासकार कांग्रेस में उग्रवाद के उदय को दुर्भाग्यपूर्ण घटना मानते हैं। उग्रवादी विचारधारा के समर्थक इस बात के लिए आतुर थे कि भारतीय राष्ट्रवाद को उग्रवाद से जोड़ दिया जाय। तिलक चाहते थे कि हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदाय एकजूट होकर एक सशक्त हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करे। (बी. पी. वर्मा, माडर्न इंडियन पालिटिकल थाट, 1971, पृ. 167)
          भारतीय राष्ट्रवाद धर्मनिरपेक्ष नही हो सकता उसे हिन्दू परम्परा आधारित होना चाहिए। (वही) अरविन्द घोष ने तो यहां तक कहा कि हिन्दू धर्म ही हमारी स्वतंत्रता की अभिलाषा को पूरा कर सकती है। इसीलिए अहलूवालिया साम्प्रदायिकता के उदय को हिन्दू पुनरूत्थानवादियों के साथ जोड़ते हैं। (एम. एस. अहलूवालियाद्व फ्रीडम स्ट्रगल इन इंडिया, 366) इस प्रकार सिद्धान्त रूप में दो राष्ट्रका सिद्धान्त बहुत पहले ही लोगों के मानस में आ गया था। मशहूर शायर इकबाल ने 1930 के इलाहाबाद मुस्लिम लीग सम्मेलन में कहा था कि ‘‘मैं चाहता हूँ कि पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत, सिंध एवं बलूचिस्तान ये सभी एक हो जांय एवं एक राज्य बनंे। मुझे लगता है कि जहां तक पश्चिमोत्तर भारत का संबंध है वहां तक पश्चिमोत्तर मुस्लिम राज्य चाहे वह ब्रिटिश साम्राज्य के बाहर हो या अंदर यही मुसलमानों का आखिरी भाग्य हैं।’’ 1937 के हिन्दू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में खुद सावरकर ने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन किया। 1943 में भी एक अवसर पर सावरकर ने कहा कि ‘‘मुझे जिन्ना के दो राष्ट्र के सिद्धांत को लेकर कोई आपत्ति नहीं है। हम हिन्दू अपने में एक राष्ट्र है और यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हिन्दू और मुसलमान दोनों दो राष्ट्र हैं।’’
          14 जून 1947 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी में विभाजन के प्रस्ताव को पं. गोविन्द वल्लव पंत ने पेश किया जिसकी पुष्टि मौलाना आजाद एवं सरदार पटेल ने की। मौलाना आजाद ने स्पष्ट किया कि कार्यसमिति का यह फैसला बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हमलोगों ने विभाजन को रोकने के लिए पूरी शक्ति लगा दी लेकिन हम असफल रहे। (मौलाना अबुल कलाम आजाद, इंडिया वीन्स फ्रीडम, पृ. 197) विभाजन के प्रस्ताव पर काफी विरोध हुआ। जयप्रकाश नारायण, लोहिया आदि ने लगातार इस प्रस्ताव का विरोध किया। अंत में 15 जून को गाँधी ने इसमें हस्तक्षेप किया और इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने का आग्रह किया। (मेनन, बी. पी. ‘ट्रांसफर ऑफ पावर’, पृ. 386) प्रथम गिनती में प्रस्ताव के पक्ष में 153, विपक्ष में 29 तथा दूसरी गिनती में पक्ष में 157 और विपक्ष में 29 मत पड़े। (द इंडियन एनूअर रजिस्टर, 1947, खण्ड-1, पृ. 137)
          गांधी ने कहा था कि ‘विभाजन मेरी लाश पर होगा’ लेकिन गांधी के जीते जी भारत का विभाजन हुआ। गांधी ने अटूट कोशिश की थी कि 16 मई 1946 का कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव को स्वीकार कर विभाजन को टाला जाय, लेकिन वे विफल रहे। पं. नेहरू ने कहा कि विभाजन उनपर लादा नहीं गया वस्तुतः यह परिस्थिति की विवशता थी। स्वेच्छापूर्वक सहमति से भारत विभाजन को दोनों पक्षों ने कबूल कर लिया। (डा. रामजी सिंह, गांधी के दोषः एक समीक्षा, गांधी ज्योति, 15 अगस्त 1986)
          गांधी ने कहा कि वे इसे अस्वीकार कर सकते थे अगर कांग्रेस को छोड़कर दूसरे नेताओं का दल विकल्प के रूप में रहता, लेकिन देश में कांग्रेस को छोड़कर कोई दूसरा विकल्प नहीं है। कांग्रेस के नेता बूढ़े एवं थक चुके हैं और जो कांग्रेस के रीढ़ की हड्डी का निर्माता है वे ही जब विभाजन स्वीकार कर चुके हैं तो इसे रोकना बड़ी मुर्खता होगी, उन्हें अपने स्थान से हटाना संभव नहीं है। (शंकर घोष, ‘महात्मा गांधी’, 1991 पृ. 341-42)
          जब कुछ लोगों ने गांधी को अनशन करने की सलाह दी तो उन्होंने इसे क्षणिक पागलपन कहा और अंतरात्मा के आदेश के बिना उपवास करना गलत बताया। (डा. राम सिंह, गांधी ज्योति) 15 जून 1947 के ‘हरिजन’ में उन्होंने लिखा है कि मैं इसलिए अनशन शुरू करूँ कि कांग्रेस जो राष्ट्र की प्रतिनिधि संस्था है, मेरी बात नहीं मानी? लेकिन कांग्रेस ने पहले भी मेरी कई बातें नहीं मानी थी मुझे तो सत्य की अंतिम जय के लिए धीरज रखना है। 27 जुलाई 1947 के हरिजन में उन्होंने लिखा है कि विवशता में विभाजन को स्वीकार किया गया है। उसी में वे कहते हैं कि उनका संघर्ष अहिंसात्मक नहीं था निष्क्रिय प्रतिरोध के अलावे कुछ नहीं था। यदि यह वीरों की अहिंसा होती तो भारत का दूसरा चित्र होता और भारत का विभाजन नहीं होता।
          दरअसल गांधी ने विभाजन का हमेशा विरोध किया। गांधी और माउण्टबेटन में इस संबंध में लम्बी बातचीत चली (लारी कालिंस, डोमिनिक लापियर, माउण्टबेटन और भारत का विभाजन, द. 1982, पृ. 41) माउण्टबेटन कहते हैं कि विभाजन से बचने के लिए वे हर तिनके का सहारा लेने को तैयार थे। गांधी को यह विश्वास था कि विभाजन के बावजूद दोनों के बीच जीवन्त एकता कायम हो सकेगी और इसी में वे अपने आपको लगाना चाहते थे। पं. सुन्दरलाल के जीवनगाथा में वर्णित है कि सुन्दरलाल, मृदुला साराभई और राजकुमारी अमृत कौर को पाकिस्तान भेजा गया। अमृत कौर की जगह डा. सुशीला नायर गई। लियाकत अली के साथ लम्बी बातचीत में यह तय किया गया कि दोनों ओर के शरणार्थियों का धाराप्रवाह आगमन रूके। पाकिस्तान सरकार हिन्दू और सिक्खों और हिन्दुस्तान सरकार मुसलमानों के हिफाजत की जिम्मेदारी ले। अपहरण की हुई स्त्रियों को तलाश करने व उनको वापस करने में दोनों सरकारें पूरी तरह मदद करें पाकिस्तान के हिन्दू ट्रांजिट कैम्प में भारत सरकार के सलाहकार और उसी तरह भारत के ट्रांजिट कैंप में पाकिस्तान सरकार का सलाहकार रहे, दोनों देश शक्ति के साथ आततायियों और कातिलों को दबाने के लिए कठोर कदम उठाये। लियाकत अली ने विश्वास दिलाया कि पाकिस्तान निवासी हिन्दू और सिक्ख जो वापस आयेंगे पाकिस्तान की सरकार जमीन और जायदाद वापस दिलाने में कठोर कदम उठायेगी। इस फैसले को कायद-ए-आजम जिन्ना साहब ने भी मंजूर किया। दिल्ली छोड़ने के पहले गांधी जी ने सुन्दरलाल जी से कहा था कि देश के बटवारे को मैं अनैतिक मानता हूँ इसलिए शांति स्थापना के लिए मैं पाकिस्तान जाकर रहना चाहता हूँ। इसकी भी चर्चा कायद-ए-आजम और लियाकत अली से इुई, और उन्होंने इसका स्वागत किया। इस प्रस्ताव को देख गांधी इतमिनान हुए, जवाहरलाल जी के चेहरे पर भी संतोष था। लेकिन बाद में खबर आई कि इसे कैबिनेट की मंजूरी नहीं मिली। पटेल इसके लिए तैयार नहीं थे।
          एक दिन गांधी जी ने सुन्दरलाल जी को अपना प्रतिनिधि बनाकर राष्ट्रपति भवन भेजा जहाँ बैठक चल रही थी। सुन्दरलाल जी ने लिखा है कि कमरे में 8-10 दिल्ली के हिन्दू महासभा और आर. एस. एस. के नेताः जिला मजिस्ट्रेट रंधावा, दिल्ली का मुसलमान चीफ कमिश्नर, बल्लभ भाई और राजेन्द्र बाबू वहाँ बैठे थे। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने कहा कि दिल्ली के मुसलमानों की जान-माल सुरक्षित नहीं है, यह भारत सरकार कर्तव्य है कि दिल्ली के मुसलमानों को सुरक्षित जगह पहुँचाए और मुसलमानों का सुरक्षित जगह पाकिस्तान है। रंधावा के बात की पुष्टि हिन्दू महासभा एवं आर. एस. एस. के नेताओं ने की। राजेन्द्र बाबू के पूछे जाने पर सुन्दरलाल जी ने कहा कि बापू जवाहर लाल और आपके रहते क्या भारत सरकार की पालिसी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट तय करेगा। अगर वह हिफाजत नहीं कर सकता तो इस्तिफा दे दे। दिल्ली को हम मुसलमानों से खाली नहीं होने देंगे। दूसरे दिन रंधावा सुन्दरलाल जी से मिले थे और कहा था आपने मुझे नाहक डांटा, मेरा कोई कसूर नहीं था, मैं तो वही कह रहा था जो गृह मंत्री बल्लभ भाई चाहते थे। बापू ने शहीद के नाम 27 अक्टूबर 1947 को पत्र में लिखा कि हिन्दू और मुसलमान दो राष्ट्र नहीं हैं मुसलमान कभी हिन्दूओं के और हिन्दू कभी मुसलमानों के गुलाम नहीं होंगे। इसलिए आपको और मुझे इन दोनों को मित्रों और भाईयों की तरह साथ रखने की कोशिश में खपना पड़ेगा। उनके यह कहने पर कि भारतीय संघ में उनपर कोई भरोसा नहीं करता। गांधी ने उनसे कहा था कि आपकी नेकनियती का प्रमाण देने का एकमात्र उपाय यह है कि आप पाकिस्तान की अनुचित नीतियों और कार्यवाहियों की सच्चे दिल से साहसपूर्वक निंदा करें। कश्मीर में पाकिस्तान का अगर हाथ है तो भारतीय राष्ट्रीय नागरिक के नाते आप इस विश्वास की घोषणा करें। अगर नहीं तो आप वास्तविकता का पता लगावें। अगर मुझे यह मालूम हो जाय कि मैं गलत हूँ और आप सही हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी। (पूर्णाहुति, खण्ड-4, पृ. 77)
          कश्मीर की रक्षा करते हुए ब्रिगेडियर उसमान और शेरवानी के शहादत पर गांधी जी ने प्रार्थना प्रवचन में कहा कि यह ऐसी शहादत है जिसके लिये किसी भी हिन्दू, सिक्ख या मुसलमान के लिए गर्व होगा। लेकिन गांधी जी का यह मानना था कि यदि पाकिस्तान के मुसलमानों के कुकृत्यों को रोकना या बंद करना है तो संघ के हिन्दूओं के कुकृत्यों की घोषणा पुकार-पुकार कर करनी होगी। (हरिजन, 21 दिसम्बर 1947, पृ. 473, पूर्णाहुति खण्ड 4, पृ. 85)
          हिन्दू कट्टरपंथियों जिनका विश्वास ब्राम्हणवादी व्यवस्था के पुर्नस्थापना, जाति व्यवस्था को कायम करने और आर्थिक विश्लेषण के अनुसार सम्पुर्ण के स्वामित्व के पारम्परिक व्यवस्था को कायम रखने पर था ने हमेशा से ही परिवर्तन का विरोध किया। इनके अनुसार गांधी का वध हुआ जो कभी इतिहास में रावण, कंस और शिशुपाल का हुआ था। एक ही साथ नाथूराम प्रवक्ता, पुलिस, न्यायाधीश और जल्लाद सभी बन जाते हैं और पाप के लिए  बहाना ढूंढ लेते हैं जिसमें 55 करोड़ का भी संदर्भ दिया जाता है। देश के विभाजन के बाद भारत सरकार की कुल सम्पत्ति और नकद रकमों का जनसंख्या के आधार पर बटवारा हुआ। पाकिस्तान को 75 करोड़ देना तय हुआ। 20 करोड़ रूपये दे दिये गये 55 करोड़ बाकी रहा। गांधी जी ने 13 जनवरी को प्रार्थना सभा में उपवास की घोषणा की उसमें 55 करोड़ की बात नहीं थी। 13 जनवरी को नाथूराम ने अपने बीमे की पाॅलिसी नाना आप्टे की पत्नी के नाम करा दी थी और दूसरा पालिसी 14 जनवरी को गोपाल गोडसे की पत्नी के पक्ष में।
          इस प्रकार भारत विभाजन या गांधी की हत्या, 55 करोड़ आदि के कारण नहीं हुई। जहाँतक गांधी पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाया जात है यह साफ है कि मुसलमानों को मुख्य धारा में लाने का प्रयास काफी पहले प्रारंभ हो गया था। 1857 के स्वर्णजयन्ती के अवसर पर सावरकर ने मुसलमानों का उल्लेख इन्द्रधनुष के रंग के रूप में किया था। 1909 में कौमी मतदाता परिषद् बना। तिलक और जिन्ना के पहल पर 1916 के लखनऊ मसझौते में मुसलमानों को जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व देने की बात की। डा. अम्बेदकर को भी स्वशासन का अधिकार केवल मुसलमानों को दिये जाने से एतराज नहीं था। सुभाष बाबू मुसलमानों को कांग्रेस में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिए लड़ते रहे।

प्रो. मनोज कुमार 
निदेशक
महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र 
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा 
mgfgcps@gmail.com