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Thursday, October 4, 2018

गांधी एवं समकालीन समय


वर्धा, 2 अक्टूबर 2018। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150 वी जयंती के अवसर पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के गालिब सभागार में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। ‘गांधी का आलोक’ विषयक इस एक दिवसीय परिचर्चा में ‘गांधी एवं समकालीन समय’ विषयक अंतिम चर्चा सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने किया। जबकि  संचालन गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. मनोज कुमार राय ने किया। इस सत्र के मुख्य वक्ता गांधी विचार परिषद, वर्धा के प्रोफेसर आर.सी. प्रधान एवं विशिष्ट वक्ता अरुण कुमार त्रिपाठी थे।
 सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. आर. सी. प्रधान ने कहा कि, गांधी पर कोई गंभीर शोध नहीं हो रहे हैं। उन्होंने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि भारतीय शोधार्थी पश्चिमी चिंतकों के विचार सरणी पर आधारित शोध करते हैं और उसमें पुछल्ले के तौर पर गांधी का नाम जोड़ भर दिया जाता है।
 उन्होंने कहा कि हमें गांधी की परंपरा पर शोध करने की जरूरत है। गांधी के बाद के महत्वपूर्ण गांधीवादियों पर नए सिरे से शोध किए जाने की आवश्यकता है। भारतीय विद्या, भारतीय ज्ञान परंपरा को गांधी के योगदानों पर शोध किया जाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि 1945 के बाद गांधी भारतीय राजनीति के हाशिये पर धकेल दिया गया था। उसके बाद नेहरू की भूमिका बढ़ जाती है। नेहरू गांधी के सपनों के भारत को खारिज करते हुए, भारत को शहरीकरण-औद्योगिकरण की तरफ ले जाने का स्पष्ट संकेत देते हैं। इसमें न केवल नेहरू की ही भूमिका होती है। अपितु राजेंद्र प्रसाद से लेकर सरदार पटेल, जे. बी. कृपलानी जैसे लोगों की भी भूमिका थी। हालांकि ये सभी त्यागी पुरुष थे, इनकी नीयत पर शक नहीं किया जा सकता। इन लोगों ने काफी योगदान किया है। इन महापुरुषों की नज़र में राज्य की भूमिका अहम थी। जबकि गांधी राज्य की भूमिका को सीमित कर देखते थे और अंतिम तौर पर राज्य विहीन समाज बनाना चाहते थे। इसी कारण गांधीजी और कांग्रेस के अन्य नेताओं के बीच यह विरोध दिखाई पड़ता है। किन्तु आज पूरी दुनिया में गांधी पर काफी कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है, जिससे यह साबित होता है कि दुनिया नए सिरे से उनपर विचार कर रही है।  
 मौजूदा समस्याओं पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज भी भारत में सांप्रदायिकता, सवर्ण-अवर्ण के बीच भेदभाव, अमीर-गरीब के बीच फर्क कायम है। इन समस्याओं से नज़र चुराने से समस्या ख़त्म नहीं होने वाली है। मनुष्य आज काफी सिमटता जा रहा है। आत्म केन्द्रीयता बढ़ती जा रही है। आज यह जाँचने की जरूरत है कि इन संकटों को दूर करने का गांधी के पास क्या उत्तर है! हर महापुरुष अपने युग की समस्याओं के खिलाफ लड़ने-जूझने के साथ-साथ मनुष्य समाज की शाश्वत समस्याओं पर भी दृष्टि देते हैं। गांधीजी एक नई वैकल्पिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं। गांधी ने हिन्द स्वराज उस वक्त लिखी जिस वक्त पूरी दुनिया अद्योगिकरण के चकाचौंध से वशीभूत थी। उस वक्त गांधीजी ने इस सभ्यता की तीक्ष्ण आलोचना करते हुए उसे हिंसा पर आधारित विनाशकारी सभ्यता करार दिया था। गांधी ने आवश्यकता और लोभ में फर्क किया है। मनुष्य की जरूरतें और लोभ में फर्क होता है। गांधी ने मनुष्य को अपनी जरूरतों को भी सीमित करने की बात की है। गांधी ने अद्वैत की बात ज़ोर-शोर से की थी। गांधी आम आदमी को केंद्र में लाने की व्यवस्था सुझाते हैं। इसके लिए उन्होंने विकेंद्रित व्यवस्था की वकालत की थी। गांधी ने साधन-साध्य की शुचिता पर ज़ोर दिया है।
 अंत में उन्होंने कहा कि देश-दुनिया की लगभग सारी समस्याओं का समाधान गांधी के एकादश व्रत में निहित है। गांधी ने राज्य सत्ता हाथ में आए बगैर रचनात्मक कार्यों के जरिये भारतीय समाज को खड़ा होना सिखाय। गांधी ने राज्य सत्त्ता के अन्याय पूर्ण निर्णय के खिलाफ अहिंसक लड़ाई के लिए सत्याग्रह का शक्तिशाली मार्ग सुझाया।
 वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी ने अपने सम्बोधन में कहा कि गांधी की आखिरी और अहम लड़ाई साम्प्रदायिकता के खिलाफ है। गांधी और भगत सिंह की मृत्यु लगभग एक जैसी है। कानपुर दंगे में गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या पर गांधी ने कहा था कि ऐसी मौत से मुझे ईर्ष्या होती है। और सचमुच में गांधी की मौत भी ठीक वैसी ही हुई। आज भी देश में साम्प्रदयिक हिंसा थमने का नाम नहीं ले रहा है। देश में जातीय विद्वेष और हिंसा भी चरम पर है। गांधी के देश में ये सारी घटनाएं अत्यंत ही चिंताजनक है। गांधी 1857 की हिंसा से भयभीत थे वहीं भगत सिंह 1857 को दुहराना चाहते थे। गांधी उस किस्म की हिंसा को भारत की जनता के लिए अनिष्टकारी मानते थे। अंग्रेजी हुकूमत लगातार हिन्दू-मुस्लिम एकता से चिंतित थी और इस एकता को तोड़ने में वे कामयाब रहे। गांधी को समझने के लिए राष्ट्रवाद के विमर्श को गंभीर तरीके से समझने की आवश्यकता है। गांधी के राष्ट्र की परिकल्पना में भारत सहित विश्वमानवता की चिंता समाहित है। आगे उन्होंने कहा कि, गांधी ने कहा था कि मैं कब्र से भी बोलूंगा! आज गांधी कब्र से बोल रहे हैं, अब हम उसे सुनते हैं अथवा नहीं यह हमारे ऊपर निर्भर करता है। गांधी सत्य के अन्वेषी थे। किंतु उन्होंने अंतिम सत्य प्राप्ति का कभी दंभ नहीं किया। कुछ लोग गांधी को विफल करार देते हैं, किन्तु गांधी की विफलता के आगे सफलता भी छोटी प्रतीत होती है।
 अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि आज रचनात्मक कार्यक्रमों को नए रूप में किए जाने पर गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है। गांधीजी का समाज के प्रति ज्यादा विश्वास था। सत्ता का मुंह ताकने के वजाय गांधी समाज के छोर से विकल्प प्रस्तुत करने में यकीन रखते थे। उन्होंने कहा कि गांधीवादी संस्थाएं आज अपना आकर्षण खोती जा रही हैं। इन्हें नए सिरे से खड़ा करने की आवश्यकता है। गांधीजी प्रयोगधर्मी थे। उनके प्रयोग आज भी हमारे लिए प्रेरणास्रोत की भांति है। गांधी में अद्धभुत चारित्रिक-नैतिक बल था। आज उसी चारित्रिक-नैतिक बल की आवश्यकता है। देश-दुनिया आज जिस अंधाधुंध भौतिक प्रगति के मार्ग की तरफ बढ़ रही है उसपर भी नए सिरे से विचार करना होगा अन्यथा संकट और भी गहराता जाएगा। आज समाज को इसके लिए तैयार करना होगा। आज साम्रज्यवाद के नए-नए स्वरूपों के खिलाफ गांधी से प्रेरणा ग्रहण कर प्रतिरोध करने की भी आवश्यता है। मौजूदा साम्प्रदायिक हिंसा के समाधान पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हमें आज एक अच्छे हिन्दू, अच्छे मुस्लिम, एक अच्छे सिख और एक अच्छे ईसाई बनने की जरूरत है। तभी सारे झगड़े मिटेंगे।

इस एक दिवसीय संगोष्ठी का समापन महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी समाज कार्य अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार के आभार ज्ञापन से हुआ। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षकों एवं सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया।

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, प्रेरित बाथरी, माधुरी श्रीवास्तव, खुशबू साहू, अजय गौतम, अक्षय कदम, सुधीर कुमार, मोहिता एवं सपना पाठक

Monday, March 19, 2018

ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन


वर्धा, 19 मार्च, 2018  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र और राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। जिसमें महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, बिहार, तमिलनाडू, नागपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर विश्वविद्यालय,  कोयंबटूर विश्वविद्यालय एवं हरियाणा के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने की और संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। स्वागत वक्तव्य देते हुए केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि अपेक्षा है कि इन सात दिनों में हम संकाय संवर्द्धन कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा करेंगे। पाठ्यक्रम का सामाजिक सरोकार स्पष्ट होना चाहिए। आज पाठ्यक्रम और समाज एक-दूसरे से जुड़ नहीं पा रहा है। पाठ्यक्रम को समाज की जरूरतों के अनुकूल और समाज को बेहतर दिशा में ले जाने वाला होना चाहिए। 

एनसीआरआई- नेशनल काउंसिल ऑफ रुरल इंस्टीट्यूट के डी.एन. दास ने उक्त अवसर पर कहा कि 1995 से एनसीआरआई कार्यरत है। इसका उद्देश्य ग्रामीण भारत के विश्वविद्यालयों को ग्रामीण जरूरतों से जोड़ना है। इसके अनुरूप पाठ्यक्रम को विकसित करने और ग्रामीण समुदाय के साथ तादात्म्य स्थापित करना ही इसका उद्देश्य है।

 अपने अध्यक्षीय वक्तब्य में प्रतिकुलपति प्रो. आनंदवर्द्धन शर्मा ने कहा कि बड़ी उत्सुकता की बात है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय और एनसीआरआई मिलकर सात दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन कर रही है। आपको बताना चाहूँगा कि यह कार्य बहुत बड़ा है। विश्वविद्यालया में वर्ष भर में बहुत से कार्यक्रम होते हैं जो कि बड़ी छाप छोड़ते हैं। उन्होंने उक्त मौके पर कहा कि महात्मा गांधी और विनोबा की कर्मभूमि पर आयोजित हो रही इस कार्यशाला से ग्रामीण क्षेत्र और ग्रामीण विकास से संबन्धित पाठ्यक्रम विकसित करने में मदद मिलेगी। उन्होंने इस कार्यशाला की सफलता के लिए शुभकामना व्यक्त की। उदघाटन सत्र के अंत में आभार प्रकट करते हुए विश्वविद्यालय के कुलसचिव कादर नवाज खान ने कहा कि उम्मीद है कि देश के विभिन्न हिस्सों से आए समाज कार्य के प्राध्यापक इस कार्यशाला से नए अनुभव लेकर जाएंगे।

'ग्रामीण समुदाय का परिचय और संवेदनशीलता' विषयक प्रथम चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए स्नातकोत्तर समाजशास्त्र विभाग, संत तुकड़ोजी महाराज विश्वविद्यालय, नागपुर के प्रो. अशोक बोरकर ने पुरातात्विक सर्वेक्षणों के हवाले से प्राचीनकालीन सामाजिक संरचना के बारे में विस्तारपूर्वक बताया। पुरातात्विक अवशेषों से हमें उत्पादक जातियों के अवशेष मिलते हैं। मातृदेवी, यक्ष-यक्षणी के भी अवशेष मिलते हैं, इसके बाद वैदिक साहित्य से भी हमें पुराने समाज की जानकारी प्राप्त होती है। वैश्यों-क्षत्रियों के गाँव की भी हमें जानकारी मिलती है। हमें आदिवासी गांवों के बारे में भी अहम जानकारियाँ प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि गोंडों का सामुदायिक बोध और पंचायत व्यवस्था अत्यंत ही सुदृढ़-विकसित व्यवस्था आज भी कायम है। उन्होंने कहा कि गाँव एक समुदाय है, उसमें सामुदायिक भावना है। गाँव के लोग सामान्य जीवन जीते हैं। कृषि उनका प्रमुख व्यवसाय है। ग्रामीण समुदाय में एक्य भाव होता है। भारत में हर दौर में सामाजिक व्यवस्था पर सबसे ज्यादा ज़ोर दिया जाता रहा है। कृषि समस्या पर फोकस नहीं किया जाता रहा है। 18वीं सदी में महात्मा फुले ने ही इस पर मजबूती से अपनी बात रखी है। अंग्रेजों के भारत आने के पूर्व भारत के गाँव को स्वयंपूर्ण इकाई मानते थे। प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे की मान्यता थी कि भारत के गाँव स्वयंपूर्ण नहीं थे। कई मामलों में ये गाँव एक-दूसरे पर निर्भर थे। दुबे ने ग्रामीण व्यवस्था के अपने महत्वपूर्ण अध्ययन के निष्कर्ष के आधार पर उक्त बातें कही थी। पश्चिमी समाजशास्त्री राबर्ट रेडफ़ील्ड के विचारों से एस.सी. दुबे के विचार मेल खाते हैं।

आगे उन्होंने कहा कि परिवार भारतीय गाँव की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। उसके बाद दूसरी सबसे महत्वपूर्ण इकाई जाति व्यवस्था है। गाँव में वर्चस्वशाली परिवार गाँव के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक मसलों को नियंत्रित करता है। इन्के परिवार के रिश्तेदार भी इसमें अहम भूमिका अदा करते हैं। उसी प्रकार जाति संरचना भी कार्य करती है। इसका स्थान परिवार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इस प्रकार वर्चस्वशाली जातियों का ग्रामीण समाज पर पूरी तरह से नियंत्रण रहा है। जाति व्यवस्था की संरचना सीढ़ीनुमा है। जाति-वर्ग की संरचना में ब्राम्हण और अस्पृश्य का स्थान नियत होता है, बाकि जाति-वर्ण का स्थान बदलता रहता आया है। उन्होंने कहा कि सरकार की बहुत सारी योजनाएँ अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाती हैं, इसकी जड़ें भी जाति वयवस्था में निहित हैं। गांवों में आज भी अंधविश्वास, जातीय हिंसा और जजमानी व्यवस्था कायम है। इसी के चलते पहले भी गांवों में श्रमिकों का शोषण किया जाता था। अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व भारत में कृषि के साथ-साथ वस्त्र उद्योग और चर्म उद्योग का जाल बिछा हुआ था। यही कारण है कि हर कोई किसी न किसी प्रकार से जीवित रह लेता था। भारत में संयुक्त परिवार कृषि व्यवस्था के अनुकूल थे। देश के वर्तमान कृषि संकट को इसके आईने में समझने की जरूरत है।
            उन्होंने कहा कि गांधी के आगमन के पूर्व भारत का स्वतंत्रता आंदोलन शहर केन्द्रित था। गांधी ने इस केंद्र को बदलकर गाँव केन्द्रित किया था। गांधी की मान्यता थी कि अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भारत के गाँव समृद्ध व साधन संपन्न थे। गांधी के लिए भारत की स्वतंत्रता का अर्थ गांवों की स्वायत्ता थी। वहीं डॉ. अंबेडकर और नेहरू की गांवों के संबंध में दृष्टि भिन्न थी। इनके अनुसार गांवों में लोगों के कर्त्तब्य तो परिभाषित थे, किन्तु ज़्यादातर लोगों के कोई अधिकार नहीं थे। गाँव गणतन्त्र नहीं था, क्योंकि गाँव पर वर्चस्वशाली जातियों का ही आधिपत्य कायम था। वर्चस्वशाली जातियों का आर्थिक संसाधनों व राजनीतिक व्यवस्था आदि पर वर्चस्व रहा है। नेहरू जाति आधारित श्रेणीक्रम को आधुनिक समाज के लिए अनुपयोगी मानते थे। जाति-व्यवस्था मानवाधिकारों के हनन करने के साथ-साथ अवसरों की असमानता के लिए जिम्मेदार रही है। जबकि डॉ. अंबेडकर राजनीतिक लोकतन्त्र के साथ-साथ सामाजिक लोकतन्त्र की बात करते हैं। डॉ. अंबेडकर ने भारतीय सभ्यता को हिन्दू सभ्यता करार देते हुए कहा कि इसमें अस्पृश्यों के लिए कोई स्थान नहीं था। संविधान सभा का बहुमत चाहता था कि गाँव स्वतंत्र भारत की इकाई बने, अंबेडकर इसके खिलाफ थे।

भोजनावकाश के उपरांत 'ग्रामीण समाज की आर्थिक और राजनीतिक संरचना' विषय पर केन्द्रित चर्चा सत्र प्रारम्भ हुआ। विषय विशेषज्ञ नागपुर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रो. श्रीनिवास खानदेवाला ने कुछ सवालों के जरिये अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि क्या भारतीय समाज का राजनैतिक ढांचा पर्याप्त है? उसी प्रकार क्या भारतीय समाज का आर्थिक ढांचा संतोषजनक है? इस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। राजनैतिक पहलू का निर्माण समाज के नियंत्रण कायम किए जाने की जरूरतों के फलस्वरूप होता है। अनियंत्रित समाज का वांछित विकास नहीं हो पाता है, इसमें बिखराव, दिशाहीनता की संभावना बनी रहती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए राजतंत्र का निर्माण हुआ था। स्वतंत्रता के बाद भारत ने जनतंत्र स्वीकार किया। इससे पूर्व पुराने जमाने में आम लोग राजतंत्र में इतना यकीन रखते थे कि राजा की मृत्योपरांत राजा के छोटे से छोटे बच्चे को राजा के बतौर स्वीकार कर लेते थे। फिर राजा को शिक्षित-प्रशिक्षित करने की व्यवस्था थी। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज अभी पूरी तरह से लोकतान्त्रिक नहीं हुआ है। अमेरिका आदि देशों में राष्ट्रपति को सुझाव देने हेतु अलग-अलग विभागों की अलग-अलग सलाहकार समिति बनी हुई है जिसके सुझावों पर राष्ट्रपति अमल करते हैं।
            भारत में आज भी निर्णय प्रक्रिया में इस किस्म की परिपक्वता का अभाव देखा जा सकता है। इसका परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है। इसलिए लोककल्याण और सरकार के नीति निर्धारण में कमी रह जाती है। इसके बीच तालमेल की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए। जनतंत्र में निर्णय प्रक्रिया में विभिन्न समूहों से आए लोग शामिल होते हैं। लोगों की आकांक्षाएँ और सरकार की ज़िम्मेदारी के बीच भी सुस्पष्ट संबंध है। इन चीजों को संविधान निर्धारित करता है। संविधान देश के भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। भारतीय संविधान के संदर्भ में देखें तो सांस्कृतिक, धार्मिक, जातीय, प्रजातीय बहुलता वाले देश में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सबका कल्याण संविधान में सुनिश्चित किया जा सके। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत यात्रा के दौरान यह व्यक्त किया था कि कैसे अपनी विभिन्नताओं को अपने संविधान में समायोजित किए हुए है। जबकि विश्व के अन्य देशों में ऐसी समस्या नहीं है क्योंकि वहाँ की जनसंख्या कम है। भारतीय राजनेताओं को भी भारतीय संस्कृति, धर्म एवं इतिहास का ज्ञान होना चाहिए तभी वो भारतीय विविधताओं का संयोजन कर सकेंगे।

आगे उन्होंने कहा कि राजनैतिक संरचना कौन बनाता है? इसपर किसका प्रभाव है, क्या सभी इससे संतुष्ट हैं? इसपर भी चर्चा आवश्यक है। क्या सभी संविधान से संतुष्ट हैं इसपर भी चर्चा आवश्यक है। क्योंकि समाज इस पर दबाव डालता है। वर्तमान में राजनीतिक शक्ति का हस्तांतरण बाजार के हवाले होता जा रहा है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी अहम चीजों की कीमत बाजार तय कर रहा है। लोक कल्याण के कार्य आज बाजार की भेंट चढ़ रहे हैं। देश में ऐसे आर्थिक निर्णय लिए जा रहे हैं, जिसे किसी भी मायने में जनतान्त्रिक नहीं कहा जा सकता है। नोटबंदी के जितने फायदे गिनाए गए थे, उस मोर्चे पर विफलता हाथ लगी है। वहीं जीएसटी का मौजूदा स्वरूप आम लोगों के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। आज तमाम महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाएं असहाय प्रतीत हो रही हैं, यह लोकतन्त्र के लिए और जनहित की दृष्टि से अत्यंत ही खतरनाक स्थिति है। 


रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, डिसेन्ट साहू, सुधीर कुमार, आशु बौद्ध एवं सोनम बौद्ध.



Monday, February 2, 2015

Restoring Mental Health In India: Pluralistic Therapies and concepts

    
प्रस्तुत पुस्तक ब्रिगिट्टे सेबास्तिया के संपादन में और ऑक्सफोर्ड यूनी. प्रेस द्वारा प्रकाशित है। शीर्षक से ही पता चल जाता है कि इसमें भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न रूपों में मानसिक स्वास्थ्य पर उपचार कर लाभ पहुंचानेवाली थेरेपिज का विश्लेषण है, विभीन्न लेखकों द्वारा किए गए शोध अध्ययनों के अंतर्गत पाए गए विश्लेषण को इस किताब में लेखिका ने संपादित किया है.  तीन भागों में वर्गीकृत इस किताब के पहला भाग रिस्टोरिंग मेंटल हेल्थ विथ कोडिफाइड इन्डियन मेडिसिन्स इस उपशीर्षक के अंतर्गत है। द्वितीय भाग में सांस्कृतिक आधार बताते हुए लोकाचार में निहित थेरेपिज का विश्लेषण दिया है, जिसका उपशीर्षक रेस्टोरिंग मेंटल हैल्थ विथ फ़ोक थेरेपी है। तीसरे भाग में रेस्टोरिंग मेंटल हेल्थ विथ स्यायकियाट्रि पर चर्चा की है.
प्रथम भाग में ओ. शामसुंदरम द्वारा तमिलनाडु में मनोविकार से संबंधित सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं चिकित्सात्मक दृष्टिकोण का विश्लेषण किया गया है. तमिलनाडु में द्रविडीयन संस्कृति के अनुसार मनोविकार पर ‘सिद्धा’ (तमिल में सिट्टा (Citta)) चिकित्सा व्यवस्था प्राचीन काल से चलती आ रही है उसी व्यवस्था का आज के समय में उपयोग की ओर लेखक ने ध्यान खिंचना चाहा है. लेखक का मानना है कि यह व्यवस्था पश्चिमी अवधारणा के अनुसार देखे तो कायिक (Somatotype) जैसा लगती है. सिद्धा व्यवस्था के अनुसार मानवी शरीर को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता रहा है. इस वर्गीकरण के अनुसार व्यक्तित्व- एक सामान्य व्यक्तित्व होता है, दुसरा, Alal Utal (सामान्य से थोड़े होशियार और प्रभावकारी व्यक्तित्व), तीसरे में, Iya Utal (इस वर्ग में आनेवाले लोग खुशनुमा व्यक्तित्व के होते है और शारीरिक रूप से भी बड़े स्वस्थ होते हैं) आते हैं. इन तीनों के साथ ही इन्हें मिलाकर और छ: उपप्रकारों में बांटकर व्यक्तित्व का विश्लेषण किया गया है. लेखक ने इस आलेख में तमिलनाडु के आत्महत्याओं के कारणों की भी खोज करने की कोशिश की हैं. जिसमें वह इतिहास में उसके साक्ष्यों को खोजते हुए राजा चेरा (King Chera) तक पहुँच जाते है. वहां के मंदिरों में भी मनोचिकित्सा जैसी व्यवस्था पायी गयी है, इस ओर ध्यान खींचते है,  लेखक ने गुनासिलम (Gunasilam), तिरुविदाईमारुतुर (Tiruvidaimaruthur) एवं शोलिंगुर (Sholingur) के मंदिरों की मनोचिकित्सा व्यवस्था का विश्लेषण किया है. निष्कर्ष के रूप में लेखक का कहना है कि पश्चिमी मनोचिकित्सा के शब्दावली से साम्य रखनेवाले सभी साक्ष्य तमिल साहित्य और संस्कृति में मिलते हैं, मनोचिकित्सा के लिए उपयोगी थेरेपिज भी आज के पश्चिमी मनोचिकित्सा में पाए जाने वाले कायिक दृष्टिकोण (Somatotype) की तरह ही दीखाई देती हैं. 
प्रथम भाग के द्वितीय आलेख नादिया गिग्युरे (Nadiya Giguere) द्वारा केरल के गवर्मेंट आयुर्वेदिक मेंटल हॉस्पिटल में किया गया एथनोग्राफिक अध्ययन है. लेखिका ने कुछ ख़ास शब्दों पर जोर देते हुए वहां की व्यवस्था और उस व्यवस्था में उपचार प्राप्त करने वाले रोगी दोनों का व्यक्तिक अध्ययन किया है. लेखिका ने डोसा (Dosa), सत्वबलम् (Satvabalam), जेनेस (Genes) और पूजा जैसे शब्दों का नृवंशीय वर्णन किया है. लेख का नाम Dosa, Satvabalam, Genes and Poojaa: A God for Everything; An Ethnographic Study Of Government Ayurvedic mental Hospital है. लेखिका का कहना है कि सरकारी आयुर्वेदिक मेंटल हॉस्पिटल मुलत: चरक संहिता, सुश्रुत संहिता एवं अष्टांगह्रदय जैसे आयुर्वेदिक ग्रंथों पर आधारित उपचार पर मान्यता रखता है, अत: मानसिक रोगियों पर वह इसीका उपयोग करते हैं. यहाँ पर मनोरोग को छ: उन्मादों के रूप में देखा जाता है और उसी के आधार पर उन्माद संबंधी विकारों का वर्गीकरण किया जाता है. जैसे- पित्तउन्माद (पित्त से), कफोन्माद (कफ से), वातोन्माद (वायु से), सन्निकोन्माद (उक्त तीनों के मिश्रण से), अधिजोन्माद (मानसिक धक्का या सदमा) और अंत में विषजोन्माद (जहर या उससे संबंधित चीजों के बनने से)। साथ ही शरीर को देखने का दृष्टिकोण बताते हुए लेखिका हॉस्पिटल में अभ्यासकों (Practissioner)  द्वारा उपयोग में लाए जानेवाले शब्द जैसे- डोसा शब्द का उपयोग करती हैं। डोसा से तात्पर्य यहाँ अलग है, यह शरीर को समझने के लिए किया गया है. उनका मानना है कि  इसी आधार पर वह शरीर के स्वस्थता की जांच करते हैं. इसे आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में ‘थ्री डोसा व्यवस्था’ के नाम से भी जाना जाता है. लेखिका ने इस व्यवस्था को जानने की कोशिश की है साथ ही काउन्सलिंग जैसी पश्चिमी अवधारणा की जगह लेता हुआ सत्वबलम (शक्ति को बढ़ाना), को भी व्याख्यायित किया है. लेखिका के अनुसार आयुर्वेदिक मनोचिकित्सा में उपयोग किए जाने वाले सभी उपकरण खुले और लचीले होने के कारण वहां के समाज-सांस्कृतिक परिदृश्य में उसका उचित प्रभाव मनोरोगियों पर पड़ता नजर आता है.  
सी. कुमार बाबू ने The Relevance of Yoga and Mediatation in the Management of Common Mental Disorder में यह दर्शाने की कोशिश की है कि योग किस तरह सामान्य मानसिक विकारों के उपचार में सहायक बन रहा है, साथ ही आज के समय में योग थेरेपी पर पश्चिमी मनोचिकित्सा जगत में किस तरह की चर्चा हो रही है, इस ओर भी ध्यान खींचना चाहा है. इसके लिए उन्होंने मनोचिकित्सा के जर्नलों में छपे आलेखों का आधार लिया है. महत्वपूर्ण बात यह है कि योगा को एक थेरेपी के रूप में प्रयोग करने वाले किस तरह उसे मनोचिकित्सा का एक बेहतर उपकरण बता रहे हैं इस ओर लेखक ने  ध्यान खींचना चाहा है. लिखते हैं...
“2004  में एस. बी. एस. खालसा ने संदर्भ जालीय विश्लेषण  (Bibiometric Analysis) का आधार लिया जिसमें Indian Journal of Physiology एवं Pharmacology महत्वपूर्ण थे. 2004 तक १८१ प्रकाशित जर्नलों में से ८१ जर्नल  लगभग 50 अलग-अलग राष्ट्रों से प्रकाशित हो चुके थे; भारतीय जर्नलों में 96 में से 27, U.S. जर्नल में ४३ में से 24, ब्रिटिश जर्नल में २१ में से ११ और अन्य 12 राष्ट्रों से छपने वाले २१ में से १९ जर्नल योगा पर आधारित थे, साथ ही ३४ प्रकाशन ऐसे थे जो केवल योगा विशेषज्ञता वाले जर्नल को प्रकाशित करते थे. यह सब दबावजन्य रोग एवं चिंता से संबंधित बीमारियों पर किए जाने वाले उपचार के आधार पर दिया गया है.”
ग्रोवर (१९९४;१५५) द्वारा किए गए अध्ययन का हवाला देते हुए लेखक लिखते है कि ‘कॉम्प्रेहेंसिव योगा थेरेपी’ का समान्य मानसिक रोगों पर किए गए उपचारों के परिणाम काफी महत्त्वपूर्ण है, लगभग 50 प्रतिशत या उससे अधिक मात्रा में इस थेरेपी ने ऐसे रोगों के लक्षणों को नष्ट कर दिया है. ७३.९ प्रतिशत रोगियों की प्रतिक्रयाएं अच्छी रही अन्य थेरेपिज को ४२.५ प्रतिशत प्रतिक्रयाएं  मिली. यह अध्ययन १९८२ में बी.बी. सेठी द्वारा किया गया था.
            १९७९ में बालकृष्णा ने अध्ययन किया जिसका हवाला ग्रोवर देते है. योगा थेरेपी एवं ड्रग थेरेपी का तुलनात्मक अध्ययन  था, इसमें 75 न्युरोटीक रोगियों को शामिल किया गया था. योगा थेरेपी इन मरीजों को दो महीने तक सप्ताह में छः बार दी गयी जिसका प्रत्येक सेशन 45-60 मिनट का होता था. चिकित्सकों द्वारा जांचने के बाद पता चला कि ड्रग थेरेपी योगा थेरेपी से ज्यादा प्रभावशाली रही परन्तु मनोवैज्ञानिक परीक्षणों ने यह दिखाया कि चिंता व सामाजिक समायोजन में ड्रग थेरेपी से ज्यादा अच्छी योगा थेरेपी रही. मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के अनुसार ड्रग थेरेपी के कारण केवल दबाव में महत्त्वपूर्ण कमी आयी लेकिन चिंता और सामाजिक समायोजन में परिणाम न के बराबर रहा. इस अंतर्विरोध में योगा थेरेपी का के कारण चिंता, दबाव स्तर एवं सामाजिक समायोजन में महत्त्वपूर्ण सुधारात्मक परिणाम देखा गया.
            इसी को मद्देनजर रखते हुए WHO मानसिक स्वास्थ्य के घटकों को एक समेकित स्वरूप देकर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के रूप में इससे संबंधित कार्यकर्ताओं की मांग से संबंधित तकनीक की सूचनाएं प्रदान कर रही है. साथ ही जिला स्तर के प्रत्येक मानसिक स्वास्थ्य अस्पतालों में इसे चलाने की कोशिश में हैं इसके लिए रोटरी एवं लायन्स क्लबों से बातचीत जारी है. (Sebastia, 2009, पृ. 91)
            द्वितीय भाग में Restoring mental Health with Folk Therapy पहला आलेख पिलार गलियाना अबाल (Pilar Galiana Abal) द्वारा When God Heals... Can Darsan be a Therapy? द्वारा लिखा गया है,  इस आलेख में लेखक द्वारा पिछले तीन वर्षों से मुंबई के बाबुलनाथ मंदिर में किए गए क्षेत्र अध्ययन के दौरान पाए गए तथ्यों का विश्लेषण है. मंदिर में विभिन्न जाति-धर्मों के आने वाले दर्शनार्थियों के साक्षात्कार एवं अवलोकन के आधार पर हिन्दू धर्म में प्राचीन से चली आ रही ‘दर्शन’ परम्परा को एक थेरेपी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है और इसके लिए पुरानों के तथ्य देने की कोशिश की गयी है.
लेखक ने कैथरीन बेल (Cathrine Bell) (१९९७) की Rituals Perspectives and Dimentions का हवाला देते हुए लिखा है “दर्शन को आने वाले सभी पुरुष प्रतिभागियों की दर्शन परंपरा को को एक गिफ्ट एक्सचेंज धर्मकृत्य (Rite of Gift Exchange) के रूप में देखा जा सकता है, उनके लिए यह कोई मनस्ताप पूर्ण धार्मिक कृत्य नहीं हैं क्योंकि यह प्राथमिक रूप से प्रतिभागी द्वारा किया गया ‘मानवी भक्ति का लेनदेन’ (Human Divine Transanctions) है जिसमें सीधे गुणगान, प्रार्थना, याचना के सामर्थ्य से एक मांग रखी जाति है साथ ही भक्त अपने भलाई (Well-Being) के लिए अपनी इस भक्तिमय भागीदारी को वापस लेने का सामर्थ्य भी शामिल होता है.” (Sebastia, 2009, पृ. 97)  अर्थात ‘दर्शन’ के पीछे मुख्य उद्देश्य यह होता है कि भक्त उस भगवान् के प्रति प्रेम और भक्ति दिखाएं जिसके बदले दर्शनार्थी यह मानकर चलता है कि भगवान् भी उसे प्रेम सुरक्षा प्रदान करेगा.
लेखक के अनुसार दर्शनार्थियों में कुछ को बीमारियों के विभीन्न दशाओं के अनुभव के साथ पाया गया, जैसे- निद्रारोग, चिंता, दबाव और   व्योमोहाभ लक्षण (Paranoid Syndrome). कुल ३५ दर्शनार्थियों में से ज्यादातर लोगों के साथ साक्षात्कार किया गया जिसमें प्रतिभागियों ने यह दावा किया कि वे दर्शन से मानसिक सहायता प्राप्ति की कोशिश कर रहे थे, जिसके बाद उनके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार भी आया है.
आलेख के पहले हिस्से में लेखक ने दर्शन के धार्मिक कृत्य को ‘Seeing And Touching’के परम्परा के साथ जोड़कर देखा है. साथ ही भारतीय धर्मग्रंथों का आधार लेते हुए इस ‘दर्शन’ का विश्लेषण किया है. द्वीतीय भाग में लेखक द्वारा बबुलनाथ मंदिर में आनेवाले दर्शनार्थियों के पूरे दर्शन पद्धति का ब्योरा दिया है जिसमें उनके द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कृत्य का मनोविश्लेषनात्मक पद्धति से विवेचन किया है, जैसे- प्रतिभागियों का मंदिर में प्रवेश, शिवलिंग पर चढ़ावे के लिए फूल-पत्ते ले जाना उसे शिवलिंग पर चढ़ाना, शिवलिंग को चूमना, स्पर्श करना, यहाँ तक कि भीड़ के कारण पुरोहित द्वारा दबाव में ‘जल्दी करो’ कहना उसके बाद भी किसी भक्त का मंदिर में किसी कोने में जाकर वहीँ से शिवलिग के प्रति समर्पित भाव से देखना, इन सभी छोटी-छोटी चीजों का मनोवैज्ञानिक अर्थ निकालकर लेखक ने इसे Ethno-Psychoanalytical  Approach से विश्लेषित किया है.  राजू की केस स्टडी से उन्होंने इस बात को स्थापित करने की कोशिश की है कि दर्शन एक थेरेपी के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है.
तीसरे भाग में Restoring Mental Health With Psychiatry  प्रतिमा मूर्ति एवं संजीव जैन द्वारा बैंगलोर में पागलखानों में दिए जाने वाले उपचार के दृष्टिकोणों का अध्ययन किया है जिसमें एतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देकर ब्रिटिश पूर्व भारत, ब्रिटिशकालीन भारत एवं समकालीन समय में इसकी स्थितियों का विवरण अपने आलेख Dignosis and Treatment Approches at the Asylum in Bangalore  में किया है. 
स्वास्थ्य संबंधी आधुनिक प्रशानिक उपकरणों, हॉस्पिटल का उदय मध्य पूर्व में दिखाई देता है. भारतीय परिदृश्य में देखें तो दक्षिण एशियाई प्रदेशों में हॉस्पिटल्स जैसे प्रबंध दिखाई देते हैं. (वर्मा,१९५३, ‘History of Psychiatry  in India and Pakistan,’ Indian Journal of Neurology and Psychiatry, Vol-4. P.P.-138-64)
लेखक ने भारतीय द्वीप में शुरुआती समय में प्रचलित व्ययक्तिक रूप से चिकित्सा सेवा में लगे वैद्य एवं हाकिम दोनों का 14 वी सदी तक के साक्ष्य दिए हैं. मोहम्मद तुग़लक एवं उसके बाद फिरुज तुगलक को रेखांकित करते हुए इस बात को बाल दिलाते है कि उस समय में हॉस्पिटल जैसी अवधारणा थी किन्तु वह मुख्यत: सैनिकों, खानाबदोश-घुमक्कड़ एवं परदेशियों के लिए थी. (Sebastia, 2009, पृ. 213) 
लेखक के अनुसार १५००-१७५० यह वह समय था जब भारत में यूरोपीय प्रभाव बढता गया इसका सीधा प्रभाव दक्षिण एशिया पर हुआ, जिससे वहां के लोगों में ‘यूरोपियन मेडिसिन’ के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी. युद्धों की श्रुंखला के बाद 18 वी शताब्दी के आते तक पश्चिमी एवं भारतीय चिकित्सा एकत्रित रूप से कार्यरत होने लगी. १९ वी सदी के मध्य तक इन दोनों चिकित्सा प्रणालियों में उपयुक्त शरीरविज्ञान आधारित ज्ञान ही बुनियाद बन गया. ह्यूमोरल(शरीर द्रवीय) कंसेप्ट टू जस्टिफाई द कॉउजेशन ऑफ़ डिजीज जो पश्चिम से बनी है और भारतीय अवधारणा के अनुसार थ्योरी ऑफ़ एलिमेंट इन दोनों में कोई समानता नहीं दीखाई देती थी फिर भी आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में समानता पर आधारित चर्चा एवं लेन-देन शुरू हुआ था. (Sebastia, 2009, पृ. 214)
तीसरा भाग इसी तरह के अन्य आलेखों से भरा है. मनोचिकित्सा प्राणाली से मानसिक स्वास्थ्य को किस तरह से पुनः प्रस्थापित किया जा सकता है, इस बात पर जोर दिया गया है.
समकालीन समय में यह किताब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारतीय चिकित्सा पद्धतियों का ऐतिहासिक एवं समकालीन विश्लेषण प्राथमिक तथ्यों पर आधारित है. मनोवैज्ञानिक एवं मनोचिकित्सा के अध्ययन कर्ताओं के लिए यह किताब महत्त्वपूर्ण है. किन्तु लेखिका ने समकालीन सामाजिक विमर्श या नव सामाजिक विज्ञान को दरकिनार किया है. इस किताब में भारतीय चिकित्सा विद्याओं को देशज ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करने की बजाय मुख्यधारा के चिकित्सा प्रणाली के साथ साम्य जुटाने पर ज्यादा बल दिया है. तीन हिस्सों में से किसी भी आलेख में कारपोरेट अर्थव्यवस्था के दबाव के कारण भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को मिलने वाला स्थान, इस पर बात नहीं की गई. किताब पूरी तरह से निष्क्रिय अकादमिक संश्लेषण का नतीजा लगती है. हालांकि इस तरह के तथ्य जुटाने में ज्यादा समय खर्च होता है और ऐसे में इन तथ्यों को केवल एकांगी रूप से देखने का नजरिया मानसिक स्वास्थ्य से ज्यादा शरीरक्रिया चिकित्सा प्रणाली का रूप धारण करता है. किताब इतनी सरल लिखी गई है कि सामान्य से सामान्य समझ वाला भी इसे समझ सकता है. मानसिक स्वास्थ्य के शोधार्थियों के लिए ऐतिहासिक तथ्य एवं समकालीन थेरेपिज का स्वरूप देखने के लिए इसे एक बार जरूर पढनी चाहिए.       
-Brigitte Sebastia (edi.), 2009






निलामे गजानन सूर्यकांत 
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र,
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा।  
gajanannilame@gmail.com