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Saturday, April 28, 2018

तीन दिवसीय बा-बापू 150वीं जयंती तैयारी बैठक का दूसरा दिन

वर्धा 27 अप्रैल. पीसफुल सोसाइटी, गोवा के किशन के द्वारा मुरारी शरण द्वारा रचित ‘नदियाँ धीरे बहो’ गीत गायन से दूसरे दिन के सत्र का प्रारंभ हुआ. सत्र के प्रारंभ में डॉ. मुकेश कुमार ने 26 अप्रैल की पूरी चर्चा का संक्षिप्त सार पेश किया. उसके उपरांत कलानंद मणि ने गाँधी के रचनात्मक कार्यक्रमों के आलोक में सात मुद्दों पर समूह चर्चा हेतु सात समूह प्रस्तावित किया.
सामाजिक
आर्थिक
शैक्षणिक
आरोग्य
एकादश व्रत
गाँधी के विचारों-मूल्यों-प्रयोगों पर शोध
गाँधी के विरुद्ध होने वाली बातों का सार्थक उत्तर स्वरूप गतिविधियाँ
कौमी एकता,
अस्पृश्यता निवारण,
महिलाएं,
आदिवासी
आर्थिक समानता,
खादी,
ग्रामोद्योग,
किसान,
मजदूर

बुनियादी तालीम,
राष्ट्रभाषा,
मातृभाषा,
प्रांतीय भाषा,
वयस्क शिक्षा

आरोग्य की शिक्षा,
नशाबंदी,
ग्रामीण स्वच्छता,
कुष्ट रोग निवारण,
एड्स निवारण 
सत्य,
अहिंसा,
अस्तेय,
ब्रह्मचर्य,
अपरिग्रह,
स्वदेशी,
अभय,
सर्वधर्म समभाव, अस्पृश्यता निवारण, शरीर श्रम, अस्वाद



·      ग्रामीण उद्योग को बढ़ावा मिलना चाहिए. आज सारी चीजें बड़े उद्योगों में पैदा हो रही हैं. जबकि आम लोगों की ज़रूरतों के ज्यादातर सामान गाँव में बनाया जा सकता है.·      खादी एक वस्त्र ही नहीं विचार भी है. यह विकेन्द्रित उद्योग में बनता है. हर गाँव में खादी बनने का कार्य हो, इसका डिजाईन तैयार हो. सरकारी संस्थानों में इसके उपयोग को बढ़ावा मिले. खादी के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था हो.आर्थिक मुद्दे पर समूह चर्चा की रिपोर्ट :
·      आज बीज, खाद व कीटनाशक आदि पर बाज़ार का नियंत्रण हो चुका है. किसानों के पास से यह सब छिन गया है. किसानों को अनाज उत्पादन का वाजिब मूल्य नहीं मिल पा रहा है. किसानों के हितों को संरक्षण मिलना चाहिए.
·      मजदूर का शोषण न हो.
·      आर्थिक असमानता दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि संपत्ति रखने की सीमा निर्धारित होनी चाहिए.
               
सामाजिक मुद्दे पर समूह चर्चा की रिपोर्ट :
·      देश विभिन्न जाति, धर्म, सम्प्रदाय में सदियों से बंटा रहा है. आज साम्प्रदायिकता बढ़ती जा रही है इसके राजनीतिक कारण हैं.
·      धर्म, जाति के चुनावी इस्तेमाल पर रोक लगानी चाहिए.
·      भारतीय संविधान में दी गयी धार्मिक स्वतंत्रता के दुरुपयोग पर रोक लगे.
·      भारतीय संविधान की पुस्तक को घर-घर तक पहुँचाना होगा तभी अधिकारों और कर्त्तव्यों के प्रति जागरूकता आएगी.
·      अस्पृश्यता कोई वैज्ञानिक-तार्किक आधार नहीं है, यह एक किस्म की अंधश्रद्धा है. यह सामाजिक असमानता को बढ़ावा देती है. इसको खत्म करने के लिए कानून बने और इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए.
·      अंतरजातीय विवाह आदि को बढ़ावा देना चाहिए.
·      आदिवासियों की भाषा को संरक्षण दिया जाये. उनके बच्चों को स्कूली शिक्षा उन्हीं की मातृभाषा में दी जानी चाहिए. आदिवासियों का वनों पर अधिकार सुनिश्चित किया जाना चाहिए.
·      महिलाओं के बराबरी के अधिकार को लागू किया जाए. घर के बाहर या अंदर दोनों ही जगहों पर महिलाओं को समान अधिकार मिलना चाहिए.

शिक्षा के मुद्दे पर समूह चर्चा की रिपोर्ट :

·      बुनियादी शिक्षा / तालीम को फिर से शुरू किया जाना चाहिए :
शिक्षक शिक्षण में गाँधी दर्शन का दृष्टिकोण और उसके आधार पर मोड्यूल के निर्माण में अध्यापकों की भूमिका होनी चाहिए. शिक्षकों का गाँधी साहित्य के साथ परिचय कराया जाना चाहिए. नई तालीम की अनुसंधानपरक प्रस्तुति. शैक्षिक वातावरण में असहमति के लिए जगह होनी चाहिए. गांधीजी की नई तालीम से असहमति नहीं है किंतु नई तालीम में समयानुरूप बदलाव भी जरुरी है. सेवापूर्व शिक्षकों को नई तालीम से परिचय कराया जाए. निशुल्क शिक्षा की गारंटी हो. मातृभाषा में शिक्षा मिले. उत्पादकता से छात्र जुड़ें. प्रत्येक विश्वविद्यालय ने केंद्र सरकार के निर्देशानुसार पाँच गावों को गोद लिया है. उन गावों में स्थित सरकारी प्राथमिक विद्यालय एवं माध्यमिक विद्यालयों में विश्वविद्यालय को जोड़ा जाए.

·      वयस्क शिक्षा :
वयस्क शिक्षा के लिए पूर्व में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा योजना लायी गयी थी उस योजना को पूर्ववत लागू करने का प्रस्ताव है ताकि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय अपने-अपने क्षेत्रों में वयस्क एवं सतत शिक्षा के लिए नीति आधारित कार्य कर सकें.

·      प्रांतीय भाषा :
प्रांतीय भाषाओं में उपलब्ध गांधीवादी साहित्य और देशज ज्ञान पर आधारित साहित्य का अनुवाद हिंदी में उपलब्ध कराया जाए और हिंदी, अंग्रेजी तथा अन्य प्रादेशिक भाषाओं के साहित्य का अंतर अनुवाद भी किया जाए. इसके लिए कार्यशालाओं, परिचर्चा, वाद-विवाद, निबंध एवं अन्य समावेशी कार्यक्रमों का आयोजन ग्रामीण एवं शहरी स्तरों पर किया जाए जिसमें राज्य एवं केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को जिम्मेदारी दी जाए. बा-बापू पर आधारित साहित्य का रेडियो, नाटक, डोक्युमेंट्री एवं फिल्म निर्माण एवं प्रदर्शन के लिए कार्यक्रम बनाया जाए. प्रांतीय भाषाओं में जो भी आदिवासी भाषाओं में प्राप्त ज्ञान के संरक्षण के लिए उन भाषाओं का जतन किया जाए.

राष्ट्रीय भाषा :

राष्ट्रीय भाषा के साथ प्रांतीय भाषा की टकराहट का समाधान किया जाना चाहिए. भाषाई अस्मिता और टकराहट को सांस्कृतिक गतिविधियों द्वारा समझने और समझाने की कार्य योजना बनाई जाए. समस्त राज्यों के बीच मानव संसाधन एवं विकास विभाग-एमएचआरडी ने ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ कार्यक्रम की योजना प्रारंभ की है, उसमें गाँधी विचार का अंतर्भाव किया जाए अथवा ‘बा-बापू’ यात्रा कश्मीर से कन्याकुमारी तक के विविध राज्यों के विद्यार्थियों के नेतृत्व में निकाली जाए.
·      कलानंद मणी ने सुझाव दिया कि 30 जनवरी 2019 से भारत के कोने-कोने से एक यात्रा निकले जो 2 अक्टूबर 2019 को एक स्थान पर एकत्रित हो.

इस समूह में डॉ.शाहिद अली, डॉ.ऋषभ कुमार मिश्र, डॉ.धर्मेन्द्र शंभरकर, डॉ.राजेश लेहकपुरे, डॉ.अनुपमा कुमारी, रेहाना तबस्सुम, रफीक अली एवं संदीप मधुकर सपकाले शामिल थे.

समूह चर्चा के बीच सुरेश शर्मा द्वारा निर्देशित डाक्यूमेंट्री प्रदर्शित की गई. इसमें महात्मा गांधी के दांडी मार्च से लेकर सेवाग्राम आश्रम के बारे में संक्षेप में दिखाया गया है.

स्वास्थ्य समूह चर्चा :

क्या हम पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धति के प्रयोगों के बारे में अध्ययन कर सकते हैं?
एकादश व्रत समूह चर्चा की रिपोर्ट :

·      विश्व अहिंसा के 10 वर्षों के कार्यक्रमों का दस्तावेजीकरण हो, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों द्वारा किया गया हो.
·      वैयक्तिक हिंसा से वैश्विक हिंसा के माहौल को अहिंसा के माध्यम से शमन हेतु संकल्पित समाज बनाया जाना चाहिए.
·      ऐसे प्रभावी माध्यमों का उपयोग करते हुए सत्य के प्रयोग के प्रति माहौल तैयार किया जाना चाहिए.
·      एकादश व्रत के लोक व्यापीकरण हेतु सक्षम समूहों को तैयार करते हुए समाज में शिक्षण प्रबोधन की श्रृंखला चलाई जाए.
·      एकादश व्रत को सार्वजानिक कार्यक्रमों के पूर्व प्रस्तुत किया जाए.
·      प्रार्थना का भाव हमारे व्यक्तिगत एवं सार्वजानिक जीवन में अंगीकृत एवं उसका प्रकटीकरण हो.
·      संविधान की अनुसूची-8 में वर्णित सभी भाषाओं में मंगल प्रभात का अनुवाद हो.
·      एकादश व्रत को केवल उपदेशात्मक न होकर व्यावहारिक रूप में क्रियान्वित किया जाए.
गांधी को लेकर भ्रांतियां पर समूह चर्चा की रिपोर्ट :

विरोध:
·      भारत विभाजन का जिम्मेदार.
·      मुसलमानों के प्रति अधिक उदार होना.
·      दलित विरोधी थे.
·      पुणे एक्ट के सम्बन्ध में.
·      नेहरु के प्रति मोह और पटेल के प्रति द्वेष.
·      गैर वैज्ञानिक विचारधारा.
·      गांधीजी के ब्रह्मचर्य पर सवाल.
·      पूंजीपतियों के पक्षधर.
·      भगत सिंह को नहीं बचाया

जवाब :
·      ब्रिटिश सरकार हिन्दू मुस्लिम एकता को तोड़ना चाहती थी.
भारत के विभाजन में हिन्दू संगठन एवं मुस्लिम लीग या संगठन की अहम् भूमिका थी. गांधी ने जाति व धार्मिक संघर्षों को रोकने में भूमिका अदा की.
·      उदारता दुर्गुण नहीं, बल्कि सदगुण है. मुसलामानों के प्रति ही उदार नहीं वरन सभी दलित एवं पिछड़ों के प्रति सद्भाव होना चाहिए.
·      गांधी ने वर्ण व्यवस्था को समाप्त करने हेतु विशेष कार्य किया.
·      सवाल करने वालों से सवाल किया जाए उन्होंने समाज व देश के लिए क्या किया? आलोचना करना बहुत आसान है.


शोध में गांधी समूह चर्चा की रिपोर्ट :

सिनेमा में गांधी का अभिग्रहण
गांधी पर फिल्म/डाक्यूमेंट्री बने
शोध उपकरण के रूप में सिनेमा का प्रयोग किया जाए.
Gandhi in popular culture.
संकेत के रूप में गांधी
गांधी वांगमय की भूमिका का संकलन/संपादन
गांधी की आलोचनाओं की समीक्षा.
गांधी के समकालीन लोगों के कृतित्व को सामने लाना.
गांधी-लोहिया : प्रो. मनोज कुमार
गांधी-भगत सिंह : डॉ. अमित राय
गांधी अंबेडकर : डॉ. अमित विश्वास  
पूना पैक्ट : शैलेश
जे.पी. : सुरेश शर्मा
टैगोर : अमरेन्द्र कु. शर्मा
नेहरु : शम्भू जोशी
मीरा : सुप्रिया
सुभाष : चित्रा

कस्तूरबा की समकालीन महिलाओं का इतिहास लेखन
सुशीला नैय्यर : सुप्रिया

·      युवाओं के लिए प्रेरक प्रसंग
·      2 क्रेडिट का पाठ्यक्रम ugc द्वारा गांधी पर सुनिश्चित किया जाए
·      देश के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का सम्मलेन
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विश्वविद्यालय काशी,गुजरात –एक कार्यक्रम –एक बैठक- GSDS
·      गांधी वादी संस्थाओं पर शोध का कार्य हो.
·      MGCU गांधी कार्यक्रम प्रारम्भ करे.
·        गांधी को नाटक में, साहित्य में , डाक्यूमेंट्री आदि के साथ अनिवार्य रूप से लाना चाहिए
·      culture of peace व सत्याग्रह 2018-2019 को घोषित किया जाए
·      गांधी के शैक्षणिक प्रयोगों पर शोध हो.
·      हिंसा व प्रतिरोध के बदलते स्वरूप में गांधी
·      गांधी दर्शन में पुनर्चर्चा व उन्मुखीकरण
·      विदेशों में गांधी कार्य हेतु धनराशि एवं सहयोग
·      विदेशों में गांधी कार्य


कलानन्द मणि ने सूचित किया कि पूना में किसानों का संगठन बना है जिसकी पहुँच सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचा रहा है.
बसंत भाई ने नयी दिल्ली में 1व 2 मई को प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति से बापू की 150 वीं जयंती होने जा रही वार्ता का ज़िक्र किया. 


Sunday, March 25, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के छठे दिन प्रतिभागियों के अलग-अलग समूहों के बीच हुई चर्चा


वर्धा, 24 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्यअध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के छठे दिन सेवाग्राम स्थित गांधी आश्रम का अवलोकन करते हुए सेगांव ग्राम का शैक्षणिक भ्रमण किया गया।
शनिवार को भोजनोपरांत सत्र का प्रारंभ हुआ। सत्र के प्रारंभ में डॉ. मिथिलेश कुमार ने शेष कार्यक्रम की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की। उसके उपरांत एनसीआरआई के डी. एन. दास ने चर्चा के लिए बाकी बचे दो समूहों को आमंत्रित किया। समूह चर्चा टीम ने खेती, किसानी और शिक्षा पर चर्चा की। चर्चा की शुरुआत डॉ. मुकेश कुमार ने की। चर्चा में डॉ. देवाशीष मित्रा ने ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था के इतिहास की संक्षिप्त चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत में कृषि अत्यंत ही विविधतापूर्ण इसलिए भारत में कृषि का कोई एकसमान पाठ्यक्रम नहीं बन सकता है। सभी राज्यों की भौगोलिक स्थिति में भी काफी भिन्नता है।

वहीं इस समूह के सदस्य डॉ. पार्थसारथी मल्लिक ने समूह चर्चा में कहा कि ग्रामीण समुदाय की बहुसंख्या कृषि पर निर्भर है। ग्रामीण क्षेत्र में कृषि की स्थिति बदहाल बनी हुई है। आज की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित नहीं रह गई है। लोग गाँव से पलायन कर रहे हैं। गाँव के लोगों को आज बिजली चाहिए, शिक्षा चाहिए, स्वास्थ्य चाहिए। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के चर्चित मेंढ़ा लेखा मॉडेल विलेज की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सबकुछ के बावजूद उस गाँव में शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी और वहाँ शिक्षा को लेकर जागरूकता का अभाव था। सरकारी शिक्षा व्यवस्था अत्यंत ही बदहाल है। निजी शिक्षा संस्थानों में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए संसाधन नहीं है। हर गाँव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। गाँव केन्द्रित पाठ्यक्रम विकसित करने की जरूरत है।

डॉ. देवाशीष मित्रा ने चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि शिक्षा की आदर्शवादी परिकल्पना को सरजमीं पर उतार पाना काफी मुश्किल है। डॉ. पार्थसारथी मल्लिक ने गांधी के बुनियादी तालीम की भी चर्चा की। डॉ. मुकेश कुमार ने गांधी के बुनियादी तालीम के हृदय, हाथ और मस्तिस्क के संतुलित विकास के सिद्धान्त और व्यवहार पर प्रकाश डाला। शोधार्थी नरेश गौतम ने कहा कि आज 'वन इंडिया वन प्लान' की कोशिश की जा रही है। जबकि भारत के अलग-अलग राज्यों में भूमि का वितरण अत्यंत ही असमान है, मुट्ठीभर हाथों में आज भी भूमि का ज़्यादातर हिस्सा है जबकि ज़्यादातर लोग खेत-मज़दूर हैं।
समूह ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि कृषि केन्द्रित पाठ्यक्रम बनना चाहिए। समूह ने यह बात स्पष्टता के साथ कहा कि पूरे भारत के लिए कृषि पर केन्द्रित कोई एक पाठ्यक्रम नहीं हो सकता, कृषि की विभिन्नता, भौगोलिक भिन्नता आदि का ख्याल रखते हुए ही कृषि का कोई पाठ्यक्रम विकसित व निर्धारित किया जाना चाहिए। समूह चर्चा टीम की प्रस्तुति के उपरांत उपस्थित प्रतिभागियों ने अपने-अपने सुझाव दिए। चर्चा के अंत में एनसीआरआई के डी.एन. दास ने भी अपनी बातें रखी।


महाराष्ट्र के वर्धा जिले के देवली ब्लाक के लोनी गाँव में किए जा रहे प्रयोग को सीएम फ़ेलो अतुल ए. राऊत ने प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि ग्राम परिवर्तन अभियान के तहत महाराष्ट्र सरकार राज्य के एक हजार गांवों की शिनाख्त कर उसे विकसित करने का कार्यक्रम चला रही है। फिलहाल 450 गाँव में काम करने हेतु 350 सीएम फ़ेलो बहाल किए गए हैं। 9 बड़े कॉरपोरेट घरानों के कॉरपोरेट सोशल रेस्पोन्सिबिलिटी के तहत इस कार्य को आर्थिक सहयोग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने हमें योजना बनाने और उसे लागू करने की एक साथ ज़िम्मेदारी दी है। गाँव के सामुदायिक स्वास्थ्य को लेकर चलाई जा रही योजना की उन्होंने विस्तृत चर्चा की। गाँव में आसपास के सहयोग से पुस्तकालय की व्यवस्था करने, कृषि के विकास आदि क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों पर भी उन्होंने विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला।
एनसीआरआई के डी.एन. दास ने ग्रामीण समुदाय के साथ सहभागिता बढ़ाने हेतु पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने हेतु महत्वपूर्ण सुझाव पेश किए। उन्होंने विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों को गाँव से जुडने, उनके बीच कार्य करने हेतु कदम बढ़ाने पर ज़ोर दिया। गाँव के लोगों से जुड़ते हुए सरकार द्वारा चलाई जा रही विकास योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू करने में शिक्षकों-विद्यार्थियों की भूमिका भी उन्होंने रेखांकित किया।

सत्र का अंत सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका के लिए गठित समूह ने नाट्य प्रस्तुति के जरिये सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवियों व छात्र-छात्राओं की भूमिका कॉ बेहतरीन ढंग से रेखांकित किया। इस समूह ने एक निरक्षर व्यक्ति को रोज़मर्रा की जिंदगी में आने वाली कठिनाइयों का चित्रण करते हुए शिक्षा की महत्ता को संवेदनशील ढंग से सामने लाने का प्रयास किया। शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने में सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व छात्र-छात्राओं की भूमिका को भी भली भांति चित्रित किया। समूह ने शिक्षा के सशक्त माध्यम के बतौर नाट्य प्रस्तुति की महत्ता पर भी प्रकाश डाला। इस समूह में टी. राजू, डॉ. विजय कुमार वाघमारे, डॉ. भरत खंडागढ़े एवं श्याम शर्मा शामिल थे। अंत में एनसीआरआई के डी.एन. दास ने इसपर अपने विचार व्यक्त किए। गजानन एस. निलामे द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र की समाप्ति हुई। 
 
रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, गजानन एस. निलामे, डिसेन्ट कुमार साहू

Wednesday, March 21, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के तीसरे दिन ग्रामीण स्वास्थ्य और कृषि समस्या पर हुई चर्चा



वर्धा, 21 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के तीसरे दिन के प्रथम चर्चा सत्र 'विश्वविद्यालयों का समाज से जुड़ाव की आवश्यकता' विषय पर गांधी ग्राम रुरल इंस्टीट्यूट तमिलनाडु एवं उत्तरप्रदेश के चित्रकूट विश्वविद्यालय के कुलपति रहे एग्रोइंडस, वर्धा के निदेशक प्रो. टी. करुणाकरण ने संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा और समाज के बीच गहरा अंतरसंबंध होता है। वर्तमान शिक्षा पद्धति किताबी हो गई है। भारत में शिक्षा व्यवस्था अत्यंत ही समृद्ध रही है। हमारे यहाँ प्राचीन भारत में नालंदा विश्वविद्यालय जैसा शिक्षा का विश्व प्रसिद्ध हुआ करता था। पुराने समय की गुरुकुल पद्धति में स्वावलंबी जीवन दर्शन की शिक्षा गुरु के सान्निध्य में दी जाती थी। नालंदा विश्वविद्यालय का समाज से गंभीर जुड़ाव था और विश्वविद्यालय समाज पर निर्भर था।
स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन विश्वविद्यालय बनाया था। वहाँ श्रीनिकेतन था, जो ग्रामीण समुदाय से जुड़ा हुआ था। जिसे उनके शिष्य जी. रामचंद्रन ने 'गांधीग्राम रुरल विश्वविद्यालय' के रूप में आगे विकसित किया था। उन्होंने कहा कि देश के मौजूदा विश्वविद्यालय अत्यंत ही बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं। विश्वविद्यालय ज्ञान का केंद्र है। इस ज्ञान का समाज के बदलाव-विकास में भूमिका होनी चाहिए। टैगोर और गांधी ने शिक्षा और समाज के बीच तालमेल स्थापित करने का प्रयास किया था। गांधी की बुनियादी शिक्षा पद्धति शिक्षा का बेहतरीन मॉडल है। शिक्षा को व्यवहारिक और प्रायोगिक दोनों होना चाहिए। सिद्धान्त और व्यवहार के बीच समुचित तालमेल आवश्यक है।
 उन्होंने टैगोर, गांधी के साथ-साथ उत्तरप्रदेश के चित्रकूट विश्वविद्यालय के शिक्षा मॉडल की चर्चा की। आदर्शवाद और व्यवहारिकता के बीच तालमेल की जरूरत को भी उन्होंने रेखांकित किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वर्तमान हालात को बदलने में शिक्षण शालाओं की भूमिका होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में लाखों ग्राम पंचायत हैं। किन्तु ग्राम पंचायतों के अधिकार और कर्त्तव्य की लोगों को कोई समुचित जानकारी तक नहीं है। पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित किए जाने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। विश्वविद्यालयों की इस कार्य में भूमिका हो सकती है। विश्वविद्यालयों का समाज को अपराधीकरण से मुक्त करने में तथा सामाजिक चुनौतियों के सार्थक समाधान में अहम योगदान हो सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को सृजनात्मक कार्य की तरफ बढ़ना होगा।
सत्र के अंत में प्रतिभागियों ने भी अपनी जिज्ञासा रखी जिसका समाधान विषय विशेषज्ञ ने किया। सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया और धन्यवाद एनसीआरआई के डी. एन. दास ने किया।

महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के डिपार्टमेन्ट ऑफ मेडिसिन के प्रो. प्रदीप देशमुख ने 'सामुदायिक सशक्तिकरण : पद्धति और तकनीक' विषयक चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि सामुदायिक सशक्तिकरण अत्यंत ही प्रचलित शब्द है। समुदाय के साथ अंतरसंबंध स्थापित करते हुए ही सामुदायिक सशक्तिकरण किया जा सकता है। समुदाय की जरूरतों की शिनाख़्त करते हुए उसे प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाना आवश्यक है। समुदाय के साथ अर्थपूर्ण ढंग से जुड़ाव के जरिए सामुदायिक सशक्तिकरण के लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है। सामुदायिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया में यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि सभी किस्म की शक्तियाँ समुदाय को अनिवार्य तौर पर हस्तांतरित हों। पीआरए प्रक्रिया की भी उन्होंने विस्तृत चर्चा की। सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया।

तीसरे दिन भोजनावकाश के उपरांत चर्चा सत्र में राष्ट्रीय संत तुकड़ोजी महाराज विश्वविद्यालय, नागपुर के राजनीति विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विकास जांभुलकर ने 'पॉलिसी प्लानिंग इन इंडिया' विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत में शहरी और ग्रामीण प्लानिंग अलग-अलग है। इसी कारण 'इंडिया' और 'भारत' की भी संकल्पनाएँ चर्चा में आती रहती हैं। प्लानिंग की पूरी प्रक्रिया में नौकरशाही की प्रधान भूमिका होती है और नौकरशाही के सोचने का अपना अलग ढर्रा होता है। प्लानिंग में विश्वविद्यालय महज बाजार की जरूरतों के अनुरूप वर्कर तैयार करने का केंद्र मात्र बनकर रह गया है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना 2016 से चल रही है। इससे पूर्व इंदिरा आवास योजना चलाई जा रही थी। अभी ग्रामीण क्षेत्र के लिए 1, 20,000 रुपए की राशि आवास के लिए दी जा रही है। दुर्गम क्षेत्र के लिए एक लाख तीस हजार रुपए दिए जाते हैं। इस योजना में 20 हजार घर बनाने वाले कारीगरों को वर्ष 2022 तक ट्रेनिंग दिए जाने की भी योजना है। उसी प्रकार मनरेगा योजना में वर्ष 2017-18 के लिए 48 हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस योजना के तहत कंक्रीट की सड़कें बनी है, गाँव को नजदीकी मुख्य सड़क से जोड़ा गया है। सरकार ने 'मेरी सड़क' नाम से एप भी शुरू किया है, जिसपर शिकायत दर्ज किया जा सकता है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर चलाई जाने वाली कई महत्वपूर्ण योजना, उसके निर्धारित लक्ष्य, योजना हेतु आवंटित की जाने वाली राशि आदि की विस्तृत चर्चा की। उन्होंने बताया कि दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल विकास योजना के 2 लाख लक्ष्य के विरुद्ध अब तक मात्र 83 हजार लोग ही प्रशक्षित किए जा सके हैं। और इसमें से मात्र 40 हजार लोगों को ही जॉब दिया जा सका है। उन्होंने योजनाओं के निर्माण के पीछे की राजनीति की भी चर्चा करते हुए कहा कि योजनाओं के निर्माण में लक्षित समूह का प्रतिनिधत्व ही नहीं होता, यह भारी कमी है।

तीसरे दिन के अंतिम चर्चा सत्र में विदर्भ के किसान आंदोलन एवं सर्व सेवा संघ से जुड़े चर्चित किसान नेता अविनाश काकड़े द्वारा भारत में कृषि परिवर्तन पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कृषि परिवर्तन को उच्च स्तर पर जाकर देखना होगा। समाज द्वारा कृषि को देखने के नजरिए को हमें समझना होगा। भारतीय कृषि पर यहाँ की जाति, वर्ग से लेकर आज के ग्लोबलाइजेशन आदि प्रक्रियाओं का असर पड़ा है। भारतीय कृषि व्यवस्था की समस्याओं को सरकार के सामने लाने का कार्य पहली बार ज्योतिबा फुले द्वारा 18वीं सदी में हुआ। उन्होंने 'किसान का कोड़ा' नामक अपनी पुस्तिका में जो समस्याएं बतायी थी वह आज भी अनुत्तरित है।
1930 के बाद की कृषि में कुछ खास परिवर्तन नहीं हुआ है। उस समय कृषि उत्पादन का मूल्यांकन उसी वर्ष के आधार पर होता था, जिस वर्ष फसल अच्छी होती थी। आंदोलनों से कृषि मुद्दे जुड़े थे, जैसे कि नील खेती का आंदोलन। ऐसे कई सारे मुद्दों की ख़ासी भूमिका आज़ादी आंदोलन में रही है। उन्होंने आगे कहा कि अंग्रेजों के समय में अंग्रेजों ने अपनी व्यवस्था के लिए यहाँ पाटिल, कुलकर्णी तथा देशपांडे जैसे वर्ग का निर्माण किया था किन्तु आज़ादी के बाद 'लगान' पद्धति को बंद कराया गया था, जिसके चलते कृषकों को 50% तक हिस्सा सरकार को देना पड़ता था।
उन्होंने आगे कहा कि सौ में से 99 फीसदी कृषकों में अपने व्यवसाय के प्रति अज्ञानता है। इसके कारण उनका बड़े पैमाने पर शोषण हुआ है। आज़ादी के बाद की सरकारों ने कृषि सुधार हेतु निम्न कार्य किए- जमींदारी उन्मूलन कानून, सीलिंग कानून, देश में कृषि उत्पादन की बढ़ोत्तरी हेतु प्रयास करना आदि कई महत्वपूर्ण कार्य किए गए थे। इन सभी मामलों को लेकर केंद्र व राज्य की सरकारों ने कई कार्य किया किन्तु जनसंख्या नियंत्रण जैसे चीज छुट गई। आज हम जितना उत्पादन कर रहे हैं उतने में ही काफी हो जाता, अगर हमने शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों पर ध्यान दिया होता। नतीजतन इतनी बड़ी जनसंख्या का भार कृषि पर पड़ने लगा और जमीन का छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटवारा होने लगा। 80 फीसदी कृषक अन्य भू-धारक के रूप में तब्दील हो गए। 2011 का एक सर्वे बताता है कि गांवों के 39 फीसदी लोगों के पास अब जमीन ही नहीं बची है। स्वतन्त्रता के बाद 4 फीसदी एरिगेशन को हम 40 फीसदी पर ले गए। 8 करोड़ हेक्टेयर एरिगेशन तथा बड़े बांधों से तथा 12 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर खेती की जा सकती है। लेकिन सुरक्षित खेती के लिए कम से कम 50 से 60 फीसदी एरिगेशन होना चाहिए। ऐसे में हमारा यह लक्ष्य एरिगेशन क्षेत्र का विस्तार करना होना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा 75 लाख हेक्टेयर जमीन के एरिगेशन का लक्ष्य रखा गया और 10-12 लाख हेक्टेयर ही अब तक पहुँच पाया है।

अंत में उन्होंने यह कहा कि जब हम सोचते हैं कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है तब हमें अपनी ओर देखना होगा। बिना शिक्षा के किसानों की समझ में नहीं आएगा कि हमें करना क्या है। हमारे साथ क्या हो रहा है? उचित शिक्षा से ही उनका विवेक जागृत हो सकता है। इसके बाद ही वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकेंगे। उन्होंने कहा कि भारत का विकास खेती के विकास के बगैर मुमकिन नहीं है। भारत की शुरुआती दो पंचवर्षीय योजनाएँ कृषि से संबन्धित रही है। 80 के दशक के पूर्व लोग नौकरी से ज्यादा खेती को प्राथमिकता देते थे। किन्तु आज स्थिति ऐसी होती जा रही है कि लोग खेत बेचकर चपरासी की भी नौकरी करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने आज़ादी के पूर्व भारत में हुए किसानों के आंदोलन का जिक्र किया। उन्होंने महात्मा फुले, महात्मा गांधी से लेकर अन्य नेताओं के योगदानों की चर्चा की। उन्होंने आज़ादी के बाद किसानों के हित में उठाए गए कदमों की भी विस्तृत चर्चा की। आज़ादी के बाद किसानों का लगान माफ कर दिया गया। पूर्व में अंग्रेज़ बड़े पैमाने पर किसानों से लगान वसूलते थे। उन्होंने कहा कि कृषक आज भी अपने व्यवसाय को लेकर, बाजार को लेकर अशिक्षित हैं। किसान आज कर्ज में डूबते जा रहे हैं। पूर्व में भी अंग्रेजी राज में किसान महाजनों के कर्ज में डूबकर अपनी जमीन गंवा बैठते थे। आज वे आत्महत्या करने पर विवश हैं।  
उन्होंने कहा कि भूमि उसी की होनी चाहिए जो कृषि का कार्य करें। विनोबा जी को 42 लाख एकड़ जमीन दान में मिली थी, किन्तु उसमें से आधी से ज्यादा खेती योग्य नहीं थी। केवल 12 लाख एकड़ जमीन ही वितरित हो पायी है। सरकार ने सीलिंग एक्ट बनाया, सीलिंग से फाजिल भूमि एक हद तक ही किसानों के बीच वितरित की जा सकी। भारत में कृषि के लिए आवश्यक सिंचाई व्यवस्था का अभाव आज भी बना हुआ है। यहाँ की ज्यादातर खेती मानसून पर निर्भर है। 1200 लाख हेक्टेयर भूमि असिंचित है जबकि सरकार का लक्ष्य मात्र 75 लाख हेक्टेयर सिंचित करने का ही है, जो 10 फीसदी से भी कम है। इस सत्र का संचालन डॉ. मुकेश कुमार ने किया और आभार ज्ञापन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया।

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, गजानन निलामे, नरेश गौतमडिसेन्ट कुमार साहू, सुधीर कुमारकुमारी आशु, माधुरी श्रीवास्तव, खुशबू साहू एवं सोनम बौद्ध.