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Tuesday, February 3, 2015

जैसे ही मैंने अपनी पहचान जाहिर की तो मेरे घर के दरवाजे मेरे ही लिए बंद हो गए-रवीना बरिहा

छत्तीसगढ़ थर्ड जेंडर वेलफेयर बोर्ड की सदस्य एवं 'छत्तीसगढ़ मितवा संकल्प समिति की सचिव रवीना बरीहा से खास बातचीत 
रवीना बरीहा से बात करते डा. मुकेश
 अपने जीवन-संघर्षों के बारे में बताएं।  
इस मामले में मैं थोड़ा भाग्यशाली रहीहमारे समाज में थर्ड जेंडर को जितनी प्रताड़ना झेलनी पड़ती हैउतनी मुझे नहीं झेलनी पड़ी। सामाजिक उपेक्षा और बहिष्कार की जितनी पीड़ा हमारे समुदाय के अन्य लोगों को झेलनी पड़ती हैउसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। लेकिन मुझे यह सब कम झेलना पड़ा। छठी कक्षा की पढ़ाई मैंने अपने घर पर ही रह कर की। उस समय तक घर वालों को समझ ही नहीं आया कि मैं 'किन्नरहूँ। उसके बाद रायपुर के रामकृष्ण मिशन स्कूल में मेरा चयन हो गयाजहां रहकर मैंने बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई की। इस आश्रम में मेरी सही ढंग से परवरिश हुईमुझे कहीं से भी यह एहसास नहीं होने दिया गया कि मैं किन्नर’ हूँ। मानव के व्यक्तित्व के विकास के लिए शिक्षाभोजन-वस्त्र आदि जिन बुनियादी चीजों की आवश्यकता होती हैसारी चीजें मुझे वहाँ उपलब्ध हुईं। जीव-विज्ञान से 12वीं कक्षा पास करने के बाद मैंने रायपुर के दुर्गा महाविद्यालय से कला (दर्शनहिन्दी साहित्यराजनीति विज्ञान) में स्नातक किया। तदुपरांत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संबद्ध एक संस्थान से मैंने रायपुर में ही एक वर्ष का फिल्म मेकिंग (पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा इन डिजिटल विडियोग्राफी) कोर्स किया। इसी दौरान मैंने रायपुर के दैनिक अखबार हरीभूमि’ में काम किया। वहाँ मैं प्रूफ-रीडर और संपादकीय में प्रांतीय डेस्क देखती थी। मैंने तीन वर्षों तक वहां काम किया। वर्ष 2009 में हमलोगों ने खुद का एक संगठन बनाने के बारे में सोचा। और हमलोगों ने अन्य चार-पाँच किन्नर साथियों के साथ मिलकर मितवा’ नामक संस्था बनाई।
तब तक आपकी पहचान किन्नर के तौर पर समाज के सामने आ गई थी
हाँबारहवीं की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद मैं खुलकर अपनी जेंडर पहचान के साथ सामने आ गई थी। 
बारहवीं के बाद तक भी आपका अपने घरवालों से रिश्ता बना रहा?
बारहवीं के बाद भी मैं आश्रम में ही रही। अपनी पहचान स्पष्ट कर देने के बाद मुझको घर जाना नहीं पड़ा। पढ़ाई करते हुए मैंने टायपिंग भी सीख ली थी। इसी कारण मुझे अखबार में नौकरी मिल गई। प्रारंभ में मैंने देशबंधु अखबार में काम किया। इन पड़ावों से गुजरते हुए मुझे समझ में आया कि थर्ड जेंडर के प्रति समाज की धारणा कैसी है! तब से मेरे मन में एक बीज डल गया किमैं अपने लिंग- तृतीय लिंग के लोगों के लिए काम करूंगी। खासकर इन्हें सामाजिक समानता हासिल होइसके लिए काम करने का जज़्बा मेरे भीतर पैदा हुआ। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमने मितवा’ संस्था बनाई।
मितवा’ अत्यंत ही प्यारा नाम रखा आप लोगों ने अपनी संस्था का। इसके पीछे भावना क्या थी
तृतीय लिंग समुदाय के हक-अधिकार पर काम करने के लिए हम लोगों ने यह संस्था बनाई। हम यह बताना चाहते हैं किहम न कोई दैवीय रूप हैं और न ही उपेक्षा के पात्र। हम मित्र’ हैं। उपनिषदों के एक साथ चलेंएक साथ मिलकर उपभोग करेंएक साथ तेजस्वी बनें’ वाक्य के मद्देनजर हम लोगों ने मित्रता को इष्ट’ और श्रेष्ठ सदगुण समझा। इसी मित्रता के भाव को मितवा का नाम दिया गया। इस संस्था के जरिये हम लोग समाज की मुख्यधारा से थर्ड जेंडर को जोड़ने हेतु तरह-तरह की गतिविधियां चलाते हैं। हर वर्ष नवरात्रि के दिन हमलोग नर्सों का सम्मान करते हैं। उसी प्रकार ट्रैफिक पुलिस को अंबेडकर जयंती के दिन सम्मानित किया जाता है और रक्षा-बंधन के दिन पेड़-पौधों को हमलोग राखी बांधते हैं। रामनवमी में हमलोग गरीबों को भोजन कराते हैं। अस्पताल जाकर हम मरीजों को फल आदि वितरित करते हैं। इन गतिविधियों के जरिये हम समाज की मुख्यधारा से जुडने का लगातार प्रयास चला रहे हैं।
मितवा’ के लिए शुरुआती दिनों में आपलोगों ने फंड जेनरेट कैसे किया
मितवा’ के सारे सदस्य कहीं न कहीं काम कर रहे थेमैं खुद पत्रकारिता में थीऔर अन्य सदस्य में से एक वहीं के किसी होटल में वरिष्ठ कुक थेएक का बहुत अच्छा ब्यूटी-पार्लर थाएक-दो लोग बधाई मांगने का काम करते थे। इन सबके साझे आर्थिक सहयोग से संस्था का काम शुरू किया गया। संस्था को आज भारत सरकार के स्वास्थ मंत्रालय की ओर से लक्ष्यगत हस्तक्षेप परियोजना के अंतर्गत एक प्रोजेक्ट मिला हुआ है। एचआईवी-एड्स और टीबी पर जागरूकता के लिए इस प्रोजेक्ट के तहत संस्था के द्वारा पूरे रायपुर जिले में कार्य किया जा रहा है। इसके तहत जगह-जगह शिविर लगाकर खून की जांच करायी जाती है। स्वास्थ्य जागरूकता के लिए नुक्कड़-नाटककार्यशाला-सेमिनार आदि भी आयोजित किए जाते हैं। संस्था में आज 52 वेतनभोगी स्टाफ हैंजिसमें से सत्तर फीसदी थर्ड जेंडर हैं। संस्था ने यौन-रोगएचआईवी आदि से संबंधित निःशुल्क जानकारी देने के लिए एक सहायता केंद्र भी खोला थाजहां ऐसे मरीजों को जरूरी जानकारी व काउंसलिंग की जाती थी।
भारतीय समाज में थर्ड जेंडर’ को आप कहाँ पाते हैं
यदि हम भारतीय समाज को धार्मिक व व्यावहारिक दोनों दृष्टि से देखें तो जहां धार्मिक दृष्टि से थर्ड जेंडर- किन्नरों को पवित्र और ऊंचा स्थान दिया गया है। लेकिन व्यवहार में थर्ड जेंडर को अत्यंत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को हासिये पर रखा गया है। वस्तुतः थर्ड जेंडर आज न्यूनतम मानवाधिकारों से भी वंचित है।   
थर्ड जेंडर को लेकर भारतीय व पाश्चात्य अवधारणा में क्या भिन्नताएँ हैं?  
भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को सामाजिक मान्यता और जेंडर की भूमिका में देखा जाता है। जबकि पश्चिम में केवल यौनिकता ही इसका मूलआधार रहा है। हमारी यौन प्रवृत्तियौन-व्यवहार या यौनिकता के आधार पर इस जेंडर को अलग रखा गया है। पर भारतीय समाज में सामाजिक मान्यता और सामाजिक जेंडर के हिसाब से थर्ड जेंडर को देखा जाता है। यूं कहें कि जहां पश्चिम में हमारी बुनियाद यौनिकता’ है वहीं भारत में हमारी बुनियाद जेंडर’ है। 
भारत में थर्ड जेंडर को कैसे वर्गीकृत किया गया है
भारत में वर्गीकरण सामाजिक और पारंपरिक आधार पर किया गया है। जबकि पश्चिम में सेक्सुअलिटी के आधार पर। वहाँ कई ट्रांस जेंडर बाइ-सेक्सुअलहोमो-सेक्सुअल होते हैं। पश्चिम में आठ प्रकार की यौनिकता के आधार पर वर्गीकरण किया गया है। जबकि भारत में यौनिकता के बजाय परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति के आधार पर यह वर्गीकरण हुआ है। थर्ड जेंडर में जो भिक्षावृत्ति के पेशे में शामिल हैं उन्हें हिजड़ा’ कहा गयाघरों में रहकर सामान्य लोगों की भांति जीवन-यापन करने वालों को ट्रांस-जेंडर’, जो शर्ट-पेंट में रहते हैं उन्हें कोती’ कहा जाता है। कुछ थर्ड जेंडर जो धार्मिक-आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हैंउसे जोगप्पा’ कहा जाता है। यहां मैं यह भी कहना चाहूंगी किथर्ड जेंडर के वर्गीकरण की भारतीय और पश्चिमी दोनों अवधारणा अपने आप में एकांगी है। यौनिकता और सामाजिक-सांस्कृतिक दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर ही हमारे साथ वास्तविक न्याय किया जा सकता है और इसी से हमारा समुचित विकास भी होगा।
आपकी नज़र में सेक्स सेक्सुअलिटी और जेंडर के बीच क्या फर्क है?
सेक्स तीन हैं- एक पुरूषदूसरा स्त्री  और तीसरा जिनके सेक्स अंगों का सही विकास नहीं हो पाया। ये तीन ही सेक्स मानते हैं हम लोग। जबकि सेक्सुअलिटी कई प्रकार की होती है। हो सकता है किसी को होमो-सेक्सुअलिटी पसंद आयेकोई विषम लैंगिक होकोई ट्रांस-जेंडर के साथ सेक्से करना पसंद करेंतो कुछ लोग ऐसे होंगे जो स्त्रीी-पुरूष दोनों के साथ समान रूप से सेक्सुअल संबंध बनाना पंसद करेंगे। इसके और भी बहुत सारे प्रकार हो सकते हैं। हम मानते हैं कि सेक्सप प्रकृति-प्रदत्त अवस्थाएं हैं। जबकि यौनिकता मनुष्य का यौन-व्यवहार है। यह प्रवाहमान होता है और बदल भी सकता है। आज का विषम-लैंगिक कल समलैंगिक हो जा सकते हैंआदि-आदि। कहने का अभिप्राय यह कियौनिकता परिवर्तनशील धारणा है। वहीं जेंडर’ समाज प्रदत्त हैसामाजिक निर्मिति है। इसके जरिये समाज आपकी स्थिति को निरूपित करता है। 
आमतौर पर थर्ड जेंडर के प्रति समाज का नजरिया कैसा रहता हैयानी समाज आपके साथ कैसा बर्ताव करता है?  
थर्ड जेंडर के प्रति हम लोग समाज की मिलीजुली प्रतिक्रिया देखते हैं। समाज के जिन लोगों का थर्ड जेंडर-किन्नरों के साथ पहले कभी अथवा लगातार मेल-जोल रहा हैवे बहुत जल्दी हमलोगों को एक्सेप्ट (स्वीकार) करते हैं। हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं। कई बार तो हमलोगों को एक दैवीय रूप में देखा जाता है। लेकिन समाज का एक बड़ा तबका ऐसा हैजो अपने कुछ पूर्वाग्रहों के कारण हमसे दूर भागता है। शायद थर्ड जेंडर का समाज से पर्याप्त मेल-जोल नहीं होने से वे एक झिझक के कारण हमें कबूल नहीं करते। इस प्रकार हम लोग समाज से दो भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं देखते हैं – एक बहुत साकारात्मक तो दूसरा अत्यंत ही नाकारात्मक-उपेक्षात्मक है। 
इसका मतलब यह हुआ कि थर्ड जेंडर को समाज मनुष्य’ के तौर पर कबूल नहीं करताया तो उसमें देवत्व’ ढूंढा जाता है या फिर उसे हंसी-व्यंग्य और अपमान का पात्र समझा जाता है!  
आपने सही कहाहमारे प्रति ये दोनों नजरिया समाज का रहता है। हमें या तो दैवीय शक्ति’ के तौर पर देखा जाता अथवा उपेक्षा व उत्पीड़न का पात्र समझा जाता है। और समाज का ये दोनों ही अतिवादी नजरिया हमारे विकास के लिए सही नहीं हैबल्कि सच कहें तो बाधक है। क्योंकि हम समाज में यदि बहुत ऊंचेपूजनीय रूप में माने जायेंगे तो भी हम समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पायेंगे। और यदि हम उपेक्षित हैंतो वह हमारे लिए कष्टदायक है ही। इसलिए हम चाहते हैं कि हमारे साथ भी बाकी लोगों जैसा समानता का बर्ताव हो। हमें भी समानतान्याय व अवसर की मुकम्मल गारंटी मिले। तभी थर्ड जेंडर का समुचित विकास हो सकेगा और हम समाज की मुख्यधारा से जुड़कर समाज के समुचित-संतुलित बदलाव-विकास में योगदान कर सकेंगे।
आमतौर पर थर्ड जेंडर के साथ पुलिस-प्रशासन का व्यवहार कैसा रहता है ?        
हमारे प्रति पुलिस का व्युवहार नकारात्म क ज्यांदा है। कई बार गंभीर मामलों में भी पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं करती। यहां तक कि एफआईआर दर्ज कराने जाने पर पुलिस स्टेआशन से हमें भगा दिया जाता है। खासकर रेलवे स्टेकशन में तो मारा-पीटा तक जाता है। कई बार 'असलीहो या 'नकलीकह कर पुलिस हमारे समुदाय के लोगों से कपड़े तक उतरवाती है। सोचिये महज़ एफआईआर लिखाने के पहले कितनी प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है। पीड़ित को पुलिस द्वारा दोबारा उत्पींड़ित किया जाता है। जबकि एफआईआर तो कोई भी लिखा सकता है। चाहे वह स्त्री  – पुरूष या थर्ड जेंडर ही क्यों न हो। इस स्थिति को देखते हुए हमने रायपुर में पुलिस के साथ वर्कशॉप किया थावहां थोड़ी स्थिति बदली है। लेकिन ज्यादातर जगहों पर पुलिस का हमारे प्रति अमानवीय व्यीवहार ही रहता है। पुलिस को हमारे प्रति अपना व्यवहार नकारात्मक नहीं रखना चाहिए। आख़िर हम भी तो इंसान ही हैंहमें भी दर्द होता है इससे।                               
जाहिर है कि थर्ड जेंडर मूलतः एक उत्पीड़ित सामाजिक वर्ग है। भारतीय समाज में दलित-आदिवासी और महिला आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं। इस मायने में अन्य उत्पीड़ित समूहों से थर्ड जेंडर कैसे अलग है
थर्ड जेंडर से इतर जिन समूहों के बारे में आप कह रहे हैंवे सचमुच उत्पीड़ित हैं। किंतु कहीं न कहीं इन समूहों को कानून व राज्य का संरक्षण प्राप्त है। अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए कई कानूनी प्रावधान और आयोग बने हुए हैंस्त्रियों के लिए भी इसी प्रकार की व्यवस्था है। यहाँ तक कि बच्चोंपशु-पक्षियों व पेड़-पौधों के संरक्षण-विकास की व्यवस्था है। पर हमारा दुर्भाग्य है कि किन्नरों के लिए कुछ भी नहीं है। वर्ष 2014 में हमें सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से पहचान मिला। जबकि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुगलकाल और उससे पहले थर्ड जेंडर को बराबर या समानांतर दर्जा प्राप्त था। हमलोगों ने अपने अध्ययन में पाया कि औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने किन्नरों को दुरावस्था की स्थिति तक पहुंचाया। अंग्रेजों ने ऐसे-ऐसे कानून बनायेजो किन्नरों को अपराधी ठहराता था। इसी काल में धारा-377 भी बना। आज हम इन काले क़ानूनों को बदलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार से हमलोगों का इस मसले पर संवाद चल रहा है। हमें उम्मीद है कि इन काले क़ानूनों को जल्द ही बदला जा सकेगा। इसलिए इस मायने में हमारी उपेक्षा अन्य सामाजिक वर्गों से भिन्न प्रकार की है।
आपकी बातचीत से लगता है कि थर्ड जेंडर की स्थिति में साकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। इन बदलावों की आप क्या वजहें मानती हैं?
इस बदलाव के दो-तीन कारण हैं। पिछले दो दशकों में मानवाधिकारों को लेकर देश में आयी जागरूकता एक बड़ी वजह है। पहले इस दिशा में लोग बात तक करने के लिए तैयार नहीं थे। दूसरा कारणदेश के साकारात्मक सोच रखने वालेजो हमारे प्रति संकीर्ण-नाकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखतेउनलोगों की भूमिका रही है। ऐसे लोगों ने हमारा साथ दिया है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने भी इस सूरत-ए-हाल को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
थर्ड जेंडर की संस्कृति पर कुछ प्रकाश डालिए...  
भारतीय वर्गीकरणजिसकी चर्चा मैंने आपसे कीजिन सामाजिक-सांस्कृतिक आधारों पर किया गया हैवही उनकी संस्कृति है। हिजड़ा समुदायजो भिक्षावृत्ति करता हैउसमें गुरू-शिष्य की परंपरा होती है। उसी प्रकार जो आध्यात्मिक-धार्मिक परंपरा से संबद्ध होते हैंउनके पहनावे भिन्न होते हैं। वे जापभजन-कीर्तन आदि करते हैं। जो लोग घरों में रहते हैंवे सामान्य लोगों की ही तरह जीते-रहते हैं।
पर्व-त्योहारों में भी इनमें आपस में भिन्नता रहती है क्या
हांपर्व-त्योहार भी इसी वर्गीकरण के आधार पर है। हिजड़ों के पर्व-त्योहार अलग हैं। ये गौचरा माता’ को मानते हैं। गुजरात में इनका तीर्थ-स्थल है। अंतिम संस्कार का भी इनका विधि-विधान अलग है। घरों में रहने वाले अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा के मुताबिक होली-दीवालीईद मनाते हैं। मंदिरों में रहने वाले मंदिरों की मान्य सांस्कृतिक परंपरा को मानते हैं। इस प्रकार थर्ड जेंडर की कोई सर्वमान्य विशेष परंपरा नहीं है।दुर्भाग्यवश समाज हिजड़ों की संस्कृति को देखकर पूरे थर्ड जेंडर की एक ही संस्कृति मान लेता हैजबकि ऐसा है नहीं।
कुछ लोगों को लगता है कि हिजड़ा समुदाय को बगैर मेहनत के काफी पैसे मिल जाते हैं। एक प्रकार से इन्हें मुफ्तखोर के बतौर देखा जाता है। आपकी प्रतिक्रिया...
हांभिक्षावृत्ति के द्वारा कुछ लोग आजीविका प्राप्त करते हैं। लेकिन हमलोगों ने जब इस पर सर्वेक्षण किया तो यह बात सामने आयी कि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। गांव-कसबों  में रह रहे थर्ड जेंडर के ज़्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दयनीय है। ये अत्यंत ही कम मजदूरी की दर पर अपना पेट पालतेइनके पास वोटर-कार्ड तक नहीं है। ये जहां श्रम करतेकार्य-स्थल पर भी भेदभाव के शिकार बनते हैं। कुछ-कुछ जगह हैजहां किन्नर समुदाय के लोगों ने संगठित तौर पर भिक्षावृत्ति जैसी चीज को बढ़ावा दिया है। लेकिन इनकी संख्या बहुत अधिक नहीं। आज अगर पूरे भारतवर्ष में थर्ड जेंडर की स्थिति का अध्ययन करें तो हम पायेंगे कि इनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत ही निम्न है। चूंकि समाज में भिक्षावृत्ति करने वाले दीख जाते हैंइसलिए लोगों को ऐसा लग सकता है। किंतु थर्ड जेंडर के इससे कई गुना ज़्यादा लोग हैंजो मेहनत-मजदूरी करके बड़ी कठिनाई से अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।
हिजड़ों के बारे में समाज में कई तरह की भ्रांत धारणा है। अक्सर यह कहा जाता है कि इनके जो गुरू होते हैंवे पूरे रुतबे और भोग-विलास की जिंदगी जीते हैं ! इस पर आपकी टिप्पणी...
यह सही है कि मठाधीशों के पास जब बहुत पैसा आ जाता है तो वे विलासिता का जीवन जीने लग जाते हैं। इनमें से कुछ लोग बहुत संपन्न हो भी गये हैं। आज दिल्लीइंदौरजबलपुररायपुर आदि कुछ शहरों में उनके अपने बड़े-बड़े फ्लैट हैं। रायपुर में तो लगभग आधे किलोमीटर का उनका कॉम्प्लेक्स हैजिसमें बड़ी-बड़ी दुकानें चलती हैं। यह जो उनकी संपत्ति और विलासिता है उसके पीछे समाज का वह नजरियाकि लोगों ने उन्हें देवत्व के तौर पर माना है। लोगों ने उन्हें पैसा देना शुरू कर दिया। इसी कारण वे लोग भी अपने इसी दैवीय रूप को बरकरार रखना चाहते हैं। उन लोगों ने अपना अलग-अलग घराना’ बना लिया है। एक-एक घराने में कई शिष्य होते हैंजिन्हें गुरू का निर्देश रहता है कि बाहर के लोगों से एक सीमा के बाद दूरी बनाए रखें। अपने बारे में ज्यादा जानकारी न दें और न ही लोगों से घुलें-मिलें। अगर कोई बात भी करना चाहे तो उनसे उन्हें गाली-गलौज करने की शिक्षा दी जाती है। इस तरीके से उनको ऐसे नियमों में बांधा जाता है। इन घरानों में कायदे-कानून इतने सख्त हैं जिसके चलते थर्ड जेंडर के सभी लोग वहां नहीं जा सकते। उन्हें जानवरों की तरह रखा जाता है। यह एक बहुत बड़ा सामाजिक दोष है। उनकी स्थिति को बदलकर ही इस समस्या को दूर किया जा सकता है।
इस सबके बावजूद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस समय बच्चे को तीसरा लिंग’ का होने के कारण उनके मां-बाप द्वारा परिवार-समाज से निकाल दिया जाता हैये गुरू-मठाधीश ही उन्हें संरक्षण देते हैं। उनका भरण-पोषण करते हैंउन्हें ठौर देते हैं। इन दोनों पहलुओं को हमें देखना चाहिए। क्योंकि जब इनके पास खाने को नहीं थाफुटपाथ पर रात बिताते थेआए दिन कुछ न कुछ अप्रिय घटनाएँ घटती थींतब उन्होंने ही सहारा दिया।
आज की तारीख में देशभर में किन्नरों पर काम करने वाले कितने संगठन सक्रिय हैं?
2009 तक तो केवल संगठन ही सक्रिय थे। 2011 में अखिल भारतीय स्तर पर काम करने के लिए एक नेटवर्क – ‘हमसफर’ का निर्माण किया गया। यह हर राज्य में जाकर वहाँ के किन्नरों को संगठित करने के साथ संगठन को एक संस्था का रूप देता है। आज भारत में उत्तर-पूर्व के राज्यों को छोड़करक्योंकि वहाँ किन्नर शेष भारत की तुलना में पहले से ही बेहतर स्थिति में हैंहर राज्य की राजधानी में एक संस्था का गठन किया जा चुका है। ये संस्थाएं किन्नरों के हितों की एडवोकेसी’ करते हैं और उन्हें संगठित भी। 
थर्ड जेंडर को लेकर भारत में अब तक क्या-क्या कानूनी प्रावधान किये गए हैं
अभी सर्वोच्च न्यायालय ने थर्ड जेंडर को मान्यता दी है। सामाजिक न्याय मंत्रालय की एक टीम ने कुछ-कुछ बिन्दुओं पर राज्य सरकारों को निर्देश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय और मंत्रालय द्वारा दिये गये निर्देशों पर अमल करने का दायित्व राज्य सरकारों का है। जिन राज्य सरकारों ने इन सुझावों पर अमल किया वहां थर्ड जेंडर को सुविधाएं मिलनी शुरू हुई है। जैसे तमिलनाडू में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बहुत पहले से ही थर्ड जेंडर के लिए अलग से अधिनियम है। वहां 2002 में ही इसके लिए बोर्ड का गठन हो चुका है। राजस्थान में भी कुछ-कुछ कानून आया है। छत्तीसगढ़ में अभी हाल ही में अलग बोर्ड का गठन किया गया है। किन्नरों के हितों के मद्देनजर देश के सभी राज्यों की सरकारों को चाहिए कि इस दिशा में त्वरित कदम उठायेँ। इस हेतु हमलोग विभिन्न राज्य की सरकारों से संवाद भी चला रहे हैं।
थर्ड जेंडर के सशक्तीकरण के लिए आप लोगों की प्रमुख मांगें क्या हैं?  
हमलोगों ने दो-तीन चीजें निर्धारित की हैं। पहला तो शिक्षा है। आजीविका है। न्याय के समक्ष समानता है। आर्थिक अवसरों में उन्नति की समानता है। कुछ अधिनियम हैंजिन्हें सभी राज्यों में लाया जाना चाहिए। सभी राज्यों में बोर्ड का गठन होना चाहिए। केंद्र स्तर पर भी अनुसूचित जाति-जनजातिमहिला आयोग आदि की भांति थर्ड जेंडर के लिए भी स्वतंत्र आयोग का गठन किया जाना चाहिए। इन मांगों को लेकर शासन से हमलोग लगातार बात कर रहे हैं। तीन राज्यों- छतीसगढ़महाराष्ट्र और तमिलनाडु की सरकार ने अपने यहां बोर्ड का गठन किया भी है। मध्यप्रदेश और बिहार में यह प्रक्रियाधीन है। यदि हमारी इन मांगों पर राज्य सरकारें समुचित ध्यान दें तो किन्नरों की दशा-दिशा बदल सकती है।
थर्ड जेंडर के शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिए सरकार को क्‍या कदम उठाने चाहिएजिस प्रकार सरकार द्वारा बोर्डिंग स्कूहलनवोदय विद्यालयसैनिक स्कूरल और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए अलग आवासीय विद्यालय चलाये जा रहे हैंक्याच किन्नजरों के लिए भी उसी प्रकार की अलग से व्येवस्था  होनी चाहिए?
यह जरूरी है कि हमलोगों के लिए अलग से आवासीय विद्यालय की व्यजवस्था् हो। हर राज्यस में थर्ड जेंडर के लिए कम से कम एक आवासीय विद्यालय हो तो तत्काल हमारी शिक्षा की जरूरतें पूरी हो सकती है। इस दिशा में केन्द्रय और राज्यी सरकार को यथाशीघ्र कदम उठाना चाहिए। थर्ड जेंडर के लिए ब्यूटीशियनटेलरिंगबागवानी आदि के प्रशिक्षण की भी व्यकवस्थाय सरकार को करनी चाहिए। ताकि इनके स्वरोजगार का रास्ता खुल सके।
देश में अब तक किन-किन प्रांतों में थर्ड जेंडर को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा दी गयी है?
अभी आरक्षण केवल तमिलनाडू राज्यश में ही मिल पाया है। बाकि राज्योंि में यह प्रक्रियाधीन है। केन्द्रं सरकार ओबीसी कोटे के भीतर थर्ड जेंडर को आरक्षण देने की बात कर रही है। लेकिन हम लोग कह रहे हैं कि जो अनुसूचित जाति-जनजाति से आये किन्निर हैंउन्हेंं उसी कोटे से आरक्षण दिया जाना चाहिए। हालांकि अभी यह विचाराधीन हैइस पर अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।
पिछड़े-दलितों के कोटे से थर्ड जेंडर को आरक्षण देने की स्थिति में इनसे टकराहट की स्थिति भी पैदा हो सकती है। आपको क्या लगता है? 
मुमकीन है कि टकराहटें हों। हमें इसका डर भी है। इसी कारण हम लोग यह मांग कर रहे हैं कि हमें अल्प संख्यडकों की भांति संरक्षण प्रदान किये जायें। जातिगत दायरे में हमारे लिए आरक्षण की व्यसवस्था होने से राजनीतिक समीकरण प्रभावित होंगेजिससे तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। हमलोग दीर्घकाल तक आरक्षण के बजाय मात्र 10-20 वर्षों तक संरक्षण देने की मांग कर रहे हैं। बीस वर्ष बाद सरकार हमारी स्थिति का अध्य यन करा ले और जरूरी समझे तो उसे समाप्त् कर दे।
देश में व्याप्त बेरोजगारीगरीबीविषमताभ्रष्टाचारमंहगाई और यौन-हिंसा जैसी गंभीर समस्याओं को आप बतौर ट्रांस-जेंडर किस रूप में देखती हैं?
हमारी लड़ाई इसी समाज में जाने की है। इसलिए हमारी प्राथमिकता है कि यह समाज हमें अपना माने। यही वजह है कि अभी हमलोग इन सवालों पर बहुत सोच नहीं पा रहे हैं। हमारी पहली कोशिश सामाजिक समानता लाने की है। पर हम इतना जरूर चाहते हैं कि जो अशिक्षागरीबीभ्रष्टाचारयौन हिंसा आदि समस्याएँ हैंवे दूर हों। क्योंकि ये समस्याएँ ऐसी हैं जो पूरे समाज को प्रभावित करने वाली हैं और निश्चित रूप से हमें भी। इन समस्याओं को लेकर हम केंद्र-राज्य की सरकारों से मांग करते हैं कि वे इसका सार्थक समाधान निकालें। सरकार अपने काम-काज में पारदर्शिता लाये। मानवाधिकारों की गारंटी हो। हम चाहते हैं कि सरकार वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हुए इन सवालों का समाधान करे। ये समस्याएँ खत्म होंगी तो हमारे हालात भी बदलेंगे।
आपकी सद-इच्छाएं वाजिब हैं। किन्तु सरकारें बनाने-चलाने वाली पार्टियों की खास विचारधारा व खास समूहों के प्रति प्रतिबद्धताएं होती हैंसत्ता में रहते हुए इनके नीति-व्यापार सबके सब इसी बिना पर निर्धारित होते हैं। 
मुख्यधारा की इन पार्टियों का अपना एजेंडा रहता हैजिसपर ये पार्टियां काम करती हैं। इन पार्टियों के एजेंडे में थर्ड जेंडर’ को आप कहाँ पाती हैं?
इस बार लोकसभा चुनाव के पहले हमलोगों ने मुख्यधारा की पार्टियों के मेनिफेस्टो’ में अपने सवालों को शामिल कराने का प्रयास किया था। दक्षिण भारत के विभिन्न राजनीतिक दलोंपश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस पार्टीकांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी ने हमारे सवाल को अपने चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल किया भी था। हमारे संपर्क के पूर्व भाजपा का घोषणा-पत्र छप चुका थाइसलिए उसमें यह शामिल नहीं हो पाया। शेष राजनीतिक पार्टियों से हमलोग समय से संपर्क नहीं कर पाये इसलिए उनके घोषणा-पत्र में हमारी बात शामिल नहीं हो पाई। लेकिन मैं यहाँ एक बात कहना चाहूंगी कि जब हम लोगों ने इन पार्टियों का घोषणा-पत्र देखा तो हमें नहीं लगा कि उनमें बहुत अंतर है। सभी विकाससुशासनशिक्षागरीबी पर बात करते हैं। इसलिए हमलोगों ने तय किया कि हम किसी पार्टी विशेष का पक्ष नहीं लेंगे। इसलिए हमलोग किसी दल को फॉलो’ करने अथवा उनपर टिप्पणी करने से बचते हैं। बावजूद इसके यह बात तो है किहमारी कोशिश रहनी चाहिए कि सभी दलों तक हम अपनी बात पहुंचाएं। इस बार हमलोग यह पूरे तौर पर नहीं कर पायेक्योंकि किन्नर समाज में पढ़े-लिखे लोगों का काफी अभाव है और संगठन में सक्रिय लोगों की संख्या भी अभी पर्याप्त नहीं है। लेकिन आगे हम इसकी कोशिश जरूर करेंगे। जो राजनैतिक दल हमारे लिए काम करेंगे हम उनके साथ हैं।
इन आदर्शवादी अपेक्षाओं के बावजूद इतना तो मानना पड़ेगा कि व्यवहारतः मुख्यधारा की ये पार्टियां /गठबंधन – एनडीए-यूपीए अंतिम तौर पर समाज में यथास्थितावाद बहाल रखने के लिए ही प्रयत्नशील हैं। ऐसी स्थिति में उत्पीड़ित समूहचाहे वह दलित-आदिवासी व महिला हो या फिर ट्रांस-जेंडरइनके हक-अधिकार की मुकम्मल गारंटी तब तक संभव नहीं हो सकती जब तक इस यथास्थितिवाद को पलटते हुए पूरे समाज का क्रांतिकारी-समता आधारित मूल्यों के आधार पर पुनर्संगठन न किया जाय। इसी रास्ते उत्पीड़ित समूहों को मनुष्य’ का दर्ज़ा भी हासिल हो सकेगा। क्या कहना चाहेंगी आप
इस बात को हमलोगों ने भी महसूस किया। अगर कोई राजनीतिक पार्टी है तो वह बहुत सारे लोगों का जिस चीज पर दबदबा हैउसी को साथ लेकर चलती है। जिनकी संख्या कम हैवे हमेशा उपेक्षित रह जाते हैं। हम इस बात को मानते हैं कि पार्टी वोट बैंक से चलती हैजिस सामाजिक समूह से ज्यादा वोट हासिल होता हैउसी को वे देखती हैं। यह चलता आ रहा है और शायद आगे भी बहुत दिनों तक चलेगा। इसलिए हमलोग दो दिशाओं में काम कर रहे हैं – राजनीतिक पार्टियों से भी संपर्क-संवाद कर रहे हैं और न्यायपालिका का भी दरवाजा खटखटा रहे हैं। वर्तमान में हम देख रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने कई बड़े मामले पर हस्तक्षेप किया है और सरकारों को भी फटकार तक लगाई है। इसे देखते हुए हमलोगों ने महसूस किया कि हम केवल राजनीतिक पार्टियों के भरोसे नहीं रहेंगे बल्कि न्यायपालिका की भी मदद लेंगे। हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। इसलिए हमलोगों ने तय किया है किकानूनी लड़ाई भी लड़ेंगे और लगातार विधायिका-कार्यपालिका के समक्ष अपनी मांगें भी रखेंगे।                          
                                                    संपर्क : 
डॉ. मुकेश कुमारपोस्ट डॉक्टोरल फ़ेलोआईसीएसएसआरमहात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालयवर्धा - 442005, महाराष्ट्र.मो.: 09431690824;                                           
 ई-मेल: drmukeshkumar.bgp@gmail.com 

डिसेन्ट कुमार साहूजूनियर रिसर्च फ़ेलोयूजीसीसमाज-कार्यमहात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालयवर्धा - 442005, महाराष्ट्र.मो.: 08855868445 ई-मेल: dksahu171@gmail.com 



Sunday, February 1, 2015

कुँवारी माँ(Single Mother) – आदिवासी स्त्री और हिंसा के नए रूप


-नरेश गौतम
समाज व्यवस्था के विपरीत आदिवासी समाज की अपनी एक अलग व्यवस्था रही है। एक जमाने में आदिवासी समाज में दो बातें मुख्य तौर पर देखी जाती थी। पहली उनकी अपनी सामुदायिक पंचायत और दूसरा गाँव से दूर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्षिक्षण के बतौर उनके युवागृह। पिछले दो-तीन दशकों में कुछ ऐसी स्थितियाँ-परिस्थितियाँ निर्मित हुई हैं कि अचानक से या कहें कि बड़े सुनियोजित तरीके से इन पर हमले हुए हैं और आज हालत यह है कि आदिवासी समाज की पहचान के ये दोनों प्रमुख आधार अब अपने अंतिम समय में महज कुछ अवशेषों के ज़रिए ही देखे-जाने-पहचाने जा सकते हैं। मुख्यधारा के बरक्स आदिवासी समुदाय का जीने का एक अलग जीवन-ढ़ंग और जीवन-दृष्टि थी जो अधिकाधिक समुदाय केंद्रित और अपने प्राकृतिक परिवेश के साथ आबद्ध थी लेकिन एक बनते हुए राष्ट्र-राज्य की ज़रूरतें और अधिकाधिक मुनाफ़े के लिए अधिकाधिक दोहन (चाहे वह व्यक्ति का हो या प्रकृति का) के नव पूंजीवादी रुझानों ने अपनी छोटी और अलग दुनिया में खुश इन समुदायों पर बाहरी हमलों को जन्म दिया। ये हमले भी दोतरफा रहे जहाँ एक तरफ इनके अलग एवं स्वायत्त सिस्टम को वाह्य प्रभावों की घुसपैठ ने कमजोर किया, वहीं इनकी सहजता-सरलता और खुलेपन का फायदा भी उठाया गया। घने जंगलों के भीतर जहाँ सड़कें-रेल जैसे आवाजाही के साधन न पहुँचते हों, वहाँ किसी बाहरी व्यक्ति के आसानी से न पहुँच पाने का अर्थ राष्ट्र-राज्य के न पहुँच पाने से भी था और इस तरह यह राष्ट्र के अंदर एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में बड़ी चुनौती भी था। पिछले डेढ़-दो सौ सालों में (औपनिवेशिक शासन और आज़ादी के बाद) राष्ट्र-राज्य के मजबूत होने के साथ ही इस चुनौती से निपटने के क्रम में इन पर हुए हमलों और इन इलाक़ों में यातायात साधनों के विकास को देखा जा सकता है। यद्यपि पिछले कुछ समय से इन हमलों में आई तेज़ी संकटग्रस्त पूंजीवाद को, यहाँ संसाधनों के रूप में दिख रही अथाह खनिज-सम्पदा एवं इन पिछड़े इलाकों के विकास के नाम पर वैश्विक आर्थिक मंदी से मुक्ति की उम्मीद के कारण भी है। कुल मिलाकर हमले बढ़े हैं चाहे वह विकास के नाम पर हों या फिर संस्कृति के नाम पर।    

इन हमलों में उनकी सामुदायिकता एवं स्वायत्तता को ख़त्म कर उनका मुख्यधारीकरण करना शामिल है, साथ ही उन्हें सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाना भी। इसी के तहत जहाँ उनकी सामुदायिक पंचायत पर पंचायतीराज व्यवस्था ने हमला किया, वहीं युवागृहों को अनैतिक एवं अ-सांस्कृतिक कह कर विकास के नाम पर वहाँ तक पहुँची मुख्यधारा की पूर्वाग्रही चेतना ने ख़त्म कर दिया। आदिवासी समाज के सांस्कृतिक मूल्यों पर गैर-आदिवासियों (मुख्य धारा समाज) ने जम कर आघात पहुँचाया। एक तरफ तो उन्होंने इसे असभ्यता और उच्छृंखलता कहा, वहीं दूसरी तरफ नैतिकता के छद्म से परे दैहिक संबंध बनाने की सहजता ने उन्हें अपनी दबी-छिपी यौन कुंठाओं के साथ इस तरफ आकर्षित भी किया। इस दोतरफ़े हमले ने दोहरा नुकसान किया। जैसा कि हम जानते हैं कि मुख्यधारा के बरक्स आदिवासी समाज एक अधिक मुक्त समाज रहा है और यहाँ पितृसत्ता के वैसे सुदृढ़ रूप भी नहीं दिखते लेकिन इनके संस्कृतिकरण के नाम पर जो कोशिशें हुईं, उसने यहाँ पितृसत्ता के नए रूप रचे-गढ़े हैं। चूंकि कोई भी संस्कृति हमेशा स्त्रियों की नैतिकता पर ही निर्मित होती है, इसलिए इनके संस्कृतिकरण ने एक ओर इन्हें मुख्यधारा नैतिकता की तरफ मोड़ा है और इनके पारंपरिक स्त्री-पुरुष संबंधों में बदलाव आया है, वहीं दूसरी ओर ये संस्कृतिकरण कोई ऐसी प्रक्रिया भी नहीं जो एकबारगी पूरी हो जाए। किसी जीवन-ढंग के सैकड़ों सालों से चले आ रहे अभ्यास कुछेक दिनों-महीनों-वर्षों में भूले भी नहीं जाते, इसलिए यौनिक खुलेपन का सामाजिक व्यवहार संस्कृतिकरण के साथ-साथ जारी रहा। यह तब तक समस्या नहीं बना जब तक कि उनके अपने सामुदायिक जीवन के पारंपरिक नियम-कानूनों में संस्कृतिकरण के मुख्यधारीकृत नैतिक मूल्यों ने जगह बनानी शुरू नहीं कर दी। आदिवासी समाज के लिए दैहिक संबंध कभी कोई टैबू नहीं रहे क्योंकि निजी संपत्ति, परिवार और विवाह को लेकर यहाँ की सामाजिक संरचना एवं मान्यताएं दूसरी हैं। कुछ समुदाय जो मातृवंशीय हैं, वहाँ बच्चों को माँ के नाम से जाना जाता है लेकिन जहाँ ऐसा नहीं है, वहाँ भी पिता के नाम को लेकर वैसी रूढ़ता नहीं है। बिना विवाह माँ बनना (कुँवारी माँ) यहाँ कभी कोई समस्या नहीं रही क्योंकि इसके बावजूद माँ और बच्चा दोनों ही समाज में सहज स्वीकार्य थे लेकिन मुख्यधारा के साथ इनकी अन्तरक्रिया ने सांस्कृतिक एवं नैतिक मान्यताओं को बदला है। विवाह की अनिवार्यता और अवैधता की धारणाओं ने इस समाज में भी अब अपनी जगह बना ली है और इसलिए अब यह एक समस्या के रूप में हमारे सामने है।

यद्यपि इसकी शुरुआत तभी हो गयी थी, जब कानून-व्यवस्था का इनके निजी जीवन में दखल शुरू हुआ। पहले आदिवासियों की परंपरा के सरोकार जंगलों से जुड़े थे। जंगल अपने थे, व्यवस्था अपनी थी और सरकार भी अपनी थी। वे जंगलों में रहते थे, कुदरत के भरोसे जल-जंगल-जमीन के साथ ज़िंदगी जीते थे और उनके लिए ही संघर्ष करते हुये मर जाते थे। लेकिन एक समय ऐसा आया जब जंगल के व्यापारिक महत्व को तो समझते हुए, पर आदिवासियों की मानसिकता और उनकी भावनाओं को नज़रअंदाज़ करते हुए सरकार ने जंगल से जुड़े जो कानून बनाए, उसकी आदिवासियों की हालत को बदतर बनाने में एक बड़ी भूमिका रही। इन कानूनों के अंतर्गत आदिवासियों का जंगल में जाना अपराध घोषित हुआ और जंगलों को सभ्य समाज के लिए संरक्षित किया जाने लगा। जंगल से बाहर जो रोजगार थे, उन पर बाहरी (मुख्य धारा के) लोगों का कब्जा था। इस तरह अब यह आदिवासियों की लाचारी हो गयी कि वह जंगल से बाहर रोजगार देखें और बाहर के लोगों के सामने हाथ फैलाएं। लोगों ने उन्हें काम तो दिया लेकिन काम के बदले उनसे कुछ और भी अपेक्षाएं की। आदिवासी स्त्री के लिए दैहिक संबंध एक बहुत ही स्वाभाविक सा व्यवहार है। उस समाज में जहाँ ऐसी मानसिकता थी कि दैहिक संबंध बनाना पाप नहीं है, इससे वन देवी नाराज हो सकती है, तो इस कारण वहाँ बड़ी सहजता के साथ उन युवतियों ने बाहर के लोगों से संबंध बनाए। इसके बदले उन्हें रोटी मिलती थी, रंगीन कपड़े मिलते थे और सौंदर्य सामग्री भी। ये तमाम उपहार वे सहज स्वीकार करते गए। 'विकास' के नाम पर इस सहजता का 'विकास' करने वाले लोगों ने भरपूर लाभ उठाया और इस तरह आदिवासी स्त्रियाँ खुले सेक्स संबंधों की प्रतीक बन गईं। सड़कों के विकास ने इसे और मजबूती दी। साथ ही वस्तु विनिमय के स्थान पर अब संग्रहणीय रुपए ने इन मुसीबतों को और बढ़ा दिया है। चूंकि आदिवासी समाज में स्त्रियाँ रीढ़ होती हैं और घर-बाहर के कामों में उनकी समान भागीदारी होती है जबकि मुख्यधारा समाज अपनी स्त्रियों को घरों में रखते हुए बाहरी दुनिया की इन महिलाओं के साथ इनकी 'यौन उन्मुक्तता' एवं 'आसान उपलब्धता' की अपनी पूर्व धारणाओं के साथ अन्तरक्रिया करता है और इस तरह अपनी यौन कुंठाओं के लिए इन्हें एक 'सॉफ्ट टार्गेट' के रूप में देखता है। यह एक नयी तरह की हिंसा है जो मुख्यधारा समाज के पुरुष और आदिवासी समुदाय की स्त्री के बीच उनके असमान एवं हायर्रिकल संबंधों से पैदा होती है।

महाराष्ट्र का ऐसा ही एक जिला यवतमाल है। इस जिले की तालुका झरीजामणी में आधे से भी अधिक आबादी आदिवासियों की है जिनमें मुख्यतः कोलाम, गोंड, परधान, जनजाति के लोग निवास करते हैं। पिछले कुछ वर्षों से यहाँ कुँवारी लड़कियों के माँ बनने की काफी घटनाएँ सामने आ रही हैं। झरीजामणी तालुका में 55 ग्राम पंचायत आती है। इन 55 ग्राम पंचायतों में अब तक 216 से भी अधिक लड़कियाँ कुंवारी माँ बन चुकी हैं। वैसे तो आदिवासी समाज में कभी भी कुवांरी माँ बनने में हीनता नहीं थी,  लेकिन जैसे-जैसे आदिवासी समुदाय मुख्यधारा के साथ विकास की प्रक्रिया में आ रहा है, वैसे ही उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताएं भी बदल रही हैं और इसी क्रम में अब तक जिसे प्रजनन की सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया माना जाता था, उसे अब इस समाज ने भी अपराध की श्रेणी में गिनना शुरू कर दिया है। मुख्यधारा समाज में बिना ब्याह के किसी लड़की के माँ बनने का मतलब ही है कि वह चरित्रहीन है,  कुलटा है और इसे एक अपराध की ही तरह देखा जाता है। अब यही धारणा मुख्य समाज के संपर्क में आने से आदिवासी समाज की भी बनने लगी है। सिर्फ यही नहीं मुख्यधारा की तरह ही इस तथाकथित अपराध की सज़ा के बतौर स्त्री का सामाजिक बहिष्कार और बच्चे को अवैध कह कर बहिष्कृत कर दिया जाता है। वह गाँव में अपने परिवार के साथ नहीं रह सकती, किसी महामारी की तरह ही उसे गाँव के बाहर कर दिया जाता है। कुछ इस तरह कि जैसे वह यहाँ रहेगी तो और भी लोगों को यह बीमारी हो सकती है। यह सामाजिक बेदख़ली और आधारहीनता उसे और भी शोषित एवं प्रताड़ित होने को विवश करती है।
 
झरीजामणी तालुका में अब तक 216 महिलाये कुँवारी माँ बन चुकी है। उन्हें माँ बनने के बाद घर तक नसीब नहीं है। कुछ-कुछ लड़कियाँ तो दो से तीन बार माँ बन चुकी है। पंचायत में इस तरह का कोई केस सामने आने पर ऐसा है कि अगर वहाँ की पंचायत चाहे तो उस व्यक्ति से शादी करा दे और यदि न चाहे तो लड़की को ऐसे ही बच्चे को जन्म देना होगा। इस संबंध में अभी तक एक भी केस पुलिस में नहीं गया है। यदि कोई लड़की अपने ही समाज में प्रेम करती है और उससे बच्चा होता है तो पंचायत उसे शादी के लिए कहती है लेकिन बहुत से ऐसे भी मामले है जहाँ बाहर से लोग आकर लड़कियों को बहला-फुसला कर अपना शिकार बनाते हैं और उसके बाद वह जीवन भर उसे ढोती रहती है। परंतु यह घटना सिर्फ किसी एक यवतमाल की ही नहीं है बल्कि जहाँ-जहाँ आदिवासियों को जंगल से निकाला जा  रहा है और जंगलों को पर्यटकों के लिए संरक्षित किया जा रहा है, वहाँ ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। वह मामला चाहे यवतमाल के झरीजामणी का हो या उड़ीसा के कालाहांडी, बेलगीर, माल्कनगिरि या उत्तर प्रदेश के सोनभद्र का, सभी जगह एक जैसी ही स्थितियाँ है। सभी जगह आदिवासियों को जंगल से निकाला जा रहा है, जंगलों को संरक्षित किया जा रहा है, रिजॉर्ट बनाए जा रहे हैं और उन्हीं जगहों पर आने वाले लोग भोली-भाली लड़कियों को अपने भोग-विलास का साधन भी बना रहे हैं। दूसरी तरफ वही लोग, वही समाज उन्हें अपराधी भी ठहरा रहा है। वहाँ न तो ये घटनाएं सरकारी महकमे को दिखायी देती हैं और न ही समाज के ठेकेदारों को। वैसे गौर करें तो जिस विकास के नाम पर इस तरह के कृत्य शुरू हुए हैं, वह विकास अपनी अवधारणा में पश्चिम से आयातित है और वहाँ सिंगल मदर कोई अनोखी या आपराधिक चीज़ नहीं है, बल्कि इसे पूर्ण सामाजिक मान्यता प्राप्त है। दूसरी तरफ यहाँ भारत में विकास का पैमाना तो पश्चिम से तय किया जा रहा है, लेकिन सामाजिक संबंधों में आज भी वही जाति-धर्म आधारित उच्च वर्ग और निम्न वर्ग को मान्यता दी जाती है और वही सड़े-गले संस्कार हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं दिखाई देता।
सवाल सिर्फ ये नहीं है कि यवतमाल की उन 216 कुँवारी माँओं और उनके बच्चों या सोनभद्र से लेकर उड़ीसा तक जंगलों में रह रहे आदिवासी जो अपनी समस्याओं को लेकर ऐसे ही दोराहे पर खड़े हैं, का क्या होगा या होना चाहिए? सवाल ये भी नहीं है कि आदिवासी समाज की सामुदायिकता, रीति-रिवाज, जीवन-ढंग और संसाधनों पर हमले बढ़े हैं और इन्हें बंद होना चाहिए? सवाल इससे कहीं ज्यादा गहरे और व्यापक हैं और वो यह कि क्या हम एक समाज के रूप में कभी अपने से अलग और ठीक विपरीत चीज़ों को भी बर्दाश्त करने की काबिलियत हासिल कर सकेंगे या नहीं? या कि हायरार्कीज (पदानुक्रमता) पर टिकी सत्ता-संरचनाएं जो हमेशा ही हिंसा के नए-नए रूपों को जन्म देती हैं, वहाँ इन सत्ता-संरचनाओं को ख़त्म किए बिना क्या हम एक अहिंसक समाज के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकते हैं क्या? क्योंकि हमारा दावा तो यही है लेकिन हमारी ज्यादातर कोशिशें इसी संबंध में की जा रही बेमतलब की उछल-कूद जैसी ही हैं।     

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नरेश गौतम

76, गोरख पाण्डेय हॉस्टल
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा