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Sunday, September 30, 2018

एलजीबीटीक्यू+ समुदाय एवं उनके मानवाधिकार


महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र के अंतर्गत 16 सितंबर को 'एलजीबीटीक्यू+ समुदाय एवं उनके मानवाधिकार' विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में छत्तीसगढ़ वेलफ़ेयर बोर्ड की सदस्य रवीना बरिहा, सारथी ट्रस्ट नागपुर के सदस्य आनंद चंद्राणी व छत्तीसगढ़ से ही ट्रान्सजेंडर सामाजिक कार्यकर्ता शंकर यादव ने अपनी बात रखी। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता केंद्र निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने की। सर्वप्रथम आनंद चंद्राणी ने अपनी बात रखते हुए धारा 377 के बारे में बताया व कैसे इस कानून से एलजीबीटीक्यू+ समुदाय प्रभावित होते रहे हैं। आगे उन्होंने बताया कि इस कानून के कारण लोग अपनी यौन रुझान को लेकर शर्म, झिझक व अपराधबोध की स्थिति में रहते हैं। इसका असर यह होता है कि व्यक्ति में एक असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है कि उसका यौन रुझान सही है या नहीं या उसकी तरह वह अकेला ही है या और भी लोग हैं। लोगों द्वारा भी उन्हें कलंकित होना पड़ता है ऐसे स्थिति में वह कई बार आत्महत्या तक भी कर लेते हैं। 12 साल के अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि ज़्यादातर लोग समलैंगिकता को प्राकृतिक-अप्राकृतिक या संक्रामक बीमारी के रूप में देखते हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह कोई बीमारी नहीं हैं और इससे मानव समाज को कोई खतरा भी नहीं है।

अगले वक्ता के रूप में रवीना बरिहा ने अपनी बात की शुरुआत अपनी स्वरचित कविता से करते हुए ट्रान्सजेंडर समुदाय के दर्द को श्रोताओं के सामने रखा व इस पितृसत्तात्मक समाज को कठघरे में खड़ा किया। इसके बाद उन्होंने कहा कि हम उतना ही जानते-समझते हैं जो हमारे सामने मौजूद है और हम उन सभी चीजों को नकार देते हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते। उन्होंने कहा कि यह दुनिया बहुत बड़ी है और इसमें उतनी ही विविधता है। हमारी ज्ञान के सीमित दायरे के कारण ही ट्रान्सजेंडर समुदाय पीड़ित है। जेंडर भूमिका समाजीकरण का हिस्सा है और इसकी शुरुआत बच्चे के जन्म के साथ ही हो जाती है। हम बच्चे को स्त्री-पुरुष व्यवहार के एक खास ढांचे में प्रशिक्षित करते हैं और जो इस ढांचे को स्वीकार नहीं करता उसे हम समाज से बहिष्कृत कर देते हैं। आगे उन्होंने कहा कि ट्रान्सजेंडर व्यक्ति ही वे लोग हैं जो इस खांचे को तोड़ते हैं। उन्होंने समाज में ट्रान्सजेंडर को लेकर भ्रांतियों के बारे में भी बात की। किस तरह लोग ट्रान्सजेंडर का मतलब सोचते हैं कि वह बच्चा को अंतरलिंगी (intersex) हो। जबकि ऐसे बच्चों का जेंडर निर्धारण उनके बड़े होने के बाद वे खुद करते हैं। उन्होंने नालसा जजमेंट का हवाला देते हुए बताया कि ट्रांसजेंडर वे व्यक्ति है जो जन्म से मिले जैविक लिंग के विपरीत व्यवहार करते हैं। हम स्त्रैण व्यवहार के आधार पर किसी को भी ट्रान्सजेंडर नहीं कह सकते। जब तक कि वह व्यक्ति खुद के पहचान को निर्धारित नहीं करता है। उन्होंने ट्रान्सजेंडर समुदाय के उल्लेख को मिथकीय ग्रन्थों से लेकर आधुनिक साहित्य तक बताया।

आगे उन्होंने धारा 377 को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह कानून जितना प्रभावित एलजीबीटीक्यू+ समुदाय को करता है उतना ही प्रभावित यह विषमलैंगिक समुदाय को करता है। यह समाज का समलैंगिकता से डर ही है जिसके कारण इसे खास समुदायों से जोड़कर प्रचारित-प्रसारित किया जाता रहा है। इसके साथ ही उन्होंने ट्रान्सजेंडर समुदाय के साथ होने वाले दुर्व्यवहार व मानवाधिकार हनन के मुद्दों को विस्तार से श्रोताओं के सामने रखा। अंत में अपनी बातों को रखते हुए रवीना ने असमानता, असंवेदनशीलता व अपरिपक्वता को सामाजिक विघटन का प्रमुख कारण बताते हुये अपनी बात को ख़त्म किया।

अगले वक्ता के रूप में शंकर ने अपने बचपन से लेकर अब तक के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने श्रोताओं के सामने अपनी पहचान रखते हुए कहा कि वो ट्रान्सजेंडर हैं और परिवार में सिर्फ इसीलिए स्वीकार है चूंकि अभी भी वो पेंट-शर्ट में रहते हैं। इस तरह से उसे दोहरी ज़िंदगी व्यतित करनी पड़ रही है। उन्होंने आगे कहा कि उसके स्त्रैण व्यवहार के कारण उसे स्कूल में हमेशा चिढ़ाया गया व उसका यौन शोषण भी किया गया। इसके बाद विजय जी ने अपनी बाद रखी जो वर्धा में संचालित संस्था के सदस्य है।

अध्यक्षीय वक्तव्य रखते हुए प्रो. मनोज कुमार (निदेशक, महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक अध्ययन केंद) ने कहा कि समाज को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा खास कर समाज कार्य के विद्यार्थियों और शोधार्थियों को, समाज की हर तरह की विभिन्नताओं के बीच काम करने के लिए अपने आप को तैयार करना होगा। तथा सामाजिक क्रिया को बढावा देना होगा जिससे लोग परिवर्तनों को स्वीकार कर सकें।

इस कार्यक्रम का मंच का संचालन डिसेन्ट कुमार साहू ने किया एवं आभार ज्ञापन नरेश कुमार गौतम ने किया। उक्त कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकगण, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं भारी संख्या में मौजूद थे।










खुशबू साहू और शिवानी अग्रवाल
शोधार्थी समाज कार्य 

Sunday, March 25, 2018

वर्धा : सात दिवसीय संकाय संवर्द्धन कार्यशाला का प्रतिकुलपति ने किया समापन



वर्धा, 25 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के अंतिम दिन प्रथम सत्र में महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के मेडिसिन विभाग के निदेशक प्रो. उल्हास जाजू ने पिछले चार दशकों के अपने अनुभव के आधार पर सामुदायिक स्वास्थ्य को लेकर किए गए प्रयोग पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि हमारे काम की शुरुआत 40 साल पहले इस संदर्भ में शुरू किया था ताकि स्वास्थ्य सुविधाएं ग्रामीण लोगों तक पहुँच सके और इसी कड़ी में ग्रामीण स्वच्छता का मुद्दा हमारे सामने आया। इस कार्य को पूर्ण करने के लिए हमने गांधी, विनोबा तथा सुशीला नायर आदि के विचारों को अपनाया। जिससे हमने ग्रामीण भारत के साथ जुडने की कला सीखी। इसी कड़ी में हमने जयप्रकाश नारायण के विचारों को भी अपनाया।

उन्होंने आगे कहा कि समता, स्वतंत्रता तथा मैत्री के आधार पर ही अपने ध्येय को प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए सत्ता का विकेन्द्रीकरण आवश्यक शर्त बन जाती है। गांधी के अनुसार ग्रामीणों में सत्ता का विकेन्द्रीकरण ही सच्चा 'हिन्द स्वराज' लाएगा। इसी कड़ी में हमने गांधी-जीवन के आदर्शों को अपनाते हुए श्रम आधारित समाज रचना की स्वीकार्यता को अपनाया। प्रो. जाजू ने आगे कहा कि गांधी ने ग्राम स्वराज का सपना देखा जिसे विनोबा जी ने भूदान-ग्रामदान के जरिये आगे बढ़ाने की कोशिश की थी। विदर्भ के गढ़चिरौली जिले में मेंढ़ा-लेखा इसी तरह का प्रयोग है जो आज भी हमें देखने को मिलता है।
            उन्होंने कहा कि गांधी अंत्योदय से सर्वोदय अर्थात समन्वय की बात करते थे। हमने लाओत्से का निम्न मंत्र अपनाया-
            लोगों की ओर जाओ
            उनके साथ काम करो
            उन्हें समझो
            उनसे सीखें
            उन्हें प्रेम करें
            उनके साथ नियोजन करें
            उनके साथ कार्य करें!
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हुए हमने यह ध्यान रखा कि यह 'for the people' अर्थात जनता के लिए हो। हमें कुछ समस्याओं के साथ भी जूझना पड़ा। यहाँ के लोगों के लिए आज सबसे महंगा स्वास्थ्य खर्च माना जाता है। गांवों की संस्कृति, उनका जीवन अनुभव आदि को समझे बगैर तथाकथित पढ़े-लिखे लोग केवल विकास के नाम पर आउटसाइडर के रूप में काम करने की सोचते हैं। जिसमें उन्हें भीख से ज्यादा नहीं देते, ऐसे में हम इसे समुदाय सहभागिता कैसे कहें! यह एक गंभीर प्रश्न है। अक्सर हम गाँव वालों पर थोंपने की ही कोशिश करते हैं। आज एक ओर विज्ञान नये-नये लक्ष्यों की प्राप्ति की है लेकिन कहीं भी इसको अच्छे उपयोग के लिए नहीं अपनाया गया। इसे ज़्यादातर दुरुपयोग के लिए ही उपयोग में लाया जाता है। विनोबा को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान रथ के घोड़े की तरह है जिसकी लगाम अपने अच्छे लोगों के हाथ में होने की आवश्यकता है।
            उन्होंने कहा कि गांवों में हम ऐसा क्यों समझते हैं कि ग्रामीणों को हम अक्ल सिखाने जा रहे हैं? गांवों के लोगों के विज़डम को भी हमें समझना होगा। एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि गाँव में वट वृक्ष की पूजा करने वाली महिलाओं से यह पूछा गया कि आपने किसकी पूजा की तो उनका उत्तर था पति अर्थात शिव की। मेरे प्रश्न के जवाबी उत्तर में कि क्या किसी देवी की पूजा होती है तो उनका जवाब था 'साहब उनकी पूजा तो रोज ही होती है।' अर्थात 85% महिलाओं को आज भी पति के द्वारा पीटा जाता है, जिसे वे महिलाएं व्यंग्यपूर्वक पूजा कह रही थी।
            उन्होंने आगे कहा कि आम लोगों तक वास्तविक लाभ पहुँचाने के लिए हमें समाज की संरचना को बदलना होगा जिसके लिए राजनैतिक मंशा की आवश्यकता ज्यादा है। अपने प्रयोग पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हमने गांवों में फ्री में कोई भी सेवा नहीं दी और वहाँ के लोगों की सहभागिता के आधार पर ज्वार, धान आदि को इकट्ठा कर उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं दी गई। इस गतिविधि के माध्यम से ग्रामीणों में 'राइट टू डिमांड' के प्रति जागरूकता को बढ़ाने की कोशिश की। उन्होंने ट्रस्टीशिप की भावना के विकास पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत में आज भी स्वास्थ्य पर कुल GDP का मात्र 1.4 फीसदी ही खर्च किया जाता है। जबकि यूएनडीपी के मुताबिक यह 5 से लेकर 10 फीसदी तक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रति व्यक्ति के आधार पर ग्राम सभा के जरिये संसाधनों का बंटवारा हो और ग्रामीण लोगों के हाथों में निर्णय प्रक्रिया हो तभी गांवों का समुचित विकास मुमकिन हो सकता है। साथ ही उन्होंने समुदाय सहभागिता के मूलतत्व बताएं जिसमें से कुछ इस प्रकार है-
            -समुदाय द्वारा स्वीकृति
            -समुदाय द्वारा सहयोग
            -समुदाय द्वारा पार्टनरशिप
            -समुदाय द्वारा सहभागिता
            उन्होंने इसका उदाहरण बताते हुए बताया कि क्रांति सातत्यपूर्ण होती है, नित-नवीनतम होती है। मेंढ़ा-लेखा जैसे गाँव में ग्राम सभा को भूस्वामित्व ग्रामसभा को सौंपने में 35 साल लगे। ऐसे गाँव में सही मायने में ग्रामीण सहभागिता के उक्त सभी मूल तत्वों को देखा जा सकता है। आगे उन्होंने कहा कि हमने गांवों में स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने हेतु जिस तरीके को अपनाया वह यह थी- शुरुआत में हमने घर-घर जाकर ग्राम वासियों को स्वच्छता के बारे में बताना शुरू किया। इस कार्य में ग्रामीणों की सहभागिता के साथ-साथ कुछ संस्थाओं से मदद ली गई। खुले में शौच जाने को खत्म करने हेतु अलग-अलग मोहल्ले में एक-एक टाइलेट बनाया गया लेकिन इसका उपयोग देखा कि लोग लकड़ी, बकरी आदि को रखने के लिए किया जाने लगा। जब हमने वहाँ की वृद्ध महिलाओं से बातचीत की कि ऐसा क्यों हुआ! तब उन्होंने बताया कि 'हर परिवार की महिलाओं को ही दूर-दूर के कुएं से पानी ढोकर लाना होता है। घर के सात लोगों के लिए नहाने, कपड़े धोने से लेकर पीने व रसोई के लिए पानी लेकर वे ही आती हैं। उसमें भी अब आपकी टाइलेट के लिए अलग से पानी लाकर मेरी बहू को मारना है क्या? तब जवाब में मैंने खिसियाहट के साथ कहा कि फिर सुबह-सुबह सलामी देने का शौक क्यों है? वृद्धा ने जवाब दिया कि गीली जमीन, बिजली की कमी तथा बिच्छू, साँप के डर से महिला-पुरुष रास्ते के दोनों अलग-अलग किनारे पर टायलेट के लिए जाते हैं। इस तरह हमने उनसे वहाँ से अक्ल प्राप्त की और विज्ञान का आधार लेते हुए उनकी आवश्यकताओं के अनुसार कम पानी खर्च होने वाला शौचालय बनाया गया। इसे बनाने एवं उपयोग में लाने में पाँच साल लगे। आगे इस परियोजना को गांवों में क्रियान्वित करने के लिए ग्रामीणों के द्वारा ही किये जाने की प्रविधि को अपनाया गया जिसका अंतिम उद्देश्य 'ग्राम स्वराज' था। उन्होंने कहा कि बिना लोकशक्ति के गाँव में कोई भी परिवर्तन नहीं लाया जा सकता है। शक्ति के आधार पर, नैतिकता के आधार पर हमने वहाँ कार्य किया, जाति-धर्म से अलग आर्थिक क्षमताओं के आधार पर सामाजिक संरचना का निर्माण करना। व्यक्ति तथा सामाजिक योगदान को बढ़ावा दिया। श्रमदान, समर्थ की पहचान की गयी इसी से सहभागितापूर्ण नेतृत्व का निर्माण हुआ।
            उन्होंने आगे कहा कि हमने अपने प्रयोगों में से जो पाया वह यह था कि ग्रामीण लोगों के अनुभवों के आधार पर ही उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य होना चाहिए। दान का स्वरूप भीख न हो बल्कि लोकशक्ति के रूप में उसका उभार होना चाहिए। दानकर्ता को ट्रस्टी के रूप में होना चाहिए न कि दाता के रूप में। संसाधन ग्राम सभाओं के हाथ में होने चाहिए। इस पूरे कार्य को करने के लिए तंत्र-मंत्र के साथ-साथ व्रत लेना जरूरी है। हम सब जब व्रती के रूप में सामाजिक जीवन का निर्वहन करेंगे तभी अच्छे समाज का निर्माण होगा। मेंढ़ा-लेखा इस मामले में काफी आगे निकाल चुका है। हम भी समाज का मंगल चाहते हैं तो इस तरह के प्रयोगों को आगे बढ़ाना होगा।

द्वितीय सत्र में ग्रुप प्रस्तुति हुई। अशोक सातपूते, राहुल निकम, गजानन नीलामे, डिसेन्ट कुमार द्वारा लेखा-मेंढ़ा के सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षिक स्थिति के अध्ययन के आधार पर अपना रिपोर्ट प्रस्तुत किया। रिपोर्ट में उन्होंने कहा कि वहाँ की शैक्षिक स्थिति बहुत ही निम्नतर है तथा गाँव में इसको लेकर एक प्राथमिक स्कूल के अलावा दूसरा कुछ संसाधन भी नहीं दिखाई दिया। निकम ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि उस गाँव में दोपहर के अनुचित समय में जाने के कारण ज्यादा जानकारी नहीं प्राप्त हो सकी, किन्तु ग्रामीणों की सहभागिता काबिल-ए-तारीफ़ है। गांवों में कई सारे गलत चीजों पर प्रतिबंध लगाया गया है। वहीं अशोक सातपूते ने मेंढ़ा लेखा के विवाह संस्था का विस्तृत विश्लेषण सबके सामने रखा। अंत में सभी ने सेवाग्राम गाँव की संरचना पर अपनी बात रखी। 
            समृद्धि डाबरे ने अपने ग्रुप का प्रतिनिधित्व करते हुए महिलाओं से संबन्धित समस्याओं पर बात रखी। डॉ. शिव सिंह बघेल ने मेंढ़ा लेखा पर विस्तृत प्रस्तुति दी। साथ ही सेवाग्राम गाँव की महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर बात की। अंत में दोनों की तुलना के आधार पर गांवों के बेहतरी के लिए विकल्प प्रस्तुत किए।
            खेती-किसानी और शिक्षा के मसले पर गठित समूह ने मेंढ़ा-लेखा और सेगांव के शैक्षिक भ्रमण के हवाले से अपने अनुभव साझा किए। इस समूह में डॉ. मुकेश कुमार, डॉ. देवशीष मित्रा एवं डॉ. पार्थसारथी मालिक, नरेश गौतम शामिल थे। इस समूह की तरफ से डॉ. पार्थसारथी ने अपने अनुभव रखते हुए कहा कि पढ़े-लिखे लोग सैद्धान्तिक चर्चा मात्र करते हैं किन्तु गाँव के लोग उसको व्यवहार में उपयोग में लाते हैं। श्याम शर्मा ने भी मेंढ़ा लेखा के अपने अनुभव शेयर किए। उन्होंने गाँव के सांस्कृतिक पहलू को रेखांकित किया। टी. राजु ने भी अपने अनुभव बताए। मेंढ़ा लेखा गाँव में की जा रही बांस की खेती के बारे में भी उन्होंने चर्चा की।
            चर्चा के अंत में प्रो. उल्हास जाजू ने मेंढ़ा-लेखा गाँव के बनने की पूरी प्रक्रिया की संक्षिप्त चर्चा की। उन्होंने बताया कि वनों पर सामुदायिक अधिकार कानून बनाने के साथ-साथ इस गाँव ने सबसे पहले उसे हासिल भी किया। तत्कालीन केंद्रीय वन-पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने उस गाँव में आकार वनों पर सामुदायिक अधिकार की घोषणा की थी। उन्होंने बताया कि तीन वर्ष पूर्व इस गाँव ने अपनी भूमि ग्राम सभा को दान कर दिया है। अब वहाँ भूमि की मिल्कियत पर व्यक्तिगत मालिकी नहीं है। ग्राम सभा ने हर किसी को उस भूमि पर कृषि करने हेतु दे रखी है। श्रमजीवी समाज के लिए इस गाँव ने एक नया आदर्श खड़ा किया।

इस सात दिवसीय कार्यशाला के समापन-सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने की। संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया। उक्त मौके पर प्रो. उल्हास जाजू, विश्वविद्यालय के कुलसचिव कादर नवाज खान, डॉ शंभू जोशी एवं एनसीआरआई के डॉ. डी. एन. दास मौजूद थे। एनसीआरआई के डॉ. डी. एन. दास को प्रतिकुलपति ने अंगवस्त्र, सूत की माला व चरखा भेंट कर सम्मानित किया। समापन सत्र में पूरे कार्यक्रम की संक्षिप्त रिपोर्ट डॉ. मुकेश कुमार ने प्रस्तुत किया। समापन सत्र में दो प्रतिभागियों टी. राजू एवं डॉ. राहुल निकम ने बारी-बारी से अपने अनुभव शेयर करते हुए बताया कि इस कार्यशाला से उन्हें काफी फायदा मिला और ग्रामीण समुदाय को सूक्ष्मता से जानने-समझने का मौका मिला। दोनों ने कहा कि इस किस्म का फ़ैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम एक सप्ताह मात्र न होकर पंद्रह दिनों का होना चाहिए। उक्त मौके पर एनसीआरआई के डॉ. डी. एन. दास ने अपना मत प्रकट करते हुए कहा कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय ने यह आयोजन कर महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने प्रतिकुलपति और कुलसचिव से ग्रामीण समुदाय से लगाव बढ़ाने हेतु इसे पाठ्यक्रम का अंग बनाने में सहयोग का अनुरोध किया। समापन सत्र में ही प्रतिकुलपति एवं कुलसचिव के हाथों सभी प्रतिभागियों के बीच प्रमाण-पत्र वितरित किया गया।

समापन सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने कहा कि ग्रामीण समुदाय पर केन्द्रित महत्वपूर्ण कार्यशाला सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए आप सभी बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि भारत के गाँव तमाम अभावों के बावजूद विशिष्टता लिए हुए हैं। गाँव में आतिथ्य भाव आज भी कायम है। गाँव से आज भी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। गांव में आज सुविधाओं का अभाव है, लोग बड़े पैमाने पर गाँव से विस्थापित हो रहे हैं। उन्होंने महाराष्ट्र के चर्चित मॉडल गाँव हिबरे बाजार के प्रयोग की भी चर्चा की। प्रतिकुलपति ने एनसीआरआई से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में एक स्थायी केंद्र बनाने का भी निवेदन किया, जहां वर्ष भर इस प्रकार के ग्राम केन्द्रित कार्यक्रम संचालित किए जा सकें। समापन सत्र में सभी प्रतिभागियों को कुलसचिव कादर नवाज खान ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, गजानन एस. निलामे एवं डिसेन्ट कुमार साहू.


Thursday, May 18, 2017

'हमारा होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है'

जिन लोगों के जेंडर तथा यौनिक व्यवहारों को लेकर हमारे समाज में ढेर सारी गालियां बनी हो, वहाँ ऐसे लोगों पर उपहास करना, उनके साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार व उन्हें समाज में कलंकित मान लेना अभी भी आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन जब शोषित समूह के लोग स्वयं को छुपाने के बजाए समाज के सामने ढ़ोल की ताल पर थिरकते हुए, लाउडस्पीकर पर अपनी पहचान को समाज के सामने रखते हुए नारा लगाए कि 'हमारा होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है।', 'हमें चाहिए आज़ादी -प्यार करने की आज़ादी, भेदभाव के बिना जीने की आज़ादी।'  तो लोगों को यह दृश्य आश्चर्यचकित कर रही थी। यह मौका था नागपुर में आयोजित दूसरे LGBTQ प्राइड मार्च का जिसमें समूह के लोग तथा देशभर से आए LGBTQ अधिकारों के समर्थक एकत्रित हुए थे। मार्च के द्वारा धारा 377 का विरोध करते हुए स्वीकार्यता, सम्मान, स्वतन्त्रता, शिक्षा, रोजगार, जैसे मानवीय अधिकारों की मांग भी की गई।
बैंगलोर से आए समीर कहते है - 'आज मैं विशेष तौर से इस मार्च में शामिल होने के लिए आया हूँ। मैं इस लड़ाई में अपने लोगों के साथ हूँ। आज इतने सारे लोगों को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। संविधान में हमें जो भी वैयक्तिक अधिकार मिले है वो हमें भी मिलना चाहिए। धारा 377 हटाई जाए और संवैधानिक अधिकार दी जाए, हमें भी जीने का अधिकार है।'
प्राइड मार्च समाज के लिए जरूरी क्यों है? पुछें जाने पर मुख्य अतिथि के रूप में गुजरात से आए मानवेंद्र गोहील ने कहा कि 'जरूरत इसलिए है कि हमें समाज को बताना है कि हमारी संख्या भले ही कम है, लेकिन हमारी उपस्थिती है और हमें गर्व है कि हम क्या है। प्रत्येक इंसान को आज़ादी से जीने का हक है तो हमें क्यों नहीं मिला है? जब भारतीय संविधान में सभी लोगों को समानता और सम्मान से जीने का हक है तो हमें क्यों नहीं? हमें हमारे तरीके से जीने दिया जाए, प्यार करने की आज़ादी हो। हम पैदाइशी ही ऐसे है, हमारा कोई दोष नहीं कि हम ऐसे है। ये हमारे लिए आज़ादी की लड़ाई है।'
आगे उन्होंने कहा कि 'हमें अब दूसरे लोगों का भी सहयोग मिल रहा है, कुछ माँ-बाप भी समझने लगे है कि बच्चों से ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती, उन्हें अपने जीवन साथी चुनने का अधिकार देना होगा।' मीडिया किस तरह से उन्हें अब पेश कर रही है? पुछे जाने पर उन्होंने कहा कि 'LGBTQ समूह को लेकर मीडिया प्रेजेंटेशन में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है। मीडिया काफी सकारात्मक हुई है, अब हमारी समस्याओं के बारे में भी लिख रहे है। युवाओं में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है, अब वे भी इन विविधताओं के बारे में जानना चाहते है।'

पिऊ जो नागपुर की ही है, वे कहती है 'आज पहली बार लड़कियों की तरह तैयार होकर इस मार्च में शामिल हो रही हूँ। थोड़ी सी डरी हुई हूँ कि कहीं घर वालों को पता न चल जाएँ, लेकिन मैं खुश हूँ कि जैसा मैं महसूस करती हूँ उसी रूप में समाज के सामने हूँ।'

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 अप्रैल 2014 को ट्रान्सजेंडर को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता देने तथा उनके स्थिति में सुधार के लिए उचित कदम उठाने के दिशानिर्देश के बावजूद अभी भी सरकारी प्रयास न के बराबर ही है। यही कारण है की पिऊ तथा पिऊ के जैसे हजारों ट्रान्सजेंडर को अपनी पहचान छुपाकर जीवन व्यतित करने के लिए मजबूर हैं।

जब भी LGBTQ अधिकारों की बात की जाती है तो समलैंगिकता को लेकर प्राकृतिक-अप्राकृतिक, नैतिक-अनैतिक, वैध-अवैध कि बहसे तेज हो जाती है। धारा 377 को हटाने के लिए एक लंबी बहस समलैंगिकता के अपराधीकरण को मानव अधिकारों के हनन के रूप में हुई है। संवैधानिक बहसो में जिन अधिकारों को लेकर चर्चा हुई है उनमें समानता, सम्मान, गोपनियता तथा भेदभाव व स्वतन्त्रता शामिल है। इन तमाम बहसों के बाद भी भारतीय कानून समलैंगिकता को अपराध मानता है। भारतीय दंड संहिता, धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) इस प्रकार से है - “जो भी कोई स्वेच्छा से किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध कामुक संभोग करता है, उसे आजीवन कारावास या फिर 10 वर्षों तक बढ़ाई जा सकती है और जुर्माना भी हो सकता था।" धारा यह स्पष्ट नहीं करती कि 'अप्राकृतिक' यौन क्या-क्या है, इसके साथ ही ‘लिंग प्रवेश यौनिक संभोग को स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।' इस व्याख्या के कारण इसमें मुख व गुदा भी शामिल हो जाता है।  

यह कानून औपनिवेशिक काल में 'यौन आनंद' के निषेध के लिए बनाया गया था इस तरह ऐसे सभी यौनिक व्यवहारों को आपराधिक करार देने के लिए बनाया गया था जो प्रजनन प्रक्रिया से जुड़े नहीं है। यह कानून समलिंगी गतिविधियों के साथ विषमलैंगिक व्यवहार वाले जोड़े पर उस दशा में लागू होता है जब वह मुख मैथुन (oral sex), गुदा मैथुन (anal sex) या हस्तमैथुन करते हैं। फिर भी होमोफोबिया (समलैंगिकता के प्रति भय) के कारण हमेशा ही समलैंगिक गतिविधियों वाले लोगों को ही निशाना बनाया जाता रहा है। इसलिए धारा 377 का विरोध सभी नागरिकों को करना चाहिए, इसे सिर्फ समलैंगिक सम्बन्धों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत में समलैंगिकता को लेकर राजनैतिक मांग के रूप में धारा 377 के खिलाफ संघर्ष की शुरुवात वैश्विक परिदृश्य की तुलना में बहुत बाद में 1990 से मान सकते हैं जब पहचान आधारित आंदोलनों के उभार ने हाशिए के समाजों को अपने अधिकारों के लिए संगठित किया।   

डिसेन्ट कुमार साहू
शोधार्थी - समाजकार्य विभाग
म. गां. अं. हि. वि. वि. वर्धा 

मनुष्यता से जुड़ा हुआ है पर्यावरण का मुद्दा: प्रो. मनोज कुमार


तथाकथित विकास से उत्पन्न समस्याओं ने आज पूरे विश्व को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि विकास की इस राह पर ज्यादा दिनों तक चला नहीं जा सकता है। वैसे तो यह सोचते-सोचते 50 वर्ष से भी अधिक का समय गुजर चुका है क्योंकि इसकी शुरुवात 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के स्टाकहोम सम्मेलन से होती है, जहां विकास से उपजे पर्यावरणीय प्रदूषण और संसाधनों के खत्म होने की चिंता को लेकर सौ से अधिक देशइकट्ठा हुए। विकास की इन समस्याओं को देखते हुए 'बुंटलैंड आयोग' ने 'स्थायी विकास' का नारा दिया। तब से लेकर अब तक विभिन्न मंचों से सतत या स्थायी विकास का नारा बुलंद किया जाता रहा है। इस वर्ष के विश्व समाज कार्य दिवस का उद्देश्य भी पर्यावरण और इंसानी अस्तित्व की निरंतरता (Sustainability) को बढ़ावा देना रहा। इसी क्रम में 21 मार्च को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी समाज कार्य अध्ययन केंद्र के द्वारा विश्व समाजकार्य दिवस, 2017 पर एक परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। परिचर्चा इस वर्ष का विषय ग्लोबल एजेंडे का तीसरा स्तम्भ 'सामुदायिक और पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देना' रहा।
केन्द्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि पर्यावरणीय मुद्दे पर दुनिया की तमाम सरकारें एक तरह से सोच रही हैं और जनता दूसरे तरीके से सोच रही है। जब तक हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित नहीं करेंगे तब तक पर्यावरण की सुरक्षा नहीं होगी। आगे उन्होने कहा कि पर्यावरण का मुद्दा मनुष्यता से जुड़ा हुआ है। इस परिचर्चा को आगे बढ़ते हुए सहायक प्रोफेसर श्री आमोद गुर्जर ने कहा कि सतत विकास की अवधारणा व्यक्ति केन्द्रित है जबकि इसे समग्र उपागम (holisticapproach) को अपनाना होगा। हमने मानव अस्तित्व पर संकट आने के बाद ही 'सतत विकास' की अवधारणा अपनाई।डॉ. शिव सिंह बघेल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए यह कहा कि विद्यार्थियों को अपना लक्ष्य ऐसा बनाना चाहिए ताकि वे स्वयं को वैश्विक एजेंडे से जोड़ सके और ग्राम स्तर तक पहुंचाए।
डॉ. मिथिलेश ने कहा कि वैश्विक स्तर तथा भारत में भी संसाधनों के बड़े भाग पर चंद लोगों का आधिपत्य है जबकि एक बड़ा भाग अपना जीवन गरीबी और अभाव में व्यतीत कर रहा है इसलिए हमें संसाधनों के न्याय पूर्ण वितरण पर ध्यान देना होगा। परिचर्चा के दौरान उपस्थित सभी सहभागियों नेइस मुद्दे पर अपनी बात रखी। ज़्यादातर विद्यार्थियों ने अपने आस-पास विकास के नाम पर उत्पन्न हो रहे विसंगतियों को प्रमुखता के साथ रखा।
कार्यक्रम का संचालन नरेन्द्र कुमार दिवाकर ने किया। प्रास्ताविक डिसेन्ट कुमार साहू ने रखा और आभार गजानन निलामे ने किया। इस परिचर्चा में केंद्र के निदेशक प्रो.मनोज कुमार,डॉ. मिथिलेश कुमार, डॉ. शिव सिंह बघेल, सहायक प्रोफेसर श्री आमोद गुर्जर तथा केंद्र केनरेश गौतम, श्याम सिंह, आशुतोष, छविनाथ यादव,विलास चुनारकर, अनुराग पाण्डेय, शीना नेगी, सुधीर कुमार,अदिति, आनीता और शुभांगी सहित बड़ी संख्या में समाज कार्य के शोधार्थी/विद्यार्थी और एन जी ओ प्रबंधन के विद्यार्थी उपस्थित रहे।
नरेंद्र कुमार दिवाकर
शोधार्थी समाजकार्य