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Sunday, March 25, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के छठे दिन प्रतिभागियों के अलग-अलग समूहों के बीच हुई चर्चा


वर्धा, 24 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्यअध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के छठे दिन सेवाग्राम स्थित गांधी आश्रम का अवलोकन करते हुए सेगांव ग्राम का शैक्षणिक भ्रमण किया गया।
शनिवार को भोजनोपरांत सत्र का प्रारंभ हुआ। सत्र के प्रारंभ में डॉ. मिथिलेश कुमार ने शेष कार्यक्रम की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की। उसके उपरांत एनसीआरआई के डी. एन. दास ने चर्चा के लिए बाकी बचे दो समूहों को आमंत्रित किया। समूह चर्चा टीम ने खेती, किसानी और शिक्षा पर चर्चा की। चर्चा की शुरुआत डॉ. मुकेश कुमार ने की। चर्चा में डॉ. देवाशीष मित्रा ने ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था के इतिहास की संक्षिप्त चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत में कृषि अत्यंत ही विविधतापूर्ण इसलिए भारत में कृषि का कोई एकसमान पाठ्यक्रम नहीं बन सकता है। सभी राज्यों की भौगोलिक स्थिति में भी काफी भिन्नता है।

वहीं इस समूह के सदस्य डॉ. पार्थसारथी मल्लिक ने समूह चर्चा में कहा कि ग्रामीण समुदाय की बहुसंख्या कृषि पर निर्भर है। ग्रामीण क्षेत्र में कृषि की स्थिति बदहाल बनी हुई है। आज की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित नहीं रह गई है। लोग गाँव से पलायन कर रहे हैं। गाँव के लोगों को आज बिजली चाहिए, शिक्षा चाहिए, स्वास्थ्य चाहिए। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के चर्चित मेंढ़ा लेखा मॉडेल विलेज की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सबकुछ के बावजूद उस गाँव में शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी और वहाँ शिक्षा को लेकर जागरूकता का अभाव था। सरकारी शिक्षा व्यवस्था अत्यंत ही बदहाल है। निजी शिक्षा संस्थानों में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए संसाधन नहीं है। हर गाँव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। गाँव केन्द्रित पाठ्यक्रम विकसित करने की जरूरत है।

डॉ. देवाशीष मित्रा ने चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि शिक्षा की आदर्शवादी परिकल्पना को सरजमीं पर उतार पाना काफी मुश्किल है। डॉ. पार्थसारथी मल्लिक ने गांधी के बुनियादी तालीम की भी चर्चा की। डॉ. मुकेश कुमार ने गांधी के बुनियादी तालीम के हृदय, हाथ और मस्तिस्क के संतुलित विकास के सिद्धान्त और व्यवहार पर प्रकाश डाला। शोधार्थी नरेश गौतम ने कहा कि आज 'वन इंडिया वन प्लान' की कोशिश की जा रही है। जबकि भारत के अलग-अलग राज्यों में भूमि का वितरण अत्यंत ही असमान है, मुट्ठीभर हाथों में आज भी भूमि का ज़्यादातर हिस्सा है जबकि ज़्यादातर लोग खेत-मज़दूर हैं।
समूह ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि कृषि केन्द्रित पाठ्यक्रम बनना चाहिए। समूह ने यह बात स्पष्टता के साथ कहा कि पूरे भारत के लिए कृषि पर केन्द्रित कोई एक पाठ्यक्रम नहीं हो सकता, कृषि की विभिन्नता, भौगोलिक भिन्नता आदि का ख्याल रखते हुए ही कृषि का कोई पाठ्यक्रम विकसित व निर्धारित किया जाना चाहिए। समूह चर्चा टीम की प्रस्तुति के उपरांत उपस्थित प्रतिभागियों ने अपने-अपने सुझाव दिए। चर्चा के अंत में एनसीआरआई के डी.एन. दास ने भी अपनी बातें रखी।


महाराष्ट्र के वर्धा जिले के देवली ब्लाक के लोनी गाँव में किए जा रहे प्रयोग को सीएम फ़ेलो अतुल ए. राऊत ने प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि ग्राम परिवर्तन अभियान के तहत महाराष्ट्र सरकार राज्य के एक हजार गांवों की शिनाख्त कर उसे विकसित करने का कार्यक्रम चला रही है। फिलहाल 450 गाँव में काम करने हेतु 350 सीएम फ़ेलो बहाल किए गए हैं। 9 बड़े कॉरपोरेट घरानों के कॉरपोरेट सोशल रेस्पोन्सिबिलिटी के तहत इस कार्य को आर्थिक सहयोग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने हमें योजना बनाने और उसे लागू करने की एक साथ ज़िम्मेदारी दी है। गाँव के सामुदायिक स्वास्थ्य को लेकर चलाई जा रही योजना की उन्होंने विस्तृत चर्चा की। गाँव में आसपास के सहयोग से पुस्तकालय की व्यवस्था करने, कृषि के विकास आदि क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों पर भी उन्होंने विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला।
एनसीआरआई के डी.एन. दास ने ग्रामीण समुदाय के साथ सहभागिता बढ़ाने हेतु पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने हेतु महत्वपूर्ण सुझाव पेश किए। उन्होंने विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों को गाँव से जुडने, उनके बीच कार्य करने हेतु कदम बढ़ाने पर ज़ोर दिया। गाँव के लोगों से जुड़ते हुए सरकार द्वारा चलाई जा रही विकास योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू करने में शिक्षकों-विद्यार्थियों की भूमिका भी उन्होंने रेखांकित किया।

सत्र का अंत सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका के लिए गठित समूह ने नाट्य प्रस्तुति के जरिये सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवियों व छात्र-छात्राओं की भूमिका कॉ बेहतरीन ढंग से रेखांकित किया। इस समूह ने एक निरक्षर व्यक्ति को रोज़मर्रा की जिंदगी में आने वाली कठिनाइयों का चित्रण करते हुए शिक्षा की महत्ता को संवेदनशील ढंग से सामने लाने का प्रयास किया। शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने में सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व छात्र-छात्राओं की भूमिका को भी भली भांति चित्रित किया। समूह ने शिक्षा के सशक्त माध्यम के बतौर नाट्य प्रस्तुति की महत्ता पर भी प्रकाश डाला। इस समूह में टी. राजू, डॉ. विजय कुमार वाघमारे, डॉ. भरत खंडागढ़े एवं श्याम शर्मा शामिल थे। अंत में एनसीआरआई के डी.एन. दास ने इसपर अपने विचार व्यक्त किए। गजानन एस. निलामे द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र की समाप्ति हुई। 
 
रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, गजानन एस. निलामे, डिसेन्ट कुमार साहू

Wednesday, March 21, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के तीसरे दिन ग्रामीण स्वास्थ्य और कृषि समस्या पर हुई चर्चा



वर्धा, 21 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के तीसरे दिन के प्रथम चर्चा सत्र 'विश्वविद्यालयों का समाज से जुड़ाव की आवश्यकता' विषय पर गांधी ग्राम रुरल इंस्टीट्यूट तमिलनाडु एवं उत्तरप्रदेश के चित्रकूट विश्वविद्यालय के कुलपति रहे एग्रोइंडस, वर्धा के निदेशक प्रो. टी. करुणाकरण ने संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा और समाज के बीच गहरा अंतरसंबंध होता है। वर्तमान शिक्षा पद्धति किताबी हो गई है। भारत में शिक्षा व्यवस्था अत्यंत ही समृद्ध रही है। हमारे यहाँ प्राचीन भारत में नालंदा विश्वविद्यालय जैसा शिक्षा का विश्व प्रसिद्ध हुआ करता था। पुराने समय की गुरुकुल पद्धति में स्वावलंबी जीवन दर्शन की शिक्षा गुरु के सान्निध्य में दी जाती थी। नालंदा विश्वविद्यालय का समाज से गंभीर जुड़ाव था और विश्वविद्यालय समाज पर निर्भर था।
स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन विश्वविद्यालय बनाया था। वहाँ श्रीनिकेतन था, जो ग्रामीण समुदाय से जुड़ा हुआ था। जिसे उनके शिष्य जी. रामचंद्रन ने 'गांधीग्राम रुरल विश्वविद्यालय' के रूप में आगे विकसित किया था। उन्होंने कहा कि देश के मौजूदा विश्वविद्यालय अत्यंत ही बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं। विश्वविद्यालय ज्ञान का केंद्र है। इस ज्ञान का समाज के बदलाव-विकास में भूमिका होनी चाहिए। टैगोर और गांधी ने शिक्षा और समाज के बीच तालमेल स्थापित करने का प्रयास किया था। गांधी की बुनियादी शिक्षा पद्धति शिक्षा का बेहतरीन मॉडल है। शिक्षा को व्यवहारिक और प्रायोगिक दोनों होना चाहिए। सिद्धान्त और व्यवहार के बीच समुचित तालमेल आवश्यक है।
 उन्होंने टैगोर, गांधी के साथ-साथ उत्तरप्रदेश के चित्रकूट विश्वविद्यालय के शिक्षा मॉडल की चर्चा की। आदर्शवाद और व्यवहारिकता के बीच तालमेल की जरूरत को भी उन्होंने रेखांकित किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वर्तमान हालात को बदलने में शिक्षण शालाओं की भूमिका होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में लाखों ग्राम पंचायत हैं। किन्तु ग्राम पंचायतों के अधिकार और कर्त्तव्य की लोगों को कोई समुचित जानकारी तक नहीं है। पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित किए जाने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। विश्वविद्यालयों की इस कार्य में भूमिका हो सकती है। विश्वविद्यालयों का समाज को अपराधीकरण से मुक्त करने में तथा सामाजिक चुनौतियों के सार्थक समाधान में अहम योगदान हो सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को सृजनात्मक कार्य की तरफ बढ़ना होगा।
सत्र के अंत में प्रतिभागियों ने भी अपनी जिज्ञासा रखी जिसका समाधान विषय विशेषज्ञ ने किया। सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया और धन्यवाद एनसीआरआई के डी. एन. दास ने किया।

महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के डिपार्टमेन्ट ऑफ मेडिसिन के प्रो. प्रदीप देशमुख ने 'सामुदायिक सशक्तिकरण : पद्धति और तकनीक' विषयक चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि सामुदायिक सशक्तिकरण अत्यंत ही प्रचलित शब्द है। समुदाय के साथ अंतरसंबंध स्थापित करते हुए ही सामुदायिक सशक्तिकरण किया जा सकता है। समुदाय की जरूरतों की शिनाख़्त करते हुए उसे प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाना आवश्यक है। समुदाय के साथ अर्थपूर्ण ढंग से जुड़ाव के जरिए सामुदायिक सशक्तिकरण के लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है। सामुदायिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया में यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि सभी किस्म की शक्तियाँ समुदाय को अनिवार्य तौर पर हस्तांतरित हों। पीआरए प्रक्रिया की भी उन्होंने विस्तृत चर्चा की। सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया।

तीसरे दिन भोजनावकाश के उपरांत चर्चा सत्र में राष्ट्रीय संत तुकड़ोजी महाराज विश्वविद्यालय, नागपुर के राजनीति विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विकास जांभुलकर ने 'पॉलिसी प्लानिंग इन इंडिया' विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत में शहरी और ग्रामीण प्लानिंग अलग-अलग है। इसी कारण 'इंडिया' और 'भारत' की भी संकल्पनाएँ चर्चा में आती रहती हैं। प्लानिंग की पूरी प्रक्रिया में नौकरशाही की प्रधान भूमिका होती है और नौकरशाही के सोचने का अपना अलग ढर्रा होता है। प्लानिंग में विश्वविद्यालय महज बाजार की जरूरतों के अनुरूप वर्कर तैयार करने का केंद्र मात्र बनकर रह गया है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना 2016 से चल रही है। इससे पूर्व इंदिरा आवास योजना चलाई जा रही थी। अभी ग्रामीण क्षेत्र के लिए 1, 20,000 रुपए की राशि आवास के लिए दी जा रही है। दुर्गम क्षेत्र के लिए एक लाख तीस हजार रुपए दिए जाते हैं। इस योजना में 20 हजार घर बनाने वाले कारीगरों को वर्ष 2022 तक ट्रेनिंग दिए जाने की भी योजना है। उसी प्रकार मनरेगा योजना में वर्ष 2017-18 के लिए 48 हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस योजना के तहत कंक्रीट की सड़कें बनी है, गाँव को नजदीकी मुख्य सड़क से जोड़ा गया है। सरकार ने 'मेरी सड़क' नाम से एप भी शुरू किया है, जिसपर शिकायत दर्ज किया जा सकता है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर चलाई जाने वाली कई महत्वपूर्ण योजना, उसके निर्धारित लक्ष्य, योजना हेतु आवंटित की जाने वाली राशि आदि की विस्तृत चर्चा की। उन्होंने बताया कि दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल विकास योजना के 2 लाख लक्ष्य के विरुद्ध अब तक मात्र 83 हजार लोग ही प्रशक्षित किए जा सके हैं। और इसमें से मात्र 40 हजार लोगों को ही जॉब दिया जा सका है। उन्होंने योजनाओं के निर्माण के पीछे की राजनीति की भी चर्चा करते हुए कहा कि योजनाओं के निर्माण में लक्षित समूह का प्रतिनिधत्व ही नहीं होता, यह भारी कमी है।

तीसरे दिन के अंतिम चर्चा सत्र में विदर्भ के किसान आंदोलन एवं सर्व सेवा संघ से जुड़े चर्चित किसान नेता अविनाश काकड़े द्वारा भारत में कृषि परिवर्तन पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कृषि परिवर्तन को उच्च स्तर पर जाकर देखना होगा। समाज द्वारा कृषि को देखने के नजरिए को हमें समझना होगा। भारतीय कृषि पर यहाँ की जाति, वर्ग से लेकर आज के ग्लोबलाइजेशन आदि प्रक्रियाओं का असर पड़ा है। भारतीय कृषि व्यवस्था की समस्याओं को सरकार के सामने लाने का कार्य पहली बार ज्योतिबा फुले द्वारा 18वीं सदी में हुआ। उन्होंने 'किसान का कोड़ा' नामक अपनी पुस्तिका में जो समस्याएं बतायी थी वह आज भी अनुत्तरित है।
1930 के बाद की कृषि में कुछ खास परिवर्तन नहीं हुआ है। उस समय कृषि उत्पादन का मूल्यांकन उसी वर्ष के आधार पर होता था, जिस वर्ष फसल अच्छी होती थी। आंदोलनों से कृषि मुद्दे जुड़े थे, जैसे कि नील खेती का आंदोलन। ऐसे कई सारे मुद्दों की ख़ासी भूमिका आज़ादी आंदोलन में रही है। उन्होंने आगे कहा कि अंग्रेजों के समय में अंग्रेजों ने अपनी व्यवस्था के लिए यहाँ पाटिल, कुलकर्णी तथा देशपांडे जैसे वर्ग का निर्माण किया था किन्तु आज़ादी के बाद 'लगान' पद्धति को बंद कराया गया था, जिसके चलते कृषकों को 50% तक हिस्सा सरकार को देना पड़ता था।
उन्होंने आगे कहा कि सौ में से 99 फीसदी कृषकों में अपने व्यवसाय के प्रति अज्ञानता है। इसके कारण उनका बड़े पैमाने पर शोषण हुआ है। आज़ादी के बाद की सरकारों ने कृषि सुधार हेतु निम्न कार्य किए- जमींदारी उन्मूलन कानून, सीलिंग कानून, देश में कृषि उत्पादन की बढ़ोत्तरी हेतु प्रयास करना आदि कई महत्वपूर्ण कार्य किए गए थे। इन सभी मामलों को लेकर केंद्र व राज्य की सरकारों ने कई कार्य किया किन्तु जनसंख्या नियंत्रण जैसे चीज छुट गई। आज हम जितना उत्पादन कर रहे हैं उतने में ही काफी हो जाता, अगर हमने शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों पर ध्यान दिया होता। नतीजतन इतनी बड़ी जनसंख्या का भार कृषि पर पड़ने लगा और जमीन का छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटवारा होने लगा। 80 फीसदी कृषक अन्य भू-धारक के रूप में तब्दील हो गए। 2011 का एक सर्वे बताता है कि गांवों के 39 फीसदी लोगों के पास अब जमीन ही नहीं बची है। स्वतन्त्रता के बाद 4 फीसदी एरिगेशन को हम 40 फीसदी पर ले गए। 8 करोड़ हेक्टेयर एरिगेशन तथा बड़े बांधों से तथा 12 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर खेती की जा सकती है। लेकिन सुरक्षित खेती के लिए कम से कम 50 से 60 फीसदी एरिगेशन होना चाहिए। ऐसे में हमारा यह लक्ष्य एरिगेशन क्षेत्र का विस्तार करना होना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा 75 लाख हेक्टेयर जमीन के एरिगेशन का लक्ष्य रखा गया और 10-12 लाख हेक्टेयर ही अब तक पहुँच पाया है।

अंत में उन्होंने यह कहा कि जब हम सोचते हैं कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है तब हमें अपनी ओर देखना होगा। बिना शिक्षा के किसानों की समझ में नहीं आएगा कि हमें करना क्या है। हमारे साथ क्या हो रहा है? उचित शिक्षा से ही उनका विवेक जागृत हो सकता है। इसके बाद ही वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकेंगे। उन्होंने कहा कि भारत का विकास खेती के विकास के बगैर मुमकिन नहीं है। भारत की शुरुआती दो पंचवर्षीय योजनाएँ कृषि से संबन्धित रही है। 80 के दशक के पूर्व लोग नौकरी से ज्यादा खेती को प्राथमिकता देते थे। किन्तु आज स्थिति ऐसी होती जा रही है कि लोग खेत बेचकर चपरासी की भी नौकरी करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने आज़ादी के पूर्व भारत में हुए किसानों के आंदोलन का जिक्र किया। उन्होंने महात्मा फुले, महात्मा गांधी से लेकर अन्य नेताओं के योगदानों की चर्चा की। उन्होंने आज़ादी के बाद किसानों के हित में उठाए गए कदमों की भी विस्तृत चर्चा की। आज़ादी के बाद किसानों का लगान माफ कर दिया गया। पूर्व में अंग्रेज़ बड़े पैमाने पर किसानों से लगान वसूलते थे। उन्होंने कहा कि कृषक आज भी अपने व्यवसाय को लेकर, बाजार को लेकर अशिक्षित हैं। किसान आज कर्ज में डूबते जा रहे हैं। पूर्व में भी अंग्रेजी राज में किसान महाजनों के कर्ज में डूबकर अपनी जमीन गंवा बैठते थे। आज वे आत्महत्या करने पर विवश हैं।  
उन्होंने कहा कि भूमि उसी की होनी चाहिए जो कृषि का कार्य करें। विनोबा जी को 42 लाख एकड़ जमीन दान में मिली थी, किन्तु उसमें से आधी से ज्यादा खेती योग्य नहीं थी। केवल 12 लाख एकड़ जमीन ही वितरित हो पायी है। सरकार ने सीलिंग एक्ट बनाया, सीलिंग से फाजिल भूमि एक हद तक ही किसानों के बीच वितरित की जा सकी। भारत में कृषि के लिए आवश्यक सिंचाई व्यवस्था का अभाव आज भी बना हुआ है। यहाँ की ज्यादातर खेती मानसून पर निर्भर है। 1200 लाख हेक्टेयर भूमि असिंचित है जबकि सरकार का लक्ष्य मात्र 75 लाख हेक्टेयर सिंचित करने का ही है, जो 10 फीसदी से भी कम है। इस सत्र का संचालन डॉ. मुकेश कुमार ने किया और आभार ज्ञापन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया।

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, गजानन निलामे, नरेश गौतमडिसेन्ट कुमार साहू, सुधीर कुमारकुमारी आशु, माधुरी श्रीवास्तव, खुशबू साहू एवं सोनम बौद्ध.


Tuesday, March 20, 2018

संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के दूसरे दिन ग्रामीण समुदाय की समस्याओं पर हुई गहन चर्चा


वर्धा, 20 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के दूसरे दिन चर्चा सत्र के पूर्व पाँच राज्यों के विभिन्न विश्वविद्यालय से आए प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए।

दूसरे दिन के प्रथम चर्चा सत्र में मातृ सेवा संघ इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क, नागपुर के एसोसिएट प्रोफेसर केशव वाल्के ने 'ग्रामीण समुदाय की समस्याएं' विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत की लगभग 70 फीसदी आबादी गाँवों में रहती है। आज विकास के नाम पर गाँव की भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। इससे विस्थापन की समस्या पैदा हो रही है। महाराष्ट्र सरकार की इस वर्ष 13 करोड़ वृक्ष लगाने की योजना है तब सवाल यह उठता है कि क्या इतनी जमीन उपलब्ध है। वहीं दूसरी तरफ अंबानी व रामदेव जैसे व्यापारियों को राज्य की सैकड़ों एकड़ वनभूमि दी गई है। अंतर्विरोधी बात तो यह भी है कि पूंजीपतियों को कृषि भूमि वनभूमि तो दी जा रही है किन्तु भूमिहीनों को जमीन नहीं दी जा रही है। भूमि अधिग्रहण के बदले किसानों को मुआवजे के बतौर पैसे दिये जा रहे हैं। इस पैसे का सदुपयोग होने के बजाय विलासिता की वस्तुओं को खरीदने में खर्च हो रहा है। आज विस्थापित परिवारों की स्थिति बेहद दयनीय होती जा रही है। विस्थापितों के मुकम्मल पुनर्वास की सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है। रोजगार नहीं होने की वजह से अपराधीकरण बढ़ रहा है। गाँव में रहने वाले ज़्यादातर लोग कृषि पर निर्भर हैं। मिट्टी और कृषि की समुचित जानकारी के अभाव में बहुफ़सली कृषि नहीं हो पा रही है। सरकार ने योजना में सभी के लिए ऑन लाइन आवेदन करने का प्रावधान किया है। किन्तु गाँव के लोगों को इसकी समुचित जानकारी ही नहीं है। कर्जमाफ़ी वगैरह को भी सही ढंग से जमीन तक पहुंचाया जा सका है। किसानों को सही वक्त पर बैंक से लोन नहीं मिल पाता है। इसके विपरीत समर्थ लोगों को सैकड़ों करोड़ रूपये का लोन आसानी से मिल जाता है और वे पैसा हजम कर जा रहे हैं।
            उन्होंने महाराष्ट्र में वन अधिकार प्राप्त करने वाले आत्मनिर्भर गाँवों की भी विस्तृत चर्चा की। उन्होंने बताया कि गाँव की सबसे बड़ी समस्या रही है कि यहाँ भूमि का वितरण अत्यंत ही असमान है। गाँव की जमीन आज शहर के धनी लोग खरीद ले रहे हैं। टाइगर रिजर्व आदि के नाम पर किसानों की जमीन तो ले ली जा रही है किन्तु वही जमीन बड़े-बड़े रेस्टोरेन्ट और होटल खोलने के लिए पूंजीपतियों को मुहैया कराई जा रही है। गाँव वालों की जमीन अधिग्रहण कर जो जल परियोजनाएं बन रही हैं, उसके लाभ से भी गाँव वंचित हो रहा है। गाँवों का पानी शहरों को आपूर्ति की जा रही है। ग्रामीण संसाधनों के लाभ से गाँव को वंचित करते हुए उसे शहर के हवाले किया जा रहा है। पूरे देश में बाघ अभयारण्य में से 6 अकेले विदर्भ में ही हैं। विदर्भ का पूरा जंगल अगर आरक्षित है तो गाँव के पशु कहाँ जाएंगे? आज यह सवाल उठ खड़ा हुआ है। मध्यप्रदेश के 90 गाँव बाघ परियोजना के दायरे में आ गए हैं। वहीं दूसरी तरफ जनपक्षधर क़ानूनों को राष्ट्रीय विकास का तर्क देते हुए बदला जा रहा है। ग्राम सभाओं के अधिकारों को अध्यादेश के जरिये छीना जा रहा है। परियोजनाओं के लिए भूमि दिये जाने का निर्णय लेने का अधिकार ग्राम सभा से अपहृत कर लिए गए हैं। जिनकी जमीनें अधिग्रहित की जाती हैं उन्हें प्रशिक्षण देकर उच्च पदों पर नौकरी देने के बजाए उन्हें चपरासी और गार्ड आदि की नौकरियों तक सीमित कर दिया जाता है। उन्होंने गाँव में व्याप्त अशिक्षा की समस्या की भी विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि गाँव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। जहां गाँव के स्कूल खिचड़ी विद्यालयों में तब्दील हो चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ शहरों-कस्बों में निजी स्कूल-अंग्रेजी स्कूल खुल गए हैं। गाँव के स्कूल भवन मात्र बनकर रह गए हैं। आज भी सरकारी स्कूलों में जातिगत भेदभाव जारी है। कमजोर तबकों के छात्रों के लिए चलाई जा रही योजनाएं भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रहा है। गाँव में स्वास्थ्य सुविधाओं का भी भारी अभाव बना हुआ है। आशा कार्यकर्ताओं और आंगनबाड़ी केन्द्रों पर गाँव की स्वास्थ्य व्यवस्था निर्भर है। बीमार पड़ने पर ग्रामवासियों को नजदीकी शहर जाना पड़ता है। गाँव से शहर तक पहुँचने हेतु समुचित यातायात सुविधाओं का आज भी भारी अभाव है। सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों में चिकित्सकों और स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है। सरकारें पूँजीपतियों को तो कर्जमाफी दे रही है। किन्तु गरीबों- किसानों से ब्याज समेत पाई-पाई वसूल कर रही है आज लोग स्वकेन्द्रित स्वार्थी होते जा रहे हैं। लोगों की मानसिकता बदल गई है या यूं कहें कि बाजारवाद ने इसे बदल दिया है। गाँव में आज निवेश की मात्रा न्यून है। ज़्यादातर निवेश शहर केन्द्रित हो रहा है। सिंचाई की व्यवस्था भी संकटग्रस्त है। डैम बन गए हैं, लेकिन पानी निकासी के लिए कैनल नहीं बन पाये हैं।
            आगे उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल और राजनेताओं की प्राथमिकता में भी गाँव की बदहाली दूर करना शामिल नहीं रह गया है। आज डिजिटल इंडिया की बात तो हो रही है पर देश की 30 फीसदी आबादी निरक्षर है। आधारभूत सुविधाओं की गारंटी के बगैर गाँव का विकास मुमकिन नहीं है। दूसरे देशों की परिस्थितियां भिन्न है, उसकी हु-ब-हु नकल भारत में नहीं की जा सकती है। भारत में आज भी अंधविश्वास बड़े पैमाने पर व्याप्त है, जो फिजूलखर्ची को बढ़ावा देता है। सामाजिक कुरीतियां भारतीय समाज के विकास में बहुत बड़ी बाधक हैं। भारत के गाँव के लोगों में सरकारी लोक कल्याणकारी योजनाओं और जनपक्षधर क़ानूनों की जानकारी का अभाव देखा जाता है। ग्राम पंचायत विकास कार्यक्रम भी सही ढंग से अमल में नहीं आ पाया है। सामाजिक न्याय विभाग की ढेर सारी योजनाओं से लाभुक वंचित रह जाते हैं। आज गाँव के लोगों को प्रशिक्षित करने वाले सहयोगियों का अभाव है। उपभोक्तावादी संस्कृति की चपेट में गाँव भी आ गए हैं। इस कारण कर्जखोरी की समस्या बढ़ रही है। नौकरशाही की भी गाँव की समस्या दूर करने में रुचि नहीं दिखाई पड़ती है।

दूसरे तकनीकी सत्र में 'भारत के ग्रामीण युवाओं की समस्या' विषय पर चर्चा करते हुए मातृ सेवा संघ इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क, नागपुर के एसोसिएट प्रोफेसर केशव वाल्के ने कहा कि आजकल भारत में 34.3 फीसदी युवा हैं। 13 से 35 वर्ष के लोगों को युवा कहा जाता है। युवाओं में लिंगानुपात तेजी से असंतुलित होता जा रहा है। महिलाओं की तादाद में भारी गिरावट आ रही है। बिहार, राजस्थान, चंडीगढ़, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में लिंगानुपात चिंताजनक गति से असंतुलित होते जा रहे हैं।
            ग्रामीण युवाओं को केंद्र में रखकर उनके मुद्दों को देखें तो युवाओं की शिक्षा व्यवस्था संकट में है। बेरोजगारी का सवाल भी भयावह होता जा रहा है। गाँव से युवाओं को शिक्षा, रोजगार आदि के लिए बड़े पैमाने पर पलायन करना पड़ता है। रोजगार के अभाव में युवा अपराध की तरफ जाने को विवश हैं। ग्रामीण युवाओं को राजनीतिक शक्तियों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए गुमराह किया जा रहा है। राजनीतिक दलों के आईटी सेल युवाओं को टार्गेट कर अपने स्वार्थ में इस्तेमाल कर रहे हैं। ग्रामीण युवाओं को सूचनाओं की सही जानकारी नहीं मिल पा रही है। ग्रामीण युवाओं में बाजार के अनुरूप कौशल का अभाव है। इस कारण उन्हें बाजार में काम नहीं मिल पाता है। ग्रामीण युवा नशे की गिरफ्त में भी लगातार आता जा रहा है। युवाओं के विकास के लिए सरकार कई किस्म के कार्यक्रम चला रही है किन्तु उसका समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
            विषय विशेषज्ञ के सम्बोधन के उपरांत प्रतिभागियों ने बारी-बारी से अपनी राय रखी। सत्र का संचालन डॉ. आमोद गुर्जर ने किया।

भोजन अवकाश के बाद 'ग्रामीण युवा स्त्रियों की समस्या' विषयक तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए मातृसेवा संघ इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क, नागपुर की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्योति निसवाड़े ने कहा कि युवाओं में लैंगिक स्तर पर भिन्नता मौजूद है। स्त्री और पुरुषों की समस्याओं में भिन्नता है। आज भारत को युवाओं का देश कहा जा रहा है। 2011 की जनगणना भी इसकी पुष्टि करता है। लेकिन इसका सबसे नकारात्मक पहलू यह भी है कि शिशु लिंगानुपात, युवा लिंगानुपात में काफी गिरावट दर्ज की जा रही है। लड़कियों के बाल विवाह में थोड़ी कमी आई दिखाई देती है। महिला साक्षरता दर में भी एक हद तक की वृद्धि हुई है। किन्तु पुरुष साक्षरता दर से यह आज भी कम है। रोजगार कि दृष्टि से महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों से काफी कम है। देश में जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ शिक्षण के अवसर और सुविधाओं का विस्तार हुआ है किन्तु बेरोजगारी के सवाल का हल नहीं हो पा रहा है। एक सर्वे बताता है कि आज युवाओं की नजर में गरीबी और बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है।

उन्होंने कहा कि दुनिया भर में युवाओं को शक्ति का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन युवा आज शक्ति संरचना के केंद्र में नहीं है। युवा समाज व्यवस्था का महत्वपूर्ण घटक है। किन्तु समाज की संरचना युवाओं के कितने अनुरूप है, इसे गहराई में जाकर समझने की जरूरत है। युवाओं के समाजीकरण की प्रक्रिया पर ही युवाओं के व्यक्तित्व का विकास निर्भर करता है। युवाओं में भावुकता और आक्रामकता की भावना उनके तार्किक होने के मार्ग में बाधक होती है। युवा महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक व मानसिक समस्याएं होती है। रोजगार की असुरक्षा, आर्थिक असुरक्षा व सामाजिक असुरक्षा युवा महिलाओं की प्रमुख समस्याएँ हैं।
            आगे उन्होंने कहा कि ग्रामीण युवाओं का अपने सवालों को लेकर देश के ग्रामीण हिस्सों में कोई प्रतिरोध दिखाई नहीं पड़ता। इसकी वजहें सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक संरचना और अशिक्षा में निहित है। युवा महिलाओं को समुचित सामाजिक दर्जा प्राप्त नहीं रहता है। युवा होते ही उनके परिजन उनके विवाह की चिंता करने लगते हैं। इस किस्म की सामाजिक परंपरा भी युवा महिलाओं के विकास में बाधक बनते हैं। युवा महिलाओं को अवसर की समानता नहीं मिलती है, महिलाओं को तरह-तरह का शोषण भी झेलना पड़ता है। ये सभी युवा महिलाओं के सशक्तिकरण में बाधक हैं। स्कूल छोड़ने वाले बच्चों में सबसे ज्यादा लड़कियां ही होती हैं। इस कारण वे शिक्षा से वंचित होकर रोजगार के अवसर से वंचित हो जाती है। ग्रामीण स्कूल में लड़कियों के अनुकूल व्यवस्था / संसाधन का घोर अभाव बना हुआ है। पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था में लिंग के आधार पर महिलाओं की भूमिका निर्धारण कर दी गई है। रूढ़िवादी परंपरा की बेड़ियां आज भी स्त्रियों के विकास में कदम-कदम पर बाधक बनी हुई है। ग्रामीण लड़कियों के लिए शिक्षा से ज्यादा प्राथमिकता घरेलू काम करने की ही होती है। इन कारणों से महिलाओं को आगे आने के लिए एक ही साथ कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ता है। महिलाओं को घरेलू हिंसा का भी शिकार होना पड़ता है। उनकी आजादी को तरह-तरह से प्रतिबंधित किया जाता है। इस कारण भी महिलाओं के व्यक्तित्व के समुचित विकास में बाधाएँ आती हैं। परिवार की निर्णय प्रक्रिया में युवा महिलाओं की भूमिका नाममात्र की ही होती है। ज़्यादातर मौकों पर महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया से अलग-थलग रखा जाता है।
            उन्होंने कहा कि ग्रामीण महिलाओं का एक स्वतंत्र संगठन का होना बहुत आवश्यक है तभी युवा महिलाओं का मुकम्मल सशक्तिकरण मुमकिन हो सकता है। आज ग्रामीण युवा महिलाओं को अपनी क्षमता और कौशल को दिखाने का कोई प्लेटफॉर्म मौजूद नहीं है।
            इस सत्र की चर्चा में प्रतिभागियों ने बालिकाओं की शिक्षा पर विशेष ज़ोर देते हुए कहा कि बालिकाओं को बेहतर शिक्षा के जरिये ही शोषण, विषमता आदि से मुक्ति मिल सकती है। 

कार्यशाला के दूसरे दिन के अंतिम चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. ज्योति निसवाड़े ने 'वृद्धि महिलाओं की समस्या' पर बोलते हुए कहा कि अलग-अलग समाज में वृद्धावास्था की अलग-अलग धारणाएँ हैं।  वृद्धावस्था एक यथार्थ और प्राकृतिक प्रक्रिया है। भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में हम देखते हैं कि वृद्धावस्था अत्यंत ही चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। आज पारिवारिक और सामाजिक तौर पर कई किस्म की चुनौतियां पैदा हुई हैं। 19वीं सदी में उम्र के विभाजन को इतना महत्व नहीं दिया जाता था। वृद्धावस्था में आर्थिक तौर पर उत्पादन क्षमता में कमी आ जाती है। इसके साथ ही और कई बदलाव आते हैं। जीवन प्रत्याशा औसत में बढ़ोतरी हुई है। पूर्व में वृद्धों की निर्णय प्रक्रिया में जिस प्रकार की भूमिका होती थी उसमें आज काफी बदलाव आया है। बढ़ते शहरीकरण ने नाभिक परिवारों को बढ़ावा दिया है। संयुक्त परिवार लगभग खत्म होने के कगार पर हैं। इस वजह से भी वृद्धों की स्थिति में काफी परिवर्तन आया है। आज सामाजिक से ज्यादा आर्थिक तत्व परिवार पर ज्यादा असर डाल रहे हैं। इसने भी वृद्धों की स्थिति में बदलाव लाने में अहम भूमिका अदा की है। भारतीय समाज में इन सारे तत्वों का प्रभाव देखा जा सकता है। वृद्धों में भी महिलाओं की समस्याएँ अलग किस्म की हैं, उन्हें वृद्धावस्था में परिवार के बच्चों का लालन-पालन, घरेलू काम में तो योगदान करना पड़ता ही है साथ ही घर के बाहर के काम भी इन्हें करना पड़ता है।
            सत्र का संचालन डॉ आमोद गुर्जर ने किया धन्यवाद एनसीआरआई के डी.एन. दास ने किया।   

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, सुधीर कुमार, कुमारी आशु एवं सोनम बौद्ध.

                                                                                                                                                              


Monday, March 19, 2018

ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन


वर्धा, 19 मार्च, 2018  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र और राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। जिसमें महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, बिहार, तमिलनाडू, नागपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर विश्वविद्यालय,  कोयंबटूर विश्वविद्यालय एवं हरियाणा के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने की और संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। स्वागत वक्तव्य देते हुए केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि अपेक्षा है कि इन सात दिनों में हम संकाय संवर्द्धन कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा करेंगे। पाठ्यक्रम का सामाजिक सरोकार स्पष्ट होना चाहिए। आज पाठ्यक्रम और समाज एक-दूसरे से जुड़ नहीं पा रहा है। पाठ्यक्रम को समाज की जरूरतों के अनुकूल और समाज को बेहतर दिशा में ले जाने वाला होना चाहिए। 

एनसीआरआई- नेशनल काउंसिल ऑफ रुरल इंस्टीट्यूट के डी.एन. दास ने उक्त अवसर पर कहा कि 1995 से एनसीआरआई कार्यरत है। इसका उद्देश्य ग्रामीण भारत के विश्वविद्यालयों को ग्रामीण जरूरतों से जोड़ना है। इसके अनुरूप पाठ्यक्रम को विकसित करने और ग्रामीण समुदाय के साथ तादात्म्य स्थापित करना ही इसका उद्देश्य है।

 अपने अध्यक्षीय वक्तब्य में प्रतिकुलपति प्रो. आनंदवर्द्धन शर्मा ने कहा कि बड़ी उत्सुकता की बात है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय और एनसीआरआई मिलकर सात दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन कर रही है। आपको बताना चाहूँगा कि यह कार्य बहुत बड़ा है। विश्वविद्यालया में वर्ष भर में बहुत से कार्यक्रम होते हैं जो कि बड़ी छाप छोड़ते हैं। उन्होंने उक्त मौके पर कहा कि महात्मा गांधी और विनोबा की कर्मभूमि पर आयोजित हो रही इस कार्यशाला से ग्रामीण क्षेत्र और ग्रामीण विकास से संबन्धित पाठ्यक्रम विकसित करने में मदद मिलेगी। उन्होंने इस कार्यशाला की सफलता के लिए शुभकामना व्यक्त की। उदघाटन सत्र के अंत में आभार प्रकट करते हुए विश्वविद्यालय के कुलसचिव कादर नवाज खान ने कहा कि उम्मीद है कि देश के विभिन्न हिस्सों से आए समाज कार्य के प्राध्यापक इस कार्यशाला से नए अनुभव लेकर जाएंगे।

'ग्रामीण समुदाय का परिचय और संवेदनशीलता' विषयक प्रथम चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए स्नातकोत्तर समाजशास्त्र विभाग, संत तुकड़ोजी महाराज विश्वविद्यालय, नागपुर के प्रो. अशोक बोरकर ने पुरातात्विक सर्वेक्षणों के हवाले से प्राचीनकालीन सामाजिक संरचना के बारे में विस्तारपूर्वक बताया। पुरातात्विक अवशेषों से हमें उत्पादक जातियों के अवशेष मिलते हैं। मातृदेवी, यक्ष-यक्षणी के भी अवशेष मिलते हैं, इसके बाद वैदिक साहित्य से भी हमें पुराने समाज की जानकारी प्राप्त होती है। वैश्यों-क्षत्रियों के गाँव की भी हमें जानकारी मिलती है। हमें आदिवासी गांवों के बारे में भी अहम जानकारियाँ प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि गोंडों का सामुदायिक बोध और पंचायत व्यवस्था अत्यंत ही सुदृढ़-विकसित व्यवस्था आज भी कायम है। उन्होंने कहा कि गाँव एक समुदाय है, उसमें सामुदायिक भावना है। गाँव के लोग सामान्य जीवन जीते हैं। कृषि उनका प्रमुख व्यवसाय है। ग्रामीण समुदाय में एक्य भाव होता है। भारत में हर दौर में सामाजिक व्यवस्था पर सबसे ज्यादा ज़ोर दिया जाता रहा है। कृषि समस्या पर फोकस नहीं किया जाता रहा है। 18वीं सदी में महात्मा फुले ने ही इस पर मजबूती से अपनी बात रखी है। अंग्रेजों के भारत आने के पूर्व भारत के गाँव को स्वयंपूर्ण इकाई मानते थे। प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे की मान्यता थी कि भारत के गाँव स्वयंपूर्ण नहीं थे। कई मामलों में ये गाँव एक-दूसरे पर निर्भर थे। दुबे ने ग्रामीण व्यवस्था के अपने महत्वपूर्ण अध्ययन के निष्कर्ष के आधार पर उक्त बातें कही थी। पश्चिमी समाजशास्त्री राबर्ट रेडफ़ील्ड के विचारों से एस.सी. दुबे के विचार मेल खाते हैं।

आगे उन्होंने कहा कि परिवार भारतीय गाँव की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। उसके बाद दूसरी सबसे महत्वपूर्ण इकाई जाति व्यवस्था है। गाँव में वर्चस्वशाली परिवार गाँव के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक मसलों को नियंत्रित करता है। इन्के परिवार के रिश्तेदार भी इसमें अहम भूमिका अदा करते हैं। उसी प्रकार जाति संरचना भी कार्य करती है। इसका स्थान परिवार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इस प्रकार वर्चस्वशाली जातियों का ग्रामीण समाज पर पूरी तरह से नियंत्रण रहा है। जाति व्यवस्था की संरचना सीढ़ीनुमा है। जाति-वर्ग की संरचना में ब्राम्हण और अस्पृश्य का स्थान नियत होता है, बाकि जाति-वर्ण का स्थान बदलता रहता आया है। उन्होंने कहा कि सरकार की बहुत सारी योजनाएँ अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाती हैं, इसकी जड़ें भी जाति वयवस्था में निहित हैं। गांवों में आज भी अंधविश्वास, जातीय हिंसा और जजमानी व्यवस्था कायम है। इसी के चलते पहले भी गांवों में श्रमिकों का शोषण किया जाता था। अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व भारत में कृषि के साथ-साथ वस्त्र उद्योग और चर्म उद्योग का जाल बिछा हुआ था। यही कारण है कि हर कोई किसी न किसी प्रकार से जीवित रह लेता था। भारत में संयुक्त परिवार कृषि व्यवस्था के अनुकूल थे। देश के वर्तमान कृषि संकट को इसके आईने में समझने की जरूरत है।
            उन्होंने कहा कि गांधी के आगमन के पूर्व भारत का स्वतंत्रता आंदोलन शहर केन्द्रित था। गांधी ने इस केंद्र को बदलकर गाँव केन्द्रित किया था। गांधी की मान्यता थी कि अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भारत के गाँव समृद्ध व साधन संपन्न थे। गांधी के लिए भारत की स्वतंत्रता का अर्थ गांवों की स्वायत्ता थी। वहीं डॉ. अंबेडकर और नेहरू की गांवों के संबंध में दृष्टि भिन्न थी। इनके अनुसार गांवों में लोगों के कर्त्तब्य तो परिभाषित थे, किन्तु ज़्यादातर लोगों के कोई अधिकार नहीं थे। गाँव गणतन्त्र नहीं था, क्योंकि गाँव पर वर्चस्वशाली जातियों का ही आधिपत्य कायम था। वर्चस्वशाली जातियों का आर्थिक संसाधनों व राजनीतिक व्यवस्था आदि पर वर्चस्व रहा है। नेहरू जाति आधारित श्रेणीक्रम को आधुनिक समाज के लिए अनुपयोगी मानते थे। जाति-व्यवस्था मानवाधिकारों के हनन करने के साथ-साथ अवसरों की असमानता के लिए जिम्मेदार रही है। जबकि डॉ. अंबेडकर राजनीतिक लोकतन्त्र के साथ-साथ सामाजिक लोकतन्त्र की बात करते हैं। डॉ. अंबेडकर ने भारतीय सभ्यता को हिन्दू सभ्यता करार देते हुए कहा कि इसमें अस्पृश्यों के लिए कोई स्थान नहीं था। संविधान सभा का बहुमत चाहता था कि गाँव स्वतंत्र भारत की इकाई बने, अंबेडकर इसके खिलाफ थे।

भोजनावकाश के उपरांत 'ग्रामीण समाज की आर्थिक और राजनीतिक संरचना' विषय पर केन्द्रित चर्चा सत्र प्रारम्भ हुआ। विषय विशेषज्ञ नागपुर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रो. श्रीनिवास खानदेवाला ने कुछ सवालों के जरिये अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि क्या भारतीय समाज का राजनैतिक ढांचा पर्याप्त है? उसी प्रकार क्या भारतीय समाज का आर्थिक ढांचा संतोषजनक है? इस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। राजनैतिक पहलू का निर्माण समाज के नियंत्रण कायम किए जाने की जरूरतों के फलस्वरूप होता है। अनियंत्रित समाज का वांछित विकास नहीं हो पाता है, इसमें बिखराव, दिशाहीनता की संभावना बनी रहती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए राजतंत्र का निर्माण हुआ था। स्वतंत्रता के बाद भारत ने जनतंत्र स्वीकार किया। इससे पूर्व पुराने जमाने में आम लोग राजतंत्र में इतना यकीन रखते थे कि राजा की मृत्योपरांत राजा के छोटे से छोटे बच्चे को राजा के बतौर स्वीकार कर लेते थे। फिर राजा को शिक्षित-प्रशिक्षित करने की व्यवस्था थी। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज अभी पूरी तरह से लोकतान्त्रिक नहीं हुआ है। अमेरिका आदि देशों में राष्ट्रपति को सुझाव देने हेतु अलग-अलग विभागों की अलग-अलग सलाहकार समिति बनी हुई है जिसके सुझावों पर राष्ट्रपति अमल करते हैं।
            भारत में आज भी निर्णय प्रक्रिया में इस किस्म की परिपक्वता का अभाव देखा जा सकता है। इसका परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है। इसलिए लोककल्याण और सरकार के नीति निर्धारण में कमी रह जाती है। इसके बीच तालमेल की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए। जनतंत्र में निर्णय प्रक्रिया में विभिन्न समूहों से आए लोग शामिल होते हैं। लोगों की आकांक्षाएँ और सरकार की ज़िम्मेदारी के बीच भी सुस्पष्ट संबंध है। इन चीजों को संविधान निर्धारित करता है। संविधान देश के भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। भारतीय संविधान के संदर्भ में देखें तो सांस्कृतिक, धार्मिक, जातीय, प्रजातीय बहुलता वाले देश में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सबका कल्याण संविधान में सुनिश्चित किया जा सके। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत यात्रा के दौरान यह व्यक्त किया था कि कैसे अपनी विभिन्नताओं को अपने संविधान में समायोजित किए हुए है। जबकि विश्व के अन्य देशों में ऐसी समस्या नहीं है क्योंकि वहाँ की जनसंख्या कम है। भारतीय राजनेताओं को भी भारतीय संस्कृति, धर्म एवं इतिहास का ज्ञान होना चाहिए तभी वो भारतीय विविधताओं का संयोजन कर सकेंगे।

आगे उन्होंने कहा कि राजनैतिक संरचना कौन बनाता है? इसपर किसका प्रभाव है, क्या सभी इससे संतुष्ट हैं? इसपर भी चर्चा आवश्यक है। क्या सभी संविधान से संतुष्ट हैं इसपर भी चर्चा आवश्यक है। क्योंकि समाज इस पर दबाव डालता है। वर्तमान में राजनीतिक शक्ति का हस्तांतरण बाजार के हवाले होता जा रहा है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी अहम चीजों की कीमत बाजार तय कर रहा है। लोक कल्याण के कार्य आज बाजार की भेंट चढ़ रहे हैं। देश में ऐसे आर्थिक निर्णय लिए जा रहे हैं, जिसे किसी भी मायने में जनतान्त्रिक नहीं कहा जा सकता है। नोटबंदी के जितने फायदे गिनाए गए थे, उस मोर्चे पर विफलता हाथ लगी है। वहीं जीएसटी का मौजूदा स्वरूप आम लोगों के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। आज तमाम महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाएं असहाय प्रतीत हो रही हैं, यह लोकतन्त्र के लिए और जनहित की दृष्टि से अत्यंत ही खतरनाक स्थिति है। 


रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, डिसेन्ट साहू, सुधीर कुमार, आशु बौद्ध एवं सोनम बौद्ध.



Monday, February 2, 2015

Restoring Mental Health In India: Pluralistic Therapies and concepts

    
प्रस्तुत पुस्तक ब्रिगिट्टे सेबास्तिया के संपादन में और ऑक्सफोर्ड यूनी. प्रेस द्वारा प्रकाशित है। शीर्षक से ही पता चल जाता है कि इसमें भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न रूपों में मानसिक स्वास्थ्य पर उपचार कर लाभ पहुंचानेवाली थेरेपिज का विश्लेषण है, विभीन्न लेखकों द्वारा किए गए शोध अध्ययनों के अंतर्गत पाए गए विश्लेषण को इस किताब में लेखिका ने संपादित किया है.  तीन भागों में वर्गीकृत इस किताब के पहला भाग रिस्टोरिंग मेंटल हेल्थ विथ कोडिफाइड इन्डियन मेडिसिन्स इस उपशीर्षक के अंतर्गत है। द्वितीय भाग में सांस्कृतिक आधार बताते हुए लोकाचार में निहित थेरेपिज का विश्लेषण दिया है, जिसका उपशीर्षक रेस्टोरिंग मेंटल हैल्थ विथ फ़ोक थेरेपी है। तीसरे भाग में रेस्टोरिंग मेंटल हेल्थ विथ स्यायकियाट्रि पर चर्चा की है.
प्रथम भाग में ओ. शामसुंदरम द्वारा तमिलनाडु में मनोविकार से संबंधित सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं चिकित्सात्मक दृष्टिकोण का विश्लेषण किया गया है. तमिलनाडु में द्रविडीयन संस्कृति के अनुसार मनोविकार पर सिद्धा’ (तमिल में सिट्टा (Citta)) चिकित्सा व्यवस्था प्राचीन काल से चलती आ रही है उसी व्यवस्था का आज के समय में उपयोग की ओर लेखक ने ध्यान खिंचना चाहा है. लेखक का मानना है कि यह व्यवस्था पश्चिमी अवधारणा के अनुसार देखे तो कायिक (Somatotype) जैसा लगती है. सिद्धा व्यवस्था के अनुसार मानवी शरीर को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता रहा है. इस वर्गीकरण के अनुसार व्यक्तित्व- एक सामान्य व्यक्तित्व होता है, दुसरा, Alal Utal (सामान्य से थोड़े होशियार और प्रभावकारी व्यक्तित्व), तीसरे में, Iya Utal (इस वर्ग में आनेवाले लोग खुशनुमा व्यक्तित्व के होते है और शारीरिक रूप से भी बड़े स्वस्थ होते हैं) आते हैं. इन तीनों के साथ ही इन्हें मिलाकर और छ: उपप्रकारों में बांटकर व्यक्तित्व का विश्लेषण किया गया है. लेखक ने इस आलेख में तमिलनाडु के आत्महत्याओं के कारणों की भी खोज करने की कोशिश की हैं. जिसमें वह इतिहास में उसके साक्ष्यों को खोजते हुए राजा चेरा (King Chera) तक पहुँच जाते है. वहां के मंदिरों में भी मनोचिकित्सा जैसी व्यवस्था पायी गयी है, इस ओर ध्यान खींचते है,  लेखक ने गुनासिलम (Gunasilam), तिरुविदाईमारुतुर (Tiruvidaimaruthur) एवं शोलिंगुर (Sholingur) के मंदिरों की मनोचिकित्सा व्यवस्था का विश्लेषण किया है. निष्कर्ष के रूप में लेखक का कहना है कि पश्चिमी मनोचिकित्सा के शब्दावली से साम्य रखनेवाले सभी साक्ष्य तमिल साहित्य और संस्कृति में मिलते हैं, मनोचिकित्सा के लिए उपयोगी थेरेपिज भी आज के पश्चिमी मनोचिकित्सा में पाए जाने वाले कायिक दृष्टिकोण (Somatotype) की तरह ही दीखाई देती हैं. 
प्रथम भाग के द्वितीय आलेख नादिया गिग्युरे (Nadiya Giguere) द्वारा केरल के गवर्मेंट आयुर्वेदिक मेंटल हॉस्पिटल में किया गया एथनोग्राफिक अध्ययन है. लेखिका ने कुछ ख़ास शब्दों पर जोर देते हुए वहां की व्यवस्था और उस व्यवस्था में उपचार प्राप्त करने वाले रोगी दोनों का व्यक्तिक अध्ययन किया है. लेखिका ने डोसा (Dosa), सत्वबलम् (Satvabalam), जेनेस (Genes) और पूजा जैसे शब्दों का नृवंशीय वर्णन किया है. लेख का नाम Dosa, Satvabalam, Genes and Poojaa: A God for Everything; An Ethnographic Study Of Government Ayurvedic mental Hospital है. लेखिका का कहना है कि सरकारी आयुर्वेदिक मेंटल हॉस्पिटल मुलत: चरक संहिता, सुश्रुत संहिता एवं अष्टांगह्रदय जैसे आयुर्वेदिक ग्रंथों पर आधारित उपचार पर मान्यता रखता है, अत: मानसिक रोगियों पर वह इसीका उपयोग करते हैं. यहाँ पर मनोरोग को छ: उन्मादों के रूप में देखा जाता है और उसी के आधार पर उन्माद संबंधी विकारों का वर्गीकरण किया जाता है. जैसे- पित्तउन्माद (पित्त से), कफोन्माद (कफ से), वातोन्माद (वायु से), सन्निकोन्माद (उक्त तीनों के मिश्रण से), अधिजोन्माद (मानसिक धक्का या सदमा) और अंत में विषजोन्माद (जहर या उससे संबंधित चीजों के बनने से)। साथ ही शरीर को देखने का दृष्टिकोण बताते हुए लेखिका हॉस्पिटल में अभ्यासकों (Practissioner)  द्वारा उपयोग में लाए जानेवाले शब्द जैसे- डोसा शब्द का उपयोग करती हैं। डोसा से तात्पर्य यहाँ अलग है, यह शरीर को समझने के लिए किया गया है. उनका मानना है कि  इसी आधार पर वह शरीर के स्वस्थता की जांच करते हैं. इसे आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में थ्री डोसा व्यवस्थाके नाम से भी जाना जाता है. लेखिका ने इस व्यवस्था को जानने की कोशिश की है साथ ही काउन्सलिंग जैसी पश्चिमी अवधारणा की जगह लेता हुआ सत्वबलम (शक्ति को बढ़ाना), को भी व्याख्यायित किया है. लेखिका के अनुसार आयुर्वेदिक मनोचिकित्सा में उपयोग किए जाने वाले सभी उपकरण खुले और लचीले होने के कारण वहां के समाज-सांस्कृतिक परिदृश्य में उसका उचित प्रभाव मनोरोगियों पर पड़ता नजर आता है.  
सी. कुमार बाबू ने The Relevance of Yoga and Mediatation in the Management of Common Mental Disorder में यह दर्शाने की कोशिश की है कि योग किस तरह सामान्य मानसिक विकारों के उपचार में सहायक बन रहा है, साथ ही आज के समय में योग थेरेपी पर पश्चिमी मनोचिकित्सा जगत में किस तरह की चर्चा हो रही है, इस ओर भी ध्यान खींचना चाहा है. इसके लिए उन्होंने मनोचिकित्सा के जर्नलों में छपे आलेखों का आधार लिया है. महत्वपूर्ण बात यह है कि योगा को एक थेरेपी के रूप में प्रयोग करने वाले किस तरह उसे मनोचिकित्सा का एक बेहतर उपकरण बता रहे हैं इस ओर लेखक ने  ध्यान खींचना चाहा है. लिखते हैं...
2004  में एस. बी. एस. खालसा ने संदर्भ जालीय विश्लेषण  (Bibiometric Analysis) का आधार लिया जिसमें Indian Journal of Physiology एवं Pharmacology महत्वपूर्ण थे. 2004 तक १८१ प्रकाशित जर्नलों में से ८१ जर्नल  लगभग 50 अलग-अलग राष्ट्रों से प्रकाशित हो चुके थे; भारतीय जर्नलों में 96 में से 27, U.S. जर्नल में ४३ में से 24, ब्रिटिश जर्नल में २१ में से ११ और अन्य 12 राष्ट्रों से छपने वाले २१ में से १९ जर्नल योगा पर आधारित थे, साथ ही ३४ प्रकाशन ऐसे थे जो केवल योगा विशेषज्ञता वाले जर्नल को प्रकाशित करते थे. यह सब दबावजन्य रोग एवं चिंता से संबंधित बीमारियों पर किए जाने वाले उपचार के आधार पर दिया गया है.
ग्रोवर (१९९४;१५५) द्वारा किए गए अध्ययन का हवाला देते हुए लेखक लिखते है कि कॉम्प्रेहेंसिव योगा थेरेपीका समान्य मानसिक रोगों पर किए गए उपचारों के परिणाम काफी महत्त्वपूर्ण है, लगभग 50 प्रतिशत या उससे अधिक मात्रा में इस थेरेपी ने ऐसे रोगों के लक्षणों को नष्ट कर दिया है. ७३.९ प्रतिशत रोगियों की प्रतिक्रयाएं अच्छी रही अन्य थेरेपिज को ४२.५ प्रतिशत प्रतिक्रयाएं  मिली. यह अध्ययन १९८२ में बी.बी. सेठी द्वारा किया गया था.
            १९७९ में बालकृष्णा ने अध्ययन किया जिसका हवाला ग्रोवर देते है. योगा थेरेपी एवं ड्रग थेरेपी का तुलनात्मक अध्ययन  था, इसमें 75 न्युरोटीक रोगियों को शामिल किया गया था. योगा थेरेपी इन मरीजों को दो महीने तक सप्ताह में छः बार दी गयी जिसका प्रत्येक सेशन 45-60 मिनट का होता था. चिकित्सकों द्वारा जांचने के बाद पता चला कि ड्रग थेरेपी योगा थेरेपी से ज्यादा प्रभावशाली रही परन्तु मनोवैज्ञानिक परीक्षणों ने यह दिखाया कि चिंता व सामाजिक समायोजन में ड्रग थेरेपी से ज्यादा अच्छी योगा थेरेपी रही. मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के अनुसार ड्रग थेरेपी के कारण केवल दबाव में महत्त्वपूर्ण कमी आयी लेकिन चिंता और सामाजिक समायोजन में परिणाम न के बराबर रहा. इस अंतर्विरोध में योगा थेरेपी का के कारण चिंता, दबाव स्तर एवं सामाजिक समायोजन में महत्त्वपूर्ण सुधारात्मक परिणाम देखा गया.
            इसी को मद्देनजर रखते हुए WHO मानसिक स्वास्थ्य के घटकों को एक समेकित स्वरूप देकर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के रूप में इससे संबंधित कार्यकर्ताओं की मांग से संबंधित तकनीक की सूचनाएं प्रदान कर रही है. साथ ही जिला स्तर के प्रत्येक मानसिक स्वास्थ्य अस्पतालों में इसे चलाने की कोशिश में हैं इसके लिए रोटरी एवं लायन्स क्लबों से बातचीत जारी है. (Sebastia, 2009, पृ. 91)
            द्वितीय भाग में Restoring mental Health with Folk Therapy पहला आलेख पिलार गलियाना अबाल (Pilar Galiana Abal) द्वारा When God Heals... Can Darsan be a Therapy? द्वारा लिखा गया है,  इस आलेख में लेखक द्वारा पिछले तीन वर्षों से मुंबई के बाबुलनाथ मंदिर में किए गए क्षेत्र अध्ययन के दौरान पाए गए तथ्यों का विश्लेषण है. मंदिर में विभिन्न जाति-धर्मों के आने वाले दर्शनार्थियों के साक्षात्कार एवं अवलोकन के आधार पर हिन्दू धर्म में प्राचीन से चली आ रही दर्शनपरम्परा को एक थेरेपी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है और इसके लिए पुरानों के तथ्य देने की कोशिश की गयी है.
लेखक ने कैथरीन बेल (Cathrine Bell) (१९९७) की Rituals Perspectives and Dimentions का हवाला देते हुए लिखा है दर्शन को आने वाले सभी पुरुष प्रतिभागियों की दर्शन परंपरा को को एक गिफ्ट एक्सचेंज धर्मकृत्य (Rite of Gift Exchange) के रूप में देखा जा सकता है, उनके लिए यह कोई मनस्ताप पूर्ण धार्मिक कृत्य नहीं हैं क्योंकि यह प्राथमिक रूप से प्रतिभागी द्वारा किया गया मानवी भक्ति का लेनदेन’ (Human Divine Transanctions) है जिसमें सीधे गुणगान, प्रार्थना, याचना के सामर्थ्य से एक मांग रखी जाति है साथ ही भक्त अपने भलाई (Well-Being) के लिए अपनी इस भक्तिमय भागीदारी को वापस लेने का सामर्थ्य भी शामिल होता है. (Sebastia, 2009, पृ. 97)  अर्थात दर्शनके पीछे मुख्य उद्देश्य यह होता है कि भक्त उस भगवान् के प्रति प्रेम और भक्ति दिखाएं जिसके बदले दर्शनार्थी यह मानकर चलता है कि भगवान् भी उसे प्रेम सुरक्षा प्रदान करेगा.
लेखक के अनुसार दर्शनार्थियों में कुछ को बीमारियों के विभीन्न दशाओं के अनुभव के साथ पाया गया, जैसे- निद्रारोग, चिंता, दबाव और   व्योमोहाभ लक्षण (Paranoid Syndrome). कुल ३५ दर्शनार्थियों में से ज्यादातर लोगों के साथ साक्षात्कार किया गया जिसमें प्रतिभागियों ने यह दावा किया कि वे दर्शन से मानसिक सहायता प्राप्ति की कोशिश कर रहे थे, जिसके बाद उनके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार भी आया है.
आलेख के पहले हिस्से में लेखक ने दर्शन के धार्मिक कृत्य को ‘Seeing And Touching’के परम्परा के साथ जोड़कर देखा है. साथ ही भारतीय धर्मग्रंथों का आधार लेते हुए इस दर्शनका विश्लेषण किया है. द्वीतीय भाग में लेखक द्वारा बबुलनाथ मंदिर में आनेवाले दर्शनार्थियों के पूरे दर्शन पद्धति का ब्योरा दिया है जिसमें उनके द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कृत्य का मनोविश्लेषनात्मक पद्धति से विवेचन किया है, जैसे- प्रतिभागियों का मंदिर में प्रवेश, शिवलिंग पर चढ़ावे के लिए फूल-पत्ते ले जाना उसे शिवलिंग पर चढ़ाना, शिवलिंग को चूमना, स्पर्श करना, यहाँ तक कि भीड़ के कारण पुरोहित द्वारा दबाव में जल्दी करोकहना उसके बाद भी किसी भक्त का मंदिर में किसी कोने में जाकर वहीँ से शिवलिग के प्रति समर्पित भाव से देखना, इन सभी छोटी-छोटी चीजों का मनोवैज्ञानिक अर्थ निकालकर लेखक ने इसे Ethno-Psychoanalytical  Approach से विश्लेषित किया है.  राजू की केस स्टडी से उन्होंने इस बात को स्थापित करने की कोशिश की है कि दर्शन एक थेरेपी के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है.
तीसरे भाग में Restoring Mental Health With Psychiatry  प्रतिमा मूर्ति एवं संजीव जैन द्वारा बैंगलोर में पागलखानों में दिए जाने वाले उपचार के दृष्टिकोणों का अध्ययन किया है जिसमें एतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देकर ब्रिटिश पूर्व भारत, ब्रिटिशकालीन भारत एवं समकालीन समय में इसकी स्थितियों का विवरण अपने आलेख Dignosis and Treatment Approches at the Asylum in Bangalore  में किया है. 
स्वास्थ्य संबंधी आधुनिक प्रशानिक उपकरणों, हॉस्पिटल का उदय मध्य पूर्व में दिखाई देता है. भारतीय परिदृश्य में देखें तो दक्षिण एशियाई प्रदेशों में हॉस्पिटल्स जैसे प्रबंध दिखाई देते हैं. (वर्मा,१९५३, ‘History of Psychiatry  in India and Pakistan, Indian Journal of Neurology and Psychiatry, Vol-4. P.P.-138-64)
लेखक ने भारतीय द्वीप में शुरुआती समय में प्रचलित व्ययक्तिक रूप से चिकित्सा सेवा में लगे वैद्य एवं हाकिम दोनों का 14 वी सदी तक के साक्ष्य दिए हैं. मोहम्मद तुग़लक एवं उसके बाद फिरुज तुगलक को रेखांकित करते हुए इस बात को बाल दिलाते है कि उस समय में हॉस्पिटल जैसी अवधारणा थी किन्तु वह मुख्यत: सैनिकों, खानाबदोश-घुमक्कड़ एवं परदेशियों के लिए थी. (Sebastia, 2009, पृ. 213) 
लेखक के अनुसार १५००-१७५० यह वह समय था जब भारत में यूरोपीय प्रभाव बढता गया इसका सीधा प्रभाव दक्षिण एशिया पर हुआ, जिससे वहां के लोगों में यूरोपियन मेडिसिनके प्रति जागरूकता बढ़ने लगी. युद्धों की श्रुंखला के बाद 18 वी शताब्दी के आते तक पश्चिमी एवं भारतीय चिकित्सा एकत्रित रूप से कार्यरत होने लगी. १९ वी सदी के मध्य तक इन दोनों चिकित्सा प्रणालियों में उपयुक्त शरीरविज्ञान आधारित ज्ञान ही बुनियाद बन गया. ह्यूमोरल(शरीर द्रवीय) कंसेप्ट टू जस्टिफाई द कॉउजेशन ऑफ़ डिजीज जो पश्चिम से बनी है और भारतीय अवधारणा के अनुसार थ्योरी ऑफ़ एलिमेंट इन दोनों में कोई समानता नहीं दीखाई देती थी फिर भी आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में समानता पर आधारित चर्चा एवं लेन-देन शुरू हुआ था. (Sebastia, 2009, पृ. 214)
तीसरा भाग इसी तरह के अन्य आलेखों से भरा है. मनोचिकित्सा प्राणाली से मानसिक स्वास्थ्य को किस तरह से पुनः प्रस्थापित किया जा सकता है, इस बात पर जोर दिया गया है.
समकालीन समय में यह किताब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारतीय चिकित्सा पद्धतियों का ऐतिहासिक एवं समकालीन विश्लेषण प्राथमिक तथ्यों पर आधारित है. मनोवैज्ञानिक एवं मनोचिकित्सा के अध्ययन कर्ताओं के लिए यह किताब महत्त्वपूर्ण है. किन्तु लेखिका ने समकालीन सामाजिक विमर्श या नव सामाजिक विज्ञान को दरकिनार किया है. इस किताब में भारतीय चिकित्सा विद्याओं को देशज ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करने की बजाय मुख्यधारा के चिकित्सा प्रणाली के साथ साम्य जुटाने पर ज्यादा बल दिया है. तीन हिस्सों में से किसी भी आलेख में कारपोरेट अर्थव्यवस्था के दबाव के कारण भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को मिलने वाला स्थान, इस पर बात नहीं की गई. किताब पूरी तरह से निष्क्रिय अकादमिक संश्लेषण का नतीजा लगती है. हालांकि इस तरह के तथ्य जुटाने में ज्यादा समय खर्च होता है और ऐसे में इन तथ्यों को केवल एकांगी रूप से देखने का नजरिया मानसिक स्वास्थ्य से ज्यादा शरीरक्रिया चिकित्सा प्रणाली का रूप धारण करता है. किताब इतनी सरल लिखी गई है कि सामान्य से सामान्य समझ वाला भी इसे समझ सकता है. मानसिक स्वास्थ्य के शोधार्थियों के लिए ऐतिहासिक तथ्य एवं समकालीन थेरेपिज का स्वरूप देखने के लिए इसे एक बार जरूर पढनी चाहिए.       
-Brigitte Sebastia (edi.), 2009






निलामे गजानन सूर्यकांत 
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र,
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा।  
gajanannilame@gmail.com