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Sunday, March 25, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के छठे दिन प्रतिभागियों के अलग-अलग समूहों के बीच हुई चर्चा


वर्धा, 24 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्यअध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के छठे दिन सेवाग्राम स्थित गांधी आश्रम का अवलोकन करते हुए सेगांव ग्राम का शैक्षणिक भ्रमण किया गया।
शनिवार को भोजनोपरांत सत्र का प्रारंभ हुआ। सत्र के प्रारंभ में डॉ. मिथिलेश कुमार ने शेष कार्यक्रम की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की। उसके उपरांत एनसीआरआई के डी. एन. दास ने चर्चा के लिए बाकी बचे दो समूहों को आमंत्रित किया। समूह चर्चा टीम ने खेती, किसानी और शिक्षा पर चर्चा की। चर्चा की शुरुआत डॉ. मुकेश कुमार ने की। चर्चा में डॉ. देवाशीष मित्रा ने ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था के इतिहास की संक्षिप्त चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत में कृषि अत्यंत ही विविधतापूर्ण इसलिए भारत में कृषि का कोई एकसमान पाठ्यक्रम नहीं बन सकता है। सभी राज्यों की भौगोलिक स्थिति में भी काफी भिन्नता है।

वहीं इस समूह के सदस्य डॉ. पार्थसारथी मल्लिक ने समूह चर्चा में कहा कि ग्रामीण समुदाय की बहुसंख्या कृषि पर निर्भर है। ग्रामीण क्षेत्र में कृषि की स्थिति बदहाल बनी हुई है। आज की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित नहीं रह गई है। लोग गाँव से पलायन कर रहे हैं। गाँव के लोगों को आज बिजली चाहिए, शिक्षा चाहिए, स्वास्थ्य चाहिए। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के चर्चित मेंढ़ा लेखा मॉडेल विलेज की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सबकुछ के बावजूद उस गाँव में शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी और वहाँ शिक्षा को लेकर जागरूकता का अभाव था। सरकारी शिक्षा व्यवस्था अत्यंत ही बदहाल है। निजी शिक्षा संस्थानों में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए संसाधन नहीं है। हर गाँव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। गाँव केन्द्रित पाठ्यक्रम विकसित करने की जरूरत है।

डॉ. देवाशीष मित्रा ने चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि शिक्षा की आदर्शवादी परिकल्पना को सरजमीं पर उतार पाना काफी मुश्किल है। डॉ. पार्थसारथी मल्लिक ने गांधी के बुनियादी तालीम की भी चर्चा की। डॉ. मुकेश कुमार ने गांधी के बुनियादी तालीम के हृदय, हाथ और मस्तिस्क के संतुलित विकास के सिद्धान्त और व्यवहार पर प्रकाश डाला। शोधार्थी नरेश गौतम ने कहा कि आज 'वन इंडिया वन प्लान' की कोशिश की जा रही है। जबकि भारत के अलग-अलग राज्यों में भूमि का वितरण अत्यंत ही असमान है, मुट्ठीभर हाथों में आज भी भूमि का ज़्यादातर हिस्सा है जबकि ज़्यादातर लोग खेत-मज़दूर हैं।
समूह ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि कृषि केन्द्रित पाठ्यक्रम बनना चाहिए। समूह ने यह बात स्पष्टता के साथ कहा कि पूरे भारत के लिए कृषि पर केन्द्रित कोई एक पाठ्यक्रम नहीं हो सकता, कृषि की विभिन्नता, भौगोलिक भिन्नता आदि का ख्याल रखते हुए ही कृषि का कोई पाठ्यक्रम विकसित व निर्धारित किया जाना चाहिए। समूह चर्चा टीम की प्रस्तुति के उपरांत उपस्थित प्रतिभागियों ने अपने-अपने सुझाव दिए। चर्चा के अंत में एनसीआरआई के डी.एन. दास ने भी अपनी बातें रखी।


महाराष्ट्र के वर्धा जिले के देवली ब्लाक के लोनी गाँव में किए जा रहे प्रयोग को सीएम फ़ेलो अतुल ए. राऊत ने प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि ग्राम परिवर्तन अभियान के तहत महाराष्ट्र सरकार राज्य के एक हजार गांवों की शिनाख्त कर उसे विकसित करने का कार्यक्रम चला रही है। फिलहाल 450 गाँव में काम करने हेतु 350 सीएम फ़ेलो बहाल किए गए हैं। 9 बड़े कॉरपोरेट घरानों के कॉरपोरेट सोशल रेस्पोन्सिबिलिटी के तहत इस कार्य को आर्थिक सहयोग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने हमें योजना बनाने और उसे लागू करने की एक साथ ज़िम्मेदारी दी है। गाँव के सामुदायिक स्वास्थ्य को लेकर चलाई जा रही योजना की उन्होंने विस्तृत चर्चा की। गाँव में आसपास के सहयोग से पुस्तकालय की व्यवस्था करने, कृषि के विकास आदि क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों पर भी उन्होंने विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला।
एनसीआरआई के डी.एन. दास ने ग्रामीण समुदाय के साथ सहभागिता बढ़ाने हेतु पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने हेतु महत्वपूर्ण सुझाव पेश किए। उन्होंने विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों को गाँव से जुडने, उनके बीच कार्य करने हेतु कदम बढ़ाने पर ज़ोर दिया। गाँव के लोगों से जुड़ते हुए सरकार द्वारा चलाई जा रही विकास योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू करने में शिक्षकों-विद्यार्थियों की भूमिका भी उन्होंने रेखांकित किया।

सत्र का अंत सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका के लिए गठित समूह ने नाट्य प्रस्तुति के जरिये सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवियों व छात्र-छात्राओं की भूमिका कॉ बेहतरीन ढंग से रेखांकित किया। इस समूह ने एक निरक्षर व्यक्ति को रोज़मर्रा की जिंदगी में आने वाली कठिनाइयों का चित्रण करते हुए शिक्षा की महत्ता को संवेदनशील ढंग से सामने लाने का प्रयास किया। शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने में सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व छात्र-छात्राओं की भूमिका को भी भली भांति चित्रित किया। समूह ने शिक्षा के सशक्त माध्यम के बतौर नाट्य प्रस्तुति की महत्ता पर भी प्रकाश डाला। इस समूह में टी. राजू, डॉ. विजय कुमार वाघमारे, डॉ. भरत खंडागढ़े एवं श्याम शर्मा शामिल थे। अंत में एनसीआरआई के डी.एन. दास ने इसपर अपने विचार व्यक्त किए। गजानन एस. निलामे द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र की समाप्ति हुई। 
 
रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, गजानन एस. निलामे, डिसेन्ट कुमार साहू

Saturday, March 24, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के चौथे दिन ग्रामीण स्वास्थ्य व अन्य मुद्दों पर हुई गहन चर्चा



वर्धा, 22 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषदहैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के चौथे दिन दत्ता मेघे इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस के संकायाध्यक्ष डॉ. अभय मूढ़े ने 'सामुदायिक स्वास्थ्य एवं स्वच्छता' विषय पर केन्द्रित सत्र को संबोधित किया। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति शहरों से अलग है। गांवों की स्थिति आज पहले से काफी बदल गई है। गांवों का कई मामलों में विकास हुआ है। गांवों में बिजली, इंटरनेट की सुविधाएं पहुंची है, गांवों में शौचालय बने हैं। बावजूद इसके आज भी ढेर सारे गांवों में जागरूकता का अभाव है। गाँव में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति आज भी बहुत बेहतर नहीं है। गाँव में आंगनबाड़ी केंद्र बने हैं। गांवों में स्कूल हैं, पर वहाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों के बीच में ही स्कूल छोड़ने की तादाद सबसे ज्यादा है। स्वच्छता की भारी कमी है। नालियाँ खुली पड़ी हुई हैं, उसके साफ-सफाई की नियमित व्यवस्था नहीं है।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए स्वास्थ्य केंद्र और स्वास्थ्य उपकेंद्र तो बने हुए हैं, किन्तु वहाँ चिकित्सकों का अभाव है। तीन हजार से ज्यादा आबादी वाले गाँव में छोटा स्वास्थ्य केंद्र का प्रावधान है, किन्तु ज़्यादातर गांवों में आज भी इसकी गारंटी नहीं हो पाई है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक पुरुष व महिला डाक्टर होना चाहिए। किन्तु ढेर सारे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां डाक्टर तो हैं, किन्तु जरूरी दवाओं की भारी कमी है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी आधा से अधिक गाँव में खुले में शौच जाना जारी है। इसका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इससे खाद्यान्न, शाक-सब्जी के संक्रमित होने का खतरा बढ़ जाता है। गाँव में शरीर और हाथों की साफ-सफाई को लेकर भी समुचित जागरूकता का अभाव है। भारत सरकार ने 1998 से सभी शहर और गाँव को स्वच्छ व निरोगी बनाने का संकल्प लिया है। सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान भी चलाया जा रहा है। इन सबके बीच ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल का अभाव बना हुआ है।
            आगे उन्होंने बताया कि निर्मल भारत अभियान के तहत ग्रामीण स्कूलों के बच्चों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जाता है। निर्मल ग्राम पुरस्कार भी दिए जाते हैं। स्वच्छता रथ के जरिए भी जागरूकता लाने की कोशिश की जा रही है। 9 से 15 अगस्त तक स्वच्छता सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। जनजागरूकता लाने में मीडिया की भी अहम भूमिका होती है।
            सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने और धन्यवाद डॉ. मुकेश कुमार ने किया।

चौथे दिन के दूसरे चर्चा सत्र में नेशनल इस्टिट्यूट आफ रुरल डेवलपमेंट एंड पंचायती राज, भारत सरकार, हैदराबाद के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर एवं मातृसेवा संघ इंटीट्यूट आफ सोशल वर्क, नागपुर में एसोसिएट प्रोफेसर रहे इंडियन जर्नल आफ सोशल वर्क एंड सोशल साइंसेज के इश्यू एडिटर रह चुके डॉ. अजित कुमार ने '14 वें वित्त आयोग: ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान' को दो केस स्टडी- सिंघाना ग्राम पंचायत (मध्यप्रदेश) एवं पटोदा (महाराष्ट्र) के संदर्भ में इसकी विस्तृत चर्चा की। महाराष्ट्र के प्रत्येक ग्राम पंचायत को औसतन 48 लाख रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ है। एंड, फंक्शन और फंक्शनरी के बीच बेहतर तालमेल के बगैर ग्राम पंचायतों का विकास मुश्किल है। कई राज्यों में ग्राम पंचायतों को शक्तियाँ तो दी गई हैं, किन्तु वहाँ स्टाफ वगैरह की व्यवस्था समुचित तौर पर नहीं किया गया है। केंद्र सरकार द्वारा ग्राम पंचायत को 29 तरह के अधिकार दिए हैं किन्तु ज़्यादातर राज्य सरकारों ने ग्राम पंचायतों को अब तक ये सारे अधिकार नहीं दिए हैं।
            उन्होंने कहा कि वित्त आयोग ही विभिन्न योजनाओं पर खर्च किए जाने वाली राशि का बंटवारा करता है। आज तक ग्राम पंचायतों को समुचित राशि उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है। ग्राम पंचायतों के पास आज न तो सत्ता है और न ही समुचित संसाधन है। भारत के कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों को एक हद तक शक्ति का हस्तांतरण किया गया है किन्तु ज़्यादातर राज्यों में ऐसा नहीं हो पाया है। हर ग्राम पंचायतों को अपनी परिस्थिति के विश्लेषण का भी वैधानिक प्रावधान है। ग्राम पंचायतों के पास जितने स्थानीय संसाधन हैं, उसका भी सम्पूर्ण ब्योरा ग्राम पंचायतों के पास होना चाहिए। देश में यथार्थपरक अध्ययन के तथ्य और आंकड़ों की भारी कमी है। इसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका हो सकती है।
            मध्यप्रदेश के धार जिले के मनावर ब्लाक के सिंघाना ग्राम पंचायत की केस स्टडी के आधार पर डॉ. अजित कुमार ने कहा कि यह मध्यप्रदेश के पिछड़े जिले में आता है। यहाँ ज्यादातर भीलों की आबादी है। 2005 के पूर्व इस ग्राम पंचायत के लोगों के पास पेय जल की व्यवस्था नहीं थी। लोगों का पानी की तलाश में ही ज़्यादातर वक्त खर्च हो जाता था। सड़क भी नहीं थी, दूसरे गाँव के लोग इस गाँव में अपनी लड़की की शादी करने तक को तैयार नहीं होते थे। इस ग्राम पंचायत में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आज गाँव की सड़क बन गई है, 60 फीसदी घरों में शौचालय है। पुल-पुलिया बन गए हैं। सामुदायिक भवन हैं। घर-घर नल का पानी पहुँच गया है। मनरेगा के तहत इस गाँव में जबरदस्त काम हुआ। ग्राम पंचायत अपनी सारी गतिविधियों का सुव्यवस्थित ढंग से दस्तावेजीकरण कर रहा है।
            उक्त गाँव में कृषि के उत्पादन में भी वृद्धि हुई है। सिंचाई के लिए कुएं खोदे गए हैं। सुव्यवस्थित ग्राम पंचायत भवन सुचारु ढंग से चल रहा है। यह सारा परिवर्तन 2005 से 2015 के बीच हुआ है। इसमें मनरेगा योजना की अहम भूमिका रही। मनरेगा से इस गाँव का विकास हुआ। संदीप अग्रवाल नामक एक स्थानीय व्यक्ति के कुशल नेतृत्व की इसमें अहम भूमिका रही। आज यह धार जिले का चमकता हुआ तारा बन चुका है। उन्होंने कहा कि मनरेगा योजना के ठप्प हो जाने से सिंघाना के लोग एक बार फिर पलायन करने को विवश हो गए हैं। यहाँ से छोटी उम्र के बच्चे को गुजरात के सूरत आदि जघों पर कपास बिनने के लिए ले जाया जाता है।  
            डॉ. अजीत कुमार ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के पटोदा ग्राम पंचायत की केस स्टडी के आधार पर बताया कि इस गाँव की आबादी 3350 है। यह मराठा बाहुल्य गाँव है। 2005 में जहां इस ग्राम पंचायत को 2,14,000 रुपए मात्र का अनुदान प्राप्त हुआ था वहीं 2012-13 में 28,30,627 रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ। पूर्व में गाँव में चार आटा चक्की था, जिसकी जगह पर ग्रामसभा ने चारों को बंद कर आपसी सहयोग से एक बड़ी आटा चक्की स्थापित की। इस गाँव में हुए अभिनव प्रयोग की उन्होंने विस्तृत चर्चा की। अंत में प्रतिभागियों के प्रश्नों का भी उन्होंने उत्तर दिया। इस सत्र का संचालन एवं आभार ज्ञापन डॉ. आमोद गुर्जर ने किया।   

तीसरे चर्चा सत्र का संयोजन एनसीआरआई के डीएन दास ने किया। सत्र में सभी सहभागियों ने सिलसिलेवार ढंग से अपने-अपने सबन्धित विषय पर प्रस्तुति दी। प्रथम सहभागी के रूप मे डॉ आमोद गुर्जर ने अपने शोध के अंतर्गत आनेवाली विभिन्न प्रक्रियाओं तथा टूल्स- टेकनिक्स की बात की। प्रस्तुति के दरम्यान उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में प्रयुक्त विभिन्न पद्धतियां जैस-पीआरए, आरआरए पर चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने पीएलए को केंद्र मे रखते हुए ग्रामीण क्षेत्र की सहभागिता पर अपनी बात रखी। प्रस्तुति के बाद प्रश्नोत्तरी में Practice Based Research Methodology पर बात हुई। दूसरे प्रतिभागी के रूप में डॉ. शिवसिंह बघेल ने शोध-प्रविधि के अंतर्गत आनेवाली पीआरए, आरआरए तथा एलएफए की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अपनी प्रस्तुति की। पीआरए पर विशेष रूप से बात करते हुए उन्होंने सोशल मैपिंग, चपाती डायग्राम तथा अन्य मैट्रिक्स पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने आगे बताया कि ग्रामीण सहभागिता के लिए गावों में प्रवेश करते ही पहले 'ट्रांज़िट वाक' करना पड़ता है। जिसमें गाँव के प्रति ज़्यादातर जानकारी शोधकर्ता को प्राप्त किया जा सकता है। सामाजिक मानचित्रण पर बात करते हुए उन्होंने गाँववालों को इस प्रक्रिया में सहभागिता की तकनीकों के बारे में बताया।
रिसोर्स मैपिक पर बात करते हुए ग्रामीणों की सहभागिता से ग्रामीण संसाधन की पहचान करने की तकनीक पर भी बात की। इसके बाद चपाती डायग्राम तथा Service Mapping के उपयोग की भी उन्होंने चर्चा की। डॉ. बघेल ने पीआरए के साथ-साथ एलएफए की प्रविधि की भी संक्षिप्त चर्चा की। इसके साथ ही केंद्र के विद्यार्थियों के द्वारा सेवाग्राम गाँव में प्रयुक्त पीआरए प्रविधि के अंतर्गत किए गए कार्य को भी उन्होंने प्रस्तुत किया।
            सत्र को आगे बढ़ाते हुए केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने ग्रामीण क्षेत्र में क्षेत्र सबंधी परियोजना पर शिक्षकों के सामने विभिन्न क्षेत्र तथा सुझाव प्रस्तुत किया। उन्होंने शिक्षकों का इस ओर ध्यान केन्द्रित किया कि हमें आदर्शवादी तरीके के बजाय इसे गाँव के लोगों की स्वीकार्यता से जोड़ना होगा। हम क्या चाहते हैं, इससे ज्यादा जरूरी है कि गाँव के लोग क्या चाहते हैं। इसी को मद्देनजर रखते हुए शोधकर्ता को गैप ढूँढने की कोशिश करनी होगी। अपने अनुभव बताते हुए उन्होंने बिहार के ग्रामीण क्षेत्र में प्रयुक्त पीएसपी की उपयोगिता को भी इसके साथ जोड़कर देखने की बात की। गांवों में कार्य करते समय एक दिन में समझकर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढा जा सकता, उसके लिए छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर गहन कार्य करने की आवश्यकता है।
            अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने सभी शिक्षकों से यह निवेदन किया कि दो दिन के क्षेत्र-कार्य में आपके द्वारा किए जाने वाले कार्य का कच्चा ड्राफ्ट तैयार करने की अपेक्षा जाहिर की। साथ ही उन्होंने शिक्षकों से यह अपेक्षा जाहिर की कि हम लोगों को ग्रामीण भारत के लोगों की प्राथमिकता तय करने में उनकी मदद करनी होगी अन्यथा उनका भटकाव देश के विकास को अवरुद्ध करेगा। गांधी, कुमारप्पा एवं शुमाखर की बात उद्घृत करते हुए उन्होंने इसके भटकाव को रोकने की प्रविधि को अपनाने पर ज़ोर दिया।
            सत्र में आगे नागपुर से आयी प्रतिभागी डॉ. समृद्धि डाबरे ने ग्रामीण महिलाओं से संबन्धित मुद्दों पर कार्य करने की जिज्ञासा व्यक्त की। डॉ. पल्लवी शुक्ला ने अपने विषय - पर्यावरण पर बात करते हुए सामाजिक पर्यावरण के अध्ययन में अपनी रुचि जाहिर की। अगले प्रतिभागी अभिषेक त्रिपाठी ने गांवों को समझने में नैतिकता की ओर ध्यान केन्द्रित किया। पार्थसारथी मणिकाम ने शोध एवं पाठ्यक्रम को एक-दूसरे के साथ जोड़ने की बात करते हुए कहा कि व्यावसायिक जीवन से बाहर निकलकर स्वतः प्रयत्न से आगे निकलना होगा। उन्होंने आगे थ्योरी एवं प्रैक्टिकल को जोड़ने की संभावना पर अपनी बात रखी। इसके लिए कम से कम 15 दिन से लेकर 1 माह तक क्षेत्र में रहकर समुदाय के जीवन को समझने की आवश्यकता जताई। साथ ही सहभागिता को महत्वपूर्ण टूल्स बताया। सुझाव देते हुए उन्होंने पिछले तीन दिनों के अनुभवों को शेयर करते हुए इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया कि सेसन लेक्चर मोड से ज्यादा समस्या ओरिएंटेड तथा प्रश्नोत्तरी आधारित होना चाहिए। श्री वाघमारे तथा डॉ. भरत खंडागले ने यह सुझाव दिया कि लेक्चर मेथड के साथ विडियो विजुअल का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करने की बात की तथा प्रतिभागियों से फीडबैक लेने की महत्ता को रेखांकित की।

चतुर्थ सत्र में समूह '' ने Socio-Economic and Educational Problem पर अपनी बात रखी। इसमें डॉ. सोनवाने, डॉ. सतपुते तथा अन्य ने अपनी प्रस्तुति दी। ग्रामीण विकास के समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने विभिन्न स्टेक होल्डरों को साथ लेते हुए ग्रामीणों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं पर अपनी बात रखी। इस कार्य में विभिन्न राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय तथा स्थानीय संगठनों की भूमिका का महत्व रेखांकित किया। पर्यावरणीय मुद्दों का घटना अध्ययन करते हुए उन्होंने अपनी बात रखी। समाज कार्य प्रविधियों में से एक सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य की 'सहायक प्रक्रिया' पर बात रखी। जिसमें उन्होंने 'एडिक्सन' की समस्या पर विस्तृत चर्चा की। इसके अंतर्गत एडिक्सन के विभिन्न प्रकारों व उसकी विशेषताएँ तथा उसके शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक आदि प्रक्रियाओं पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसको समझने के लिए उसके विभिन्न कारणों की चर्चा की। इसी कड़ी में आगे डॉ. अशोक सातपूते ने भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर अपनी बात रखी। इसमें उन्होंने जनसंख्या वृद्धि के कारणों तथा प्रभावों को बताते हुए उन्होंने उसके समाधान की बात की। इन समाधानों में समाज के विभिन्न संस्थाओं एवं संगठनों की भूमिका की चर्चा की। प्रस्तुति के अंत में 'भूमिका निर्वहन' में एडिक्सन समस्या में सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य की उपयोगिता को प्रस्तुत किया।
            सत्र के अंत में डॉ. मुकेश कुमार ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के मेंढ़ा-लेखा मॉडल विलेज की संक्षिप्त चर्चा की। तदुपरान्त एनसीआरआई के डीएन दास ने धन्यवाद ज्ञापन किया।


रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, गजानन एस. निलामे, डिसेन्ट कुमार साहू, सुधीर कुमार, माधुरी श्रीवास्तव, खुशबू साहू एवं सोनम बौद्ध.

Thursday, May 18, 2017

मनुष्यता से जुड़ा हुआ है पर्यावरण का मुद्दा: प्रो. मनोज कुमार


तथाकथित विकास से उत्पन्न समस्याओं ने आज पूरे विश्व को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि विकास की इस राह पर ज्यादा दिनों तक चला नहीं जा सकता है। वैसे तो यह सोचते-सोचते 50 वर्ष से भी अधिक का समय गुजर चुका है क्योंकि इसकी शुरुवात 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के स्टाकहोम सम्मेलन से होती है, जहां विकास से उपजे पर्यावरणीय प्रदूषण और संसाधनों के खत्म होने की चिंता को लेकर सौ से अधिक देशइकट्ठा हुए। विकास की इन समस्याओं को देखते हुए 'बुंटलैंड आयोग' ने 'स्थायी विकास' का नारा दिया। तब से लेकर अब तक विभिन्न मंचों से सतत या स्थायी विकास का नारा बुलंद किया जाता रहा है। इस वर्ष के विश्व समाज कार्य दिवस का उद्देश्य भी पर्यावरण और इंसानी अस्तित्व की निरंतरता (Sustainability) को बढ़ावा देना रहा। इसी क्रम में 21 मार्च को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी समाज कार्य अध्ययन केंद्र के द्वारा विश्व समाजकार्य दिवस, 2017 पर एक परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। परिचर्चा इस वर्ष का विषय ग्लोबल एजेंडे का तीसरा स्तम्भ 'सामुदायिक और पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देना' रहा।
केन्द्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि पर्यावरणीय मुद्दे पर दुनिया की तमाम सरकारें एक तरह से सोच रही हैं और जनता दूसरे तरीके से सोच रही है। जब तक हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित नहीं करेंगे तब तक पर्यावरण की सुरक्षा नहीं होगी। आगे उन्होने कहा कि पर्यावरण का मुद्दा मनुष्यता से जुड़ा हुआ है। इस परिचर्चा को आगे बढ़ते हुए सहायक प्रोफेसर श्री आमोद गुर्जर ने कहा कि सतत विकास की अवधारणा व्यक्ति केन्द्रित है जबकि इसे समग्र उपागम (holisticapproach) को अपनाना होगा। हमने मानव अस्तित्व पर संकट आने के बाद ही 'सतत विकास' की अवधारणा अपनाई।डॉ. शिव सिंह बघेल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए यह कहा कि विद्यार्थियों को अपना लक्ष्य ऐसा बनाना चाहिए ताकि वे स्वयं को वैश्विक एजेंडे से जोड़ सके और ग्राम स्तर तक पहुंचाए।
डॉ. मिथिलेश ने कहा कि वैश्विक स्तर तथा भारत में भी संसाधनों के बड़े भाग पर चंद लोगों का आधिपत्य है जबकि एक बड़ा भाग अपना जीवन गरीबी और अभाव में व्यतीत कर रहा है इसलिए हमें संसाधनों के न्याय पूर्ण वितरण पर ध्यान देना होगा। परिचर्चा के दौरान उपस्थित सभी सहभागियों नेइस मुद्दे पर अपनी बात रखी। ज़्यादातर विद्यार्थियों ने अपने आस-पास विकास के नाम पर उत्पन्न हो रहे विसंगतियों को प्रमुखता के साथ रखा।
कार्यक्रम का संचालन नरेन्द्र कुमार दिवाकर ने किया। प्रास्ताविक डिसेन्ट कुमार साहू ने रखा और आभार गजानन निलामे ने किया। इस परिचर्चा में केंद्र के निदेशक प्रो.मनोज कुमार,डॉ. मिथिलेश कुमार, डॉ. शिव सिंह बघेल, सहायक प्रोफेसर श्री आमोद गुर्जर तथा केंद्र केनरेश गौतम, श्याम सिंह, आशुतोष, छविनाथ यादव,विलास चुनारकर, अनुराग पाण्डेय, शीना नेगी, सुधीर कुमार,अदिति, आनीता और शुभांगी सहित बड़ी संख्या में समाज कार्य के शोधार्थी/विद्यार्थी और एन जी ओ प्रबंधन के विद्यार्थी उपस्थित रहे।
नरेंद्र कुमार दिवाकर
शोधार्थी समाजकार्य

Thursday, May 12, 2016

अब की बार तीसरी फसल शहर में...


राजनैतिक मसीहा के निर्वाण के बाद कुछ पढ़े लिखे लोगों ने शहर में पाँव पसारने शुरू किए हैं. विभिन्न संगठन, मंडल, मित्र मंडल आदि का निर्माण, जमीन की खरीद-फरोक्त आदि काम ये लोग करने लगें हैं. शहर एजुकेशन हब हैं इसलिए यहाँ बहुत सारे शैक्षिक संस्थान है साथ ही प्रायवेट कोचिंग क्लासेस भी भरे पड़े हैं. व्यापारी सदा से यह चाहते हैं कि शान्ति बनी रहें ताकि ग्राहक माल खरीद सकें, इन सब को सेक्युरिटी के लिए इन संगठनों की आवश्यकता होती हैं. इस आवश्यकता की पूर्ती इन सफेदपोश लोगों द्वरा समय-समय पर होती रहती हैं. शहर का ज्यादातर हिस्सा बाहरी लोगों का होने के कारण स्थानीय लोगों की दबंगई जरुर दिखती है लेकिन वह भी शहर के शान्ति के नाम पर सहनीय है. शायद यही राज है शहर के शान्ति का? ऐसे शांतिप्रिय शहर में अचानक धारा 144 कैसे लागू हुयी. सवाल यह है कि क्या वाकई शहर पहले से शांत था? या ये व्यापारियों द्वारा तैयार शान्ति थी? ऐसा क्या हुआ है जो पानी को लेकर इस शहर में धारा 144 लगाईं गई? बहुत से लोगों के मन में यह सवाल हैं कि ऐसा क्यों?

लातूर शहर धनी व्यापारियों का शहर हैं जिसका भार यहाँ के प्रत्येक सामान्य व्यक्ति पर है. एक ओर से हैदराबाद की नजदीकी व्यापारियों को कम कींमत में माल उपलब्ध कराता है वहीँ दूसरी ओर उस माल के लिए यहाँ साक्षर और ग्रामीण ग्राहक तैयार है. शायद ही शहर का ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो मुंबई, पुणे में अपनी किस्मत आजमाने न गया हो. काम-काज ढूंढने न सही शिक्षा के लिए तो जरुर ही वे लोग इन बड़े शहरों में चले गए होंगे. लेकिन यह भी सही है कि अगल-बगल के परभणी, उस्मानाबाद, बीड के ग्रामीण लोग रोजगार के लिए पिछले सत्ता परिवर्तन के पहले तक आते रहें थे. लेकिन आज-कल उनका आना भी केवल ‘आना’ है. कई सारे मामले में लातूर इन बाकी तीन जिलों से बेहतर माना गया जिसमें शिक्षा अहम् थी, रोज बढ़ने वाला शहर मकान बनाने के लिए मजदूरों की मांग रखता था इसलिए मुंह मांगी मजदूरी मिल जाया करी थी इसलिए भी बाकी जिलों के लोगों को यह शहर आकर्षित करता रहा. व्यापारी घरानों की परंपरा ने यहाँ उद्योग के लिए नई आशा निर्माण कि जिसके चलते मजदूरों की मांग भी बढ़ गयी हालांकि यह उद्योग केवल रोजमर्रा के उपयोगी उत्पादन बनाने तक सिमित हैं.

शहर के रामभाऊ बताते हैं कि हम कभी किताबों में पढ़ा करते थे कि एशिया का सबसे बढ़ा शक्कर कारखाना लातूर में हैं तो हमारी छाती फुल जाती थी किन्तु बाद के सालों में पता चला कि उसको नीलाम किया जा रहा है. जब कोई मुझसे पूछता है कि आप के शहर में क्या है तो मैं कुछ नहीं बता सकता हालांकि यह सवाल इससे पहले कोई ज्यादातर नहीं पूछता था और अगर कोई पूछता तो जवाब में कोई न कोई कह देता कि विलासराव देशमुख का शहर, या किलारी भूकंप ये दो चीजे थी जो शहर को वैश्विकता के साथ जोड़ने में मदद करती थी. पहले वाले जवाब में सामने वाले के विचारों से जलन का आभास कर लिया जाता जिससे हम शहरवाले गर्व महसूस कर लेते और दुसरे से करुणा झलकती थी इसे भी हम हमारी प्रसिद्धि के साथ जोड़कर देखते न की कमजोरी. परंतु आज-कल पानी की कमी ने हमें हमारी औकात दिखाई. हमारा ‘लै भारी’ का भारीपन हमें बोझ लगने लगा है. इस सूखे ने हमें हमारी क्षमताओं को जानने का मौका दिया है. हालांकि शहर का बुद्धिजीवी वर्ग अब भी इस समस्या की और आकर्षित नहीं हो पाया है. इसका यह भी कारण है कि लातूर के साक्षर लोग तुरंत ही किसी समस्या को अपने उपर हावी नहीं हो देते. हमारा कोपिंग मेकनिज्म गजब का है. ये तो सरकारी महकमें की करतूत है कि उसने १४४ लगाकर हमारी खामियों को उजागर कर रखा है. वरना इससे पहले भी हमने बड़े-बड़े सुखों को मुहतोड़ जवाब दिया है.
पिछले साल पानी की कमी ने हमारे खेतों का बूरा हाल किया तब भी हम नहीं डरें, पिछले महीने एक्कड़ भर खेत से 8000 खर्च कर आधी बोरी सोयाबीन जो इस मौसम की पूरी फसल का हिस्सा था उसे घर ले जाते समय मैं ज़रा भी आशंकित नहीं था कि इतने पैसे के बदले केवल इतना धान. क्योंकि हम खेती तो केवल बचाने के लिए करते है ताकि हमें भी लगे की हम भी किसान है. लातूर शहर का किसान होने में भी अजीब सा गर्व महसूस होता है. करोड़ों की किंमत पर बेचीं जाने वाली जमीन में हम हजार-बारासों का उत्पादन लेकर हम केवल यह जताना चाहते हैं कि हमने अभी अपनी जमीन बेची नहीं हैं. ऐसे में पानी गिरने न गिरने से हमारा कुछ नहीं होने वाला. इससे ज्यादा फिक्र वाली बात यह है कि पडोसी की जमीन को मैं अपना कैसे बनाऊं. शहर के अगल बगल का शायद ही ऐसा कोई गाँव होगा जिसकी जान पहचान कोर्ट में न हो. इन लोगों ने वकीलों और न्यायधीशों के घर पैसे से भरे हैं. वो समय अब दूर नहीं जब यहाँ का कोई किसान नौसिखिए वकील को सलाह दे रहा होगा. मृदा परिक्षण जैसे आम काम यहाँ के किसान तब तक नहीं करवाते जब तक कि इसके लिए कोई फंड न मिले. हम केवल उस जमीन के मालिक होने का फर्ज अदा करते है साथ ही यह ध्यान रखते हैं कि कोई हमारे इस फर्ज के आड़े न आए. चार साल पहले की बात है शहर के नजदीक का एक गाँव शहर में समाविष्ट होने जा रहा था. पूरे गाँव में केवल इसी की चर्चा थी लोगों ने अपने पैसे खर्च कर मुंबई में जाकर मंत्रियों से बातचीत कर मसला हल करवाया तब जाकर वो जमीन बची है. लेकिन यह जमीन बचाने का असल कारण उस जमीन की कींमत ही थी. जो आसमान छु रही है. आज तक मुझे नहीं पता चला कि ख़बरों में वो बूढा किसान उभाड खाबड़ जमीन पर बैठ कर माथे से हाथ लगाकर आसमान की और देख रहा है वह कहाँ हैं. यहाँ का किसान तो रॉयल एनफील्ड पर घूम रहा है. विट बनाने का कारखाना लगा रहा है. एक नहीं दो बीवियां बना रहा है. वो दबंग हैं और चौक-चौराहे पर बैठकर निम्नवर्गियों का मज़ाक उड़ा रहा है. उसके बच्चे भी उसी के क़दमों पर चल रहे है. मध्यकाल के जमींदारों से कम प्रस्थिति इन दो-चार एक्कड़ वालों की नहीं हैं.


ऐसा ही एक उदाहरण है रशीद चाचा. रशीद चाचा की शहर से नजदीक ही खुली जमीन है. इस बार सूखे का प्रभाव बढ़ने वाला है इस बात की फ़िक्र यहाँ के व्यपारियों को ज्यादा थी इसलिए उन्होंने रशीद चाचा को पहले ही पैसे दे रखे हैं बोरिंग के लिए जिससे लगने वाला पानी वह उन्हें उसी दाम पर देगा जो पहले से तय होगा. ऐसे में उसने अपने खेत में तीन बोरिंग करवाई लगभग 700 फिट के आसपास चार इंच पानी लगा दो बोर को बाकी एक को एक इंच पानी लगा. अब तो उनकी निकल पड़ी आज-कल वो रोज पंद्रह-बीस हजार का पानी बेच रहें हैं. बताइये इतना पैसा कमाने के लिए एक किसान को कितने दिन लग जाएंगे. कौन करेगा किसानी अब रशीद चाचा तो चाहेंगे की हर साल ऐसा ही सुखा पड़े तब तो वह पैसा कमा पाएंगे. दो फसलों में तो उनको कुछ न मिला लेकिन इस सूखे में उनकी ‘तीसरी फसल’ कामयाब रहीं. 

यह केवल किसानों का ही नहीं शहर में जिस किसी के बोअर को पानी है वे लोग इस तीसरी फसल को ले रहें हैं. लागत बहुत कम है और मुनाफ़ा तगड़ा मिल रहा है. जैसे बोअर लगातार दो ड्रम पानी निकालता है तो ग्राहक के आने की राह देखने नहीं हैं. एक हजार लीटर का एक टैंक लगवाना है उसको एक प्लंबर से टोटी फिट कर दे बस. अब दिन भर दो-दो घंटे में बोर चलाकर पानी टंकी में ऐसे जमा करते है जैसे पैसे. माँ-बाप कही बाहर चले जाए तो बच्चों को बार-बार फोन करके याद दिलाते हैं कि दो घंटे हो गए है चालु करो. नौकरीपेशा आदमी भी इस उपरी कमाई के लिए घर में अपना योगदान छुट्टी लेकर दे रहा हैं. तो बच्चे अपनी कोचिंग को त्यागकर माता-पिता के सामने अपना गौरव प्राप्त करने में लगे हैं. अनपढ़ साँस की साक्षर बहुएं अपना इक्का जमाने में लगी हैं. पता चलता है इनके लिए भी सुखा किसी सुख से कम नहीं है
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पिछले बार के इलेक्शन में हारे हुए प्रत्याशी बड़े जोरों से सत्ता आजमाइश में लगें हैं. वो इस मौके को गवाना नहीं चाहते है इसलिए किसी भी हालत में वह अपने प्रभाग में पानी पहुंचाकर ही दम लेंगे. इसके लिए कुछ बड़े आसामियों ने अपने निजी कुओं से पानी निकालकर प्रभागों में बांटने का काम शुरू किया है. जिसके पीछे यही लालसा है कि अगली बार लोग याद रखें? पानी लेने वाले लोग भी खूब आशीर्वाद दे-देकर पानी ले रहें हैं. फिर प्रत्याशी इस काम को समाचार पत्रों में भेजने के लिए तैयार हैं. 850 रूपए के टैंकर में 25-30 परिवार खुश इधर प्रत्याशी का सोशल नेटवर्किंग भी मजबूत. अब इन प्रत्याशियों की बात तो समझ में आती है किन्तु जो पहले से सत्ता में है वो भी पीछे नहीं हैं. महानगरनिगम ने प्रत्येक प्रभाग में एक टैंकर नियुक्त किया है जिसमें प्रत्येक घर में आठ दिन में एक पानी दिया जाना तय है. शुरुआत में इतनी भीड़ उमड़ने लगी जिसके चलते ज्यादातर पानी निचे बहने लगा. इस समस्या का समाधान पार्षदों ने अपने हिसाब से किया टैंकर घर-घर जाएगा और आधा ड्रम पानी देगा. पानी का बंटवारा खुद पार्षद करेगा. पार्षदों ने अपने हिसाब से पानी के बंटवारे के नियम बनाए है जिसमें यह है कि आपके पास आधार-कार्ड और वोटर आय डी होनी चाहिए. अर्थात आपके पास ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे आपको इसी वार्ड का वोटर माना जाए. कुछ सनकी बुढो ने उनको इसी बिच याद भी दिलाया कि वोट माँगते समय ये ताम-झाम नहीं करते हो बस गिडगिडाते हो और अब हमें ही पुछ रहें हो कि पहचान दिखाओ. तब पार्षद का चेहरा देखने लायक हो जाता है. फिर भी वह सत्ता को फिर से पाने के चक्कर मे इस बार भी वोट की फसल काटना चाहता है इसलिए मनमानी कर कुछ अवैध लोगों को पानी दिलाता ही है. पानी वितरण का एक नियम यह भी है कि जिसके घर में किराएदार हैं वह अपने मालिक के हिस्से से पानी ले उनके लिए अलग से पानी नहीं देंगे. इस तरह कैचिं लगाकर वह भी पानी को बचाने की कोशिश कर रहा है. वाह रे पानी वितरण ये तो पीडीएस से आगे निकल गए. वहां तो केवल राशन कार्ड दिखाना पड़ता है यहाँ तो रोज नित-नए नियमों पर पानी मिल रहा है.


 तो यह हाल है लातूर के सूखे का लेकिन इस सूखे का असर लातूर के मध्यवर्ग पर नहीं दिखता. सब के पास खुद के बोअर हैं और जिनके बोअर बंद है वे अक्सर यह कहते हैं कि हम तो पिछले महीने से ही टैंकर से पानी मंगवा रहे हैं. यह कहते हुए उनके गर्व को महसूस किया जा सकता हैं. तो सवाल यह है कि यह सुखा किसके लिए है व्यापारियों के लिए, किसानों के लिए,मजदूरों के लिए नौकरीपेशा के लिए किसके लिए. इन सब वर्गों के बावजूद गरीब किसान, खेतिहर, मजदुर छोटे-मोटे व्यवसायी, ठेले वाले आदि इन पर इस सूखे का कम इस तीसरी फसल का असर जरुर दिख रहा है.
पानी न मिलने के कारण कुछ लोग जो बाहर से थे उन्होंने मकान खाली कर दिए. महनगरनिगम ने केवल 144 लगाकर लोगों को पानी के स्त्रोतों से दूर रखा है किन्तु उन स्त्रोतों में पानी ही नहीं हैं तो लोग वहां क्यों जाएंगे. बोअर-अधिग्रहण जैसा फैसला काफी पहले लेना चाहिए था जो अब तक नहीं लिया गया. उलट आरटीओ ऑफिस वाले निजी पानी-वाहक वाहनों को लायसंस बाँट रहे हैं. और पानी के निजी ठेकेदारों को यह हिदायत दे रहें हैं कि जिसके पास लायसंस हैं उन्ही को पानी देना. इस पुरे मामले में सरकार भी खूब मजा ले रही है. एक तरफ १४४ धारा लगने के बाद देश के सारे समाचार पत्रों में इस बात को प्रचारित किया गया कि लातूर सूखे की चपेट में हैं. दूसरी ओर उनके पास इस समस्या से निबटने के प्लान क्या है? यह सवाल जब उठाया गया तो जवाब- डेढ़ लाख लोग मायग्रेट हो जाएंगे. स्कूल और कोचिंग क्लासेस समय से पहले ही खत्म कर दिए जाएंगे. यह किसी शहर का प्लान कैसे हो सकता है जिसमें हो जाएंगे, कर दिए जाएंगे जैसे शब्द हो. यह तो भविष्यकालीन योजना है लेकिन असल में जो हो रहा है उस पर कारवाई के लिए इनके पास कोई प्लान नहीं है. जिस डेढ़ लाख लोगों की बात हो रही हैं वो तो बाहरी ही है वो तो मायग्रेट होंगे ही लेकिन जो स्थानीय आम जनता है जिनको रोज 2 रूपये प्रति घड़ा से पानी खरीदना पड रहा है उनके लिए इनके पास कोई प्लान नहीं हैं. कुछ ख़ास किस्म के व्यापारी-बुद्धिजीवीयों ने एलान किया कि शहर में १० रूपए में 20 लीटर शुद्ध पानी दिलाया जाएगा इसके लिए एटीएम नुमा मशीन लगवाई जाएगी जिसमें पैसे डालने के बाद पानी आएगा. ऐसे नवाचारों पर हँसे या रोये. पानी खरीद रहें हैं इसलिए रोये या पानी मिल रहा है इसपर हँसे. कुछ समझ नहीं पाएंगे. हालांकि यह भी तीसरी फसल निकालने का एक ख़ास तरिका है जो हर बार पूंजीपतियों द्वारा अख्तियार किया जाता है.



पिछले दो साल से लगातार शहर में मिनरल वाटर की कंपनियों की तादाद बढ़ी है. इस क्षेत्र की सबसे पुरानी कंपनी आज कल समाचारपत्रों में प्रचार कर रही है कि लातूर शहर के वासियों के लिए शुद्ध पानी केवल 40 रूपए में 20 लीटर, शुद्ध के साथ ठंडा चाहिए तो 60 रुपये में 20 लीटर. यह कींमत देश के किसी भी इलाके से ज्यादा ही होगी. शायद राजस्थान से भी. लेकिन शहर के लोग इसके आदि हो गए हैं यह बीस लीटर का जार पिछले साल ३० रुपये में था अब चालीस हो गया है. और शायद इसकी किंमत लगातार बढती ही जाएगी. जब पता है कि शहर सुखा ग्रस्त है, जिसे गैजेटियर में भी सुवर्णाक्षरों से लिखा गया हैं. तब भी सरकार पानी के बर्बादी का लायसंस कैसे बेच रही है. यह समझ से बाहर है.




शहर का प्राकृतिक रूप देखे तो भूगर्भशास्त्रियों का मानना है कि आज जो पानी शहर के लोग बोअर से निकाल रहे हैं वो पांच-दस हजार साल पहले का है. इसका मतलब है कि शहर में जल संरक्षण शुन्य के बराबर हैं. जंगल के नाम पर वैसे भी शहर का नाम दुनिया के किसी भी मरुस्थल के बराबर हो गया है. इस बार तो पानी मिलेगा 700-1000 फिट के निचे का किन्तु अगले साल कहाँ से मिलेगा पानी. इसके बारे में कोई सोचना नहीं चाहता है. बस मिल रहा है तब तक ठीक है. लेकिन इस बार सूखे ने सोचने का आखरी मौका दिया है, इस बार भी नहीं सोंचेगे तो ये मंजर मौत बनकर अगली बार दिखेगा जब कोई कानून भी इससे बचा नहीं पाएगा. जितने सुराख लातूर के जमीन पर बोअर के नाम पर पड़े है उनमें से कुछ में से पानी के अलावा कुछ और (पिछले महीने लोकमत में खबर थी कि एक बोअर से सोने जैसा पदार्थ निकल रहा है लेकिन वो सोना नहीं था अब तक पता नहीं चला है कि वह क्या हैं) ही निकल रहा है. तब भी लोगों की आँखे नहीं खुल रहीं है. 

सुनो शहरवालों अब वो दिन लद गए जब आपके पास एक मसीहा था, किसी दुसरे की बाँट जोहने से अच्छा होगा कि आप खुद ही इस काम में आगे आएं वरना वो दिन दूर नहीं जब आप आने वाली पीढ़ियों को एक मरुस्थल भेंट देंगे.
फोटो आभार: गूगल इमेज  



निलामे गजानन सूर्यकांत
निलामे गजानन सूर्यकांत 
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र,
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा।  
gajanannilame@gmail.com

Thursday, March 24, 2016

इतिहास, राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता

प्रो. रोमिला थापर
[प्रो. रोमिला थापर द्वारा जेएनयू में 6 मार्च, 2016 को दिये गए व्याख्यान पर आधारित लेख]
प्रो. रोमिला थापर ने अपना व्याख्यान शुरू करते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा कि उन्हें लगता है कि वे और उनके कई अन्य वरिष्ठ सहकर्मी “जेएनयू के डायनासोर” हैं। गौरतलब है कि प्रो. रोमिला थापर उन लोगों में से हैं, जो जेएनयू के विकास की प्रक्रिया के न सिर्फ साक्षी रहे हैं, बल्कि जिन्होंने इस विवि के आरंभिक क्षणों से लेकर (प्रो. थापर नवंबर 1970 में जेएनयू से जुड़ीं), इसके विकसित होने की प्रक्रिया में अतुलनीय योगदान दिया है। उन्होंने बताया कि जेएनयू के आरंभिक दिनों में, उन लोगों का उद्देश्य जेएनयू को एक ऐसे विवि के रूप में परिणत करना था, जहां बेहतर अकादमिक गुणवत्ता के साथ-साथ खुली चर्चा और विमर्श का माहौल उपलब्ध हो।
विषय पर आते हुए प्रो. थापर ने कहा कि वे इतिहास और राष्ट्रवाद के संबंधों की चर्चा करेंगी और इसके जरिये वे उस प्रक्रिया की गहराई में भी जाएंगी, जिसके अंतर्गत हम अपने समाज को समझते हैं और उसमें अपनी अस्मिता को खोजते हैं। राष्ट्रवाद का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार एरिक हाब्सबौम को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि “राष्ट्रवाद को इतिहास की तलब उतनी ही होती है, जितनी कि एक अफीमची को अफीम की” ("history is to nationalism what poppy is to an opium addict."). इस कथन की व्याख्या करते हुए प्रो. थापर ने कहा कि इतिहास राष्ट्रवाद के लिए न सिर्फ एक स्रोत होता है, बल्कि यह राष्ट्र की अस्मिता का भी निर्माण करता है।
रोमिला थापर ने कहा कि राष्ट्रवाद आधुनिक काल में ऐतिहासिक बदलावों के फलस्वरूप उपजा है, और यह आधुनिक काल से पूर्व मौजूद नहीं था। 17वीं सदी के यूरोप का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यूरोपीय देशों में पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के विस्तार, मध्यम वर्ग के उदय ने ‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा की उत्पत्ति में योगदान दिया। इसके अंतर्गत एक सेकुलर अस्मिता की भी बात की गई, जो समावेशी होने के साथ-साथ एकता को भी सुनिश्चित करती। यह समावेशी अस्मिता सामाजिक जागरूकता से उपजी थी। और इस पूरी प्रक्रिया में, “साझा इतिहास” का महत्त्व बढ़ गया क्योंकि यह लोगों को एक सूत्र में बांधता था। प्रो. थापर ने यह बात ज़ोर देकर कही कि राष्ट्र कभी एकल अस्मिता के बल पर नहीं खड़ा हो सकता, उसे समावेशी होना ही पड़ेगा।
राष्ट्रवाद की अवधारणा में आखिरकार अतीत के कुछ हिस्सों को “स्वर्ण काल” (गोल्डेन एज़) के रूप में देखने की घातक प्रवृत्ति शामिल हो गई। यह तथाकथित “स्वर्ण काल” अतीत के समाजों के भ्रामक इतिहास पर आधारित था, जबकि हम वर्तमान में जी रहे हैं। प्रो. थापर ने अपवर्जी राष्ट्रवाद (एक्सक्लूसिव नेशनलिज़्म) के रूप में, जर्मनी में 20वीं सदी के तीसरे दशक में उपजे ‘राष्ट्रवाद’ का उदाहरण दिया और समावेशी राष्ट्रवाद (इनक्लूसिव नेशनलिज़्म) के रूप में अफ़्रीकी राष्ट्रवाद का उदाहरण दिया। और यह जोड़ा कि दुनिया भर को अफ़्रीकी राष्ट्रवाद के समावेशी चरित्र को अपनाना चाहिए।
भारत में राष्ट्रवाद के उदय पर टिप्पणी करते हुए प्रो. रोमिला थापर ने कहा कि भारत में राष्ट्रवाद उपनिवेशवादविरोधी आंदोलन के दौरान पनपा। प्राक-औपनिवेशिक भारत में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की बहुतेरी अस्मिताएं एक-साथ अस्तित्व में थीं। धर्म के अंतर्गत भी कोई एकाश्मी (मोनोलीथिक) धर्म न होकर अनेक संप्रदाय अस्तित्व में थे। यह विविधता से भरा-पूरा समाज था, जहाँ भिन्न-भिन्न समूह अपने स्तर से संवाद कर रहे थे। पर ब्रिटिश शासन के दौरान जेम्स मिल सरीखे उपनिवेशवादी इतिहासकारों ने इस पूरी विविधता को धर्म तक सीमित कर दिया। जेम्स मिल ने 1818 में लिखी अपनी पुस्तक में काल-विभाजन के लिए शासक वंश के धर्म का इस्तेमाल किया और इस तरह पूरे भारतीय इतिहास को “हिन्दू काल”, “मुस्लिम काल” और “ब्रिटिश काल” में बाँट दिया।
काल-विभाजन की इस अवधारणा के पीछे द्विराष्ट्रवाद का वही सिद्धान्त काम कर रहा था, जिसके अंतर्गत यह माना जाता था कि ‘हिन्दू और मुस्लिम, स्थायी तौर पर एक-दूसरे के विरोधी और शत्रु हैं और उन्हें शांत रखने के लिए किसी बाह्य शक्ति जैसे ब्रिटिश साम्राज्य की जरूरत होगी’। द्विराष्ट्रवाद के इसी सिद्धान्त ने “अल्पसंख्यक” और “बहुसंख्यक” सरीखी श्रेणियाँ गढ़ दीं। इसने एकाश्मी धार्मिक अस्मिता को सुदृढ़ करने का (consolidated monolithic religious identity) काम किया। हेमचन्द्र रायचौधुरी, रमेश चंद्र मजूमदार और नीलकंठ शास्त्री सरीखे राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने एक ओर जहाँ प्राच्य निरंकुशता (Oriental Despotism) के सिद्धान्त को चुनौती दी, वहीं दूसरी ओर इन लोगों ने जेम्स मिल के काल-विभाजन को स्वीकार कर लिया। भले ही अब “हिन्दू”, “मुस्लिम” और “ब्रिटिश” काल की जगह प्राचीन, मध्यकाल और आधुनिक काल ने ले ली थी, पर इतिहास को धर्म के चश्मे से देखने की मूल अवधारणा में कोई बदलाव नहीं आया।
उपनिवेशवादी इतिहासलेखन ने भारतीय इतिहास में “आर्य नस्ल का सिद्धान्त” भी आरोपित कर दिया। प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि ‘आर्य भाषा’ मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची’। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत ही के स्थानीय निवासी थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! बावजूद इसके कि हड़प्पा सभ्यता की भाषा अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है और न ही हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति के स्रोत ज्ञात हो सके हैं।
एक तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, जब अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थियोसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थियोसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे। लोकमान्य तिलक का कहना था कि आर्य आर्कटिक प्रदेश से आए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में आर्यों से जुड़े मुद्दे का इतना अधिक राजनीतिकरण हो चुका है कि जो विद्वान ‘आर्यों के भारत में ही उत्पन्न होने’ की अवधारणा पर सवाल उठाते हैं, उन्हें सोशल मीडिया और इंटरनेट का गुस्सा और अपमान झेलना पड़ता है। ऐसी स्थिति ऐतिहासिक विषयों से जुड़ी परिचर्चा और वाद-विवाद-संवाद की संभावना को घटा देती है।
जहां एक ओर उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवाद सेकुलर, लोकतान्त्रिक और बराबरी के सिद्धान्त पर आधारित समाज और मुख्य अस्मिता के रूप में “भारतीयता” की वकालत करता था। वहीं दूसरी ओर, धार्मिक राष्ट्रवाद एक धर्म, संस्कृति, भाषा आदि के सबसे अलग होने को रेखांकित करता है। यह अक्सर, राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए जान-बूझकर गढ़ा जाता है, जैसा हिंदुत्व के उदाहरण में हमें स्पष्ट दिखता है। ‘हिंदुइज़्म’ और हिंदुत्व दोनों एक ही चीज नहीं हैं। ‘हिंदुइज़्म’ एक धर्म है, जबकि हिंदुत्व एक आधुनिक राजनीतिक विचारधारा। हिंदुत्व एक विचारधारा है जो कुछ बातें तो ज़रूर ‘हिंदुइज़्म’ से लेती है, पर यह ‘हिंदुइज़्म’ से बहुत अलग है।
इतालवी फासीवाद से प्रेरणा प्राप्त करने वाली हिंदुत्व की अवधारणा 20वीं सदी में अस्तित्त्व में आई, और इसका उद्देश्य था - हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए हिंदुओं को राजनीतिक रूप से संगठित करना। धर्म पर आधारित विचारधारा के निर्माण में ज़रूरत पड़ने पर धर्म की आधारभूत बातों को भी फिर से रचा जा सकता है। यह पुनर्रचना अक्सर धर्म के अभिजात्य और पुरातनपंथी अनुयायियों को ध्यान में रखकर की जाती है। जब हम ‘हिन्दू’ होने को परिभाषित करते हैं तो सामान्यतया ऐसा उच्च जाति के लोगों के संदर्भ में ही किया जाता है। क्योंकि इस परिभाषा का आधार वे टेक्स्ट होते हैं, जो इन्हीं जाति-समूहों के हैं। हिंदुत्व एक निश्चित भू-भाग, एकल संस्कृति और नृजातीय उत्पत्ति, एक भाषा और एक धर्म की बात करता है। यह हिंदुओं की साझी ‘पुण्यभूमि, पितृभूमि’ की भी बात करता है और अन्य सभी धर्मावलंबियों को विदेशी बतलाता है। हिंदुत्व अपने धार्मिक पक्ष में, सामी (सेमिटिक) धर्मों की रूपरेखा का ही अनुसरण करता है, मसलन, ‘ऐतिहासिकता’ पर ज़ोर और एकाश्मी (मोनोलिथिक) धर्म, एक पवित्र ग्रंथ, चर्च जैसे धार्मिक संगठन।
चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई या सिख, इस तथ्य की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता कि बहुतेरे धर्मावलंबी ऐसे होते हैं जो अपने धार्मिक ग्रंथों से थोड़ा ही परिचय रखते हैं। उनके लिए धर्म एक अलग ही मसला होता है। असल व्यवहार में, ये लोग अपना खुद का धर्म/पंथ निर्मित कर लेते हैं, अपने चुने हुए तरीके से अपने देवताओं, गुरुओं, पीरों या बाबाओं की पूजा करते हैं, प्रो. रोमिला थापर ने इन धर्मों को मुख्य धर्म से अलग करते हुए इन्हें “गुरू-पीर धर्म” की संज्ञा दी। धर्म के इतिहासकारों को इसका मूल्यांकन करना चाहिए कि आखिर लोगों के धर्म और उनके विश्वास किस हद तक धार्मिक टेक्स्ट पर या व्यवहारों पर निर्भर या उनतक सीमित होते हैं।
भारतीय इतिहास में धर्म की अवधारणा को पारिभाषित करने वाली दो प्रमुख धाराएँ थीं: ब्राह्मणवादी और श्रमण परंपरा। यह द्वैधता ईसा की पहली सहस्राब्दी में भी कायम रही। वैयाकरण पातंजलि ने इनके बीच के संबंधों की तुलना साँप और नेवले से की थी, यानि इन दोनों के संबंध संघर्षमय थे। हम भारत में धर्मों के इतिहास के बारे में समझने की कोशिश करें और जानना चाहें कि कैसे धर्मों ने समाजों को प्रभावित किया तो हमें उन पंथों के बारे में जानना होगा, जो इन धर्मों से उत्पन्न हुए, और साथ ही, इन पंथों के परस्पर जटिल संबंधों का अध्ययन करना होगा, जिसमें अक्सर इन पंथों के विश्वासों और व्यवहार की पूरी फेहरिस्त शामिल होगी। धर्मों और उनसे निकले पंथों/संप्रदायों का अध्ययन करते हुए हमें उनके बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा और आदान-प्रदान को भी समझना होगा। ये पंथ अक्सर किसी-न-किसी जाति से जुड़े होते थे, अतः इस संबंध का भी अध्ययन करना होगा।
अंत में, प्रो रोमिला थापर ने ज़ोर देते हुए कहा कि राष्ट्रवाद को विश्वसनीय इतिहास पर निर्भर होना होगा न कि किसी व्यक्ति या खास विचारधारा के लोगों की अतीत से जुड़ी फंतासियों पर। ज्ञान का विस्तार हो इसके लिए यह जरूरी है कि आलोचनात्मक सवाल उठाए जाएँ, इसलिए विवि परिसर स्वस्थ बहस और वाद-विवाद-संवाद का केंद्र होना चाहिए। राष्ट्र को सभी नागरिकों के समान अधिकारों और उनके बीच बराबरी को सुनिश्चित करना होगा, तभी हम सच्चे अर्थों में अपने देश को सेकुलर लोकतन्त्र बना सकेंगे।

(प्रस्तुति एवं अनुवाद- शुभनीत कौशिक)

Sunday, February 1, 2015

कुँवारी माँ(Single Mother) – आदिवासी स्त्री और हिंसा के नए रूप


-नरेश गौतम
समाज व्यवस्था के विपरीत आदिवासी समाज की अपनी एक अलग व्यवस्था रही है। एक जमाने में आदिवासी समाज में दो बातें मुख्य तौर पर देखी जाती थी। पहली उनकी अपनी सामुदायिक पंचायत और दूसरा गाँव से दूर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्षिक्षण के बतौर उनके युवागृह। पिछले दो-तीन दशकों में कुछ ऐसी स्थितियाँ-परिस्थितियाँ निर्मित हुई हैं कि अचानक से या कहें कि बड़े सुनियोजित तरीके से इन पर हमले हुए हैं और आज हालत यह है कि आदिवासी समाज की पहचान के ये दोनों प्रमुख आधार अब अपने अंतिम समय में महज कुछ अवशेषों के ज़रिए ही देखे-जाने-पहचाने जा सकते हैं। मुख्यधारा के बरक्स आदिवासी समुदाय का जीने का एक अलग जीवन-ढ़ंग और जीवन-दृष्टि थी जो अधिकाधिक समुदाय केंद्रित और अपने प्राकृतिक परिवेश के साथ आबद्ध थी लेकिन एक बनते हुए राष्ट्र-राज्य की ज़रूरतें और अधिकाधिक मुनाफ़े के लिए अधिकाधिक दोहन (चाहे वह व्यक्ति का हो या प्रकृति का) के नव पूंजीवादी रुझानों ने अपनी छोटी और अलग दुनिया में खुश इन समुदायों पर बाहरी हमलों को जन्म दिया। ये हमले भी दोतरफा रहे जहाँ एक तरफ इनके अलग एवं स्वायत्त सिस्टम को वाह्य प्रभावों की घुसपैठ ने कमजोर किया, वहीं इनकी सहजता-सरलता और खुलेपन का फायदा भी उठाया गया। घने जंगलों के भीतर जहाँ सड़कें-रेल जैसे आवाजाही के साधन न पहुँचते हों, वहाँ किसी बाहरी व्यक्ति के आसानी से न पहुँच पाने का अर्थ राष्ट्र-राज्य के न पहुँच पाने से भी था और इस तरह यह राष्ट्र के अंदर एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में बड़ी चुनौती भी था। पिछले डेढ़-दो सौ सालों में (औपनिवेशिक शासन और आज़ादी के बाद) राष्ट्र-राज्य के मजबूत होने के साथ ही इस चुनौती से निपटने के क्रम में इन पर हुए हमलों और इन इलाक़ों में यातायात साधनों के विकास को देखा जा सकता है। यद्यपि पिछले कुछ समय से इन हमलों में आई तेज़ी संकटग्रस्त पूंजीवाद को, यहाँ संसाधनों के रूप में दिख रही अथाह खनिज-सम्पदा एवं इन पिछड़े इलाकों के विकास के नाम पर वैश्विक आर्थिक मंदी से मुक्ति की उम्मीद के कारण भी है। कुल मिलाकर हमले बढ़े हैं चाहे वह विकास के नाम पर हों या फिर संस्कृति के नाम पर।    

इन हमलों में उनकी सामुदायिकता एवं स्वायत्तता को ख़त्म कर उनका मुख्यधारीकरण करना शामिल है, साथ ही उन्हें सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाना भी। इसी के तहत जहाँ उनकी सामुदायिक पंचायत पर पंचायतीराज व्यवस्था ने हमला किया, वहीं युवागृहों को अनैतिक एवं अ-सांस्कृतिक कह कर विकास के नाम पर वहाँ तक पहुँची मुख्यधारा की पूर्वाग्रही चेतना ने ख़त्म कर दिया। आदिवासी समाज के सांस्कृतिक मूल्यों पर गैर-आदिवासियों (मुख्य धारा समाज) ने जम कर आघात पहुँचाया। एक तरफ तो उन्होंने इसे असभ्यता और उच्छृंखलता कहा, वहीं दूसरी तरफ नैतिकता के छद्म से परे दैहिक संबंध बनाने की सहजता ने उन्हें अपनी दबी-छिपी यौन कुंठाओं के साथ इस तरफ आकर्षित भी किया। इस दोतरफ़े हमले ने दोहरा नुकसान किया। जैसा कि हम जानते हैं कि मुख्यधारा के बरक्स आदिवासी समाज एक अधिक मुक्त समाज रहा है और यहाँ पितृसत्ता के वैसे सुदृढ़ रूप भी नहीं दिखते लेकिन इनके संस्कृतिकरण के नाम पर जो कोशिशें हुईं, उसने यहाँ पितृसत्ता के नए रूप रचे-गढ़े हैं। चूंकि कोई भी संस्कृति हमेशा स्त्रियों की नैतिकता पर ही निर्मित होती है, इसलिए इनके संस्कृतिकरण ने एक ओर इन्हें मुख्यधारा नैतिकता की तरफ मोड़ा है और इनके पारंपरिक स्त्री-पुरुष संबंधों में बदलाव आया है, वहीं दूसरी ओर ये संस्कृतिकरण कोई ऐसी प्रक्रिया भी नहीं जो एकबारगी पूरी हो जाए। किसी जीवन-ढंग के सैकड़ों सालों से चले आ रहे अभ्यास कुछेक दिनों-महीनों-वर्षों में भूले भी नहीं जाते, इसलिए यौनिक खुलेपन का सामाजिक व्यवहार संस्कृतिकरण के साथ-साथ जारी रहा। यह तब तक समस्या नहीं बना जब तक कि उनके अपने सामुदायिक जीवन के पारंपरिक नियम-कानूनों में संस्कृतिकरण के मुख्यधारीकृत नैतिक मूल्यों ने जगह बनानी शुरू नहीं कर दी। आदिवासी समाज के लिए दैहिक संबंध कभी कोई टैबू नहीं रहे क्योंकि निजी संपत्ति, परिवार और विवाह को लेकर यहाँ की सामाजिक संरचना एवं मान्यताएं दूसरी हैं। कुछ समुदाय जो मातृवंशीय हैं, वहाँ बच्चों को माँ के नाम से जाना जाता है लेकिन जहाँ ऐसा नहीं है, वहाँ भी पिता के नाम को लेकर वैसी रूढ़ता नहीं है। बिना विवाह माँ बनना (कुँवारी माँ) यहाँ कभी कोई समस्या नहीं रही क्योंकि इसके बावजूद माँ और बच्चा दोनों ही समाज में सहज स्वीकार्य थे लेकिन मुख्यधारा के साथ इनकी अन्तरक्रिया ने सांस्कृतिक एवं नैतिक मान्यताओं को बदला है। विवाह की अनिवार्यता और अवैधता की धारणाओं ने इस समाज में भी अब अपनी जगह बना ली है और इसलिए अब यह एक समस्या के रूप में हमारे सामने है।

यद्यपि इसकी शुरुआत तभी हो गयी थी, जब कानून-व्यवस्था का इनके निजी जीवन में दखल शुरू हुआ। पहले आदिवासियों की परंपरा के सरोकार जंगलों से जुड़े थे। जंगल अपने थे, व्यवस्था अपनी थी और सरकार भी अपनी थी। वे जंगलों में रहते थे, कुदरत के भरोसे जल-जंगल-जमीन के साथ ज़िंदगी जीते थे और उनके लिए ही संघर्ष करते हुये मर जाते थे। लेकिन एक समय ऐसा आया जब जंगल के व्यापारिक महत्व को तो समझते हुए, पर आदिवासियों की मानसिकता और उनकी भावनाओं को नज़रअंदाज़ करते हुए सरकार ने जंगल से जुड़े जो कानून बनाए, उसकी आदिवासियों की हालत को बदतर बनाने में एक बड़ी भूमिका रही। इन कानूनों के अंतर्गत आदिवासियों का जंगल में जाना अपराध घोषित हुआ और जंगलों को सभ्य समाज के लिए संरक्षित किया जाने लगा। जंगल से बाहर जो रोजगार थे, उन पर बाहरी (मुख्य धारा के) लोगों का कब्जा था। इस तरह अब यह आदिवासियों की लाचारी हो गयी कि वह जंगल से बाहर रोजगार देखें और बाहर के लोगों के सामने हाथ फैलाएं। लोगों ने उन्हें काम तो दिया लेकिन काम के बदले उनसे कुछ और भी अपेक्षाएं की। आदिवासी स्त्री के लिए दैहिक संबंध एक बहुत ही स्वाभाविक सा व्यवहार है। उस समाज में जहाँ ऐसी मानसिकता थी कि दैहिक संबंध बनाना पाप नहीं है, इससे वन देवी नाराज हो सकती है, तो इस कारण वहाँ बड़ी सहजता के साथ उन युवतियों ने बाहर के लोगों से संबंध बनाए। इसके बदले उन्हें रोटी मिलती थी, रंगीन कपड़े मिलते थे और सौंदर्य सामग्री भी। ये तमाम उपहार वे सहज स्वीकार करते गए। 'विकास' के नाम पर इस सहजता का 'विकास' करने वाले लोगों ने भरपूर लाभ उठाया और इस तरह आदिवासी स्त्रियाँ खुले सेक्स संबंधों की प्रतीक बन गईं। सड़कों के विकास ने इसे और मजबूती दी। साथ ही वस्तु विनिमय के स्थान पर अब संग्रहणीय रुपए ने इन मुसीबतों को और बढ़ा दिया है। चूंकि आदिवासी समाज में स्त्रियाँ रीढ़ होती हैं और घर-बाहर के कामों में उनकी समान भागीदारी होती है जबकि मुख्यधारा समाज अपनी स्त्रियों को घरों में रखते हुए बाहरी दुनिया की इन महिलाओं के साथ इनकी 'यौन उन्मुक्तता' एवं 'आसान उपलब्धता' की अपनी पूर्व धारणाओं के साथ अन्तरक्रिया करता है और इस तरह अपनी यौन कुंठाओं के लिए इन्हें एक 'सॉफ्ट टार्गेट' के रूप में देखता है। यह एक नयी तरह की हिंसा है जो मुख्यधारा समाज के पुरुष और आदिवासी समुदाय की स्त्री के बीच उनके असमान एवं हायर्रिकल संबंधों से पैदा होती है।

महाराष्ट्र का ऐसा ही एक जिला यवतमाल है। इस जिले की तालुका झरीजामणी में आधे से भी अधिक आबादी आदिवासियों की है जिनमें मुख्यतः कोलाम, गोंड, परधान, जनजाति के लोग निवास करते हैं। पिछले कुछ वर्षों से यहाँ कुँवारी लड़कियों के माँ बनने की काफी घटनाएँ सामने आ रही हैं। झरीजामणी तालुका में 55 ग्राम पंचायत आती है। इन 55 ग्राम पंचायतों में अब तक 216 से भी अधिक लड़कियाँ कुंवारी माँ बन चुकी हैं। वैसे तो आदिवासी समाज में कभी भी कुवांरी माँ बनने में हीनता नहीं थी,  लेकिन जैसे-जैसे आदिवासी समुदाय मुख्यधारा के साथ विकास की प्रक्रिया में आ रहा है, वैसे ही उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताएं भी बदल रही हैं और इसी क्रम में अब तक जिसे प्रजनन की सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया माना जाता था, उसे अब इस समाज ने भी अपराध की श्रेणी में गिनना शुरू कर दिया है। मुख्यधारा समाज में बिना ब्याह के किसी लड़की के माँ बनने का मतलब ही है कि वह चरित्रहीन है,  कुलटा है और इसे एक अपराध की ही तरह देखा जाता है। अब यही धारणा मुख्य समाज के संपर्क में आने से आदिवासी समाज की भी बनने लगी है। सिर्फ यही नहीं मुख्यधारा की तरह ही इस तथाकथित अपराध की सज़ा के बतौर स्त्री का सामाजिक बहिष्कार और बच्चे को अवैध कह कर बहिष्कृत कर दिया जाता है। वह गाँव में अपने परिवार के साथ नहीं रह सकती, किसी महामारी की तरह ही उसे गाँव के बाहर कर दिया जाता है। कुछ इस तरह कि जैसे वह यहाँ रहेगी तो और भी लोगों को यह बीमारी हो सकती है। यह सामाजिक बेदख़ली और आधारहीनता उसे और भी शोषित एवं प्रताड़ित होने को विवश करती है।
 
झरीजामणी तालुका में अब तक 216 महिलाये कुँवारी माँ बन चुकी है। उन्हें माँ बनने के बाद घर तक नसीब नहीं है। कुछ-कुछ लड़कियाँ तो दो से तीन बार माँ बन चुकी है। पंचायत में इस तरह का कोई केस सामने आने पर ऐसा है कि अगर वहाँ की पंचायत चाहे तो उस व्यक्ति से शादी करा दे और यदि न चाहे तो लड़की को ऐसे ही बच्चे को जन्म देना होगा। इस संबंध में अभी तक एक भी केस पुलिस में नहीं गया है। यदि कोई लड़की अपने ही समाज में प्रेम करती है और उससे बच्चा होता है तो पंचायत उसे शादी के लिए कहती है लेकिन बहुत से ऐसे भी मामले है जहाँ बाहर से लोग आकर लड़कियों को बहला-फुसला कर अपना शिकार बनाते हैं और उसके बाद वह जीवन भर उसे ढोती रहती है। परंतु यह घटना सिर्फ किसी एक यवतमाल की ही नहीं है बल्कि जहाँ-जहाँ आदिवासियों को जंगल से निकाला जा  रहा है और जंगलों को पर्यटकों के लिए संरक्षित किया जा रहा है, वहाँ ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। वह मामला चाहे यवतमाल के झरीजामणी का हो या उड़ीसा के कालाहांडी, बेलगीर, माल्कनगिरि या उत्तर प्रदेश के सोनभद्र का, सभी जगह एक जैसी ही स्थितियाँ है। सभी जगह आदिवासियों को जंगल से निकाला जा रहा है, जंगलों को संरक्षित किया जा रहा है, रिजॉर्ट बनाए जा रहे हैं और उन्हीं जगहों पर आने वाले लोग भोली-भाली लड़कियों को अपने भोग-विलास का साधन भी बना रहे हैं। दूसरी तरफ वही लोग, वही समाज उन्हें अपराधी भी ठहरा रहा है। वहाँ न तो ये घटनाएं सरकारी महकमे को दिखायी देती हैं और न ही समाज के ठेकेदारों को। वैसे गौर करें तो जिस विकास के नाम पर इस तरह के कृत्य शुरू हुए हैं, वह विकास अपनी अवधारणा में पश्चिम से आयातित है और वहाँ सिंगल मदर कोई अनोखी या आपराधिक चीज़ नहीं है, बल्कि इसे पूर्ण सामाजिक मान्यता प्राप्त है। दूसरी तरफ यहाँ भारत में विकास का पैमाना तो पश्चिम से तय किया जा रहा है, लेकिन सामाजिक संबंधों में आज भी वही जाति-धर्म आधारित उच्च वर्ग और निम्न वर्ग को मान्यता दी जाती है और वही सड़े-गले संस्कार हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं दिखाई देता।
सवाल सिर्फ ये नहीं है कि यवतमाल की उन 216 कुँवारी माँओं और उनके बच्चों या सोनभद्र से लेकर उड़ीसा तक जंगलों में रह रहे आदिवासी जो अपनी समस्याओं को लेकर ऐसे ही दोराहे पर खड़े हैं, का क्या होगा या होना चाहिए? सवाल ये भी नहीं है कि आदिवासी समाज की सामुदायिकता, रीति-रिवाज, जीवन-ढंग और संसाधनों पर हमले बढ़े हैं और इन्हें बंद होना चाहिए? सवाल इससे कहीं ज्यादा गहरे और व्यापक हैं और वो यह कि क्या हम एक समाज के रूप में कभी अपने से अलग और ठीक विपरीत चीज़ों को भी बर्दाश्त करने की काबिलियत हासिल कर सकेंगे या नहीं? या कि हायरार्कीज (पदानुक्रमता) पर टिकी सत्ता-संरचनाएं जो हमेशा ही हिंसा के नए-नए रूपों को जन्म देती हैं, वहाँ इन सत्ता-संरचनाओं को ख़त्म किए बिना क्या हम एक अहिंसक समाज के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकते हैं क्या? क्योंकि हमारा दावा तो यही है लेकिन हमारी ज्यादातर कोशिशें इसी संबंध में की जा रही बेमतलब की उछल-कूद जैसी ही हैं।     

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नरेश गौतम

76, गोरख पाण्डेय हॉस्टल
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा