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Wednesday, March 21, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के तीसरे दिन ग्रामीण स्वास्थ्य और कृषि समस्या पर हुई चर्चा



वर्धा, 21 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के तीसरे दिन के प्रथम चर्चा सत्र 'विश्वविद्यालयों का समाज से जुड़ाव की आवश्यकता' विषय पर गांधी ग्राम रुरल इंस्टीट्यूट तमिलनाडु एवं उत्तरप्रदेश के चित्रकूट विश्वविद्यालय के कुलपति रहे एग्रोइंडस, वर्धा के निदेशक प्रो. टी. करुणाकरण ने संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा और समाज के बीच गहरा अंतरसंबंध होता है। वर्तमान शिक्षा पद्धति किताबी हो गई है। भारत में शिक्षा व्यवस्था अत्यंत ही समृद्ध रही है। हमारे यहाँ प्राचीन भारत में नालंदा विश्वविद्यालय जैसा शिक्षा का विश्व प्रसिद्ध हुआ करता था। पुराने समय की गुरुकुल पद्धति में स्वावलंबी जीवन दर्शन की शिक्षा गुरु के सान्निध्य में दी जाती थी। नालंदा विश्वविद्यालय का समाज से गंभीर जुड़ाव था और विश्वविद्यालय समाज पर निर्भर था।
स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन विश्वविद्यालय बनाया था। वहाँ श्रीनिकेतन था, जो ग्रामीण समुदाय से जुड़ा हुआ था। जिसे उनके शिष्य जी. रामचंद्रन ने 'गांधीग्राम रुरल विश्वविद्यालय' के रूप में आगे विकसित किया था। उन्होंने कहा कि देश के मौजूदा विश्वविद्यालय अत्यंत ही बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं। विश्वविद्यालय ज्ञान का केंद्र है। इस ज्ञान का समाज के बदलाव-विकास में भूमिका होनी चाहिए। टैगोर और गांधी ने शिक्षा और समाज के बीच तालमेल स्थापित करने का प्रयास किया था। गांधी की बुनियादी शिक्षा पद्धति शिक्षा का बेहतरीन मॉडल है। शिक्षा को व्यवहारिक और प्रायोगिक दोनों होना चाहिए। सिद्धान्त और व्यवहार के बीच समुचित तालमेल आवश्यक है।
 उन्होंने टैगोर, गांधी के साथ-साथ उत्तरप्रदेश के चित्रकूट विश्वविद्यालय के शिक्षा मॉडल की चर्चा की। आदर्शवाद और व्यवहारिकता के बीच तालमेल की जरूरत को भी उन्होंने रेखांकित किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वर्तमान हालात को बदलने में शिक्षण शालाओं की भूमिका होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में लाखों ग्राम पंचायत हैं। किन्तु ग्राम पंचायतों के अधिकार और कर्त्तव्य की लोगों को कोई समुचित जानकारी तक नहीं है। पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित किए जाने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। विश्वविद्यालयों की इस कार्य में भूमिका हो सकती है। विश्वविद्यालयों का समाज को अपराधीकरण से मुक्त करने में तथा सामाजिक चुनौतियों के सार्थक समाधान में अहम योगदान हो सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को सृजनात्मक कार्य की तरफ बढ़ना होगा।
सत्र के अंत में प्रतिभागियों ने भी अपनी जिज्ञासा रखी जिसका समाधान विषय विशेषज्ञ ने किया। सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया और धन्यवाद एनसीआरआई के डी. एन. दास ने किया।

महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के डिपार्टमेन्ट ऑफ मेडिसिन के प्रो. प्रदीप देशमुख ने 'सामुदायिक सशक्तिकरण : पद्धति और तकनीक' विषयक चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि सामुदायिक सशक्तिकरण अत्यंत ही प्रचलित शब्द है। समुदाय के साथ अंतरसंबंध स्थापित करते हुए ही सामुदायिक सशक्तिकरण किया जा सकता है। समुदाय की जरूरतों की शिनाख़्त करते हुए उसे प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाना आवश्यक है। समुदाय के साथ अर्थपूर्ण ढंग से जुड़ाव के जरिए सामुदायिक सशक्तिकरण के लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है। सामुदायिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया में यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि सभी किस्म की शक्तियाँ समुदाय को अनिवार्य तौर पर हस्तांतरित हों। पीआरए प्रक्रिया की भी उन्होंने विस्तृत चर्चा की। सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया।

तीसरे दिन भोजनावकाश के उपरांत चर्चा सत्र में राष्ट्रीय संत तुकड़ोजी महाराज विश्वविद्यालय, नागपुर के राजनीति विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विकास जांभुलकर ने 'पॉलिसी प्लानिंग इन इंडिया' विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत में शहरी और ग्रामीण प्लानिंग अलग-अलग है। इसी कारण 'इंडिया' और 'भारत' की भी संकल्पनाएँ चर्चा में आती रहती हैं। प्लानिंग की पूरी प्रक्रिया में नौकरशाही की प्रधान भूमिका होती है और नौकरशाही के सोचने का अपना अलग ढर्रा होता है। प्लानिंग में विश्वविद्यालय महज बाजार की जरूरतों के अनुरूप वर्कर तैयार करने का केंद्र मात्र बनकर रह गया है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना 2016 से चल रही है। इससे पूर्व इंदिरा आवास योजना चलाई जा रही थी। अभी ग्रामीण क्षेत्र के लिए 1, 20,000 रुपए की राशि आवास के लिए दी जा रही है। दुर्गम क्षेत्र के लिए एक लाख तीस हजार रुपए दिए जाते हैं। इस योजना में 20 हजार घर बनाने वाले कारीगरों को वर्ष 2022 तक ट्रेनिंग दिए जाने की भी योजना है। उसी प्रकार मनरेगा योजना में वर्ष 2017-18 के लिए 48 हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस योजना के तहत कंक्रीट की सड़कें बनी है, गाँव को नजदीकी मुख्य सड़क से जोड़ा गया है। सरकार ने 'मेरी सड़क' नाम से एप भी शुरू किया है, जिसपर शिकायत दर्ज किया जा सकता है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर चलाई जाने वाली कई महत्वपूर्ण योजना, उसके निर्धारित लक्ष्य, योजना हेतु आवंटित की जाने वाली राशि आदि की विस्तृत चर्चा की। उन्होंने बताया कि दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल विकास योजना के 2 लाख लक्ष्य के विरुद्ध अब तक मात्र 83 हजार लोग ही प्रशक्षित किए जा सके हैं। और इसमें से मात्र 40 हजार लोगों को ही जॉब दिया जा सका है। उन्होंने योजनाओं के निर्माण के पीछे की राजनीति की भी चर्चा करते हुए कहा कि योजनाओं के निर्माण में लक्षित समूह का प्रतिनिधत्व ही नहीं होता, यह भारी कमी है।

तीसरे दिन के अंतिम चर्चा सत्र में विदर्भ के किसान आंदोलन एवं सर्व सेवा संघ से जुड़े चर्चित किसान नेता अविनाश काकड़े द्वारा भारत में कृषि परिवर्तन पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कृषि परिवर्तन को उच्च स्तर पर जाकर देखना होगा। समाज द्वारा कृषि को देखने के नजरिए को हमें समझना होगा। भारतीय कृषि पर यहाँ की जाति, वर्ग से लेकर आज के ग्लोबलाइजेशन आदि प्रक्रियाओं का असर पड़ा है। भारतीय कृषि व्यवस्था की समस्याओं को सरकार के सामने लाने का कार्य पहली बार ज्योतिबा फुले द्वारा 18वीं सदी में हुआ। उन्होंने 'किसान का कोड़ा' नामक अपनी पुस्तिका में जो समस्याएं बतायी थी वह आज भी अनुत्तरित है।
1930 के बाद की कृषि में कुछ खास परिवर्तन नहीं हुआ है। उस समय कृषि उत्पादन का मूल्यांकन उसी वर्ष के आधार पर होता था, जिस वर्ष फसल अच्छी होती थी। आंदोलनों से कृषि मुद्दे जुड़े थे, जैसे कि नील खेती का आंदोलन। ऐसे कई सारे मुद्दों की ख़ासी भूमिका आज़ादी आंदोलन में रही है। उन्होंने आगे कहा कि अंग्रेजों के समय में अंग्रेजों ने अपनी व्यवस्था के लिए यहाँ पाटिल, कुलकर्णी तथा देशपांडे जैसे वर्ग का निर्माण किया था किन्तु आज़ादी के बाद 'लगान' पद्धति को बंद कराया गया था, जिसके चलते कृषकों को 50% तक हिस्सा सरकार को देना पड़ता था।
उन्होंने आगे कहा कि सौ में से 99 फीसदी कृषकों में अपने व्यवसाय के प्रति अज्ञानता है। इसके कारण उनका बड़े पैमाने पर शोषण हुआ है। आज़ादी के बाद की सरकारों ने कृषि सुधार हेतु निम्न कार्य किए- जमींदारी उन्मूलन कानून, सीलिंग कानून, देश में कृषि उत्पादन की बढ़ोत्तरी हेतु प्रयास करना आदि कई महत्वपूर्ण कार्य किए गए थे। इन सभी मामलों को लेकर केंद्र व राज्य की सरकारों ने कई कार्य किया किन्तु जनसंख्या नियंत्रण जैसे चीज छुट गई। आज हम जितना उत्पादन कर रहे हैं उतने में ही काफी हो जाता, अगर हमने शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों पर ध्यान दिया होता। नतीजतन इतनी बड़ी जनसंख्या का भार कृषि पर पड़ने लगा और जमीन का छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटवारा होने लगा। 80 फीसदी कृषक अन्य भू-धारक के रूप में तब्दील हो गए। 2011 का एक सर्वे बताता है कि गांवों के 39 फीसदी लोगों के पास अब जमीन ही नहीं बची है। स्वतन्त्रता के बाद 4 फीसदी एरिगेशन को हम 40 फीसदी पर ले गए। 8 करोड़ हेक्टेयर एरिगेशन तथा बड़े बांधों से तथा 12 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर खेती की जा सकती है। लेकिन सुरक्षित खेती के लिए कम से कम 50 से 60 फीसदी एरिगेशन होना चाहिए। ऐसे में हमारा यह लक्ष्य एरिगेशन क्षेत्र का विस्तार करना होना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा 75 लाख हेक्टेयर जमीन के एरिगेशन का लक्ष्य रखा गया और 10-12 लाख हेक्टेयर ही अब तक पहुँच पाया है।

अंत में उन्होंने यह कहा कि जब हम सोचते हैं कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है तब हमें अपनी ओर देखना होगा। बिना शिक्षा के किसानों की समझ में नहीं आएगा कि हमें करना क्या है। हमारे साथ क्या हो रहा है? उचित शिक्षा से ही उनका विवेक जागृत हो सकता है। इसके बाद ही वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकेंगे। उन्होंने कहा कि भारत का विकास खेती के विकास के बगैर मुमकिन नहीं है। भारत की शुरुआती दो पंचवर्षीय योजनाएँ कृषि से संबन्धित रही है। 80 के दशक के पूर्व लोग नौकरी से ज्यादा खेती को प्राथमिकता देते थे। किन्तु आज स्थिति ऐसी होती जा रही है कि लोग खेत बेचकर चपरासी की भी नौकरी करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने आज़ादी के पूर्व भारत में हुए किसानों के आंदोलन का जिक्र किया। उन्होंने महात्मा फुले, महात्मा गांधी से लेकर अन्य नेताओं के योगदानों की चर्चा की। उन्होंने आज़ादी के बाद किसानों के हित में उठाए गए कदमों की भी विस्तृत चर्चा की। आज़ादी के बाद किसानों का लगान माफ कर दिया गया। पूर्व में अंग्रेज़ बड़े पैमाने पर किसानों से लगान वसूलते थे। उन्होंने कहा कि कृषक आज भी अपने व्यवसाय को लेकर, बाजार को लेकर अशिक्षित हैं। किसान आज कर्ज में डूबते जा रहे हैं। पूर्व में भी अंग्रेजी राज में किसान महाजनों के कर्ज में डूबकर अपनी जमीन गंवा बैठते थे। आज वे आत्महत्या करने पर विवश हैं।  
उन्होंने कहा कि भूमि उसी की होनी चाहिए जो कृषि का कार्य करें। विनोबा जी को 42 लाख एकड़ जमीन दान में मिली थी, किन्तु उसमें से आधी से ज्यादा खेती योग्य नहीं थी। केवल 12 लाख एकड़ जमीन ही वितरित हो पायी है। सरकार ने सीलिंग एक्ट बनाया, सीलिंग से फाजिल भूमि एक हद तक ही किसानों के बीच वितरित की जा सकी। भारत में कृषि के लिए आवश्यक सिंचाई व्यवस्था का अभाव आज भी बना हुआ है। यहाँ की ज्यादातर खेती मानसून पर निर्भर है। 1200 लाख हेक्टेयर भूमि असिंचित है जबकि सरकार का लक्ष्य मात्र 75 लाख हेक्टेयर सिंचित करने का ही है, जो 10 फीसदी से भी कम है। इस सत्र का संचालन डॉ. मुकेश कुमार ने किया और आभार ज्ञापन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया।

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, गजानन निलामे, नरेश गौतमडिसेन्ट कुमार साहू, सुधीर कुमारकुमारी आशु, माधुरी श्रीवास्तव, खुशबू साहू एवं सोनम बौद्ध.


Thursday, May 18, 2017

'हमारा होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है'

जिन लोगों के जेंडर तथा यौनिक व्यवहारों को लेकर हमारे समाज में ढेर सारी गालियां बनी हो, वहाँ ऐसे लोगों पर उपहास करना, उनके साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार व उन्हें समाज में कलंकित मान लेना अभी भी आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन जब शोषित समूह के लोग स्वयं को छुपाने के बजाए समाज के सामने ढ़ोल की ताल पर थिरकते हुए, लाउडस्पीकर पर अपनी पहचान को समाज के सामने रखते हुए नारा लगाए कि 'हमारा होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है।', 'हमें चाहिए आज़ादी -प्यार करने की आज़ादी, भेदभाव के बिना जीने की आज़ादी।'  तो लोगों को यह दृश्य आश्चर्यचकित कर रही थी। यह मौका था नागपुर में आयोजित दूसरे LGBTQ प्राइड मार्च का जिसमें समूह के लोग तथा देशभर से आए LGBTQ अधिकारों के समर्थक एकत्रित हुए थे। मार्च के द्वारा धारा 377 का विरोध करते हुए स्वीकार्यता, सम्मान, स्वतन्त्रता, शिक्षा, रोजगार, जैसे मानवीय अधिकारों की मांग भी की गई।
बैंगलोर से आए समीर कहते है - 'आज मैं विशेष तौर से इस मार्च में शामिल होने के लिए आया हूँ। मैं इस लड़ाई में अपने लोगों के साथ हूँ। आज इतने सारे लोगों को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। संविधान में हमें जो भी वैयक्तिक अधिकार मिले है वो हमें भी मिलना चाहिए। धारा 377 हटाई जाए और संवैधानिक अधिकार दी जाए, हमें भी जीने का अधिकार है।'
प्राइड मार्च समाज के लिए जरूरी क्यों है? पुछें जाने पर मुख्य अतिथि के रूप में गुजरात से आए मानवेंद्र गोहील ने कहा कि 'जरूरत इसलिए है कि हमें समाज को बताना है कि हमारी संख्या भले ही कम है, लेकिन हमारी उपस्थिती है और हमें गर्व है कि हम क्या है। प्रत्येक इंसान को आज़ादी से जीने का हक है तो हमें क्यों नहीं मिला है? जब भारतीय संविधान में सभी लोगों को समानता और सम्मान से जीने का हक है तो हमें क्यों नहीं? हमें हमारे तरीके से जीने दिया जाए, प्यार करने की आज़ादी हो। हम पैदाइशी ही ऐसे है, हमारा कोई दोष नहीं कि हम ऐसे है। ये हमारे लिए आज़ादी की लड़ाई है।'
आगे उन्होंने कहा कि 'हमें अब दूसरे लोगों का भी सहयोग मिल रहा है, कुछ माँ-बाप भी समझने लगे है कि बच्चों से ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती, उन्हें अपने जीवन साथी चुनने का अधिकार देना होगा।' मीडिया किस तरह से उन्हें अब पेश कर रही है? पुछे जाने पर उन्होंने कहा कि 'LGBTQ समूह को लेकर मीडिया प्रेजेंटेशन में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है। मीडिया काफी सकारात्मक हुई है, अब हमारी समस्याओं के बारे में भी लिख रहे है। युवाओं में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है, अब वे भी इन विविधताओं के बारे में जानना चाहते है।'

पिऊ जो नागपुर की ही है, वे कहती है 'आज पहली बार लड़कियों की तरह तैयार होकर इस मार्च में शामिल हो रही हूँ। थोड़ी सी डरी हुई हूँ कि कहीं घर वालों को पता न चल जाएँ, लेकिन मैं खुश हूँ कि जैसा मैं महसूस करती हूँ उसी रूप में समाज के सामने हूँ।'

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 अप्रैल 2014 को ट्रान्सजेंडर को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता देने तथा उनके स्थिति में सुधार के लिए उचित कदम उठाने के दिशानिर्देश के बावजूद अभी भी सरकारी प्रयास न के बराबर ही है। यही कारण है की पिऊ तथा पिऊ के जैसे हजारों ट्रान्सजेंडर को अपनी पहचान छुपाकर जीवन व्यतित करने के लिए मजबूर हैं।

जब भी LGBTQ अधिकारों की बात की जाती है तो समलैंगिकता को लेकर प्राकृतिक-अप्राकृतिक, नैतिक-अनैतिक, वैध-अवैध कि बहसे तेज हो जाती है। धारा 377 को हटाने के लिए एक लंबी बहस समलैंगिकता के अपराधीकरण को मानव अधिकारों के हनन के रूप में हुई है। संवैधानिक बहसो में जिन अधिकारों को लेकर चर्चा हुई है उनमें समानता, सम्मान, गोपनियता तथा भेदभाव व स्वतन्त्रता शामिल है। इन तमाम बहसों के बाद भी भारतीय कानून समलैंगिकता को अपराध मानता है। भारतीय दंड संहिता, धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) इस प्रकार से है - “जो भी कोई स्वेच्छा से किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध कामुक संभोग करता है, उसे आजीवन कारावास या फिर 10 वर्षों तक बढ़ाई जा सकती है और जुर्माना भी हो सकता था।" धारा यह स्पष्ट नहीं करती कि 'अप्राकृतिक' यौन क्या-क्या है, इसके साथ ही लिंग प्रवेश यौनिक संभोग को स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।' इस व्याख्या के कारण इसमें मुख व गुदा भी शामिल हो जाता है।  

यह कानून औपनिवेशिक काल में 'यौन आनंद' के निषेध के लिए बनाया गया था इस तरह ऐसे सभी यौनिक व्यवहारों को आपराधिक करार देने के लिए बनाया गया था जो प्रजनन प्रक्रिया से जुड़े नहीं है। यह कानून समलिंगी गतिविधियों के साथ विषमलैंगिक व्यवहार वाले जोड़े पर उस दशा में लागू होता है जब वह मुख मैथुन (oral sex), गुदा मैथुन (anal sex) या हस्तमैथुन करते हैं। फिर भी होमोफोबिया (समलैंगिकता के प्रति भय) के कारण हमेशा ही समलैंगिक गतिविधियों वाले लोगों को ही निशाना बनाया जाता रहा है। इसलिए धारा 377 का विरोध सभी नागरिकों को करना चाहिए, इसे सिर्फ समलैंगिक सम्बन्धों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत में समलैंगिकता को लेकर राजनैतिक मांग के रूप में धारा 377 के खिलाफ संघर्ष की शुरुवात वैश्विक परिदृश्य की तुलना में बहुत बाद में 1990 से मान सकते हैं जब पहचान आधारित आंदोलनों के उभार ने हाशिए के समाजों को अपने अधिकारों के लिए संगठित किया।   

डिसेन्ट कुमार साहू
शोधार्थी - समाजकार्य विभाग
म. गां. अं. हि. वि. वि. वर्धा 

Monday, February 2, 2015

Restoring Mental Health In India: Pluralistic Therapies and concepts

    
प्रस्तुत पुस्तक ब्रिगिट्टे सेबास्तिया के संपादन में और ऑक्सफोर्ड यूनी. प्रेस द्वारा प्रकाशित है। शीर्षक से ही पता चल जाता है कि इसमें भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न रूपों में मानसिक स्वास्थ्य पर उपचार कर लाभ पहुंचानेवाली थेरेपिज का विश्लेषण है, विभीन्न लेखकों द्वारा किए गए शोध अध्ययनों के अंतर्गत पाए गए विश्लेषण को इस किताब में लेखिका ने संपादित किया है.  तीन भागों में वर्गीकृत इस किताब के पहला भाग रिस्टोरिंग मेंटल हेल्थ विथ कोडिफाइड इन्डियन मेडिसिन्स इस उपशीर्षक के अंतर्गत है। द्वितीय भाग में सांस्कृतिक आधार बताते हुए लोकाचार में निहित थेरेपिज का विश्लेषण दिया है, जिसका उपशीर्षक रेस्टोरिंग मेंटल हैल्थ विथ फ़ोक थेरेपी है। तीसरे भाग में रेस्टोरिंग मेंटल हेल्थ विथ स्यायकियाट्रि पर चर्चा की है.
प्रथम भाग में ओ. शामसुंदरम द्वारा तमिलनाडु में मनोविकार से संबंधित सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं चिकित्सात्मक दृष्टिकोण का विश्लेषण किया गया है. तमिलनाडु में द्रविडीयन संस्कृति के अनुसार मनोविकार पर सिद्धा’ (तमिल में सिट्टा (Citta)) चिकित्सा व्यवस्था प्राचीन काल से चलती आ रही है उसी व्यवस्था का आज के समय में उपयोग की ओर लेखक ने ध्यान खिंचना चाहा है. लेखक का मानना है कि यह व्यवस्था पश्चिमी अवधारणा के अनुसार देखे तो कायिक (Somatotype) जैसा लगती है. सिद्धा व्यवस्था के अनुसार मानवी शरीर को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता रहा है. इस वर्गीकरण के अनुसार व्यक्तित्व- एक सामान्य व्यक्तित्व होता है, दुसरा, Alal Utal (सामान्य से थोड़े होशियार और प्रभावकारी व्यक्तित्व), तीसरे में, Iya Utal (इस वर्ग में आनेवाले लोग खुशनुमा व्यक्तित्व के होते है और शारीरिक रूप से भी बड़े स्वस्थ होते हैं) आते हैं. इन तीनों के साथ ही इन्हें मिलाकर और छ: उपप्रकारों में बांटकर व्यक्तित्व का विश्लेषण किया गया है. लेखक ने इस आलेख में तमिलनाडु के आत्महत्याओं के कारणों की भी खोज करने की कोशिश की हैं. जिसमें वह इतिहास में उसके साक्ष्यों को खोजते हुए राजा चेरा (King Chera) तक पहुँच जाते है. वहां के मंदिरों में भी मनोचिकित्सा जैसी व्यवस्था पायी गयी है, इस ओर ध्यान खींचते है,  लेखक ने गुनासिलम (Gunasilam), तिरुविदाईमारुतुर (Tiruvidaimaruthur) एवं शोलिंगुर (Sholingur) के मंदिरों की मनोचिकित्सा व्यवस्था का विश्लेषण किया है. निष्कर्ष के रूप में लेखक का कहना है कि पश्चिमी मनोचिकित्सा के शब्दावली से साम्य रखनेवाले सभी साक्ष्य तमिल साहित्य और संस्कृति में मिलते हैं, मनोचिकित्सा के लिए उपयोगी थेरेपिज भी आज के पश्चिमी मनोचिकित्सा में पाए जाने वाले कायिक दृष्टिकोण (Somatotype) की तरह ही दीखाई देती हैं. 
प्रथम भाग के द्वितीय आलेख नादिया गिग्युरे (Nadiya Giguere) द्वारा केरल के गवर्मेंट आयुर्वेदिक मेंटल हॉस्पिटल में किया गया एथनोग्राफिक अध्ययन है. लेखिका ने कुछ ख़ास शब्दों पर जोर देते हुए वहां की व्यवस्था और उस व्यवस्था में उपचार प्राप्त करने वाले रोगी दोनों का व्यक्तिक अध्ययन किया है. लेखिका ने डोसा (Dosa), सत्वबलम् (Satvabalam), जेनेस (Genes) और पूजा जैसे शब्दों का नृवंशीय वर्णन किया है. लेख का नाम Dosa, Satvabalam, Genes and Poojaa: A God for Everything; An Ethnographic Study Of Government Ayurvedic mental Hospital है. लेखिका का कहना है कि सरकारी आयुर्वेदिक मेंटल हॉस्पिटल मुलत: चरक संहिता, सुश्रुत संहिता एवं अष्टांगह्रदय जैसे आयुर्वेदिक ग्रंथों पर आधारित उपचार पर मान्यता रखता है, अत: मानसिक रोगियों पर वह इसीका उपयोग करते हैं. यहाँ पर मनोरोग को छ: उन्मादों के रूप में देखा जाता है और उसी के आधार पर उन्माद संबंधी विकारों का वर्गीकरण किया जाता है. जैसे- पित्तउन्माद (पित्त से), कफोन्माद (कफ से), वातोन्माद (वायु से), सन्निकोन्माद (उक्त तीनों के मिश्रण से), अधिजोन्माद (मानसिक धक्का या सदमा) और अंत में विषजोन्माद (जहर या उससे संबंधित चीजों के बनने से)। साथ ही शरीर को देखने का दृष्टिकोण बताते हुए लेखिका हॉस्पिटल में अभ्यासकों (Practissioner)  द्वारा उपयोग में लाए जानेवाले शब्द जैसे- डोसा शब्द का उपयोग करती हैं। डोसा से तात्पर्य यहाँ अलग है, यह शरीर को समझने के लिए किया गया है. उनका मानना है कि  इसी आधार पर वह शरीर के स्वस्थता की जांच करते हैं. इसे आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में थ्री डोसा व्यवस्थाके नाम से भी जाना जाता है. लेखिका ने इस व्यवस्था को जानने की कोशिश की है साथ ही काउन्सलिंग जैसी पश्चिमी अवधारणा की जगह लेता हुआ सत्वबलम (शक्ति को बढ़ाना), को भी व्याख्यायित किया है. लेखिका के अनुसार आयुर्वेदिक मनोचिकित्सा में उपयोग किए जाने वाले सभी उपकरण खुले और लचीले होने के कारण वहां के समाज-सांस्कृतिक परिदृश्य में उसका उचित प्रभाव मनोरोगियों पर पड़ता नजर आता है.  
सी. कुमार बाबू ने The Relevance of Yoga and Mediatation in the Management of Common Mental Disorder में यह दर्शाने की कोशिश की है कि योग किस तरह सामान्य मानसिक विकारों के उपचार में सहायक बन रहा है, साथ ही आज के समय में योग थेरेपी पर पश्चिमी मनोचिकित्सा जगत में किस तरह की चर्चा हो रही है, इस ओर भी ध्यान खींचना चाहा है. इसके लिए उन्होंने मनोचिकित्सा के जर्नलों में छपे आलेखों का आधार लिया है. महत्वपूर्ण बात यह है कि योगा को एक थेरेपी के रूप में प्रयोग करने वाले किस तरह उसे मनोचिकित्सा का एक बेहतर उपकरण बता रहे हैं इस ओर लेखक ने  ध्यान खींचना चाहा है. लिखते हैं...
2004  में एस. बी. एस. खालसा ने संदर्भ जालीय विश्लेषण  (Bibiometric Analysis) का आधार लिया जिसमें Indian Journal of Physiology एवं Pharmacology महत्वपूर्ण थे. 2004 तक १८१ प्रकाशित जर्नलों में से ८१ जर्नल  लगभग 50 अलग-अलग राष्ट्रों से प्रकाशित हो चुके थे; भारतीय जर्नलों में 96 में से 27, U.S. जर्नल में ४३ में से 24, ब्रिटिश जर्नल में २१ में से ११ और अन्य 12 राष्ट्रों से छपने वाले २१ में से १९ जर्नल योगा पर आधारित थे, साथ ही ३४ प्रकाशन ऐसे थे जो केवल योगा विशेषज्ञता वाले जर्नल को प्रकाशित करते थे. यह सब दबावजन्य रोग एवं चिंता से संबंधित बीमारियों पर किए जाने वाले उपचार के आधार पर दिया गया है.
ग्रोवर (१९९४;१५५) द्वारा किए गए अध्ययन का हवाला देते हुए लेखक लिखते है कि कॉम्प्रेहेंसिव योगा थेरेपीका समान्य मानसिक रोगों पर किए गए उपचारों के परिणाम काफी महत्त्वपूर्ण है, लगभग 50 प्रतिशत या उससे अधिक मात्रा में इस थेरेपी ने ऐसे रोगों के लक्षणों को नष्ट कर दिया है. ७३.९ प्रतिशत रोगियों की प्रतिक्रयाएं अच्छी रही अन्य थेरेपिज को ४२.५ प्रतिशत प्रतिक्रयाएं  मिली. यह अध्ययन १९८२ में बी.बी. सेठी द्वारा किया गया था.
            १९७९ में बालकृष्णा ने अध्ययन किया जिसका हवाला ग्रोवर देते है. योगा थेरेपी एवं ड्रग थेरेपी का तुलनात्मक अध्ययन  था, इसमें 75 न्युरोटीक रोगियों को शामिल किया गया था. योगा थेरेपी इन मरीजों को दो महीने तक सप्ताह में छः बार दी गयी जिसका प्रत्येक सेशन 45-60 मिनट का होता था. चिकित्सकों द्वारा जांचने के बाद पता चला कि ड्रग थेरेपी योगा थेरेपी से ज्यादा प्रभावशाली रही परन्तु मनोवैज्ञानिक परीक्षणों ने यह दिखाया कि चिंता व सामाजिक समायोजन में ड्रग थेरेपी से ज्यादा अच्छी योगा थेरेपी रही. मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के अनुसार ड्रग थेरेपी के कारण केवल दबाव में महत्त्वपूर्ण कमी आयी लेकिन चिंता और सामाजिक समायोजन में परिणाम न के बराबर रहा. इस अंतर्विरोध में योगा थेरेपी का के कारण चिंता, दबाव स्तर एवं सामाजिक समायोजन में महत्त्वपूर्ण सुधारात्मक परिणाम देखा गया.
            इसी को मद्देनजर रखते हुए WHO मानसिक स्वास्थ्य के घटकों को एक समेकित स्वरूप देकर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के रूप में इससे संबंधित कार्यकर्ताओं की मांग से संबंधित तकनीक की सूचनाएं प्रदान कर रही है. साथ ही जिला स्तर के प्रत्येक मानसिक स्वास्थ्य अस्पतालों में इसे चलाने की कोशिश में हैं इसके लिए रोटरी एवं लायन्स क्लबों से बातचीत जारी है. (Sebastia, 2009, पृ. 91)
            द्वितीय भाग में Restoring mental Health with Folk Therapy पहला आलेख पिलार गलियाना अबाल (Pilar Galiana Abal) द्वारा When God Heals... Can Darsan be a Therapy? द्वारा लिखा गया है,  इस आलेख में लेखक द्वारा पिछले तीन वर्षों से मुंबई के बाबुलनाथ मंदिर में किए गए क्षेत्र अध्ययन के दौरान पाए गए तथ्यों का विश्लेषण है. मंदिर में विभिन्न जाति-धर्मों के आने वाले दर्शनार्थियों के साक्षात्कार एवं अवलोकन के आधार पर हिन्दू धर्म में प्राचीन से चली आ रही दर्शनपरम्परा को एक थेरेपी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है और इसके लिए पुरानों के तथ्य देने की कोशिश की गयी है.
लेखक ने कैथरीन बेल (Cathrine Bell) (१९९७) की Rituals Perspectives and Dimentions का हवाला देते हुए लिखा है दर्शन को आने वाले सभी पुरुष प्रतिभागियों की दर्शन परंपरा को को एक गिफ्ट एक्सचेंज धर्मकृत्य (Rite of Gift Exchange) के रूप में देखा जा सकता है, उनके लिए यह कोई मनस्ताप पूर्ण धार्मिक कृत्य नहीं हैं क्योंकि यह प्राथमिक रूप से प्रतिभागी द्वारा किया गया मानवी भक्ति का लेनदेन’ (Human Divine Transanctions) है जिसमें सीधे गुणगान, प्रार्थना, याचना के सामर्थ्य से एक मांग रखी जाति है साथ ही भक्त अपने भलाई (Well-Being) के लिए अपनी इस भक्तिमय भागीदारी को वापस लेने का सामर्थ्य भी शामिल होता है. (Sebastia, 2009, पृ. 97)  अर्थात दर्शनके पीछे मुख्य उद्देश्य यह होता है कि भक्त उस भगवान् के प्रति प्रेम और भक्ति दिखाएं जिसके बदले दर्शनार्थी यह मानकर चलता है कि भगवान् भी उसे प्रेम सुरक्षा प्रदान करेगा.
लेखक के अनुसार दर्शनार्थियों में कुछ को बीमारियों के विभीन्न दशाओं के अनुभव के साथ पाया गया, जैसे- निद्रारोग, चिंता, दबाव और   व्योमोहाभ लक्षण (Paranoid Syndrome). कुल ३५ दर्शनार्थियों में से ज्यादातर लोगों के साथ साक्षात्कार किया गया जिसमें प्रतिभागियों ने यह दावा किया कि वे दर्शन से मानसिक सहायता प्राप्ति की कोशिश कर रहे थे, जिसके बाद उनके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार भी आया है.
आलेख के पहले हिस्से में लेखक ने दर्शन के धार्मिक कृत्य को ‘Seeing And Touching’के परम्परा के साथ जोड़कर देखा है. साथ ही भारतीय धर्मग्रंथों का आधार लेते हुए इस दर्शनका विश्लेषण किया है. द्वीतीय भाग में लेखक द्वारा बबुलनाथ मंदिर में आनेवाले दर्शनार्थियों के पूरे दर्शन पद्धति का ब्योरा दिया है जिसमें उनके द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कृत्य का मनोविश्लेषनात्मक पद्धति से विवेचन किया है, जैसे- प्रतिभागियों का मंदिर में प्रवेश, शिवलिंग पर चढ़ावे के लिए फूल-पत्ते ले जाना उसे शिवलिंग पर चढ़ाना, शिवलिंग को चूमना, स्पर्श करना, यहाँ तक कि भीड़ के कारण पुरोहित द्वारा दबाव में जल्दी करोकहना उसके बाद भी किसी भक्त का मंदिर में किसी कोने में जाकर वहीँ से शिवलिग के प्रति समर्पित भाव से देखना, इन सभी छोटी-छोटी चीजों का मनोवैज्ञानिक अर्थ निकालकर लेखक ने इसे Ethno-Psychoanalytical  Approach से विश्लेषित किया है.  राजू की केस स्टडी से उन्होंने इस बात को स्थापित करने की कोशिश की है कि दर्शन एक थेरेपी के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है.
तीसरे भाग में Restoring Mental Health With Psychiatry  प्रतिमा मूर्ति एवं संजीव जैन द्वारा बैंगलोर में पागलखानों में दिए जाने वाले उपचार के दृष्टिकोणों का अध्ययन किया है जिसमें एतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देकर ब्रिटिश पूर्व भारत, ब्रिटिशकालीन भारत एवं समकालीन समय में इसकी स्थितियों का विवरण अपने आलेख Dignosis and Treatment Approches at the Asylum in Bangalore  में किया है. 
स्वास्थ्य संबंधी आधुनिक प्रशानिक उपकरणों, हॉस्पिटल का उदय मध्य पूर्व में दिखाई देता है. भारतीय परिदृश्य में देखें तो दक्षिण एशियाई प्रदेशों में हॉस्पिटल्स जैसे प्रबंध दिखाई देते हैं. (वर्मा,१९५३, ‘History of Psychiatry  in India and Pakistan, Indian Journal of Neurology and Psychiatry, Vol-4. P.P.-138-64)
लेखक ने भारतीय द्वीप में शुरुआती समय में प्रचलित व्ययक्तिक रूप से चिकित्सा सेवा में लगे वैद्य एवं हाकिम दोनों का 14 वी सदी तक के साक्ष्य दिए हैं. मोहम्मद तुग़लक एवं उसके बाद फिरुज तुगलक को रेखांकित करते हुए इस बात को बाल दिलाते है कि उस समय में हॉस्पिटल जैसी अवधारणा थी किन्तु वह मुख्यत: सैनिकों, खानाबदोश-घुमक्कड़ एवं परदेशियों के लिए थी. (Sebastia, 2009, पृ. 213) 
लेखक के अनुसार १५००-१७५० यह वह समय था जब भारत में यूरोपीय प्रभाव बढता गया इसका सीधा प्रभाव दक्षिण एशिया पर हुआ, जिससे वहां के लोगों में यूरोपियन मेडिसिनके प्रति जागरूकता बढ़ने लगी. युद्धों की श्रुंखला के बाद 18 वी शताब्दी के आते तक पश्चिमी एवं भारतीय चिकित्सा एकत्रित रूप से कार्यरत होने लगी. १९ वी सदी के मध्य तक इन दोनों चिकित्सा प्रणालियों में उपयुक्त शरीरविज्ञान आधारित ज्ञान ही बुनियाद बन गया. ह्यूमोरल(शरीर द्रवीय) कंसेप्ट टू जस्टिफाई द कॉउजेशन ऑफ़ डिजीज जो पश्चिम से बनी है और भारतीय अवधारणा के अनुसार थ्योरी ऑफ़ एलिमेंट इन दोनों में कोई समानता नहीं दीखाई देती थी फिर भी आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में समानता पर आधारित चर्चा एवं लेन-देन शुरू हुआ था. (Sebastia, 2009, पृ. 214)
तीसरा भाग इसी तरह के अन्य आलेखों से भरा है. मनोचिकित्सा प्राणाली से मानसिक स्वास्थ्य को किस तरह से पुनः प्रस्थापित किया जा सकता है, इस बात पर जोर दिया गया है.
समकालीन समय में यह किताब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारतीय चिकित्सा पद्धतियों का ऐतिहासिक एवं समकालीन विश्लेषण प्राथमिक तथ्यों पर आधारित है. मनोवैज्ञानिक एवं मनोचिकित्सा के अध्ययन कर्ताओं के लिए यह किताब महत्त्वपूर्ण है. किन्तु लेखिका ने समकालीन सामाजिक विमर्श या नव सामाजिक विज्ञान को दरकिनार किया है. इस किताब में भारतीय चिकित्सा विद्याओं को देशज ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करने की बजाय मुख्यधारा के चिकित्सा प्रणाली के साथ साम्य जुटाने पर ज्यादा बल दिया है. तीन हिस्सों में से किसी भी आलेख में कारपोरेट अर्थव्यवस्था के दबाव के कारण भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को मिलने वाला स्थान, इस पर बात नहीं की गई. किताब पूरी तरह से निष्क्रिय अकादमिक संश्लेषण का नतीजा लगती है. हालांकि इस तरह के तथ्य जुटाने में ज्यादा समय खर्च होता है और ऐसे में इन तथ्यों को केवल एकांगी रूप से देखने का नजरिया मानसिक स्वास्थ्य से ज्यादा शरीरक्रिया चिकित्सा प्रणाली का रूप धारण करता है. किताब इतनी सरल लिखी गई है कि सामान्य से सामान्य समझ वाला भी इसे समझ सकता है. मानसिक स्वास्थ्य के शोधार्थियों के लिए ऐतिहासिक तथ्य एवं समकालीन थेरेपिज का स्वरूप देखने के लिए इसे एक बार जरूर पढनी चाहिए.       
-Brigitte Sebastia (edi.), 2009






निलामे गजानन सूर्यकांत 
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र,
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा।  
gajanannilame@gmail.com