Showing posts with label Medha lekha. Show all posts
Showing posts with label Medha lekha. Show all posts

Sunday, March 25, 2018

वर्धा : सात दिवसीय संकाय संवर्द्धन कार्यशाला का प्रतिकुलपति ने किया समापन



वर्धा, 25 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषदहैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के अंतिम दिन प्रथम सत्र में महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के मेडिसिन विभाग के निदेशक प्रो. उल्हास जाजू ने पिछले चार दशकों के अपने अनुभव के आधार पर सामुदायिक स्वास्थ्य को लेकर किए गए प्रयोग पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि हमारे काम की शुरुआत 40 साल पहले इस संदर्भ में शुरू किया था ताकि स्वास्थ्य सुविधाएं ग्रामीण लोगों तक पहुँच सके और इसी कड़ी में ग्रामीण स्वच्छता का मुद्दा हमारे सामने आया। इस कार्य को पूर्ण करने के लिए हमने गांधी, विनोबा तथा सुशीला नायर आदि के विचारों को अपनाया। जिससे हमने ग्रामीण भारत के साथ जुडने की कला सीखी। इसी कड़ी में हमने जयप्रकाश नारायण के विचारों को भी अपनाया।

उन्होंने आगे कहा कि समता, स्वतंत्रता तथा मैत्री के आधार पर ही अपने ध्येय को प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए सत्ता का विकेन्द्रीकरण आवश्यक शर्त बन जाती है। गांधी के अनुसार ग्रामीणों में सत्ता का विकेन्द्रीकरण ही सच्चा 'हिन्द स्वराज' लाएगा। इसी कड़ी में हमने गांधी-जीवन के आदर्शों को अपनाते हुए श्रम आधारित समाज रचना की स्वीकार्यता को अपनाया। प्रो. जाजू ने आगे कहा कि गांधी ने ग्राम स्वराज का सपना देखा जिसे विनोबा जी ने भूदान-ग्रामदान के जरिये आगे बढ़ाने की कोशिश की थी। विदर्भ के गढ़चिरौली जिले में मेंढ़ा-लेखा इसी तरह का प्रयोग है जो आज भी हमें देखने को मिलता है।
            उन्होंने कहा कि गांधी अंत्योदय से सर्वोदय अर्थात समन्वय की बात करते थे। हमने लाओत्से का निम्न मंत्र अपनाया-
            लोगों की ओर जाओ
            उनके साथ काम करो
            उन्हें समझो
            उनसे सीखें
            उन्हें प्रेम करें
            उनके साथ नियोजन करें
            उनके साथ कार्य करें!
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हुए हमने यह ध्यान रखा कि यह 'for the people' अर्थात जनता के लिए हो। हमें कुछ समस्याओं के साथ भी जूझना पड़ा। यहाँ के लोगों के लिए आज सबसे महंगा स्वास्थ्य खर्च माना जाता है। गांवों की संस्कृति, उनका जीवन अनुभव आदि को समझे बगैर तथाकथित पढ़े-लिखे लोग केवल विकास के नाम पर आउटसाइडर के रूप में काम करने की सोचते हैं। जिसमें उन्हें भीख से ज्यादा नहीं देते, ऐसे में हम इसे समुदाय सहभागिता कैसे कहें! यह एक गंभीर प्रश्न है। अक्सर हम गाँव वालों पर थोंपने की ही कोशिश करते हैं। आज एक ओर विज्ञान नये-नये लक्ष्यों की प्राप्ति की है लेकिन कहीं भी इसको अच्छे उपयोग के लिए नहीं अपनाया गया। इसे ज़्यादातर दुरुपयोग के लिए ही उपयोग में लाया जाता है। विनोबा को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान रथ के घोड़े की तरह है जिसकी लगाम अपने अच्छे लोगों के हाथ में होने की आवश्यकता है।
            उन्होंने कहा कि गांवों में हम ऐसा क्यों समझते हैं कि ग्रामीणों को हम अक्ल सिखाने जा रहे हैं? गांवों के लोगों के विज़डम को भी हमें समझना होगा। एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि गाँव में वट वृक्ष की पूजा करने वाली महिलाओं से यह पूछा गया कि आपने किसकी पूजा की तो उनका उत्तर था पति अर्थात शिव की। मेरे प्रश्न के जवाबी उत्तर में कि क्या किसी देवी की पूजा होती है तो उनका जवाब था 'साहब उनकी पूजा तो रोज ही होती है।' अर्थात 85% महिलाओं को आज भी पति के द्वारा पीटा जाता है, जिसे वे महिलाएं व्यंग्यपूर्वक पूजा कह रही थी।
            उन्होंने आगे कहा कि आम लोगों तक वास्तविक लाभ पहुँचाने के लिए हमें समाज की संरचना को बदलना होगा जिसके लिए राजनैतिक मंशा की आवश्यकता ज्यादा है। अपने प्रयोग पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हमने गांवों में फ्री में कोई भी सेवा नहीं दी और वहाँ के लोगों की सहभागिता के आधार पर ज्वार, धान आदि को इकट्ठा कर उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं दी गई। इस गतिविधि के माध्यम से ग्रामीणों में 'राइट टू डिमांड' के प्रति जागरूकता को बढ़ाने की कोशिश की। उन्होंने ट्रस्टीशिप की भावना के विकास पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत में आज भी स्वास्थ्य पर कुल GDP का मात्र 1.4 फीसदी ही खर्च किया जाता है। जबकि यूएनडीपी के मुताबिक यह 5 से लेकर 10 फीसदी तक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रति व्यक्ति के आधार पर ग्राम सभा के जरिये संसाधनों का बंटवारा हो और ग्रामीण लोगों के हाथों में निर्णय प्रक्रिया हो तभी गांवों का समुचित विकास मुमकिन हो सकता है। साथ ही उन्होंने समुदाय सहभागिता के मूलतत्व बताएं जिसमें से कुछ इस प्रकार है-
            -समुदाय द्वारा स्वीकृति
            -समुदाय द्वारा सहयोग
            -समुदाय द्वारा पार्टनरशिप
            -समुदाय द्वारा सहभागिता
            उन्होंने इसका उदाहरण बताते हुए बताया कि क्रांति सातत्यपूर्ण होती है, नित-नवीनतम होती है। मेंढ़ा-लेखा जैसे गाँव में ग्राम सभा को भूस्वामित्व ग्रामसभा को सौंपने में 35 साल लगे। ऐसे गाँव में सही मायने में ग्रामीण सहभागिता के उक्त सभी मूल तत्वों को देखा जा सकता है। आगे उन्होंने कहा कि हमने गांवों में स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने हेतु जिस तरीके को अपनाया वह यह थी- शुरुआत में हमने घर-घर जाकर ग्राम वासियों को स्वच्छता के बारे में बताना शुरू किया। इस कार्य में ग्रामीणों की सहभागिता के साथ-साथ कुछ संस्थाओं से मदद ली गई। खुले में शौच जाने को खत्म करने हेतु अलग-अलग मोहल्ले में एक-एक टाइलेट बनाया गया लेकिन इसका उपयोग देखा कि लोग लकड़ी, बकरी आदि को रखने के लिए किया जाने लगा। जब हमने वहाँ की वृद्ध महिलाओं से बातचीत की कि ऐसा क्यों हुआ! तब उन्होंने बताया कि 'हर परिवार की महिलाओं को ही दूर-दूर के कुएं से पानी ढोकर लाना होता है। घर के सात लोगों के लिए नहाने, कपड़े धोने से लेकर पीने व रसोई के लिए पानी लेकर वे ही आती हैं। उसमें भी अब आपकी टाइलेट के लिए अलग से पानी लाकर मेरी बहू को मारना है क्या? तब जवाब में मैंने खिसियाहट के साथ कहा कि फिर सुबह-सुबह सलामी देने का शौक क्यों है? वृद्धा ने जवाब दिया कि गीली जमीन, बिजली की कमी तथा बिच्छू, साँप के डर से महिला-पुरुष रास्ते के दोनों अलग-अलग किनारे पर टायलेट के लिए जाते हैं। इस तरह हमने उनसे वहाँ से अक्ल प्राप्त की और विज्ञान का आधार लेते हुए उनकी आवश्यकताओं के अनुसार कम पानी खर्च होने वाला शौचालय बनाया गया। इसे बनाने एवं उपयोग में लाने में पाँच साल लगे। आगे इस परियोजना को गांवों में क्रियान्वित करने के लिए ग्रामीणों के द्वारा ही किये जाने की प्रविधि को अपनाया गया जिसका अंतिम उद्देश्य 'ग्राम स्वराज' था। उन्होंने कहा कि बिना लोकशक्ति के गाँव में कोई भी परिवर्तन नहीं लाया जा सकता है। शक्ति के आधार पर, नैतिकता के आधार पर हमने वहाँ कार्य किया, जाति-धर्म से अलग आर्थिक क्षमताओं के आधार पर सामाजिक संरचना का निर्माण करना। व्यक्ति तथा सामाजिक योगदान को बढ़ावा दिया। श्रमदान, समर्थ की पहचान की गयी इसी से सहभागितापूर्ण नेतृत्व का निर्माण हुआ।
            उन्होंने आगे कहा कि हमने अपने प्रयोगों में से जो पाया वह यह था कि ग्रामीण लोगों के अनुभवों के आधार पर ही उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य होना चाहिए। दान का स्वरूप भीख न हो बल्कि लोकशक्ति के रूप में उसका उभार होना चाहिए। दानकर्ता को ट्रस्टी के रूप में होना चाहिए न कि दाता के रूप में। संसाधन ग्राम सभाओं के हाथ में होने चाहिए। इस पूरे कार्य को करने के लिए तंत्र-मंत्र के साथ-साथ व्रत लेना जरूरी है। हम सब जब व्रती के रूप में सामाजिक जीवन का निर्वहन करेंगे तभी अच्छे समाज का निर्माण होगा। मेंढ़ा-लेखा इस मामले में काफी आगे निकाल चुका है। हम भी समाज का मंगल चाहते हैं तो इस तरह के प्रयोगों को आगे बढ़ाना होगा।

द्वितीय सत्र में ग्रुप प्रस्तुति हुई। अशोक सातपूते, राहुल निकम, गजानन नीलामे, डिसेन्ट कुमार द्वारा लेखा-मेंढ़ा के सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षिक स्थिति के अध्ययन के आधार पर अपना रिपोर्ट प्रस्तुत किया। रिपोर्ट में उन्होंने कहा कि वहाँ की शैक्षिक स्थिति बहुत ही निम्नतर है तथा गाँव में इसको लेकर एक प्राथमिक स्कूल के अलावा दूसरा कुछ संसाधन भी नहीं दिखाई दिया। निकम ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि उस गाँव में दोपहर के अनुचित समय में जाने के कारण ज्यादा जानकारी नहीं प्राप्त हो सकी, किन्तु ग्रामीणों की सहभागिता काबिल-ए-तारीफ़ है। गांवों में कई सारे गलत चीजों पर प्रतिबंध लगाया गया है। वहीं अशोक सातपूते ने मेंढ़ा लेखा के विवाह संस्था का विस्तृत विश्लेषण सबके सामने रखा। अंत में सभी ने सेवाग्राम गाँव की संरचना पर अपनी बात रखी। 
            समृद्धि डाबरे ने अपने ग्रुप का प्रतिनिधित्व करते हुए महिलाओं से संबन्धित समस्याओं पर बात रखी। डॉ. शिव सिंह बघेल ने मेंढ़ा लेखा पर विस्तृत प्रस्तुति दी। साथ ही सेवाग्राम गाँव की महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर बात की। अंत में दोनों की तुलना के आधार पर गांवों के बेहतरी के लिए विकल्प प्रस्तुत किए।
            खेती-किसानी और शिक्षा के मसले पर गठित समूह ने मेंढ़ा-लेखा और सेगांव के शैक्षिक भ्रमण के हवाले से अपने अनुभव साझा किए। इस समूह में डॉ. मुकेश कुमार, डॉ. देवशीष मित्रा एवं डॉ. पार्थसारथी मालिक, नरेश गौतम शामिल थे। इस समूह की तरफ से डॉ. पार्थसारथी ने अपने अनुभव रखते हुए कहा कि पढ़े-लिखे लोग सैद्धान्तिक चर्चा मात्र करते हैं किन्तु गाँव के लोग उसको व्यवहार में उपयोग में लाते हैं। श्याम शर्मा ने भी मेंढ़ा लेखा के अपने अनुभव शेयर किए। उन्होंने गाँव के सांस्कृतिक पहलू को रेखांकित किया। टी. राजु ने भी अपने अनुभव बताए। मेंढ़ा लेखा गाँव में की जा रही बांस की खेती के बारे में भी उन्होंने चर्चा की।
            चर्चा के अंत में प्रो. उल्हास जाजू ने मेंढ़ा-लेखा गाँव के बनने की पूरी प्रक्रिया की संक्षिप्त चर्चा की। उन्होंने बताया कि वनों पर सामुदायिक अधिकार कानून बनाने के साथ-साथ इस गाँव ने सबसे पहले उसे हासिल भी किया। तत्कालीन केंद्रीय वन-पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने उस गाँव में आकार वनों पर सामुदायिक अधिकार की घोषणा की थी। उन्होंने बताया कि तीन वर्ष पूर्व इस गाँव ने अपनी भूमि ग्राम सभा को दान कर दिया है। अब वहाँ भूमि की मिल्कियत पर व्यक्तिगत मालिकी नहीं है। ग्राम सभा ने हर किसी को उस भूमि पर कृषि करने हेतु दे रखी है। श्रमजीवी समाज के लिए इस गाँव ने एक नया आदर्श खड़ा किया।

इस सात दिवसीय कार्यशाला के समापन-सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने की। संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया। उक्त मौके पर प्रो. उल्हास जाजू, विश्वविद्यालय के कुलसचिव कादर नवाज खान, डॉ शंभू जोशी एवं एनसीआरआई के डॉ. डी. एन. दास मौजूद थे। एनसीआरआई के डॉ. डी. एन. दास को प्रतिकुलपति ने अंगवस्त्र, सूत की माला व चरखा भेंट कर सम्मानित किया। समापन सत्र में पूरे कार्यक्रम की संक्षिप्त रिपोर्ट डॉ. मुकेश कुमार ने प्रस्तुत किया। समापन सत्र में दो प्रतिभागियों टी. राजू एवं डॉ. राहुल निकम ने बारी-बारी से अपने अनुभव शेयर करते हुए बताया कि इस कार्यशाला से उन्हें काफी फायदा मिला और ग्रामीण समुदाय को सूक्ष्मता से जानने-समझने का मौका मिला। दोनों ने कहा कि इस किस्म का फ़ैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम एक सप्ताह मात्र न होकर पंद्रह दिनों का होना चाहिए। उक्त मौके पर एनसीआरआई के डॉ. डी. एन. दास ने अपना मत प्रकट करते हुए कहा कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय ने यह आयोजन कर महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने प्रतिकुलपति और कुलसचिव से ग्रामीण समुदाय से लगाव बढ़ाने हेतु इसे पाठ्यक्रम का अंग बनाने में सहयोग का अनुरोध किया। समापन सत्र में ही प्रतिकुलपति एवं कुलसचिव के हाथों सभी प्रतिभागियों के बीच प्रमाण-पत्र वितरित किया गया।

समापन सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने कहा कि ग्रामीण समुदाय पर केन्द्रित महत्वपूर्ण कार्यशाला सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए आप सभी बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि भारत के गाँव तमाम अभावों के बावजूद विशिष्टता लिए हुए हैं। गाँव में आतिथ्य भाव आज भी कायम है। गाँव से आज भी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। गांव में आज सुविधाओं का अभाव है, लोग बड़े पैमाने पर गाँव से विस्थापित हो रहे हैं। उन्होंने महाराष्ट्र के चर्चित मॉडल गाँव हिबरे बाजार के प्रयोग की भी चर्चा की। प्रतिकुलपति ने एनसीआरआई से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में एक स्थायी केंद्र बनाने का भी निवेदन किया, जहां वर्ष भर इस प्रकार के ग्राम केन्द्रित कार्यक्रम संचालित किए जा सकें। समापन सत्र में सभी प्रतिभागियों को कुलसचिव कादर नवाज खान ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, गजानन एस. निलामे एवं डिसेन्ट कुमार साहू.


Saturday, January 31, 2015

हमारे गाँव में हम ही सरकार


                                                                 
           - नरेश गौतम  
यह नारा दिया है मेंढ़ा-लेखा गाँव के आदिवासियों ने। इतना ही नहीं उस नारे को उन्होंने फलीभूत भी कर दिखाया है। सारी योजनाएं ग्रामसभा में बनायी जाती हैं और सबंधित सरकारी एजेंसी से सहयोग के लिए संपर्क करते हैं। सहयोग मिला तो ठीक अन्यथा उनके द्वारा बनाये गये ग्राम-सभा कोष में जमा राशि का उपयोग ग्राम-सभा के जरिये ही किया जाता है।   
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले से लगभग 30 किलोमीटर दूर बसा है आदिवासियों का यह गाँव है। यह वन पर सामुदायिक अधिकार हासिल करने वाला देश का पहला गाँव है। आज 100 परिवार वाले इस गाँव की प्रति वर्ष आमदनी लगभग एक करोड़ रुपये है। यह आय सामुदायिक वन अधिकार कानून-2006 से प्राप्त लगभग 1900 हेक्टेयर वन से प्राप्त हो रही है। वर्ष 2013-14 में इन्होंने दस लाख रूपिये से ज्यादा आयकर का भुगतान किया है। पूर्व में इतनी राशि इस वन से काटे गये वनोत्पाद की पूरी बिक्री से भी प्राप्त नहीं होती थी। साधारण से दीखने वाले इस गाँव में वैसी ही बस्तियाँ और आमतौर पर दिखने वाले वैसे ही घर, घर के बाहर घूम रही मुर्गियाँ, चूजे, सुअर और उनके छोटे-छोटे बच्चे, गलियों में जगह-जगह फैला गोबर! दिन भर सूनी रहने वाली ये गलियाँ और शांत माहौल देखकर लगता ही नहीं कि यहाँ कुछ ऐसा है जो इसे विशिष्ट बनाता हो, सिवाय गाँव के बीचो-बीच बनी ग्रामसभा भवन पर लगे उस बड़े से बोर्ड के, जिसपर लिखा है, ‘दिल्ली, मुंबई में हमारी सरकार- हमारे गाँव में हम ही सरकार! तीन भाषाओं गोंडी, मराठी और हिन्दी में लिखा यह नारा ही वह प्रतीक है जिससे हम इस गाँव की उस ताकत से रूबरू होते हैं, जो इसे दूसरे गांवों से अलग पहचान देती है। इस बोर्ड के बगल में ही एक और बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है–माहितीचा अधिकार अधिनियम 2005 और नीचे इस गाँव को इस मुकाम तक पहुंचाने वाले देवाजी तोफा का नाम दर्ज है। आज देश-विदेश में यह एक मॉडल गाँव के रूप में जाना जाता है. लेकिन आदर्श गाँव बनने की यह यात्रा कोई एक दिन की बात नहीं रही, इसके पीछे एक लंबे और अनथक संघर्ष की दास्तां है और खुद को साबित कर दिखाने का हुनर भी।
यूं तो जल, जंगल और जमीन पर अपने हक के लिए आदिवासियों की लड़ाई कोई नई बात नहीं है, यह तभी से जारी है जब वन अधिनियम (1864) के जरिए पहली बार अंग्रेजों ने जंगल पर उनके अधिकारों को चुनौती दी थी। वन अधिनियम 1878 के अंतर्गत वनों को आरक्षित वन और ग्राम के तौर पर वर्गीकृत कर दिया गया। कमोबेश स्थितियाँ यहाँ तक ठीक थीं लेकिन भारतीय वन अधिनियम 1927 के अंतर्गत आदिवासियों को उनके संपूर्ण अधिकारों से बेदखल कर दिया गया। इसके लागू होने के बाद आदिवासियों की समस्याएं बढ़ती ही चली गई। जिसके खिलाफ देश भर में अपने अधिकारों के लिए आदिवासियों के धारावाहिक संघर्ष प्रारंभ हुए जो कमोबेश आज भी जारी हैं। मेंढ़ा गाँव के आदिवासी भी इन्हीं में से एक हैं। देश की आज़ादी और नए संविधान तले नई शासन-व्यवस्था के बावजूद आदिवासियों के लिए बहुत कुछ नहीं बदला क्योंकि आदिवासी समाज के प्रति सत्ता के नजरिए और उनकी नीतियों में कोई फेरबदल नहीं आया था। आजादी के बाद एक और अधिनियम वन संरक्षण अधिनियम, 1980 आया जिसके तहत सभी वनों का नियंत्रण केंद्र सरकार और उसके साथ ही संबंधित राज्य सरकारों के हाथों में चला गया। इस अधिनियम को लागू करने का उद्देश्य जंगलों से होने वाली आय का पूरा अधिकार हासिल करना और आदिवसियों को जंगलों से बाहर निकालना था। तर्क दिया गया कि जंगलों में रहने वाले आदिवासी बेहद पिछड़े हुए हैं और उनका विकास सिर्फ तभी संभव है जब उन्हें जंगलों से बाहर निकाल कर शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य आधुनिक सुख-सुविधाओं से जोड़ा जाए। यह तर्क एक तरफ तो मुख्यधारा की सत्ता-संरचना के श्रेष्ठता बोध से निकला था। लेकिन दूसरी तरफ इसके अपने निहितार्थ भी थे जो जंगलों पर कब्जा जमाते हुए उसका अंधाधुंध दोहन कर राजस्व के रूप में अधिकाधिक मुनाफा अर्जित करना था। सभ्यता-विमर्श की मशाल थामे विकास के नाम पर बनायी गई सड़कें इन निहितार्थों की असली वाहक थीं जो उदारीकरण की आहट के साथ अचानक ही बड़ी तेज़ी से इन इलाकों तक पहुँचने लगी। 1980 में बना वन संरक्षण अधिनियम भी इसी आहट की पदचाप थी जो मेंढ़ा गाँव की इस ऐतिहासिक यात्रा की शुरुआत की वजह बन गया।
सफ़र की शुरुआत :
1984 में चंद्रपुर-गढ़चिरौली में जंगल बचाव-मानव बचाव आंदोलन शुरू हुआ। उसका मुख्य कारण यह था कि आंध्रप्रदेश में गोदावरी नदी पर इंचमपल्ली में तथा पास के बस्तर जिले में इंद्रावती नदी पर भोपालपट्टनम् में बांध बनाने की योजना थी। इस क्षेत्र में वैनगंगा और इंद्रावती ये मुख्य नदियां हैं। इंद्रावती महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के बीच की सीमारेखा है, तो वैनगंगा चंद्रपुर और गढ़चिरौली जिलों के बीच की सीमारेखा है। दोनों प्रकल्प महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की सीमा पर थे; फिर भी गढ़चिरौली जिले का काफी जंगल और आदिवासी क्षेत्र इससे डूबने वाला था। आसपास के आदिवासी गांवों का इस संभावित खतरे को भांपते हुए आंदोलित होना स्वाभाविक था। इस आंदोलन का नेतृत्व लालश्यामशाह महाराज ने किया।
लालश्यामशाह महाराज एक अनोखे नेता थे। वे एक गोंड जमींदार थे और पुराने मध्यप्रांत में गोंड समुदाय की 84 जमींदारियां थीं। ब्रिटिश राज में भू-राजस्व की वसूली कर उसे सरकार को सौंपना इन जमींदारों की जिम्मेवारी थी। लालश्यामशाह महाराज की जमींदारी राजनांदगांव जिले के पानाबारस गांव में थी। जमींदार होने के बावजूद उनका रहन-सहन और बर्ताव आम किसान-जैसा ही था। वे समाजवादी विचारों के थे। 1972 में चंद्रपुर लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय सांसद के तौर पर वे निर्वाचित भी हुए लेकिन 1971 में बांग्लादेश युद्ध के बाद शरणार्थियों को सरकार द्वारा बस्तर में बसाए जाने के विरोध में संसद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उनका सारा जीवन जन-जागरण के लिए समर्पित रहा। वे गांव-गांव घूमते। किसी के घर में नहीं, बल्कि पेड़ के नीचे ठहरते। उनका व्यक्तित्व अत्यंत ही प्रभावशाली था। आदिवासी-विकास के बारे में उनके अपने विचार थे। बांध-विरोधी आंदोलन व्यापक विकास का आंदोलन हो, यह उनका प्रयास रहा। इसीलिए आंदोलन को जंगल बचाव-मानव बचावनाम दिया गया। आंदोलन इतना जबर्दस्त था और लोगों का असंतोष इतना गहरा था कि सरकार को बाध्य होकर बांध का निर्माण रोकना पड़ा। साथ ही इस आंदोलन के प्रभाव से कारवाफा और तुलतुली जैसे दो बड़े प्रस्तावित बांध भी ठंढे बस्ते में चला गया। लेकिन आंदोलन की असली सफलता थी आदिवासियों में इस निमित्त पैदा हुई जागृति। इस जागृति से सामने आए लोगों में से ही एक थे -चंद्रपुर के युवा कार्यकर्ता मोहन हिराबाई हिरालाल। वे जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 आंदोलन में काम करने वाले विद्यार्थी तथा युवाओं के संगठन छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में शामिल थे। संघर्ष वाहिनी का केंद्र उन्होंने चंद्रपुर में शुरू किया। 1978 से चंद्रपुर में काम कर रही महाराष्ट्र जबरान जोत आंदोलन कृषि समितिमें भी वे सक्रिय थे। 1979 से 1986 के बीच उन्होंने क्षेत्र में एक अनूठी प्रक्रिया चलाई, जिसका नाम था अपना रास्ता हम खुद ही खोजें। इस प्रक्रिया का आरंभ होता था आदमी खोजने और उनसे संवाद करने से। उन्होंने अपने मित्रों के साथ 1984 में वृक्षमित्रनामक संस्था की भी स्थापना की। जिसका उद्देश्य जंगल तथा मानव के बीच के संबंधों की खोज और उन संबंधों को मानव-विकास तथा पर्यावरण-संवर्द्धन के लिए पोषक बनाना था। इस उद्देश्य के तहत 1987-88 में गढ़चिरौली जिले की धानोरा तहसील के 22 गांवों में वन तथा लोगों की उपजीविकाविषय का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन के दौरान ही ऐसे गाँवों को खोजने की कोशिश हुई जो सर्वसहमति से अपने निर्णय लेते हों। मेंढ़ा-लेखा ऐसा ही गाँव था। इस गाँव के देवाजी से जंगल बचाव-मानव बचावआंदोलन के दौरान एक पदयात्रा में हुई मुलाक़ात ने इस नए सफर की शुरुआत की।
गढ़चिरौली से राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) की तरफ जो रास्ता जाता है उस पर गढ़चिरौली से तीस किलोमीटर दूर मेंढा गांव रास्ते से सटा हुआ है। इसी रास्ते पर आगे तीन किलोमीटर दूर तहसील धानोरा है। मेंढा के पड़ोस में लेखा गांव है। इस तहसील में मेंढा नाम के दो-चार गांव हैं; इसलिए इस मेंढा को लेखा-मेंढा, अर्थात लेखा के पास का मेंढा कहा जाता है। ग्रामपंचायत लेखा के नाम से जाना जाता है। उसमें लेखा, मेंढा और कन्हाल टोला- ये तीन गांव हैं।
मेंढा करीब सवा सौ-डेढ़ सौ सालों से आबाद होगा। यहां के लोग बताते हैं कि पूरब की ओर बस्तर तहसील का पुसागंडी उनका मूल गांव है। वहां से सात भाइयों का एक परिवार इस क्षेत्र में आया। सभी मेंढा में ही नहीं बसे, कुछ लोग इधर-उधर भी गए। मेंढा के पुलिस पटेल रहे बिरजू जोगी तोफा का परिवार सबसे पहले यहां बसा। बिरजू गांव के मुख्य पुजारी भी हैं। उम्र 70 से ज्यादा ही होगी। उनके चार पीढ़ी पूर्व के पूर्वज पहले पहल यहां आए थे। फिर दूसरे लोग आए। ये लोग माड़िया गोंड कहलाते हैं- यानि पहाड़ पर रहने वाले गोंड। गोंडी भाषा में माड़ यानी पहाड़। देवाजी बताते हैं कि उनके पुरखे अबूझमाड़ में रहते थे, जो महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा पर है। वहां से उठकर ये लोग पश्चिम की ओर आए। ये सब लोग पहले पहाड़ों पर रहते थे, लेकिन जैसे-जैसे बस्ती बढ़ी, घुमंतू खेती से गुजर-बसर करना कठिन हो गया। इसलिए वे नीचे मैदानी इलाके में नदी-नालों के किनारे खेती करने आए। हालांकि खेती की जमीन यहाँ नीचे भी ज्यादा नहीं है, फिर भी हर परिवार के पास अपनी जमीन है, कोई भूमिहीन नहीं। खेती की मुख्य उपज है धान। यहाँ मुख्यतः लुचाई किस्म बोई जाती है, यद्यपि लुचाई में भी कई किस्में हैं। इसमें लाल लुचाई और सफेद लुचाई (मजबी) मुख्य हैं। इसके अलावा भारी लुचाई, काकेरी, पिटे हिड्स्क, तोया, हलका सप्री, और पोहा बनाने के लिए उपयुक्त मानी जाने वाली भारी सप्री, जैसी किस्में भी बोई जाती हैं। इन दिनों ज्यादातर लोग 1010 या सोनम किस्में ही बो रहे हैं क्योंकि ये उपज ज्यादा देती हैं। औसत उपज प्रति एकड़ तीन से चार क्विंटल रहती है। धान के अलावा ये लोग तूर, मूंग, अरहर, खेसारी जैसी दालों का तथा अलसी जैसे तिलहन का उत्पादन भी कर लेते हैं। कुछ लोग सर्दी में चना भी उपजाते हैं। खेती की उपज मुख्यतः घर में खाने के लिए ही काम आती है।
      धान की खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर है। सिंचाई सुविधा न होने से फसल एक बार ही ली जाती है। लेकिन मेंढा गांव से सटकर बहने वाली कठाणी नदी के किनारे लोग सब्जियां पैदा करते हैं। इसे मरियाणकहते हैं। धान की खेती और मरियाण के साथ यहाँ के लोग मजदूरी भी करते हैं। मेंढा गांव की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है -1890 हेक्टेयर का बड़ा जंगल, जिसे उन्होंने बड़ी जतन से संभाल रखा है। इतने बड़े जंगल में स्वाभाविक रूप से ढेरों किस्म के पेड़-पौधे, लताएं और घास हैं जिनकी सूची यकीनन काफी लंबी होगी। मेंढा गांव ने जैव-विविधता कानून-2002 के तहत अपना जैव-विविधता रजिस्टरभी बनाया है, जिसमें इन सब को दर्ज किया गया है- बांस, सागौन, महुआ, तेंदू, आंवला, हरड़ा, बेहड़ा, अर्जुन, ऐन, धावडा, खैर, चिरौंजी, सीवन, मोवई, चिलाटी आदि।
      निश्चित तौर पर जंगल इनकी उपजीविका का एक प्रमुख साधन बन गया है। इससे एक तरफ जहां इन्हें वनोपज मिलती है, वहीं दूसरी तरफ जंगल में होने वाले कामों के जरिए मजदूरी भी मिलती है। वनोपज में सबसे प्रमुख बांस है। इसके बाद महुआ, तेंदू, चिरौंजी, गोंद, शहद, आंवला, हरड़ा, बेहड़ा, पापड़ी, करंज, मशरूम, इमली, लाख, बिवला आदि भी हैं। महुआ, तेंदू, पाहूर आदि ऐसे पेड़ हैं जिनके फल-फूल एवं पत्ते, सबका कुछ न कुछ उपयोग होता है। इनमें ज्यादातर वस्तुओं का व्यापारिक मूल्य भी है। यह बात सिर्फ मेंढा में ही नहीं लगभग सभी जंगलों में पाई जाती है।
    आदिवासी हमेशा से ही जंगलों से अपने जरूरतें पूरी करते रहे हैं। चूंकि यहाँ मुख्य वनोपज बांस है, इसलिए यहाँ के लोग भी अपनी ज़रूरत का बांस शुरू से ही यहाँ से लेते रहे हैं। सरकार के वन अधिनियमों ने जंगलों पर आदिवासियों के इस हक़ को कानूनी तौर पर खत्म कर दिया था लेकिन जब तक इन कानूनों को कड़ाई से लागू नहीं किया गया तब तक कोई बहुत दिक्कत नहीं आई। दिक्कत तब आई जब ये जंगल कभी खनन के लिए तो कभी किसी कारखाने के कच्चे माल के लिए निजी कंपनियों को दे दिये गए और इन तक आदिवासियों की पहुँच वर्जित हो गई। ऐसे ही बांस से भरा-पूरा मेंढा गाँव का जंगल भी एक निजी कंपनी बल्लारपुर पेपर मिल को दीर्घकाल के लिए लीज पर दे दिया गया था। न केवल मेंढा बल्कि चंद्रपुर और गढ़चिरौली जिले के जंगल का सारा बांस सरकार ने इसी बल्लारपुर पेपर मिल को बेच दिया था। यह मिल 1950 के दशक में चंद्रपुर में आस-पास बांस की भरपूर मात्रा में उपलब्धता को देखते हुए ही बनायी गई थी। जैसे ही बांस काटने लायक होता, मिल मालिक उसे कटवा लेते। वर्ष 1991 से 2001 के दरम्यान मिल को 400 रुपए प्रति टन की दर से पानी के भाव बांस बेचा गया। एक टन में करीब 2400 मीटर बांस आता है और अगर बांस की औसत लंबाई 7 मीटर मान लें, तो एक टन में करीब 350 बांस आते हैं। यानी एक बांस की कीमत हुई रुपए-सवा रुपए, जबकि बाजार में इस बांस की कीमत दस से बारह रुपए तक थी। इस पेपर मिल को दो लाख टन बांस का आवंटन किया गया था।
      नवंबर 1990 में मेंढा गाँव के लोगों ने अपनी ग्रामसभा में सामूहिक रूप से यह तय किया की इस साल पेपर मिल को बांस नहीं काटने देंगे। इस निर्णय के पीछे कई कारण थे- एक तो ग्रामसभा का प्रस्ताव था कि अपने जंगल की रक्षा करनी है और अपने क्षेत्र में किसी को बिना अनुमति के काम नहीं करने देना है। दूसरी बात यह थी कि गांव वालों की जरूरतों की उपेक्षा कर सरकार बांस मिल मालिकों को दे रही थी। तीसरी बात यह थी कि मिल अंधाधुंध तरीके से बाँसों की कटाई करवा रही थी। छोटे और कोमल, अपक्क बांस भी काटती थी। इस निर्मम कटाई के दौरान बांस के अंकुर भी नष्ट हो जाते थे जिससे जंगल में नए बांस पैदा की पैदावार बाधित हो जा रही थी।
      न केवल आदिवासी और किसान बल्कि सभी ग्रामीणों के जीवन में बांस बहुत महत्वपूर्ण है। इससे टोकरियां, अनाज रखने के लिए कोठार, सूप जैसी कई उपयोगी वस्तुएं तो बनती ही हैं; साथ ही मकान-निर्माण, बाड़ बनाने या विवाह मंडप बनाने में भी इसका उपयोग परंपरा से होता आ रहा है। इसीलिए इसे कल्पवृक्षकहा गया है, जबकि पेपर मिल इसकी सिर्फ लुगदी बनाती थी। इतना ही नहीं, अपने कच्चे माल की यथावत आपूर्ति जारी रखने पर अमादा थी। न केवल चंद्रपुर-गढ़चिरौली में, बल्कि जहां कहीं भी पेपर मिल है, हर जगह यही हो रहा है। पर्यावरण वैज्ञानिक माधव गाडगिल के अनुसार कर्नाटक की दांडेली पेपर मिल ने 1958 से 1973 के दौरान मात्र 15 वर्षों में बेतहाशा कटाई से कारवार जिले का पूरा बांस खत्म हो गया। वहां भी मिल के मजदूर बांस के तने के निचले हिस्से पर रहने वाला कंटीला आवरण जानबूझकर काट डालते थे जिससे बांस के अंकुर सूख जाते और चंद सालों में ही बांस खत्म हो जाते। जबकि ग्रामीण ऐसा नहीं करते, वे बांस के तने का ऊपरी हिस्सा ही काटते, जिससे बांस जिंदा रहता और नई संततियाँ आती रहती हैं।
यह सही है कि बांस से कागज बनता है और कागज हर एक की जरूरत है। लेकिन बेहतर भविष्य के मद्दे नजर प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किफ़ायती ढंग से ही होना चाहिए। इसीलिए मेंढा गाँव के लोगों का कहना था कि गांव वालों की जरूरतों की पूर्ति के बाद ही बांस मिल को दिये जाएं; जहां तक हो सके, बांस के सूखे टुकड़े दिए जाएं और उनकी उचित कीमत मिले। इनकी अंधाधुंध, अवैज्ञानिक कटाई से जंगलों के स्थायी नुकसान पर रोक लगाई जाए। उनकी इन दूरदर्शितापूर्ण वाजिब बात को जब अनसूना कर दिया जाता रहा तो आंदोलन के सिवा और कोई रास्ता न था। क्योंकि जनता के शासन की बात करने वाली तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था अंतिम तौर पर हित तो अमीरों का ही देखती है। मेंढा गांव के लोगों का आग्रह बस इतना था कि कंपनी मालिकों के बजाय लोगों के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सरकार की इन नीतियों के खिलाफ ही मेंढा गाँव ने हमारे गांव में हम ही सरकारकी प्रक्रिया शुरू की। यह एक राजनीतिक प्रक्रिया थी। यूं तो जलग्रहण क्षेत्र-विकास या जंगल-रक्षा के काम महाराष्ट्र में कम नहीं हुए हैं। ग्रामसफाई या तंटामुक्ति’ (झगड़ों से मुक्ति) अभियानों के जरिये आदर्शकहलाए गए गांव भी कई हैं। लेकिन बाकियों से अलग यह राजनीतिक प्रक्रिया ही मेंढा की विशेषता है। दूसरे शब्दों में कहें तो ग्राम-विकास की बात करते समय एक अलग तरह की राजनीति का मॉडल पेश करने के मेंढ़ा गाँव के इस राजनीतिक सूत्र को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
      किसी शासन-व्यवस्था जिसे हम सरकारभी कहते हैं, का स्वरूप मुख्यतः तीन कार्य-प्रक्रियाओं से निर्मित होता है। पहली निर्णय-प्रक्रिया, यानि सरकार अपने शासन के अंतर्गत विभिन्न विषयों पर निर्णय लेती है और उसके फैसले अंतिम व सर्वमान्य होते हैं। दूसरा नियम एवं कानूनों का निर्माण, जो किसी व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने का आधार है और तीसरा इन नियम-क़ानूनों के आईने में लिए गए फैसलों को अमल में लाने वाली विस्तृत व्यवस्था, जिसे हम नौकरशाही कहते हैं। सरकार के विभिन्न विभाग होते हैं, जिनके मार्फत नीतियां और कार्यक्रम अमल में लाए जाते हैं।
मेंढ़ा गाँव की विशेषताएँ :  
सशक्त ग्राम सभा :
      सरकार और व्यवस्था के इसी ढांचे को अपने छोटे रूप में मेंढ़ा लेखा की ग्राम सभा द्वारा अपनाया गया है लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि यहाँ फैसले लेने, नियम बनाने और उसके क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया सामूहिक तौर पर पूरे गाँव द्वारा सम्पन्न की जाती है। यहाँ इलेक्शन नहीं सेलेक्शन किया जाता है, जिसमें महिलाओं और पुरुषों की समान भागीदारी होती है। किसी भी पुरुष या महिला का चुनाव तीन वर्षों के लिए किया जाता है जो कि गाँव वालों की सहमति से लिए गए फैसलों को क्रियान्वित करने का काम करता है। ग्रामसभा के पास ग्राम विकास से लेकर अन्य गाँव से संबंधी सभी दस्तावेजों एवं अन्य प्रारूपों का समुचित लेखा-जोखा रहता है। ग्रामसभा में किसी भी बात के निपटारे या निर्णय लेने में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।
सामुदायिक भूस्वामित्व/ ग्रामदान :
      पूरी ग्राम-सभा में किसी भी व्यक्ति के पास अपनी निजी जमीन नहीं है। दूरदर्शिता का परिचय देते हुए सभी ने अपनी जमीनें ग्रामसभा के नाम कर दी है। इसके पीछे इनका मूल उद्देश्य यह है कि पूरी ग्राम-सभा एक परिवार बन सके। ऐसा होने से अब जमीन की सिंचाई या इससे संबंधित किसी भी तरह के अन्य भुगतान संबंधी खर्च ग्राम सभा वहन करती है। साथ ही ग्राम-सभा के सामूहिक मालिकाने से अब कोई भी एक व्यक्ति किसी जमीन को बेच नहीं सकता। इस फैसले से भविष्य में कंपनियों के लिए वहाँ जमीन खरीदने की संभावनाओं के दरवाजे बंद कर दिये गए हैं। क्योंकि कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी अब मेंढ़ा के किसी एक को बहला-फुसला कर जमीन नहीं खरीद सकती। जमीन संबंधी सारे फैसले अब ग्राम सभा में सामूहिक चर्चा से तय किए जाते हैं। इसलिए ग्रामसभा की सहमति के बिना भविष्य में यहाँ कोई कारखाना भी नहीं खुल सकता। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला है और अपने संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के लिए एक मिसाल भी।
संपूर्ण सामुदायिक रोजगार :
      इस गाँव में सभी व्यक्तियों को साल भर सौ फीसदी रोजगार की पूरी व्यवस्था की है। स्त्री हो या पुरुष सभी को पूरे वर्ष काम उपलब्ध कराने का दायित्व ग्रामसभा पर है। जिस व्यक्ति को जो काम आता है, उसे वैसा ही काम दिया जाता है। बांस की कटाई में सभी गांव वालों का शामिल होना एक तरह से अनिवार्य है। एक बांस का मूल्य 20 रुपए तय किया गया है, जबकि इससे पहले सरकारी कटाई में एक बांस का मूल्य 2 से 5 रुपए था। ये खुद ही जंगल की निगरानी भी करते हैं। यह काम भी पूरे साल में बारी-बारी से कुछ दिनों के लिए सभी को करना पड़ता है और इसमें महिलाएं भी शामिल होती हैं। इसके लिए निश्चित मजदूरी दी जाती है। अपनी विशिष्टता के चलते पूरे देश में आकर्षण का केंद्र बने इस गाँव को देखने, इससे सीखने और निरीक्षण एवं अध्ययन के लिए बड़ी तादाद में आने आने वाले लोगों की देखरेख एवं गाँव से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने का काम भी ग्रामसभा द्वारा नियुक्त अलग-अलग लोग करते हैं, जो रोटेशन पर बदलते रहते हैं। इन सबको मजदूरी का भुगतान ग्रामसभा करती है। यहाँ तक कि बाहर से आए लोगों के खाने का इंतजाम करने वाले भी हर दिन बदल जाते हैं, ताकि सभी को काम मिल सके। यहाँ बांस से सामान बनाने वाली मशीनें भी लगाई गई हैं। जो लोग प्रशिक्षित हो चुके हैं, वे यहाँ काम करते हैं और दूसरे लोगों को प्रशिक्षित भी करते हैं। यहाँ शहद निकालने के लिए भी एक केंद्र बनाया गया है। गाँव के लोग जंगलों में जाकर शहद निकालने का काम करते हैं जिसके लिए उन्हें ग्राम-सभा द्वारा निर्धारित मूल्य मिलता है और इसकी बिक्री का काम ग्राम-सभा करती है।         
स्त्री पुरुष की समान भागीदारी :
      ग्राम-सभा में सक्रिय सहभागिता से लेकर सभी तरह के कामों में गाँव के स्त्री-पुरुषों की समान भागीदारी रहती है। बल्कि कई बार सार्वजनिक क्षेत्र के कामों में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा दिखाई देती है। चाहे बांस की कटाई हो या ग्राम सभा में कोई योजना बनानी हो, जब तक महिलाओं की पूरी भागीदारी नहीं होती, कोई भी फैसला पूरा नहीं होता। कृषि से लेकर जंगल की सुरक्षा तक के सभी कामों में समान तरीके से सबको शामिल किया जाता है। किसी विषय पर उसके अच्छे-बुरे पक्षों को देखते-समझते हुए आम राय से ही किसी निर्णय पर पहुंचा जाता है। साथ ही यह कोशिश भी होती है कि सिर्फ बहुमत के आधार पर ही कोई फैसला न हो बल्कि सभी को किसी कॉमन बिंदु पर राजी कर सर्व सहमति से निर्णय लिए जाएँ।
शराब उत्पादन पर पूर्ण पाबंदी :
मेंढ़ा-लेखा में शराब उत्पादन पर पूर्ण रूप से रोक लगाई गई है। यहाँ कोई भी शराब नहीं बनाता चाहे वह व्यक्तिगत उपयोग के लिए हो या सामूहिक। शराबबंदी की यह व्यापक पहल तीन दशक पहले महिलाओं के द्वारा की गई है। 1984 में ही यहाँ शराबबंदी शुरू हो गई थी और तब से कोई भी व्यक्ति यहाँ शराब नहीं बनाता। खुलेआम शराब पीने पर भी यहाँ प्रतिबंध है, हालांकि यह अलग बात है कि कुछ लोग कभी-कभार चोरी-छिपे दूसरे गाँव से शराब पीकर आ जाते हैं। जिसे बुरा नहीं माना आता। लेकिन अगर कोई शराब पीकर झगड़ा करता है तो उसे सामूहिक तौर पर दंड दिया जाता है जिसके लिए आर्थिक और सामाजिक दंड के अलग-अलग नियम बनाये गए हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास एवं परिवार नियोजन पर पूर्ण जागरूकता :
      मेंढ़ा-लेखा में नई पीढ़ी के सभी लोग शिक्षित और साक्षर हैं। सभी बच्चे स्कूल जाते हैं जो ग्राम-सभा भवन के पास ही स्थित है। वैसे देवाजी तोफा इस शिक्षा-प्रणाली से संतुष्ट नहीं हैं। उनका मानना है कि यह शिक्षा-व्यवस्था हमारे बच्चों को परिवारों से अलग करती है। भविष्य की उनकी योजनाओं में वैकल्पिक शिक्षा एक जरूरी विषय है जिसमें गांधी की नई तालीम को लेते हुए उसे नए संदर्भों में क्रियान्वित किए जाने का लक्ष्य है।
      स्वास्थ्य और आवास को लेकर भी उनके पास भविष्य की अनेक योजनाएं हैं। इस गाँव की एक खासियत यह भी है कि यहाँ सारे घर एक ही पैटर्न पर एक ही तरह से बने हैं जिसमें प्राकृतिक रूप से हवा के आने-जाने व रौशनी की पर्याप्त व्यवस्था है। इसके अलावा पूरा गाँव परिवार नियोजन को लेकर भी जागरूक है और नई पीढ़ी ने तो इसे पूरी तरह से अपनाया है। अन्य पारंपरिक गांवों के मुक़ाबले यहाँ किसी भी घर में दो-तीन से ज्यादा बच्चे नहीं हैं। 
आय-व्यय की पारदर्शी और टिकाऊ व्यवस्था
      पूरी ग्राम-पंचायत में आय-व्यय का भुगतान बैंक के माध्यम से ही किया जाता है। सभी व्यक्तियों के अपने निजी खाते हैं और किसी भी तरह का भुगतान इन खातों के जरिए ही होता है जिसका पूरा ब्यौरा ग्राम-पंचायत के दस्तावेजों में कभी भी देखा जा सकता है। भ्रष्टाचार की तमाम गुंजाइशों पर विराम लगाते हुए बिना बैंक खातों के किसी भी तरह के पैसे का लेन-देन नहीं किया जाता। यदि किसी योजना का भी पैसा आता है तो वह भी ग्राम-सभा के खाते में ही आता है और फिर उसका भुगतान किया जाता है। कौन सा पैसा किस मद में खर्च किया गया है, इसका पूरा ब्यौरा संपूर्ण पारदर्शिता के साथ ग्राम-सभा के पास देखा जा सकता है। आपदा या किसी अन्य तरह की जरूरत के लिए अलग से ग्राम सुरक्षा कोष बनाया गया है जहाँ सभी गाँव वालों को अपनी आय का 10 प्रतिशत सालाना जमा करना पड़ता है। इसी तरह का एक और कोष भी बनाया गया है, जहाँ साल भर के लिए सामूहिक अनाज जमा किया जाता है ताकि सूखा या इसी तरह की किसी अन्य आकस्मिक आपदा के वक्त इसका इस्तेमाल किया जा सके।
वन संरक्षण की वैज्ञानिक दृष्टि :
      ग्राम-सभा द्वारा वन संरक्षण के लिए भी नियमावली बनाई गई है। इसमें पेड़ों की गिनती, उनकी आयु, मोटाई एवं लंबाई के साथ ही उसकी उपयोगिता से संबंधित सारे ब्योरे सुरक्षित हैं। अगर कोई एक पेड़ काटा जाना है तो उसकी जगह पर दूसरा लगा दिया जाता है। जंगल में किस-किस तरह की घास पाई जाती है और कौन सी किस तरह के काम में आती है, इसका भी पूरा ब्यौरा रखा गया है। अमूमन किस पेड़ की आयु कितने वर्ष की होती है, यह भी उन्हें पता है और इसीलिए किसी पेड़ के सूखने के साथ ही उसकी जगह नया पेड़ लगा दिया जाता है। जंगल में पाये जाने वाले औषधीय पौधों के विस्तृत ब्योरे भी उनके पास हैं। गाँव में पशुओं के लिए अलग से चारागाह भी बनाया गया है।
परंपरा के प्रति तार्किक दृष्टिकोण
आधुनिकता के प्रति अपने सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ ही अपनी परंपरा को लेकर भी यहाँ के लोग काफी सचेत हैं और इसे बचाने-संभालने की उनकी कोशिशे जारी हैं। यहाँ किसी पेड़ को काटने से पहले उसकी पूजा करने का नियम है। इसके पीछे उनके तर्क हैं कि चूंकि पेड़ ही हमारा जीवन है, इसलिए काटने के पहले उसकी पूजा करना उसकी महत्ता और जीवन के प्रति हमारे द्वारा सम्मान एवं आभार प्रदर्शन करने का ही एक तरीका है। इसके अतिरिक्त आदिवासी समाजों में मासिक धर्म के समय महिलाओं को उनके रोज़मर्रा के कामों से छुट्टी देते हुए अलग से उनके आराम की व्यवस्था का नियम था। मेंढ़ा गाँव में भी स्त्रियों के लिए मासिक धर्म के समय उनके आराम करने की उचित व्यवस्था के अंतर्गत हर चार से छः घरों के बीच स्त्रियों के लिए अलग से विश्राम घर जैसी व्यवस्था की गई है। इसके अलावा सामुदायिक शिक्षा एवं परंपरागत ज्ञान के पीढ़ीगत हस्तांतरण के लिए आदिवासी समाज में मौजूद रही पारंपरिक संस्था घोंटुल भी यहाँ है जिसके जरिए समुदाय का जो व्यक्ति जिस ज्ञान में पारंगत है, वह सामुदायिक रूप से नई पीढ़ी को यह ज्ञान हस्तांतरित करता है।
कैसे संभव हुआ यह सब :
       27 अप्रैल, 2011 का दिन न केवल मेंढ़ा लेखा गाँव के लिए बल्कि पूरे आदिवासी आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण दिन था जब गढ़चिरौली जिले की धनोरा तहसील के इस गाँव को 2006 के वन अधिकार अधिनियम के तहत सरकार द्वारा 1890 हेक्टेयर वन जमीन का सामुदायिक स्वामित्व प्रदान किया गया। यद्यपि यह अधिकार एक लंबे संघर्ष का परिणाम था लेकिन कागजों पर सीमित इन अधिकारों को वन विभाग के झमेलों से मुक्त कराने के लिए इन्हें काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। अपने उपयोग के लिए तो ये बांस काट सकते थे लेकिन जंगल पर अपना अधिकार होने के बाद भी बांस की बिक्री पर मनाही थी। यहाँ तक की सरकारी अधिकारियों द्वारा यहाँ से बांस खरीदने वालों पर मुक़दमा करने की धमकी भी दी जाती थी। इसके खिलाफ वन विभाग और सरकार से दो साल लंबी लड़ाई लड़ने के बाद अंततः 2013 में इनकी बात मानी गई और जंगल के संसाधनों पर इन्हें इनका पूरा हक़ दिया गया। आज मेंढ़ा-लेखा सिर्फ कोई गाँव मात्र नहीं रह गया है, अपने लंबे संघर्ष और सामूहिक-सामुदायिक प्रयासों से आज यह जिस मुकाम तक पहुंचा है, वह न केवल जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ रहे तमाम आंदोलनों के लिए प्रेरणास्रोत है बल्कि इससे कहीं आगे विकल्पहीन होती जा रही दुनिया में विकल्प और उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है।...

मेढ़ालेखा क्षेत्र भ्रमण के दौरान मेरे सहयोगी रहे- डॉ. शिव सिंह बघेल, डॉ. मुकेश कुमार, शोध छात्र डिसेन्ट कुमार साहू, नरेश गौतम    




(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के समाज-कार्य विभाग से पी-एच.डी. शोधरत हैं.)
nareshgautam0071@gmail.com