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Thursday, March 24, 2016

इतिहास, राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता

प्रो. रोमिला थापर
[प्रो. रोमिला थापर द्वारा जेएनयू में 6 मार्च, 2016 को दिये गए व्याख्यान पर आधारित लेख]
प्रो. रोमिला थापर ने अपना व्याख्यान शुरू करते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा कि उन्हें लगता है कि वे और उनके कई अन्य वरिष्ठ सहकर्मी “जेएनयू के डायनासोर” हैं। गौरतलब है कि प्रो. रोमिला थापर उन लोगों में से हैं, जो जेएनयू के विकास की प्रक्रिया के न सिर्फ साक्षी रहे हैं, बल्कि जिन्होंने इस विवि के आरंभिक क्षणों से लेकर (प्रो. थापर नवंबर 1970 में जेएनयू से जुड़ीं), इसके विकसित होने की प्रक्रिया में अतुलनीय योगदान दिया है। उन्होंने बताया कि जेएनयू के आरंभिक दिनों में, उन लोगों का उद्देश्य जेएनयू को एक ऐसे विवि के रूप में परिणत करना था, जहां बेहतर अकादमिक गुणवत्ता के साथ-साथ खुली चर्चा और विमर्श का माहौल उपलब्ध हो।
विषय पर आते हुए प्रो. थापर ने कहा कि वे इतिहास और राष्ट्रवाद के संबंधों की चर्चा करेंगी और इसके जरिये वे उस प्रक्रिया की गहराई में भी जाएंगी, जिसके अंतर्गत हम अपने समाज को समझते हैं और उसमें अपनी अस्मिता को खोजते हैं। राष्ट्रवाद का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार एरिक हाब्सबौम को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि “राष्ट्रवाद को इतिहास की तलब उतनी ही होती है, जितनी कि एक अफीमची को अफीम की” ("history is to nationalism what poppy is to an opium addict."). इस कथन की व्याख्या करते हुए प्रो. थापर ने कहा कि इतिहास राष्ट्रवाद के लिए न सिर्फ एक स्रोत होता है, बल्कि यह राष्ट्र की अस्मिता का भी निर्माण करता है।
रोमिला थापर ने कहा कि राष्ट्रवाद आधुनिक काल में ऐतिहासिक बदलावों के फलस्वरूप उपजा है, और यह आधुनिक काल से पूर्व मौजूद नहीं था। 17वीं सदी के यूरोप का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यूरोपीय देशों में पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के विस्तार, मध्यम वर्ग के उदय ने ‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा की उत्पत्ति में योगदान दिया। इसके अंतर्गत एक सेकुलर अस्मिता की भी बात की गई, जो समावेशी होने के साथ-साथ एकता को भी सुनिश्चित करती। यह समावेशी अस्मिता सामाजिक जागरूकता से उपजी थी। और इस पूरी प्रक्रिया में, “साझा इतिहास” का महत्त्व बढ़ गया क्योंकि यह लोगों को एक सूत्र में बांधता था। प्रो. थापर ने यह बात ज़ोर देकर कही कि राष्ट्र कभी एकल अस्मिता के बल पर नहीं खड़ा हो सकता, उसे समावेशी होना ही पड़ेगा।
राष्ट्रवाद की अवधारणा में आखिरकार अतीत के कुछ हिस्सों को “स्वर्ण काल” (गोल्डेन एज़) के रूप में देखने की घातक प्रवृत्ति शामिल हो गई। यह तथाकथित “स्वर्ण काल” अतीत के समाजों के भ्रामक इतिहास पर आधारित था, जबकि हम वर्तमान में जी रहे हैं। प्रो. थापर ने अपवर्जी राष्ट्रवाद (एक्सक्लूसिव नेशनलिज़्म) के रूप में, जर्मनी में 20वीं सदी के तीसरे दशक में उपजे ‘राष्ट्रवाद’ का उदाहरण दिया और समावेशी राष्ट्रवाद (इनक्लूसिव नेशनलिज़्म) के रूप में अफ़्रीकी राष्ट्रवाद का उदाहरण दिया। और यह जोड़ा कि दुनिया भर को अफ़्रीकी राष्ट्रवाद के समावेशी चरित्र को अपनाना चाहिए।
भारत में राष्ट्रवाद के उदय पर टिप्पणी करते हुए प्रो. रोमिला थापर ने कहा कि भारत में राष्ट्रवाद उपनिवेशवादविरोधी आंदोलन के दौरान पनपा। प्राक-औपनिवेशिक भारत में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की बहुतेरी अस्मिताएं एक-साथ अस्तित्व में थीं। धर्म के अंतर्गत भी कोई एकाश्मी (मोनोलीथिक) धर्म न होकर अनेक संप्रदाय अस्तित्व में थे। यह विविधता से भरा-पूरा समाज था, जहाँ भिन्न-भिन्न समूह अपने स्तर से संवाद कर रहे थे। पर ब्रिटिश शासन के दौरान जेम्स मिल सरीखे उपनिवेशवादी इतिहासकारों ने इस पूरी विविधता को धर्म तक सीमित कर दिया। जेम्स मिल ने 1818 में लिखी अपनी पुस्तक में काल-विभाजन के लिए शासक वंश के धर्म का इस्तेमाल किया और इस तरह पूरे भारतीय इतिहास को “हिन्दू काल”, “मुस्लिम काल” और “ब्रिटिश काल” में बाँट दिया।
काल-विभाजन की इस अवधारणा के पीछे द्विराष्ट्रवाद का वही सिद्धान्त काम कर रहा था, जिसके अंतर्गत यह माना जाता था कि ‘हिन्दू और मुस्लिम, स्थायी तौर पर एक-दूसरे के विरोधी और शत्रु हैं और उन्हें शांत रखने के लिए किसी बाह्य शक्ति जैसे ब्रिटिश साम्राज्य की जरूरत होगी’। द्विराष्ट्रवाद के इसी सिद्धान्त ने “अल्पसंख्यक” और “बहुसंख्यक” सरीखी श्रेणियाँ गढ़ दीं। इसने एकाश्मी धार्मिक अस्मिता को सुदृढ़ करने का (consolidated monolithic religious identity) काम किया। हेमचन्द्र रायचौधुरी, रमेश चंद्र मजूमदार और नीलकंठ शास्त्री सरीखे राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने एक ओर जहाँ प्राच्य निरंकुशता (Oriental Despotism) के सिद्धान्त को चुनौती दी, वहीं दूसरी ओर इन लोगों ने जेम्स मिल के काल-विभाजन को स्वीकार कर लिया। भले ही अब “हिन्दू”, “मुस्लिम” और “ब्रिटिश” काल की जगह प्राचीन, मध्यकाल और आधुनिक काल ने ले ली थी, पर इतिहास को धर्म के चश्मे से देखने की मूल अवधारणा में कोई बदलाव नहीं आया।
उपनिवेशवादी इतिहासलेखन ने भारतीय इतिहास में “आर्य नस्ल का सिद्धान्त” भी आरोपित कर दिया। प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि ‘आर्य भाषा’ मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची’। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत ही के स्थानीय निवासी थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! बावजूद इसके कि हड़प्पा सभ्यता की भाषा अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है और न ही हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति के स्रोत ज्ञात हो सके हैं।
एक तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, जब अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थियोसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थियोसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे। लोकमान्य तिलक का कहना था कि आर्य आर्कटिक प्रदेश से आए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में आर्यों से जुड़े मुद्दे का इतना अधिक राजनीतिकरण हो चुका है कि जो विद्वान ‘आर्यों के भारत में ही उत्पन्न होने’ की अवधारणा पर सवाल उठाते हैं, उन्हें सोशल मीडिया और इंटरनेट का गुस्सा और अपमान झेलना पड़ता है। ऐसी स्थिति ऐतिहासिक विषयों से जुड़ी परिचर्चा और वाद-विवाद-संवाद की संभावना को घटा देती है।
जहां एक ओर उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवाद सेकुलर, लोकतान्त्रिक और बराबरी के सिद्धान्त पर आधारित समाज और मुख्य अस्मिता के रूप में “भारतीयता” की वकालत करता था। वहीं दूसरी ओर, धार्मिक राष्ट्रवाद एक धर्म, संस्कृति, भाषा आदि के सबसे अलग होने को रेखांकित करता है। यह अक्सर, राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए जान-बूझकर गढ़ा जाता है, जैसा हिंदुत्व के उदाहरण में हमें स्पष्ट दिखता है। ‘हिंदुइज़्म’ और हिंदुत्व दोनों एक ही चीज नहीं हैं। ‘हिंदुइज़्म’ एक धर्म है, जबकि हिंदुत्व एक आधुनिक राजनीतिक विचारधारा। हिंदुत्व एक विचारधारा है जो कुछ बातें तो ज़रूर ‘हिंदुइज़्म’ से लेती है, पर यह ‘हिंदुइज़्म’ से बहुत अलग है।
इतालवी फासीवाद से प्रेरणा प्राप्त करने वाली हिंदुत्व की अवधारणा 20वीं सदी में अस्तित्त्व में आई, और इसका उद्देश्य था - हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए हिंदुओं को राजनीतिक रूप से संगठित करना। धर्म पर आधारित विचारधारा के निर्माण में ज़रूरत पड़ने पर धर्म की आधारभूत बातों को भी फिर से रचा जा सकता है। यह पुनर्रचना अक्सर धर्म के अभिजात्य और पुरातनपंथी अनुयायियों को ध्यान में रखकर की जाती है। जब हम ‘हिन्दू’ होने को परिभाषित करते हैं तो सामान्यतया ऐसा उच्च जाति के लोगों के संदर्भ में ही किया जाता है। क्योंकि इस परिभाषा का आधार वे टेक्स्ट होते हैं, जो इन्हीं जाति-समूहों के हैं। हिंदुत्व एक निश्चित भू-भाग, एकल संस्कृति और नृजातीय उत्पत्ति, एक भाषा और एक धर्म की बात करता है। यह हिंदुओं की साझी ‘पुण्यभूमि, पितृभूमि’ की भी बात करता है और अन्य सभी धर्मावलंबियों को विदेशी बतलाता है। हिंदुत्व अपने धार्मिक पक्ष में, सामी (सेमिटिक) धर्मों की रूपरेखा का ही अनुसरण करता है, मसलन, ‘ऐतिहासिकता’ पर ज़ोर और एकाश्मी (मोनोलिथिक) धर्म, एक पवित्र ग्रंथ, चर्च जैसे धार्मिक संगठन।
चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई या सिख, इस तथ्य की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता कि बहुतेरे धर्मावलंबी ऐसे होते हैं जो अपने धार्मिक ग्रंथों से थोड़ा ही परिचय रखते हैं। उनके लिए धर्म एक अलग ही मसला होता है। असल व्यवहार में, ये लोग अपना खुद का धर्म/पंथ निर्मित कर लेते हैं, अपने चुने हुए तरीके से अपने देवताओं, गुरुओं, पीरों या बाबाओं की पूजा करते हैं, प्रो. रोमिला थापर ने इन धर्मों को मुख्य धर्म से अलग करते हुए इन्हें “गुरू-पीर धर्म” की संज्ञा दी। धर्म के इतिहासकारों को इसका मूल्यांकन करना चाहिए कि आखिर लोगों के धर्म और उनके विश्वास किस हद तक धार्मिक टेक्स्ट पर या व्यवहारों पर निर्भर या उनतक सीमित होते हैं।
भारतीय इतिहास में धर्म की अवधारणा को पारिभाषित करने वाली दो प्रमुख धाराएँ थीं: ब्राह्मणवादी और श्रमण परंपरा। यह द्वैधता ईसा की पहली सहस्राब्दी में भी कायम रही। वैयाकरण पातंजलि ने इनके बीच के संबंधों की तुलना साँप और नेवले से की थी, यानि इन दोनों के संबंध संघर्षमय थे। हम भारत में धर्मों के इतिहास के बारे में समझने की कोशिश करें और जानना चाहें कि कैसे धर्मों ने समाजों को प्रभावित किया तो हमें उन पंथों के बारे में जानना होगा, जो इन धर्मों से उत्पन्न हुए, और साथ ही, इन पंथों के परस्पर जटिल संबंधों का अध्ययन करना होगा, जिसमें अक्सर इन पंथों के विश्वासों और व्यवहार की पूरी फेहरिस्त शामिल होगी। धर्मों और उनसे निकले पंथों/संप्रदायों का अध्ययन करते हुए हमें उनके बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा और आदान-प्रदान को भी समझना होगा। ये पंथ अक्सर किसी-न-किसी जाति से जुड़े होते थे, अतः इस संबंध का भी अध्ययन करना होगा।
अंत में, प्रो रोमिला थापर ने ज़ोर देते हुए कहा कि राष्ट्रवाद को विश्वसनीय इतिहास पर निर्भर होना होगा न कि किसी व्यक्ति या खास विचारधारा के लोगों की अतीत से जुड़ी फंतासियों पर। ज्ञान का विस्तार हो इसके लिए यह जरूरी है कि आलोचनात्मक सवाल उठाए जाएँ, इसलिए विवि परिसर स्वस्थ बहस और वाद-विवाद-संवाद का केंद्र होना चाहिए। राष्ट्र को सभी नागरिकों के समान अधिकारों और उनके बीच बराबरी को सुनिश्चित करना होगा, तभी हम सच्चे अर्थों में अपने देश को सेकुलर लोकतन्त्र बना सकेंगे।

(प्रस्तुति एवं अनुवाद- शुभनीत कौशिक)