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Thursday, May 18, 2017

'हमारा होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है'

जिन लोगों के जेंडर तथा यौनिक व्यवहारों को लेकर हमारे समाज में ढेर सारी गालियां बनी हो, वहाँ ऐसे लोगों पर उपहास करना, उनके साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार व उन्हें समाज में कलंकित मान लेना अभी भी आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन जब शोषित समूह के लोग स्वयं को छुपाने के बजाए समाज के सामने ढ़ोल की ताल पर थिरकते हुए, लाउडस्पीकर पर अपनी पहचान को समाज के सामने रखते हुए नारा लगाए कि 'हमारा होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है।', 'हमें चाहिए आज़ादी -प्यार करने की आज़ादी, भेदभाव के बिना जीने की आज़ादी।'  तो लोगों को यह दृश्य आश्चर्यचकित कर रही थी। यह मौका था नागपुर में आयोजित दूसरे LGBTQ प्राइड मार्च का जिसमें समूह के लोग तथा देशभर से आए LGBTQ अधिकारों के समर्थक एकत्रित हुए थे। मार्च के द्वारा धारा 377 का विरोध करते हुए स्वीकार्यता, सम्मान, स्वतन्त्रता, शिक्षा, रोजगार, जैसे मानवीय अधिकारों की मांग भी की गई।
बैंगलोर से आए समीर कहते है - 'आज मैं विशेष तौर से इस मार्च में शामिल होने के लिए आया हूँ। मैं इस लड़ाई में अपने लोगों के साथ हूँ। आज इतने सारे लोगों को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। संविधान में हमें जो भी वैयक्तिक अधिकार मिले है वो हमें भी मिलना चाहिए। धारा 377 हटाई जाए और संवैधानिक अधिकार दी जाए, हमें भी जीने का अधिकार है।'
प्राइड मार्च समाज के लिए जरूरी क्यों है? पुछें जाने पर मुख्य अतिथि के रूप में गुजरात से आए मानवेंद्र गोहील ने कहा कि 'जरूरत इसलिए है कि हमें समाज को बताना है कि हमारी संख्या भले ही कम है, लेकिन हमारी उपस्थिती है और हमें गर्व है कि हम क्या है। प्रत्येक इंसान को आज़ादी से जीने का हक है तो हमें क्यों नहीं मिला है? जब भारतीय संविधान में सभी लोगों को समानता और सम्मान से जीने का हक है तो हमें क्यों नहीं? हमें हमारे तरीके से जीने दिया जाए, प्यार करने की आज़ादी हो। हम पैदाइशी ही ऐसे है, हमारा कोई दोष नहीं कि हम ऐसे है। ये हमारे लिए आज़ादी की लड़ाई है।'
आगे उन्होंने कहा कि 'हमें अब दूसरे लोगों का भी सहयोग मिल रहा है, कुछ माँ-बाप भी समझने लगे है कि बच्चों से ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती, उन्हें अपने जीवन साथी चुनने का अधिकार देना होगा।' मीडिया किस तरह से उन्हें अब पेश कर रही है? पुछे जाने पर उन्होंने कहा कि 'LGBTQ समूह को लेकर मीडिया प्रेजेंटेशन में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है। मीडिया काफी सकारात्मक हुई है, अब हमारी समस्याओं के बारे में भी लिख रहे है। युवाओं में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है, अब वे भी इन विविधताओं के बारे में जानना चाहते है।'

पिऊ जो नागपुर की ही है, वे कहती है 'आज पहली बार लड़कियों की तरह तैयार होकर इस मार्च में शामिल हो रही हूँ। थोड़ी सी डरी हुई हूँ कि कहीं घर वालों को पता न चल जाएँ, लेकिन मैं खुश हूँ कि जैसा मैं महसूस करती हूँ उसी रूप में समाज के सामने हूँ।'

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 अप्रैल 2014 को ट्रान्सजेंडर को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता देने तथा उनके स्थिति में सुधार के लिए उचित कदम उठाने के दिशानिर्देश के बावजूद अभी भी सरकारी प्रयास न के बराबर ही है। यही कारण है की पिऊ तथा पिऊ के जैसे हजारों ट्रान्सजेंडर को अपनी पहचान छुपाकर जीवन व्यतित करने के लिए मजबूर हैं।

जब भी LGBTQ अधिकारों की बात की जाती है तो समलैंगिकता को लेकर प्राकृतिक-अप्राकृतिक, नैतिक-अनैतिक, वैध-अवैध कि बहसे तेज हो जाती है। धारा 377 को हटाने के लिए एक लंबी बहस समलैंगिकता के अपराधीकरण को मानव अधिकारों के हनन के रूप में हुई है। संवैधानिक बहसो में जिन अधिकारों को लेकर चर्चा हुई है उनमें समानता, सम्मान, गोपनियता तथा भेदभाव व स्वतन्त्रता शामिल है। इन तमाम बहसों के बाद भी भारतीय कानून समलैंगिकता को अपराध मानता है। भारतीय दंड संहिता, धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) इस प्रकार से है - “जो भी कोई स्वेच्छा से किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध कामुक संभोग करता है, उसे आजीवन कारावास या फिर 10 वर्षों तक बढ़ाई जा सकती है और जुर्माना भी हो सकता था।" धारा यह स्पष्ट नहीं करती कि 'अप्राकृतिक' यौन क्या-क्या है, इसके साथ ही लिंग प्रवेश यौनिक संभोग को स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।' इस व्याख्या के कारण इसमें मुख व गुदा भी शामिल हो जाता है।  

यह कानून औपनिवेशिक काल में 'यौन आनंद' के निषेध के लिए बनाया गया था इस तरह ऐसे सभी यौनिक व्यवहारों को आपराधिक करार देने के लिए बनाया गया था जो प्रजनन प्रक्रिया से जुड़े नहीं है। यह कानून समलिंगी गतिविधियों के साथ विषमलैंगिक व्यवहार वाले जोड़े पर उस दशा में लागू होता है जब वह मुख मैथुन (oral sex), गुदा मैथुन (anal sex) या हस्तमैथुन करते हैं। फिर भी होमोफोबिया (समलैंगिकता के प्रति भय) के कारण हमेशा ही समलैंगिक गतिविधियों वाले लोगों को ही निशाना बनाया जाता रहा है। इसलिए धारा 377 का विरोध सभी नागरिकों को करना चाहिए, इसे सिर्फ समलैंगिक सम्बन्धों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत में समलैंगिकता को लेकर राजनैतिक मांग के रूप में धारा 377 के खिलाफ संघर्ष की शुरुवात वैश्विक परिदृश्य की तुलना में बहुत बाद में 1990 से मान सकते हैं जब पहचान आधारित आंदोलनों के उभार ने हाशिए के समाजों को अपने अधिकारों के लिए संगठित किया।   

डिसेन्ट कुमार साहू
शोधार्थी - समाजकार्य विभाग
म. गां. अं. हि. वि. वि. वर्धा 

मनुष्यता से जुड़ा हुआ है पर्यावरण का मुद्दा: प्रो. मनोज कुमार


तथाकथित विकास से उत्पन्न समस्याओं ने आज पूरे विश्व को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि विकास की इस राह पर ज्यादा दिनों तक चला नहीं जा सकता है। वैसे तो यह सोचते-सोचते 50 वर्ष से भी अधिक का समय गुजर चुका है क्योंकि इसकी शुरुवात 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के स्टाकहोम सम्मेलन से होती है, जहां विकास से उपजे पर्यावरणीय प्रदूषण और संसाधनों के खत्म होने की चिंता को लेकर सौ से अधिक देशइकट्ठा हुए। विकास की इन समस्याओं को देखते हुए 'बुंटलैंड आयोग' ने 'स्थायी विकास' का नारा दिया। तब से लेकर अब तक विभिन्न मंचों से सतत या स्थायी विकास का नारा बुलंद किया जाता रहा है। इस वर्ष के विश्व समाज कार्य दिवस का उद्देश्य भी पर्यावरण और इंसानी अस्तित्व की निरंतरता (Sustainability) को बढ़ावा देना रहा। इसी क्रम में 21 मार्च को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी समाज कार्य अध्ययन केंद्र के द्वारा विश्व समाजकार्य दिवस, 2017 पर एक परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। परिचर्चा इस वर्ष का विषय ग्लोबल एजेंडे का तीसरा स्तम्भ 'सामुदायिक और पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देना' रहा।
केन्द्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि पर्यावरणीय मुद्दे पर दुनिया की तमाम सरकारें एक तरह से सोच रही हैं और जनता दूसरे तरीके से सोच रही है। जब तक हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित नहीं करेंगे तब तक पर्यावरण की सुरक्षा नहीं होगी। आगे उन्होने कहा कि पर्यावरण का मुद्दा मनुष्यता से जुड़ा हुआ है। इस परिचर्चा को आगे बढ़ते हुए सहायक प्रोफेसर श्री आमोद गुर्जर ने कहा कि सतत विकास की अवधारणा व्यक्ति केन्द्रित है जबकि इसे समग्र उपागम (holisticapproach) को अपनाना होगा। हमने मानव अस्तित्व पर संकट आने के बाद ही 'सतत विकास' की अवधारणा अपनाई।डॉ. शिव सिंह बघेल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए यह कहा कि विद्यार्थियों को अपना लक्ष्य ऐसा बनाना चाहिए ताकि वे स्वयं को वैश्विक एजेंडे से जोड़ सके और ग्राम स्तर तक पहुंचाए।
डॉ. मिथिलेश ने कहा कि वैश्विक स्तर तथा भारत में भी संसाधनों के बड़े भाग पर चंद लोगों का आधिपत्य है जबकि एक बड़ा भाग अपना जीवन गरीबी और अभाव में व्यतीत कर रहा है इसलिए हमें संसाधनों के न्याय पूर्ण वितरण पर ध्यान देना होगा। परिचर्चा के दौरान उपस्थित सभी सहभागियों नेइस मुद्दे पर अपनी बात रखी। ज़्यादातर विद्यार्थियों ने अपने आस-पास विकास के नाम पर उत्पन्न हो रहे विसंगतियों को प्रमुखता के साथ रखा।
कार्यक्रम का संचालन नरेन्द्र कुमार दिवाकर ने किया। प्रास्ताविक डिसेन्ट कुमार साहू ने रखा और आभार गजानन निलामे ने किया। इस परिचर्चा में केंद्र के निदेशक प्रो.मनोज कुमार,डॉ. मिथिलेश कुमार, डॉ. शिव सिंह बघेल, सहायक प्रोफेसर श्री आमोद गुर्जर तथा केंद्र केनरेश गौतम, श्याम सिंह, आशुतोष, छविनाथ यादव,विलास चुनारकर, अनुराग पाण्डेय, शीना नेगी, सुधीर कुमार,अदिति, आनीता और शुभांगी सहित बड़ी संख्या में समाज कार्य के शोधार्थी/विद्यार्थी और एन जी ओ प्रबंधन के विद्यार्थी उपस्थित रहे।
नरेंद्र कुमार दिवाकर
शोधार्थी समाजकार्य

Thursday, March 24, 2016

इतिहास, राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता

प्रो. रोमिला थापर
[प्रो. रोमिला थापर द्वारा जेएनयू में 6 मार्च, 2016 को दिये गए व्याख्यान पर आधारित लेख]
प्रो. रोमिला थापर ने अपना व्याख्यान शुरू करते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा कि उन्हें लगता है कि वे और उनके कई अन्य वरिष्ठ सहकर्मी “जेएनयू के डायनासोर” हैं। गौरतलब है कि प्रो. रोमिला थापर उन लोगों में से हैं, जो जेएनयू के विकास की प्रक्रिया के न सिर्फ साक्षी रहे हैं, बल्कि जिन्होंने इस विवि के आरंभिक क्षणों से लेकर (प्रो. थापर नवंबर 1970 में जेएनयू से जुड़ीं), इसके विकसित होने की प्रक्रिया में अतुलनीय योगदान दिया है। उन्होंने बताया कि जेएनयू के आरंभिक दिनों में, उन लोगों का उद्देश्य जेएनयू को एक ऐसे विवि के रूप में परिणत करना था, जहां बेहतर अकादमिक गुणवत्ता के साथ-साथ खुली चर्चा और विमर्श का माहौल उपलब्ध हो।
विषय पर आते हुए प्रो. थापर ने कहा कि वे इतिहास और राष्ट्रवाद के संबंधों की चर्चा करेंगी और इसके जरिये वे उस प्रक्रिया की गहराई में भी जाएंगी, जिसके अंतर्गत हम अपने समाज को समझते हैं और उसमें अपनी अस्मिता को खोजते हैं। राष्ट्रवाद का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार एरिक हाब्सबौम को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि “राष्ट्रवाद को इतिहास की तलब उतनी ही होती है, जितनी कि एक अफीमची को अफीम की” ("history is to nationalism what poppy is to an opium addict."). इस कथन की व्याख्या करते हुए प्रो. थापर ने कहा कि इतिहास राष्ट्रवाद के लिए न सिर्फ एक स्रोत होता है, बल्कि यह राष्ट्र की अस्मिता का भी निर्माण करता है।
रोमिला थापर ने कहा कि राष्ट्रवाद आधुनिक काल में ऐतिहासिक बदलावों के फलस्वरूप उपजा है, और यह आधुनिक काल से पूर्व मौजूद नहीं था। 17वीं सदी के यूरोप का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यूरोपीय देशों में पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के विस्तार, मध्यम वर्ग के उदय ने ‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा की उत्पत्ति में योगदान दिया। इसके अंतर्गत एक सेकुलर अस्मिता की भी बात की गई, जो समावेशी होने के साथ-साथ एकता को भी सुनिश्चित करती। यह समावेशी अस्मिता सामाजिक जागरूकता से उपजी थी। और इस पूरी प्रक्रिया में, “साझा इतिहास” का महत्त्व बढ़ गया क्योंकि यह लोगों को एक सूत्र में बांधता था। प्रो. थापर ने यह बात ज़ोर देकर कही कि राष्ट्र कभी एकल अस्मिता के बल पर नहीं खड़ा हो सकता, उसे समावेशी होना ही पड़ेगा।
राष्ट्रवाद की अवधारणा में आखिरकार अतीत के कुछ हिस्सों को “स्वर्ण काल” (गोल्डेन एज़) के रूप में देखने की घातक प्रवृत्ति शामिल हो गई। यह तथाकथित “स्वर्ण काल” अतीत के समाजों के भ्रामक इतिहास पर आधारित था, जबकि हम वर्तमान में जी रहे हैं। प्रो. थापर ने अपवर्जी राष्ट्रवाद (एक्सक्लूसिव नेशनलिज़्म) के रूप में, जर्मनी में 20वीं सदी के तीसरे दशक में उपजे ‘राष्ट्रवाद’ का उदाहरण दिया और समावेशी राष्ट्रवाद (इनक्लूसिव नेशनलिज़्म) के रूप में अफ़्रीकी राष्ट्रवाद का उदाहरण दिया। और यह जोड़ा कि दुनिया भर को अफ़्रीकी राष्ट्रवाद के समावेशी चरित्र को अपनाना चाहिए।
भारत में राष्ट्रवाद के उदय पर टिप्पणी करते हुए प्रो. रोमिला थापर ने कहा कि भारत में राष्ट्रवाद उपनिवेशवादविरोधी आंदोलन के दौरान पनपा। प्राक-औपनिवेशिक भारत में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की बहुतेरी अस्मिताएं एक-साथ अस्तित्व में थीं। धर्म के अंतर्गत भी कोई एकाश्मी (मोनोलीथिक) धर्म न होकर अनेक संप्रदाय अस्तित्व में थे। यह विविधता से भरा-पूरा समाज था, जहाँ भिन्न-भिन्न समूह अपने स्तर से संवाद कर रहे थे। पर ब्रिटिश शासन के दौरान जेम्स मिल सरीखे उपनिवेशवादी इतिहासकारों ने इस पूरी विविधता को धर्म तक सीमित कर दिया। जेम्स मिल ने 1818 में लिखी अपनी पुस्तक में काल-विभाजन के लिए शासक वंश के धर्म का इस्तेमाल किया और इस तरह पूरे भारतीय इतिहास को “हिन्दू काल”, “मुस्लिम काल” और “ब्रिटिश काल” में बाँट दिया।
काल-विभाजन की इस अवधारणा के पीछे द्विराष्ट्रवाद का वही सिद्धान्त काम कर रहा था, जिसके अंतर्गत यह माना जाता था कि ‘हिन्दू और मुस्लिम, स्थायी तौर पर एक-दूसरे के विरोधी और शत्रु हैं और उन्हें शांत रखने के लिए किसी बाह्य शक्ति जैसे ब्रिटिश साम्राज्य की जरूरत होगी’। द्विराष्ट्रवाद के इसी सिद्धान्त ने “अल्पसंख्यक” और “बहुसंख्यक” सरीखी श्रेणियाँ गढ़ दीं। इसने एकाश्मी धार्मिक अस्मिता को सुदृढ़ करने का (consolidated monolithic religious identity) काम किया। हेमचन्द्र रायचौधुरी, रमेश चंद्र मजूमदार और नीलकंठ शास्त्री सरीखे राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने एक ओर जहाँ प्राच्य निरंकुशता (Oriental Despotism) के सिद्धान्त को चुनौती दी, वहीं दूसरी ओर इन लोगों ने जेम्स मिल के काल-विभाजन को स्वीकार कर लिया। भले ही अब “हिन्दू”, “मुस्लिम” और “ब्रिटिश” काल की जगह प्राचीन, मध्यकाल और आधुनिक काल ने ले ली थी, पर इतिहास को धर्म के चश्मे से देखने की मूल अवधारणा में कोई बदलाव नहीं आया।
उपनिवेशवादी इतिहासलेखन ने भारतीय इतिहास में “आर्य नस्ल का सिद्धान्त” भी आरोपित कर दिया। प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि ‘आर्य भाषा’ मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची’। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत ही के स्थानीय निवासी थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! बावजूद इसके कि हड़प्पा सभ्यता की भाषा अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है और न ही हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति के स्रोत ज्ञात हो सके हैं।
एक तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, जब अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थियोसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थियोसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे। लोकमान्य तिलक का कहना था कि आर्य आर्कटिक प्रदेश से आए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में आर्यों से जुड़े मुद्दे का इतना अधिक राजनीतिकरण हो चुका है कि जो विद्वान ‘आर्यों के भारत में ही उत्पन्न होने’ की अवधारणा पर सवाल उठाते हैं, उन्हें सोशल मीडिया और इंटरनेट का गुस्सा और अपमान झेलना पड़ता है। ऐसी स्थिति ऐतिहासिक विषयों से जुड़ी परिचर्चा और वाद-विवाद-संवाद की संभावना को घटा देती है।
जहां एक ओर उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवाद सेकुलर, लोकतान्त्रिक और बराबरी के सिद्धान्त पर आधारित समाज और मुख्य अस्मिता के रूप में “भारतीयता” की वकालत करता था। वहीं दूसरी ओर, धार्मिक राष्ट्रवाद एक धर्म, संस्कृति, भाषा आदि के सबसे अलग होने को रेखांकित करता है। यह अक्सर, राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए जान-बूझकर गढ़ा जाता है, जैसा हिंदुत्व के उदाहरण में हमें स्पष्ट दिखता है। ‘हिंदुइज़्म’ और हिंदुत्व दोनों एक ही चीज नहीं हैं। ‘हिंदुइज़्म’ एक धर्म है, जबकि हिंदुत्व एक आधुनिक राजनीतिक विचारधारा। हिंदुत्व एक विचारधारा है जो कुछ बातें तो ज़रूर ‘हिंदुइज़्म’ से लेती है, पर यह ‘हिंदुइज़्म’ से बहुत अलग है।
इतालवी फासीवाद से प्रेरणा प्राप्त करने वाली हिंदुत्व की अवधारणा 20वीं सदी में अस्तित्त्व में आई, और इसका उद्देश्य था - हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए हिंदुओं को राजनीतिक रूप से संगठित करना। धर्म पर आधारित विचारधारा के निर्माण में ज़रूरत पड़ने पर धर्म की आधारभूत बातों को भी फिर से रचा जा सकता है। यह पुनर्रचना अक्सर धर्म के अभिजात्य और पुरातनपंथी अनुयायियों को ध्यान में रखकर की जाती है। जब हम ‘हिन्दू’ होने को परिभाषित करते हैं तो सामान्यतया ऐसा उच्च जाति के लोगों के संदर्भ में ही किया जाता है। क्योंकि इस परिभाषा का आधार वे टेक्स्ट होते हैं, जो इन्हीं जाति-समूहों के हैं। हिंदुत्व एक निश्चित भू-भाग, एकल संस्कृति और नृजातीय उत्पत्ति, एक भाषा और एक धर्म की बात करता है। यह हिंदुओं की साझी ‘पुण्यभूमि, पितृभूमि’ की भी बात करता है और अन्य सभी धर्मावलंबियों को विदेशी बतलाता है। हिंदुत्व अपने धार्मिक पक्ष में, सामी (सेमिटिक) धर्मों की रूपरेखा का ही अनुसरण करता है, मसलन, ‘ऐतिहासिकता’ पर ज़ोर और एकाश्मी (मोनोलिथिक) धर्म, एक पवित्र ग्रंथ, चर्च जैसे धार्मिक संगठन।
चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई या सिख, इस तथ्य की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता कि बहुतेरे धर्मावलंबी ऐसे होते हैं जो अपने धार्मिक ग्रंथों से थोड़ा ही परिचय रखते हैं। उनके लिए धर्म एक अलग ही मसला होता है। असल व्यवहार में, ये लोग अपना खुद का धर्म/पंथ निर्मित कर लेते हैं, अपने चुने हुए तरीके से अपने देवताओं, गुरुओं, पीरों या बाबाओं की पूजा करते हैं, प्रो. रोमिला थापर ने इन धर्मों को मुख्य धर्म से अलग करते हुए इन्हें “गुरू-पीर धर्म” की संज्ञा दी। धर्म के इतिहासकारों को इसका मूल्यांकन करना चाहिए कि आखिर लोगों के धर्म और उनके विश्वास किस हद तक धार्मिक टेक्स्ट पर या व्यवहारों पर निर्भर या उनतक सीमित होते हैं।
भारतीय इतिहास में धर्म की अवधारणा को पारिभाषित करने वाली दो प्रमुख धाराएँ थीं: ब्राह्मणवादी और श्रमण परंपरा। यह द्वैधता ईसा की पहली सहस्राब्दी में भी कायम रही। वैयाकरण पातंजलि ने इनके बीच के संबंधों की तुलना साँप और नेवले से की थी, यानि इन दोनों के संबंध संघर्षमय थे। हम भारत में धर्मों के इतिहास के बारे में समझने की कोशिश करें और जानना चाहें कि कैसे धर्मों ने समाजों को प्रभावित किया तो हमें उन पंथों के बारे में जानना होगा, जो इन धर्मों से उत्पन्न हुए, और साथ ही, इन पंथों के परस्पर जटिल संबंधों का अध्ययन करना होगा, जिसमें अक्सर इन पंथों के विश्वासों और व्यवहार की पूरी फेहरिस्त शामिल होगी। धर्मों और उनसे निकले पंथों/संप्रदायों का अध्ययन करते हुए हमें उनके बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा और आदान-प्रदान को भी समझना होगा। ये पंथ अक्सर किसी-न-किसी जाति से जुड़े होते थे, अतः इस संबंध का भी अध्ययन करना होगा।
अंत में, प्रो रोमिला थापर ने ज़ोर देते हुए कहा कि राष्ट्रवाद को विश्वसनीय इतिहास पर निर्भर होना होगा न कि किसी व्यक्ति या खास विचारधारा के लोगों की अतीत से जुड़ी फंतासियों पर। ज्ञान का विस्तार हो इसके लिए यह जरूरी है कि आलोचनात्मक सवाल उठाए जाएँ, इसलिए विवि परिसर स्वस्थ बहस और वाद-विवाद-संवाद का केंद्र होना चाहिए। राष्ट्र को सभी नागरिकों के समान अधिकारों और उनके बीच बराबरी को सुनिश्चित करना होगा, तभी हम सच्चे अर्थों में अपने देश को सेकुलर लोकतन्त्र बना सकेंगे।

(प्रस्तुति एवं अनुवाद- शुभनीत कौशिक)