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Monday, March 19, 2018

ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन


वर्धा, 19 मार्च, 2018  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र और राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। जिसमें महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, बिहार, तमिलनाडू, नागपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर विश्वविद्यालय,  कोयंबटूर विश्वविद्यालय एवं हरियाणा के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने की और संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। स्वागत वक्तव्य देते हुए केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि अपेक्षा है कि इन सात दिनों में हम संकाय संवर्द्धन कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा करेंगे। पाठ्यक्रम का सामाजिक सरोकार स्पष्ट होना चाहिए। आज पाठ्यक्रम और समाज एक-दूसरे से जुड़ नहीं पा रहा है। पाठ्यक्रम को समाज की जरूरतों के अनुकूल और समाज को बेहतर दिशा में ले जाने वाला होना चाहिए। 

एनसीआरआई- नेशनल काउंसिल ऑफ रुरल इंस्टीट्यूट के डी.एन. दास ने उक्त अवसर पर कहा कि 1995 से एनसीआरआई कार्यरत है। इसका उद्देश्य ग्रामीण भारत के विश्वविद्यालयों को ग्रामीण जरूरतों से जोड़ना है। इसके अनुरूप पाठ्यक्रम को विकसित करने और ग्रामीण समुदाय के साथ तादात्म्य स्थापित करना ही इसका उद्देश्य है।

 अपने अध्यक्षीय वक्तब्य में प्रतिकुलपति प्रो. आनंदवर्द्धन शर्मा ने कहा कि बड़ी उत्सुकता की बात है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय और एनसीआरआई मिलकर सात दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन कर रही है। आपको बताना चाहूँगा कि यह कार्य बहुत बड़ा है। विश्वविद्यालया में वर्ष भर में बहुत से कार्यक्रम होते हैं जो कि बड़ी छाप छोड़ते हैं। उन्होंने उक्त मौके पर कहा कि महात्मा गांधी और विनोबा की कर्मभूमि पर आयोजित हो रही इस कार्यशाला से ग्रामीण क्षेत्र और ग्रामीण विकास से संबन्धित पाठ्यक्रम विकसित करने में मदद मिलेगी। उन्होंने इस कार्यशाला की सफलता के लिए शुभकामना व्यक्त की। उदघाटन सत्र के अंत में आभार प्रकट करते हुए विश्वविद्यालय के कुलसचिव कादर नवाज खान ने कहा कि उम्मीद है कि देश के विभिन्न हिस्सों से आए समाज कार्य के प्राध्यापक इस कार्यशाला से नए अनुभव लेकर जाएंगे।

'ग्रामीण समुदाय का परिचय और संवेदनशीलता' विषयक प्रथम चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए स्नातकोत्तर समाजशास्त्र विभाग, संत तुकड़ोजी महाराज विश्वविद्यालय, नागपुर के प्रो. अशोक बोरकर ने पुरातात्विक सर्वेक्षणों के हवाले से प्राचीनकालीन सामाजिक संरचना के बारे में विस्तारपूर्वक बताया। पुरातात्विक अवशेषों से हमें उत्पादक जातियों के अवशेष मिलते हैं। मातृदेवी, यक्ष-यक्षणी के भी अवशेष मिलते हैं, इसके बाद वैदिक साहित्य से भी हमें पुराने समाज की जानकारी प्राप्त होती है। वैश्यों-क्षत्रियों के गाँव की भी हमें जानकारी मिलती है। हमें आदिवासी गांवों के बारे में भी अहम जानकारियाँ प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि गोंडों का सामुदायिक बोध और पंचायत व्यवस्था अत्यंत ही सुदृढ़-विकसित व्यवस्था आज भी कायम है। उन्होंने कहा कि गाँव एक समुदाय है, उसमें सामुदायिक भावना है। गाँव के लोग सामान्य जीवन जीते हैं। कृषि उनका प्रमुख व्यवसाय है। ग्रामीण समुदाय में एक्य भाव होता है। भारत में हर दौर में सामाजिक व्यवस्था पर सबसे ज्यादा ज़ोर दिया जाता रहा है। कृषि समस्या पर फोकस नहीं किया जाता रहा है। 18वीं सदी में महात्मा फुले ने ही इस पर मजबूती से अपनी बात रखी है। अंग्रेजों के भारत आने के पूर्व भारत के गाँव को स्वयंपूर्ण इकाई मानते थे। प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे की मान्यता थी कि भारत के गाँव स्वयंपूर्ण नहीं थे। कई मामलों में ये गाँव एक-दूसरे पर निर्भर थे। दुबे ने ग्रामीण व्यवस्था के अपने महत्वपूर्ण अध्ययन के निष्कर्ष के आधार पर उक्त बातें कही थी। पश्चिमी समाजशास्त्री राबर्ट रेडफ़ील्ड के विचारों से एस.सी. दुबे के विचार मेल खाते हैं।

आगे उन्होंने कहा कि परिवार भारतीय गाँव की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। उसके बाद दूसरी सबसे महत्वपूर्ण इकाई जाति व्यवस्था है। गाँव में वर्चस्वशाली परिवार गाँव के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक मसलों को नियंत्रित करता है। इन्के परिवार के रिश्तेदार भी इसमें अहम भूमिका अदा करते हैं। उसी प्रकार जाति संरचना भी कार्य करती है। इसका स्थान परिवार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इस प्रकार वर्चस्वशाली जातियों का ग्रामीण समाज पर पूरी तरह से नियंत्रण रहा है। जाति व्यवस्था की संरचना सीढ़ीनुमा है। जाति-वर्ग की संरचना में ब्राम्हण और अस्पृश्य का स्थान नियत होता है, बाकि जाति-वर्ण का स्थान बदलता रहता आया है। उन्होंने कहा कि सरकार की बहुत सारी योजनाएँ अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाती हैं, इसकी जड़ें भी जाति वयवस्था में निहित हैं। गांवों में आज भी अंधविश्वास, जातीय हिंसा और जजमानी व्यवस्था कायम है। इसी के चलते पहले भी गांवों में श्रमिकों का शोषण किया जाता था। अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व भारत में कृषि के साथ-साथ वस्त्र उद्योग और चर्म उद्योग का जाल बिछा हुआ था। यही कारण है कि हर कोई किसी न किसी प्रकार से जीवित रह लेता था। भारत में संयुक्त परिवार कृषि व्यवस्था के अनुकूल थे। देश के वर्तमान कृषि संकट को इसके आईने में समझने की जरूरत है।
            उन्होंने कहा कि गांधी के आगमन के पूर्व भारत का स्वतंत्रता आंदोलन शहर केन्द्रित था। गांधी ने इस केंद्र को बदलकर गाँव केन्द्रित किया था। गांधी की मान्यता थी कि अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भारत के गाँव समृद्ध व साधन संपन्न थे। गांधी के लिए भारत की स्वतंत्रता का अर्थ गांवों की स्वायत्ता थी। वहीं डॉ. अंबेडकर और नेहरू की गांवों के संबंध में दृष्टि भिन्न थी। इनके अनुसार गांवों में लोगों के कर्त्तब्य तो परिभाषित थे, किन्तु ज़्यादातर लोगों के कोई अधिकार नहीं थे। गाँव गणतन्त्र नहीं था, क्योंकि गाँव पर वर्चस्वशाली जातियों का ही आधिपत्य कायम था। वर्चस्वशाली जातियों का आर्थिक संसाधनों व राजनीतिक व्यवस्था आदि पर वर्चस्व रहा है। नेहरू जाति आधारित श्रेणीक्रम को आधुनिक समाज के लिए अनुपयोगी मानते थे। जाति-व्यवस्था मानवाधिकारों के हनन करने के साथ-साथ अवसरों की असमानता के लिए जिम्मेदार रही है। जबकि डॉ. अंबेडकर राजनीतिक लोकतन्त्र के साथ-साथ सामाजिक लोकतन्त्र की बात करते हैं। डॉ. अंबेडकर ने भारतीय सभ्यता को हिन्दू सभ्यता करार देते हुए कहा कि इसमें अस्पृश्यों के लिए कोई स्थान नहीं था। संविधान सभा का बहुमत चाहता था कि गाँव स्वतंत्र भारत की इकाई बने, अंबेडकर इसके खिलाफ थे।

भोजनावकाश के उपरांत 'ग्रामीण समाज की आर्थिक और राजनीतिक संरचना' विषय पर केन्द्रित चर्चा सत्र प्रारम्भ हुआ। विषय विशेषज्ञ नागपुर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रो. श्रीनिवास खानदेवाला ने कुछ सवालों के जरिये अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि क्या भारतीय समाज का राजनैतिक ढांचा पर्याप्त है? उसी प्रकार क्या भारतीय समाज का आर्थिक ढांचा संतोषजनक है? इस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। राजनैतिक पहलू का निर्माण समाज के नियंत्रण कायम किए जाने की जरूरतों के फलस्वरूप होता है। अनियंत्रित समाज का वांछित विकास नहीं हो पाता है, इसमें बिखराव, दिशाहीनता की संभावना बनी रहती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए राजतंत्र का निर्माण हुआ था। स्वतंत्रता के बाद भारत ने जनतंत्र स्वीकार किया। इससे पूर्व पुराने जमाने में आम लोग राजतंत्र में इतना यकीन रखते थे कि राजा की मृत्योपरांत राजा के छोटे से छोटे बच्चे को राजा के बतौर स्वीकार कर लेते थे। फिर राजा को शिक्षित-प्रशिक्षित करने की व्यवस्था थी। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज अभी पूरी तरह से लोकतान्त्रिक नहीं हुआ है। अमेरिका आदि देशों में राष्ट्रपति को सुझाव देने हेतु अलग-अलग विभागों की अलग-अलग सलाहकार समिति बनी हुई है जिसके सुझावों पर राष्ट्रपति अमल करते हैं।
            भारत में आज भी निर्णय प्रक्रिया में इस किस्म की परिपक्वता का अभाव देखा जा सकता है। इसका परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है। इसलिए लोककल्याण और सरकार के नीति निर्धारण में कमी रह जाती है। इसके बीच तालमेल की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए। जनतंत्र में निर्णय प्रक्रिया में विभिन्न समूहों से आए लोग शामिल होते हैं। लोगों की आकांक्षाएँ और सरकार की ज़िम्मेदारी के बीच भी सुस्पष्ट संबंध है। इन चीजों को संविधान निर्धारित करता है। संविधान देश के भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। भारतीय संविधान के संदर्भ में देखें तो सांस्कृतिक, धार्मिक, जातीय, प्रजातीय बहुलता वाले देश में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सबका कल्याण संविधान में सुनिश्चित किया जा सके। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत यात्रा के दौरान यह व्यक्त किया था कि कैसे अपनी विभिन्नताओं को अपने संविधान में समायोजित किए हुए है। जबकि विश्व के अन्य देशों में ऐसी समस्या नहीं है क्योंकि वहाँ की जनसंख्या कम है। भारतीय राजनेताओं को भी भारतीय संस्कृति, धर्म एवं इतिहास का ज्ञान होना चाहिए तभी वो भारतीय विविधताओं का संयोजन कर सकेंगे।

आगे उन्होंने कहा कि राजनैतिक संरचना कौन बनाता है? इसपर किसका प्रभाव है, क्या सभी इससे संतुष्ट हैं? इसपर भी चर्चा आवश्यक है। क्या सभी संविधान से संतुष्ट हैं इसपर भी चर्चा आवश्यक है। क्योंकि समाज इस पर दबाव डालता है। वर्तमान में राजनीतिक शक्ति का हस्तांतरण बाजार के हवाले होता जा रहा है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी अहम चीजों की कीमत बाजार तय कर रहा है। लोक कल्याण के कार्य आज बाजार की भेंट चढ़ रहे हैं। देश में ऐसे आर्थिक निर्णय लिए जा रहे हैं, जिसे किसी भी मायने में जनतान्त्रिक नहीं कहा जा सकता है। नोटबंदी के जितने फायदे गिनाए गए थे, उस मोर्चे पर विफलता हाथ लगी है। वहीं जीएसटी का मौजूदा स्वरूप आम लोगों के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। आज तमाम महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाएं असहाय प्रतीत हो रही हैं, यह लोकतन्त्र के लिए और जनहित की दृष्टि से अत्यंत ही खतरनाक स्थिति है। 


रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, डिसेन्ट साहू, सुधीर कुमार, आशु बौद्ध एवं सोनम बौद्ध.



Thursday, May 12, 2016

अब की बार तीसरी फसल शहर में...


राजनैतिक मसीहा के निर्वाण के बाद कुछ पढ़े लिखे लोगों ने शहर में पाँव पसारने शुरू किए हैं. विभिन्न संगठन, मंडल, मित्र मंडल आदि का निर्माण, जमीन की खरीद-फरोक्त आदि काम ये लोग करने लगें हैं. शहर एजुकेशन हब हैं इसलिए यहाँ बहुत सारे शैक्षिक संस्थान है साथ ही प्रायवेट कोचिंग क्लासेस भी भरे पड़े हैं. व्यापारी सदा से यह चाहते हैं कि शान्ति बनी रहें ताकि ग्राहक माल खरीद सकें, इन सब को सेक्युरिटी के लिए इन संगठनों की आवश्यकता होती हैं. इस आवश्यकता की पूर्ती इन सफेदपोश लोगों द्वरा समय-समय पर होती रहती हैं. शहर का ज्यादातर हिस्सा बाहरी लोगों का होने के कारण स्थानीय लोगों की दबंगई जरुर दिखती है लेकिन वह भी शहर के शान्ति के नाम पर सहनीय है. शायद यही राज है शहर के शान्ति का? ऐसे शांतिप्रिय शहर में अचानक धारा 144 कैसे लागू हुयी. सवाल यह है कि क्या वाकई शहर पहले से शांत था? या ये व्यापारियों द्वारा तैयार शान्ति थी? ऐसा क्या हुआ है जो पानी को लेकर इस शहर में धारा 144 लगाईं गई? बहुत से लोगों के मन में यह सवाल हैं कि ऐसा क्यों?

लातूर शहर धनी व्यापारियों का शहर हैं जिसका भार यहाँ के प्रत्येक सामान्य व्यक्ति पर है. एक ओर से हैदराबाद की नजदीकी व्यापारियों को कम कींमत में माल उपलब्ध कराता है वहीँ दूसरी ओर उस माल के लिए यहाँ साक्षर और ग्रामीण ग्राहक तैयार है. शायद ही शहर का ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो मुंबई, पुणे में अपनी किस्मत आजमाने न गया हो. काम-काज ढूंढने न सही शिक्षा के लिए तो जरुर ही वे लोग इन बड़े शहरों में चले गए होंगे. लेकिन यह भी सही है कि अगल-बगल के परभणी, उस्मानाबाद, बीड के ग्रामीण लोग रोजगार के लिए पिछले सत्ता परिवर्तन के पहले तक आते रहें थे. लेकिन आज-कल उनका आना भी केवल ‘आना’ है. कई सारे मामले में लातूर इन बाकी तीन जिलों से बेहतर माना गया जिसमें शिक्षा अहम् थी, रोज बढ़ने वाला शहर मकान बनाने के लिए मजदूरों की मांग रखता था इसलिए मुंह मांगी मजदूरी मिल जाया करी थी इसलिए भी बाकी जिलों के लोगों को यह शहर आकर्षित करता रहा. व्यापारी घरानों की परंपरा ने यहाँ उद्योग के लिए नई आशा निर्माण कि जिसके चलते मजदूरों की मांग भी बढ़ गयी हालांकि यह उद्योग केवल रोजमर्रा के उपयोगी उत्पादन बनाने तक सिमित हैं.

शहर के रामभाऊ बताते हैं कि हम कभी किताबों में पढ़ा करते थे कि एशिया का सबसे बढ़ा शक्कर कारखाना लातूर में हैं तो हमारी छाती फुल जाती थी किन्तु बाद के सालों में पता चला कि उसको नीलाम किया जा रहा है. जब कोई मुझसे पूछता है कि आप के शहर में क्या है तो मैं कुछ नहीं बता सकता हालांकि यह सवाल इससे पहले कोई ज्यादातर नहीं पूछता था और अगर कोई पूछता तो जवाब में कोई न कोई कह देता कि विलासराव देशमुख का शहर, या किलारी भूकंप ये दो चीजे थी जो शहर को वैश्विकता के साथ जोड़ने में मदद करती थी. पहले वाले जवाब में सामने वाले के विचारों से जलन का आभास कर लिया जाता जिससे हम शहरवाले गर्व महसूस कर लेते और दुसरे से करुणा झलकती थी इसे भी हम हमारी प्रसिद्धि के साथ जोड़कर देखते न की कमजोरी. परंतु आज-कल पानी की कमी ने हमें हमारी औकात दिखाई. हमारा ‘लै भारी’ का भारीपन हमें बोझ लगने लगा है. इस सूखे ने हमें हमारी क्षमताओं को जानने का मौका दिया है. हालांकि शहर का बुद्धिजीवी वर्ग अब भी इस समस्या की और आकर्षित नहीं हो पाया है. इसका यह भी कारण है कि लातूर के साक्षर लोग तुरंत ही किसी समस्या को अपने उपर हावी नहीं हो देते. हमारा कोपिंग मेकनिज्म गजब का है. ये तो सरकारी महकमें की करतूत है कि उसने १४४ लगाकर हमारी खामियों को उजागर कर रखा है. वरना इससे पहले भी हमने बड़े-बड़े सुखों को मुहतोड़ जवाब दिया है.
पिछले साल पानी की कमी ने हमारे खेतों का बूरा हाल किया तब भी हम नहीं डरें, पिछले महीने एक्कड़ भर खेत से 8000 खर्च कर आधी बोरी सोयाबीन जो इस मौसम की पूरी फसल का हिस्सा था उसे घर ले जाते समय मैं ज़रा भी आशंकित नहीं था कि इतने पैसे के बदले केवल इतना धान. क्योंकि हम खेती तो केवल बचाने के लिए करते है ताकि हमें भी लगे की हम भी किसान है. लातूर शहर का किसान होने में भी अजीब सा गर्व महसूस होता है. करोड़ों की किंमत पर बेचीं जाने वाली जमीन में हम हजार-बारासों का उत्पादन लेकर हम केवल यह जताना चाहते हैं कि हमने अभी अपनी जमीन बेची नहीं हैं. ऐसे में पानी गिरने न गिरने से हमारा कुछ नहीं होने वाला. इससे ज्यादा फिक्र वाली बात यह है कि पडोसी की जमीन को मैं अपना कैसे बनाऊं. शहर के अगल बगल का शायद ही ऐसा कोई गाँव होगा जिसकी जान पहचान कोर्ट में न हो. इन लोगों ने वकीलों और न्यायधीशों के घर पैसे से भरे हैं. वो समय अब दूर नहीं जब यहाँ का कोई किसान नौसिखिए वकील को सलाह दे रहा होगा. मृदा परिक्षण जैसे आम काम यहाँ के किसान तब तक नहीं करवाते जब तक कि इसके लिए कोई फंड न मिले. हम केवल उस जमीन के मालिक होने का फर्ज अदा करते है साथ ही यह ध्यान रखते हैं कि कोई हमारे इस फर्ज के आड़े न आए. चार साल पहले की बात है शहर के नजदीक का एक गाँव शहर में समाविष्ट होने जा रहा था. पूरे गाँव में केवल इसी की चर्चा थी लोगों ने अपने पैसे खर्च कर मुंबई में जाकर मंत्रियों से बातचीत कर मसला हल करवाया तब जाकर वो जमीन बची है. लेकिन यह जमीन बचाने का असल कारण उस जमीन की कींमत ही थी. जो आसमान छु रही है. आज तक मुझे नहीं पता चला कि ख़बरों में वो बूढा किसान उभाड खाबड़ जमीन पर बैठ कर माथे से हाथ लगाकर आसमान की और देख रहा है वह कहाँ हैं. यहाँ का किसान तो रॉयल एनफील्ड पर घूम रहा है. विट बनाने का कारखाना लगा रहा है. एक नहीं दो बीवियां बना रहा है. वो दबंग हैं और चौक-चौराहे पर बैठकर निम्नवर्गियों का मज़ाक उड़ा रहा है. उसके बच्चे भी उसी के क़दमों पर चल रहे है. मध्यकाल के जमींदारों से कम प्रस्थिति इन दो-चार एक्कड़ वालों की नहीं हैं.


ऐसा ही एक उदाहरण है रशीद चाचा. रशीद चाचा की शहर से नजदीक ही खुली जमीन है. इस बार सूखे का प्रभाव बढ़ने वाला है इस बात की फ़िक्र यहाँ के व्यपारियों को ज्यादा थी इसलिए उन्होंने रशीद चाचा को पहले ही पैसे दे रखे हैं बोरिंग के लिए जिससे लगने वाला पानी वह उन्हें उसी दाम पर देगा जो पहले से तय होगा. ऐसे में उसने अपने खेत में तीन बोरिंग करवाई लगभग 700 फिट के आसपास चार इंच पानी लगा दो बोर को बाकी एक को एक इंच पानी लगा. अब तो उनकी निकल पड़ी आज-कल वो रोज पंद्रह-बीस हजार का पानी बेच रहें हैं. बताइये इतना पैसा कमाने के लिए एक किसान को कितने दिन लग जाएंगे. कौन करेगा किसानी अब रशीद चाचा तो चाहेंगे की हर साल ऐसा ही सुखा पड़े तब तो वह पैसा कमा पाएंगे. दो फसलों में तो उनको कुछ न मिला लेकिन इस सूखे में उनकी ‘तीसरी फसल’ कामयाब रहीं. 

यह केवल किसानों का ही नहीं शहर में जिस किसी के बोअर को पानी है वे लोग इस तीसरी फसल को ले रहें हैं. लागत बहुत कम है और मुनाफ़ा तगड़ा मिल रहा है. जैसे बोअर लगातार दो ड्रम पानी निकालता है तो ग्राहक के आने की राह देखने नहीं हैं. एक हजार लीटर का एक टैंक लगवाना है उसको एक प्लंबर से टोटी फिट कर दे बस. अब दिन भर दो-दो घंटे में बोर चलाकर पानी टंकी में ऐसे जमा करते है जैसे पैसे. माँ-बाप कही बाहर चले जाए तो बच्चों को बार-बार फोन करके याद दिलाते हैं कि दो घंटे हो गए है चालु करो. नौकरीपेशा आदमी भी इस उपरी कमाई के लिए घर में अपना योगदान छुट्टी लेकर दे रहा हैं. तो बच्चे अपनी कोचिंग को त्यागकर माता-पिता के सामने अपना गौरव प्राप्त करने में लगे हैं. अनपढ़ साँस की साक्षर बहुएं अपना इक्का जमाने में लगी हैं. पता चलता है इनके लिए भी सुखा किसी सुख से कम नहीं है
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पिछले बार के इलेक्शन में हारे हुए प्रत्याशी बड़े जोरों से सत्ता आजमाइश में लगें हैं. वो इस मौके को गवाना नहीं चाहते है इसलिए किसी भी हालत में वह अपने प्रभाग में पानी पहुंचाकर ही दम लेंगे. इसके लिए कुछ बड़े आसामियों ने अपने निजी कुओं से पानी निकालकर प्रभागों में बांटने का काम शुरू किया है. जिसके पीछे यही लालसा है कि अगली बार लोग याद रखें? पानी लेने वाले लोग भी खूब आशीर्वाद दे-देकर पानी ले रहें हैं. फिर प्रत्याशी इस काम को समाचार पत्रों में भेजने के लिए तैयार हैं. 850 रूपए के टैंकर में 25-30 परिवार खुश इधर प्रत्याशी का सोशल नेटवर्किंग भी मजबूत. अब इन प्रत्याशियों की बात तो समझ में आती है किन्तु जो पहले से सत्ता में है वो भी पीछे नहीं हैं. महानगरनिगम ने प्रत्येक प्रभाग में एक टैंकर नियुक्त किया है जिसमें प्रत्येक घर में आठ दिन में एक पानी दिया जाना तय है. शुरुआत में इतनी भीड़ उमड़ने लगी जिसके चलते ज्यादातर पानी निचे बहने लगा. इस समस्या का समाधान पार्षदों ने अपने हिसाब से किया टैंकर घर-घर जाएगा और आधा ड्रम पानी देगा. पानी का बंटवारा खुद पार्षद करेगा. पार्षदों ने अपने हिसाब से पानी के बंटवारे के नियम बनाए है जिसमें यह है कि आपके पास आधार-कार्ड और वोटर आय डी होनी चाहिए. अर्थात आपके पास ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे आपको इसी वार्ड का वोटर माना जाए. कुछ सनकी बुढो ने उनको इसी बिच याद भी दिलाया कि वोट माँगते समय ये ताम-झाम नहीं करते हो बस गिडगिडाते हो और अब हमें ही पुछ रहें हो कि पहचान दिखाओ. तब पार्षद का चेहरा देखने लायक हो जाता है. फिर भी वह सत्ता को फिर से पाने के चक्कर मे इस बार भी वोट की फसल काटना चाहता है इसलिए मनमानी कर कुछ अवैध लोगों को पानी दिलाता ही है. पानी वितरण का एक नियम यह भी है कि जिसके घर में किराएदार हैं वह अपने मालिक के हिस्से से पानी ले उनके लिए अलग से पानी नहीं देंगे. इस तरह कैचिं लगाकर वह भी पानी को बचाने की कोशिश कर रहा है. वाह रे पानी वितरण ये तो पीडीएस से आगे निकल गए. वहां तो केवल राशन कार्ड दिखाना पड़ता है यहाँ तो रोज नित-नए नियमों पर पानी मिल रहा है.


 तो यह हाल है लातूर के सूखे का लेकिन इस सूखे का असर लातूर के मध्यवर्ग पर नहीं दिखता. सब के पास खुद के बोअर हैं और जिनके बोअर बंद है वे अक्सर यह कहते हैं कि हम तो पिछले महीने से ही टैंकर से पानी मंगवा रहे हैं. यह कहते हुए उनके गर्व को महसूस किया जा सकता हैं. तो सवाल यह है कि यह सुखा किसके लिए है व्यापारियों के लिए, किसानों के लिए,मजदूरों के लिए नौकरीपेशा के लिए किसके लिए. इन सब वर्गों के बावजूद गरीब किसान, खेतिहर, मजदुर छोटे-मोटे व्यवसायी, ठेले वाले आदि इन पर इस सूखे का कम इस तीसरी फसल का असर जरुर दिख रहा है.
पानी न मिलने के कारण कुछ लोग जो बाहर से थे उन्होंने मकान खाली कर दिए. महनगरनिगम ने केवल 144 लगाकर लोगों को पानी के स्त्रोतों से दूर रखा है किन्तु उन स्त्रोतों में पानी ही नहीं हैं तो लोग वहां क्यों जाएंगे. बोअर-अधिग्रहण जैसा फैसला काफी पहले लेना चाहिए था जो अब तक नहीं लिया गया. उलट आरटीओ ऑफिस वाले निजी पानी-वाहक वाहनों को लायसंस बाँट रहे हैं. और पानी के निजी ठेकेदारों को यह हिदायत दे रहें हैं कि जिसके पास लायसंस हैं उन्ही को पानी देना. इस पुरे मामले में सरकार भी खूब मजा ले रही है. एक तरफ १४४ धारा लगने के बाद देश के सारे समाचार पत्रों में इस बात को प्रचारित किया गया कि लातूर सूखे की चपेट में हैं. दूसरी ओर उनके पास इस समस्या से निबटने के प्लान क्या है? यह सवाल जब उठाया गया तो जवाब- डेढ़ लाख लोग मायग्रेट हो जाएंगे. स्कूल और कोचिंग क्लासेस समय से पहले ही खत्म कर दिए जाएंगे. यह किसी शहर का प्लान कैसे हो सकता है जिसमें हो जाएंगे, कर दिए जाएंगे जैसे शब्द हो. यह तो भविष्यकालीन योजना है लेकिन असल में जो हो रहा है उस पर कारवाई के लिए इनके पास कोई प्लान नहीं है. जिस डेढ़ लाख लोगों की बात हो रही हैं वो तो बाहरी ही है वो तो मायग्रेट होंगे ही लेकिन जो स्थानीय आम जनता है जिनको रोज 2 रूपये प्रति घड़ा से पानी खरीदना पड रहा है उनके लिए इनके पास कोई प्लान नहीं हैं. कुछ ख़ास किस्म के व्यापारी-बुद्धिजीवीयों ने एलान किया कि शहर में १० रूपए में 20 लीटर शुद्ध पानी दिलाया जाएगा इसके लिए एटीएम नुमा मशीन लगवाई जाएगी जिसमें पैसे डालने के बाद पानी आएगा. ऐसे नवाचारों पर हँसे या रोये. पानी खरीद रहें हैं इसलिए रोये या पानी मिल रहा है इसपर हँसे. कुछ समझ नहीं पाएंगे. हालांकि यह भी तीसरी फसल निकालने का एक ख़ास तरिका है जो हर बार पूंजीपतियों द्वारा अख्तियार किया जाता है.



पिछले दो साल से लगातार शहर में मिनरल वाटर की कंपनियों की तादाद बढ़ी है. इस क्षेत्र की सबसे पुरानी कंपनी आज कल समाचारपत्रों में प्रचार कर रही है कि लातूर शहर के वासियों के लिए शुद्ध पानी केवल 40 रूपए में 20 लीटर, शुद्ध के साथ ठंडा चाहिए तो 60 रुपये में 20 लीटर. यह कींमत देश के किसी भी इलाके से ज्यादा ही होगी. शायद राजस्थान से भी. लेकिन शहर के लोग इसके आदि हो गए हैं यह बीस लीटर का जार पिछले साल ३० रुपये में था अब चालीस हो गया है. और शायद इसकी किंमत लगातार बढती ही जाएगी. जब पता है कि शहर सुखा ग्रस्त है, जिसे गैजेटियर में भी सुवर्णाक्षरों से लिखा गया हैं. तब भी सरकार पानी के बर्बादी का लायसंस कैसे बेच रही है. यह समझ से बाहर है.




शहर का प्राकृतिक रूप देखे तो भूगर्भशास्त्रियों का मानना है कि आज जो पानी शहर के लोग बोअर से निकाल रहे हैं वो पांच-दस हजार साल पहले का है. इसका मतलब है कि शहर में जल संरक्षण शुन्य के बराबर हैं. जंगल के नाम पर वैसे भी शहर का नाम दुनिया के किसी भी मरुस्थल के बराबर हो गया है. इस बार तो पानी मिलेगा 700-1000 फिट के निचे का किन्तु अगले साल कहाँ से मिलेगा पानी. इसके बारे में कोई सोचना नहीं चाहता है. बस मिल रहा है तब तक ठीक है. लेकिन इस बार सूखे ने सोचने का आखरी मौका दिया है, इस बार भी नहीं सोंचेगे तो ये मंजर मौत बनकर अगली बार दिखेगा जब कोई कानून भी इससे बचा नहीं पाएगा. जितने सुराख लातूर के जमीन पर बोअर के नाम पर पड़े है उनमें से कुछ में से पानी के अलावा कुछ और (पिछले महीने लोकमत में खबर थी कि एक बोअर से सोने जैसा पदार्थ निकल रहा है लेकिन वो सोना नहीं था अब तक पता नहीं चला है कि वह क्या हैं) ही निकल रहा है. तब भी लोगों की आँखे नहीं खुल रहीं है. 

सुनो शहरवालों अब वो दिन लद गए जब आपके पास एक मसीहा था, किसी दुसरे की बाँट जोहने से अच्छा होगा कि आप खुद ही इस काम में आगे आएं वरना वो दिन दूर नहीं जब आप आने वाली पीढ़ियों को एक मरुस्थल भेंट देंगे.
फोटो आभार: गूगल इमेज  



निलामे गजानन सूर्यकांत
निलामे गजानन सूर्यकांत 
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र,
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा।  
gajanannilame@gmail.com