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Tuesday, March 20, 2018

संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के दूसरे दिन ग्रामीण समुदाय की समस्याओं पर हुई गहन चर्चा


वर्धा, 20 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के दूसरे दिन चर्चा सत्र के पूर्व पाँच राज्यों के विभिन्न विश्वविद्यालय से आए प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए।

दूसरे दिन के प्रथम चर्चा सत्र में मातृ सेवा संघ इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क, नागपुर के एसोसिएट प्रोफेसर केशव वाल्के ने 'ग्रामीण समुदाय की समस्याएं' विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत की लगभग 70 फीसदी आबादी गाँवों में रहती है। आज विकास के नाम पर गाँव की भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। इससे विस्थापन की समस्या पैदा हो रही है। महाराष्ट्र सरकार की इस वर्ष 13 करोड़ वृक्ष लगाने की योजना है तब सवाल यह उठता है कि क्या इतनी जमीन उपलब्ध है। वहीं दूसरी तरफ अंबानी व रामदेव जैसे व्यापारियों को राज्य की सैकड़ों एकड़ वनभूमि दी गई है। अंतर्विरोधी बात तो यह भी है कि पूंजीपतियों को कृषि भूमि वनभूमि तो दी जा रही है किन्तु भूमिहीनों को जमीन नहीं दी जा रही है। भूमि अधिग्रहण के बदले किसानों को मुआवजे के बतौर पैसे दिये जा रहे हैं। इस पैसे का सदुपयोग होने के बजाय विलासिता की वस्तुओं को खरीदने में खर्च हो रहा है। आज विस्थापित परिवारों की स्थिति बेहद दयनीय होती जा रही है। विस्थापितों के मुकम्मल पुनर्वास की सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है। रोजगार नहीं होने की वजह से अपराधीकरण बढ़ रहा है। गाँव में रहने वाले ज़्यादातर लोग कृषि पर निर्भर हैं। मिट्टी और कृषि की समुचित जानकारी के अभाव में बहुफ़सली कृषि नहीं हो पा रही है। सरकार ने योजना में सभी के लिए ऑन लाइन आवेदन करने का प्रावधान किया है। किन्तु गाँव के लोगों को इसकी समुचित जानकारी ही नहीं है। कर्जमाफ़ी वगैरह को भी सही ढंग से जमीन तक पहुंचाया जा सका है। किसानों को सही वक्त पर बैंक से लोन नहीं मिल पाता है। इसके विपरीत समर्थ लोगों को सैकड़ों करोड़ रूपये का लोन आसानी से मिल जाता है और वे पैसा हजम कर जा रहे हैं।
            उन्होंने महाराष्ट्र में वन अधिकार प्राप्त करने वाले आत्मनिर्भर गाँवों की भी विस्तृत चर्चा की। उन्होंने बताया कि गाँव की सबसे बड़ी समस्या रही है कि यहाँ भूमि का वितरण अत्यंत ही असमान है। गाँव की जमीन आज शहर के धनी लोग खरीद ले रहे हैं। टाइगर रिजर्व आदि के नाम पर किसानों की जमीन तो ले ली जा रही है किन्तु वही जमीन बड़े-बड़े रेस्टोरेन्ट और होटल खोलने के लिए पूंजीपतियों को मुहैया कराई जा रही है। गाँव वालों की जमीन अधिग्रहण कर जो जल परियोजनाएं बन रही हैं, उसके लाभ से भी गाँव वंचित हो रहा है। गाँवों का पानी शहरों को आपूर्ति की जा रही है। ग्रामीण संसाधनों के लाभ से गाँव को वंचित करते हुए उसे शहर के हवाले किया जा रहा है। पूरे देश में बाघ अभयारण्य में से 6 अकेले विदर्भ में ही हैं। विदर्भ का पूरा जंगल अगर आरक्षित है तो गाँव के पशु कहाँ जाएंगे? आज यह सवाल उठ खड़ा हुआ है। मध्यप्रदेश के 90 गाँव बाघ परियोजना के दायरे में आ गए हैं। वहीं दूसरी तरफ जनपक्षधर क़ानूनों को राष्ट्रीय विकास का तर्क देते हुए बदला जा रहा है। ग्राम सभाओं के अधिकारों को अध्यादेश के जरिये छीना जा रहा है। परियोजनाओं के लिए भूमि दिये जाने का निर्णय लेने का अधिकार ग्राम सभा से अपहृत कर लिए गए हैं। जिनकी जमीनें अधिग्रहित की जाती हैं उन्हें प्रशिक्षण देकर उच्च पदों पर नौकरी देने के बजाए उन्हें चपरासी और गार्ड आदि की नौकरियों तक सीमित कर दिया जाता है। उन्होंने गाँव में व्याप्त अशिक्षा की समस्या की भी विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि गाँव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। जहां गाँव के स्कूल खिचड़ी विद्यालयों में तब्दील हो चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ शहरों-कस्बों में निजी स्कूल-अंग्रेजी स्कूल खुल गए हैं। गाँव के स्कूल भवन मात्र बनकर रह गए हैं। आज भी सरकारी स्कूलों में जातिगत भेदभाव जारी है। कमजोर तबकों के छात्रों के लिए चलाई जा रही योजनाएं भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रहा है। गाँव में स्वास्थ्य सुविधाओं का भी भारी अभाव बना हुआ है। आशा कार्यकर्ताओं और आंगनबाड़ी केन्द्रों पर गाँव की स्वास्थ्य व्यवस्था निर्भर है। बीमार पड़ने पर ग्रामवासियों को नजदीकी शहर जाना पड़ता है। गाँव से शहर तक पहुँचने हेतु समुचित यातायात सुविधाओं का आज भी भारी अभाव है। सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों में चिकित्सकों और स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है। सरकारें पूँजीपतियों को तो कर्जमाफी दे रही है। किन्तु गरीबों- किसानों से ब्याज समेत पाई-पाई वसूल कर रही है आज लोग स्वकेन्द्रित स्वार्थी होते जा रहे हैं। लोगों की मानसिकता बदल गई है या यूं कहें कि बाजारवाद ने इसे बदल दिया है। गाँव में आज निवेश की मात्रा न्यून है। ज़्यादातर निवेश शहर केन्द्रित हो रहा है। सिंचाई की व्यवस्था भी संकटग्रस्त है। डैम बन गए हैं, लेकिन पानी निकासी के लिए कैनल नहीं बन पाये हैं।
            आगे उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल और राजनेताओं की प्राथमिकता में भी गाँव की बदहाली दूर करना शामिल नहीं रह गया है। आज डिजिटल इंडिया की बात तो हो रही है पर देश की 30 फीसदी आबादी निरक्षर है। आधारभूत सुविधाओं की गारंटी के बगैर गाँव का विकास मुमकिन नहीं है। दूसरे देशों की परिस्थितियां भिन्न है, उसकी हु-ब-हु नकल भारत में नहीं की जा सकती है। भारत में आज भी अंधविश्वास बड़े पैमाने पर व्याप्त है, जो फिजूलखर्ची को बढ़ावा देता है। सामाजिक कुरीतियां भारतीय समाज के विकास में बहुत बड़ी बाधक हैं। भारत के गाँव के लोगों में सरकारी लोक कल्याणकारी योजनाओं और जनपक्षधर क़ानूनों की जानकारी का अभाव देखा जाता है। ग्राम पंचायत विकास कार्यक्रम भी सही ढंग से अमल में नहीं आ पाया है। सामाजिक न्याय विभाग की ढेर सारी योजनाओं से लाभुक वंचित रह जाते हैं। आज गाँव के लोगों को प्रशिक्षित करने वाले सहयोगियों का अभाव है। उपभोक्तावादी संस्कृति की चपेट में गाँव भी आ गए हैं। इस कारण कर्जखोरी की समस्या बढ़ रही है। नौकरशाही की भी गाँव की समस्या दूर करने में रुचि नहीं दिखाई पड़ती है।

दूसरे तकनीकी सत्र में 'भारत के ग्रामीण युवाओं की समस्या' विषय पर चर्चा करते हुए मातृ सेवा संघ इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क, नागपुर के एसोसिएट प्रोफेसर केशव वाल्के ने कहा कि आजकल भारत में 34.3 फीसदी युवा हैं। 13 से 35 वर्ष के लोगों को युवा कहा जाता है। युवाओं में लिंगानुपात तेजी से असंतुलित होता जा रहा है। महिलाओं की तादाद में भारी गिरावट आ रही है। बिहार, राजस्थान, चंडीगढ़, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में लिंगानुपात चिंताजनक गति से असंतुलित होते जा रहे हैं।
            ग्रामीण युवाओं को केंद्र में रखकर उनके मुद्दों को देखें तो युवाओं की शिक्षा व्यवस्था संकट में है। बेरोजगारी का सवाल भी भयावह होता जा रहा है। गाँव से युवाओं को शिक्षा, रोजगार आदि के लिए बड़े पैमाने पर पलायन करना पड़ता है। रोजगार के अभाव में युवा अपराध की तरफ जाने को विवश हैं। ग्रामीण युवाओं को राजनीतिक शक्तियों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए गुमराह किया जा रहा है। राजनीतिक दलों के आईटी सेल युवाओं को टार्गेट कर अपने स्वार्थ में इस्तेमाल कर रहे हैं। ग्रामीण युवाओं को सूचनाओं की सही जानकारी नहीं मिल पा रही है। ग्रामीण युवाओं में बाजार के अनुरूप कौशल का अभाव है। इस कारण उन्हें बाजार में काम नहीं मिल पाता है। ग्रामीण युवा नशे की गिरफ्त में भी लगातार आता जा रहा है। युवाओं के विकास के लिए सरकार कई किस्म के कार्यक्रम चला रही है किन्तु उसका समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
            विषय विशेषज्ञ के सम्बोधन के उपरांत प्रतिभागियों ने बारी-बारी से अपनी राय रखी। सत्र का संचालन डॉ. आमोद गुर्जर ने किया।

भोजन अवकाश के बाद 'ग्रामीण युवा स्त्रियों की समस्या' विषयक तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए मातृसेवा संघ इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क, नागपुर की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्योति निसवाड़े ने कहा कि युवाओं में लैंगिक स्तर पर भिन्नता मौजूद है। स्त्री और पुरुषों की समस्याओं में भिन्नता है। आज भारत को युवाओं का देश कहा जा रहा है। 2011 की जनगणना भी इसकी पुष्टि करता है। लेकिन इसका सबसे नकारात्मक पहलू यह भी है कि शिशु लिंगानुपात, युवा लिंगानुपात में काफी गिरावट दर्ज की जा रही है। लड़कियों के बाल विवाह में थोड़ी कमी आई दिखाई देती है। महिला साक्षरता दर में भी एक हद तक की वृद्धि हुई है। किन्तु पुरुष साक्षरता दर से यह आज भी कम है। रोजगार कि दृष्टि से महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों से काफी कम है। देश में जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ शिक्षण के अवसर और सुविधाओं का विस्तार हुआ है किन्तु बेरोजगारी के सवाल का हल नहीं हो पा रहा है। एक सर्वे बताता है कि आज युवाओं की नजर में गरीबी और बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है।

उन्होंने कहा कि दुनिया भर में युवाओं को शक्ति का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन युवा आज शक्ति संरचना के केंद्र में नहीं है। युवा समाज व्यवस्था का महत्वपूर्ण घटक है। किन्तु समाज की संरचना युवाओं के कितने अनुरूप है, इसे गहराई में जाकर समझने की जरूरत है। युवाओं के समाजीकरण की प्रक्रिया पर ही युवाओं के व्यक्तित्व का विकास निर्भर करता है। युवाओं में भावुकता और आक्रामकता की भावना उनके तार्किक होने के मार्ग में बाधक होती है। युवा महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक व मानसिक समस्याएं होती है। रोजगार की असुरक्षा, आर्थिक असुरक्षा व सामाजिक असुरक्षा युवा महिलाओं की प्रमुख समस्याएँ हैं।
            आगे उन्होंने कहा कि ग्रामीण युवाओं का अपने सवालों को लेकर देश के ग्रामीण हिस्सों में कोई प्रतिरोध दिखाई नहीं पड़ता। इसकी वजहें सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक संरचना और अशिक्षा में निहित है। युवा महिलाओं को समुचित सामाजिक दर्जा प्राप्त नहीं रहता है। युवा होते ही उनके परिजन उनके विवाह की चिंता करने लगते हैं। इस किस्म की सामाजिक परंपरा भी युवा महिलाओं के विकास में बाधक बनते हैं। युवा महिलाओं को अवसर की समानता नहीं मिलती है, महिलाओं को तरह-तरह का शोषण भी झेलना पड़ता है। ये सभी युवा महिलाओं के सशक्तिकरण में बाधक हैं। स्कूल छोड़ने वाले बच्चों में सबसे ज्यादा लड़कियां ही होती हैं। इस कारण वे शिक्षा से वंचित होकर रोजगार के अवसर से वंचित हो जाती है। ग्रामीण स्कूल में लड़कियों के अनुकूल व्यवस्था / संसाधन का घोर अभाव बना हुआ है। पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था में लिंग के आधार पर महिलाओं की भूमिका निर्धारण कर दी गई है। रूढ़िवादी परंपरा की बेड़ियां आज भी स्त्रियों के विकास में कदम-कदम पर बाधक बनी हुई है। ग्रामीण लड़कियों के लिए शिक्षा से ज्यादा प्राथमिकता घरेलू काम करने की ही होती है। इन कारणों से महिलाओं को आगे आने के लिए एक ही साथ कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ता है। महिलाओं को घरेलू हिंसा का भी शिकार होना पड़ता है। उनकी आजादी को तरह-तरह से प्रतिबंधित किया जाता है। इस कारण भी महिलाओं के व्यक्तित्व के समुचित विकास में बाधाएँ आती हैं। परिवार की निर्णय प्रक्रिया में युवा महिलाओं की भूमिका नाममात्र की ही होती है। ज़्यादातर मौकों पर महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया से अलग-थलग रखा जाता है।
            उन्होंने कहा कि ग्रामीण महिलाओं का एक स्वतंत्र संगठन का होना बहुत आवश्यक है तभी युवा महिलाओं का मुकम्मल सशक्तिकरण मुमकिन हो सकता है। आज ग्रामीण युवा महिलाओं को अपनी क्षमता और कौशल को दिखाने का कोई प्लेटफॉर्म मौजूद नहीं है।
            इस सत्र की चर्चा में प्रतिभागियों ने बालिकाओं की शिक्षा पर विशेष ज़ोर देते हुए कहा कि बालिकाओं को बेहतर शिक्षा के जरिये ही शोषण, विषमता आदि से मुक्ति मिल सकती है। 

कार्यशाला के दूसरे दिन के अंतिम चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. ज्योति निसवाड़े ने 'वृद्धि महिलाओं की समस्या' पर बोलते हुए कहा कि अलग-अलग समाज में वृद्धावास्था की अलग-अलग धारणाएँ हैं।  वृद्धावस्था एक यथार्थ और प्राकृतिक प्रक्रिया है। भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में हम देखते हैं कि वृद्धावस्था अत्यंत ही चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। आज पारिवारिक और सामाजिक तौर पर कई किस्म की चुनौतियां पैदा हुई हैं। 19वीं सदी में उम्र के विभाजन को इतना महत्व नहीं दिया जाता था। वृद्धावस्था में आर्थिक तौर पर उत्पादन क्षमता में कमी आ जाती है। इसके साथ ही और कई बदलाव आते हैं। जीवन प्रत्याशा औसत में बढ़ोतरी हुई है। पूर्व में वृद्धों की निर्णय प्रक्रिया में जिस प्रकार की भूमिका होती थी उसमें आज काफी बदलाव आया है। बढ़ते शहरीकरण ने नाभिक परिवारों को बढ़ावा दिया है। संयुक्त परिवार लगभग खत्म होने के कगार पर हैं। इस वजह से भी वृद्धों की स्थिति में काफी परिवर्तन आया है। आज सामाजिक से ज्यादा आर्थिक तत्व परिवार पर ज्यादा असर डाल रहे हैं। इसने भी वृद्धों की स्थिति में बदलाव लाने में अहम भूमिका अदा की है। भारतीय समाज में इन सारे तत्वों का प्रभाव देखा जा सकता है। वृद्धों में भी महिलाओं की समस्याएँ अलग किस्म की हैं, उन्हें वृद्धावस्था में परिवार के बच्चों का लालन-पालन, घरेलू काम में तो योगदान करना पड़ता ही है साथ ही घर के बाहर के काम भी इन्हें करना पड़ता है।
            सत्र का संचालन डॉ आमोद गुर्जर ने किया धन्यवाद एनसीआरआई के डी.एन. दास ने किया।   

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, सुधीर कुमार, कुमारी आशु एवं सोनम बौद्ध.

                                                                                                                                                              


Thursday, May 12, 2016

अब की बार तीसरी फसल शहर में...


राजनैतिक मसीहा के निर्वाण के बाद कुछ पढ़े लिखे लोगों ने शहर में पाँव पसारने शुरू किए हैं. विभिन्न संगठन, मंडल, मित्र मंडल आदि का निर्माण, जमीन की खरीद-फरोक्त आदि काम ये लोग करने लगें हैं. शहर एजुकेशन हब हैं इसलिए यहाँ बहुत सारे शैक्षिक संस्थान है साथ ही प्रायवेट कोचिंग क्लासेस भी भरे पड़े हैं. व्यापारी सदा से यह चाहते हैं कि शान्ति बनी रहें ताकि ग्राहक माल खरीद सकें, इन सब को सेक्युरिटी के लिए इन संगठनों की आवश्यकता होती हैं. इस आवश्यकता की पूर्ती इन सफेदपोश लोगों द्वरा समय-समय पर होती रहती हैं. शहर का ज्यादातर हिस्सा बाहरी लोगों का होने के कारण स्थानीय लोगों की दबंगई जरुर दिखती है लेकिन वह भी शहर के शान्ति के नाम पर सहनीय है. शायद यही राज है शहर के शान्ति का? ऐसे शांतिप्रिय शहर में अचानक धारा 144 कैसे लागू हुयी. सवाल यह है कि क्या वाकई शहर पहले से शांत था? या ये व्यापारियों द्वारा तैयार शान्ति थी? ऐसा क्या हुआ है जो पानी को लेकर इस शहर में धारा 144 लगाईं गई? बहुत से लोगों के मन में यह सवाल हैं कि ऐसा क्यों?

लातूर शहर धनी व्यापारियों का शहर हैं जिसका भार यहाँ के प्रत्येक सामान्य व्यक्ति पर है. एक ओर से हैदराबाद की नजदीकी व्यापारियों को कम कींमत में माल उपलब्ध कराता है वहीँ दूसरी ओर उस माल के लिए यहाँ साक्षर और ग्रामीण ग्राहक तैयार है. शायद ही शहर का ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो मुंबई, पुणे में अपनी किस्मत आजमाने न गया हो. काम-काज ढूंढने न सही शिक्षा के लिए तो जरुर ही वे लोग इन बड़े शहरों में चले गए होंगे. लेकिन यह भी सही है कि अगल-बगल के परभणी, उस्मानाबाद, बीड के ग्रामीण लोग रोजगार के लिए पिछले सत्ता परिवर्तन के पहले तक आते रहें थे. लेकिन आज-कल उनका आना भी केवल ‘आना’ है. कई सारे मामले में लातूर इन बाकी तीन जिलों से बेहतर माना गया जिसमें शिक्षा अहम् थी, रोज बढ़ने वाला शहर मकान बनाने के लिए मजदूरों की मांग रखता था इसलिए मुंह मांगी मजदूरी मिल जाया करी थी इसलिए भी बाकी जिलों के लोगों को यह शहर आकर्षित करता रहा. व्यापारी घरानों की परंपरा ने यहाँ उद्योग के लिए नई आशा निर्माण कि जिसके चलते मजदूरों की मांग भी बढ़ गयी हालांकि यह उद्योग केवल रोजमर्रा के उपयोगी उत्पादन बनाने तक सिमित हैं.

शहर के रामभाऊ बताते हैं कि हम कभी किताबों में पढ़ा करते थे कि एशिया का सबसे बढ़ा शक्कर कारखाना लातूर में हैं तो हमारी छाती फुल जाती थी किन्तु बाद के सालों में पता चला कि उसको नीलाम किया जा रहा है. जब कोई मुझसे पूछता है कि आप के शहर में क्या है तो मैं कुछ नहीं बता सकता हालांकि यह सवाल इससे पहले कोई ज्यादातर नहीं पूछता था और अगर कोई पूछता तो जवाब में कोई न कोई कह देता कि विलासराव देशमुख का शहर, या किलारी भूकंप ये दो चीजे थी जो शहर को वैश्विकता के साथ जोड़ने में मदद करती थी. पहले वाले जवाब में सामने वाले के विचारों से जलन का आभास कर लिया जाता जिससे हम शहरवाले गर्व महसूस कर लेते और दुसरे से करुणा झलकती थी इसे भी हम हमारी प्रसिद्धि के साथ जोड़कर देखते न की कमजोरी. परंतु आज-कल पानी की कमी ने हमें हमारी औकात दिखाई. हमारा ‘लै भारी’ का भारीपन हमें बोझ लगने लगा है. इस सूखे ने हमें हमारी क्षमताओं को जानने का मौका दिया है. हालांकि शहर का बुद्धिजीवी वर्ग अब भी इस समस्या की और आकर्षित नहीं हो पाया है. इसका यह भी कारण है कि लातूर के साक्षर लोग तुरंत ही किसी समस्या को अपने उपर हावी नहीं हो देते. हमारा कोपिंग मेकनिज्म गजब का है. ये तो सरकारी महकमें की करतूत है कि उसने १४४ लगाकर हमारी खामियों को उजागर कर रखा है. वरना इससे पहले भी हमने बड़े-बड़े सुखों को मुहतोड़ जवाब दिया है.
पिछले साल पानी की कमी ने हमारे खेतों का बूरा हाल किया तब भी हम नहीं डरें, पिछले महीने एक्कड़ भर खेत से 8000 खर्च कर आधी बोरी सोयाबीन जो इस मौसम की पूरी फसल का हिस्सा था उसे घर ले जाते समय मैं ज़रा भी आशंकित नहीं था कि इतने पैसे के बदले केवल इतना धान. क्योंकि हम खेती तो केवल बचाने के लिए करते है ताकि हमें भी लगे की हम भी किसान है. लातूर शहर का किसान होने में भी अजीब सा गर्व महसूस होता है. करोड़ों की किंमत पर बेचीं जाने वाली जमीन में हम हजार-बारासों का उत्पादन लेकर हम केवल यह जताना चाहते हैं कि हमने अभी अपनी जमीन बेची नहीं हैं. ऐसे में पानी गिरने न गिरने से हमारा कुछ नहीं होने वाला. इससे ज्यादा फिक्र वाली बात यह है कि पडोसी की जमीन को मैं अपना कैसे बनाऊं. शहर के अगल बगल का शायद ही ऐसा कोई गाँव होगा जिसकी जान पहचान कोर्ट में न हो. इन लोगों ने वकीलों और न्यायधीशों के घर पैसे से भरे हैं. वो समय अब दूर नहीं जब यहाँ का कोई किसान नौसिखिए वकील को सलाह दे रहा होगा. मृदा परिक्षण जैसे आम काम यहाँ के किसान तब तक नहीं करवाते जब तक कि इसके लिए कोई फंड न मिले. हम केवल उस जमीन के मालिक होने का फर्ज अदा करते है साथ ही यह ध्यान रखते हैं कि कोई हमारे इस फर्ज के आड़े न आए. चार साल पहले की बात है शहर के नजदीक का एक गाँव शहर में समाविष्ट होने जा रहा था. पूरे गाँव में केवल इसी की चर्चा थी लोगों ने अपने पैसे खर्च कर मुंबई में जाकर मंत्रियों से बातचीत कर मसला हल करवाया तब जाकर वो जमीन बची है. लेकिन यह जमीन बचाने का असल कारण उस जमीन की कींमत ही थी. जो आसमान छु रही है. आज तक मुझे नहीं पता चला कि ख़बरों में वो बूढा किसान उभाड खाबड़ जमीन पर बैठ कर माथे से हाथ लगाकर आसमान की और देख रहा है वह कहाँ हैं. यहाँ का किसान तो रॉयल एनफील्ड पर घूम रहा है. विट बनाने का कारखाना लगा रहा है. एक नहीं दो बीवियां बना रहा है. वो दबंग हैं और चौक-चौराहे पर बैठकर निम्नवर्गियों का मज़ाक उड़ा रहा है. उसके बच्चे भी उसी के क़दमों पर चल रहे है. मध्यकाल के जमींदारों से कम प्रस्थिति इन दो-चार एक्कड़ वालों की नहीं हैं.


ऐसा ही एक उदाहरण है रशीद चाचा. रशीद चाचा की शहर से नजदीक ही खुली जमीन है. इस बार सूखे का प्रभाव बढ़ने वाला है इस बात की फ़िक्र यहाँ के व्यपारियों को ज्यादा थी इसलिए उन्होंने रशीद चाचा को पहले ही पैसे दे रखे हैं बोरिंग के लिए जिससे लगने वाला पानी वह उन्हें उसी दाम पर देगा जो पहले से तय होगा. ऐसे में उसने अपने खेत में तीन बोरिंग करवाई लगभग 700 फिट के आसपास चार इंच पानी लगा दो बोर को बाकी एक को एक इंच पानी लगा. अब तो उनकी निकल पड़ी आज-कल वो रोज पंद्रह-बीस हजार का पानी बेच रहें हैं. बताइये इतना पैसा कमाने के लिए एक किसान को कितने दिन लग जाएंगे. कौन करेगा किसानी अब रशीद चाचा तो चाहेंगे की हर साल ऐसा ही सुखा पड़े तब तो वह पैसा कमा पाएंगे. दो फसलों में तो उनको कुछ न मिला लेकिन इस सूखे में उनकी ‘तीसरी फसल’ कामयाब रहीं. 

यह केवल किसानों का ही नहीं शहर में जिस किसी के बोअर को पानी है वे लोग इस तीसरी फसल को ले रहें हैं. लागत बहुत कम है और मुनाफ़ा तगड़ा मिल रहा है. जैसे बोअर लगातार दो ड्रम पानी निकालता है तो ग्राहक के आने की राह देखने नहीं हैं. एक हजार लीटर का एक टैंक लगवाना है उसको एक प्लंबर से टोटी फिट कर दे बस. अब दिन भर दो-दो घंटे में बोर चलाकर पानी टंकी में ऐसे जमा करते है जैसे पैसे. माँ-बाप कही बाहर चले जाए तो बच्चों को बार-बार फोन करके याद दिलाते हैं कि दो घंटे हो गए है चालु करो. नौकरीपेशा आदमी भी इस उपरी कमाई के लिए घर में अपना योगदान छुट्टी लेकर दे रहा हैं. तो बच्चे अपनी कोचिंग को त्यागकर माता-पिता के सामने अपना गौरव प्राप्त करने में लगे हैं. अनपढ़ साँस की साक्षर बहुएं अपना इक्का जमाने में लगी हैं. पता चलता है इनके लिए भी सुखा किसी सुख से कम नहीं है
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पिछले बार के इलेक्शन में हारे हुए प्रत्याशी बड़े जोरों से सत्ता आजमाइश में लगें हैं. वो इस मौके को गवाना नहीं चाहते है इसलिए किसी भी हालत में वह अपने प्रभाग में पानी पहुंचाकर ही दम लेंगे. इसके लिए कुछ बड़े आसामियों ने अपने निजी कुओं से पानी निकालकर प्रभागों में बांटने का काम शुरू किया है. जिसके पीछे यही लालसा है कि अगली बार लोग याद रखें? पानी लेने वाले लोग भी खूब आशीर्वाद दे-देकर पानी ले रहें हैं. फिर प्रत्याशी इस काम को समाचार पत्रों में भेजने के लिए तैयार हैं. 850 रूपए के टैंकर में 25-30 परिवार खुश इधर प्रत्याशी का सोशल नेटवर्किंग भी मजबूत. अब इन प्रत्याशियों की बात तो समझ में आती है किन्तु जो पहले से सत्ता में है वो भी पीछे नहीं हैं. महानगरनिगम ने प्रत्येक प्रभाग में एक टैंकर नियुक्त किया है जिसमें प्रत्येक घर में आठ दिन में एक पानी दिया जाना तय है. शुरुआत में इतनी भीड़ उमड़ने लगी जिसके चलते ज्यादातर पानी निचे बहने लगा. इस समस्या का समाधान पार्षदों ने अपने हिसाब से किया टैंकर घर-घर जाएगा और आधा ड्रम पानी देगा. पानी का बंटवारा खुद पार्षद करेगा. पार्षदों ने अपने हिसाब से पानी के बंटवारे के नियम बनाए है जिसमें यह है कि आपके पास आधार-कार्ड और वोटर आय डी होनी चाहिए. अर्थात आपके पास ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे आपको इसी वार्ड का वोटर माना जाए. कुछ सनकी बुढो ने उनको इसी बिच याद भी दिलाया कि वोट माँगते समय ये ताम-झाम नहीं करते हो बस गिडगिडाते हो और अब हमें ही पुछ रहें हो कि पहचान दिखाओ. तब पार्षद का चेहरा देखने लायक हो जाता है. फिर भी वह सत्ता को फिर से पाने के चक्कर मे इस बार भी वोट की फसल काटना चाहता है इसलिए मनमानी कर कुछ अवैध लोगों को पानी दिलाता ही है. पानी वितरण का एक नियम यह भी है कि जिसके घर में किराएदार हैं वह अपने मालिक के हिस्से से पानी ले उनके लिए अलग से पानी नहीं देंगे. इस तरह कैचिं लगाकर वह भी पानी को बचाने की कोशिश कर रहा है. वाह रे पानी वितरण ये तो पीडीएस से आगे निकल गए. वहां तो केवल राशन कार्ड दिखाना पड़ता है यहाँ तो रोज नित-नए नियमों पर पानी मिल रहा है.


 तो यह हाल है लातूर के सूखे का लेकिन इस सूखे का असर लातूर के मध्यवर्ग पर नहीं दिखता. सब के पास खुद के बोअर हैं और जिनके बोअर बंद है वे अक्सर यह कहते हैं कि हम तो पिछले महीने से ही टैंकर से पानी मंगवा रहे हैं. यह कहते हुए उनके गर्व को महसूस किया जा सकता हैं. तो सवाल यह है कि यह सुखा किसके लिए है व्यापारियों के लिए, किसानों के लिए,मजदूरों के लिए नौकरीपेशा के लिए किसके लिए. इन सब वर्गों के बावजूद गरीब किसान, खेतिहर, मजदुर छोटे-मोटे व्यवसायी, ठेले वाले आदि इन पर इस सूखे का कम इस तीसरी फसल का असर जरुर दिख रहा है.
पानी न मिलने के कारण कुछ लोग जो बाहर से थे उन्होंने मकान खाली कर दिए. महनगरनिगम ने केवल 144 लगाकर लोगों को पानी के स्त्रोतों से दूर रखा है किन्तु उन स्त्रोतों में पानी ही नहीं हैं तो लोग वहां क्यों जाएंगे. बोअर-अधिग्रहण जैसा फैसला काफी पहले लेना चाहिए था जो अब तक नहीं लिया गया. उलट आरटीओ ऑफिस वाले निजी पानी-वाहक वाहनों को लायसंस बाँट रहे हैं. और पानी के निजी ठेकेदारों को यह हिदायत दे रहें हैं कि जिसके पास लायसंस हैं उन्ही को पानी देना. इस पुरे मामले में सरकार भी खूब मजा ले रही है. एक तरफ १४४ धारा लगने के बाद देश के सारे समाचार पत्रों में इस बात को प्रचारित किया गया कि लातूर सूखे की चपेट में हैं. दूसरी ओर उनके पास इस समस्या से निबटने के प्लान क्या है? यह सवाल जब उठाया गया तो जवाब- डेढ़ लाख लोग मायग्रेट हो जाएंगे. स्कूल और कोचिंग क्लासेस समय से पहले ही खत्म कर दिए जाएंगे. यह किसी शहर का प्लान कैसे हो सकता है जिसमें हो जाएंगे, कर दिए जाएंगे जैसे शब्द हो. यह तो भविष्यकालीन योजना है लेकिन असल में जो हो रहा है उस पर कारवाई के लिए इनके पास कोई प्लान नहीं है. जिस डेढ़ लाख लोगों की बात हो रही हैं वो तो बाहरी ही है वो तो मायग्रेट होंगे ही लेकिन जो स्थानीय आम जनता है जिनको रोज 2 रूपये प्रति घड़ा से पानी खरीदना पड रहा है उनके लिए इनके पास कोई प्लान नहीं हैं. कुछ ख़ास किस्म के व्यापारी-बुद्धिजीवीयों ने एलान किया कि शहर में १० रूपए में 20 लीटर शुद्ध पानी दिलाया जाएगा इसके लिए एटीएम नुमा मशीन लगवाई जाएगी जिसमें पैसे डालने के बाद पानी आएगा. ऐसे नवाचारों पर हँसे या रोये. पानी खरीद रहें हैं इसलिए रोये या पानी मिल रहा है इसपर हँसे. कुछ समझ नहीं पाएंगे. हालांकि यह भी तीसरी फसल निकालने का एक ख़ास तरिका है जो हर बार पूंजीपतियों द्वारा अख्तियार किया जाता है.



पिछले दो साल से लगातार शहर में मिनरल वाटर की कंपनियों की तादाद बढ़ी है. इस क्षेत्र की सबसे पुरानी कंपनी आज कल समाचारपत्रों में प्रचार कर रही है कि लातूर शहर के वासियों के लिए शुद्ध पानी केवल 40 रूपए में 20 लीटर, शुद्ध के साथ ठंडा चाहिए तो 60 रुपये में 20 लीटर. यह कींमत देश के किसी भी इलाके से ज्यादा ही होगी. शायद राजस्थान से भी. लेकिन शहर के लोग इसके आदि हो गए हैं यह बीस लीटर का जार पिछले साल ३० रुपये में था अब चालीस हो गया है. और शायद इसकी किंमत लगातार बढती ही जाएगी. जब पता है कि शहर सुखा ग्रस्त है, जिसे गैजेटियर में भी सुवर्णाक्षरों से लिखा गया हैं. तब भी सरकार पानी के बर्बादी का लायसंस कैसे बेच रही है. यह समझ से बाहर है.




शहर का प्राकृतिक रूप देखे तो भूगर्भशास्त्रियों का मानना है कि आज जो पानी शहर के लोग बोअर से निकाल रहे हैं वो पांच-दस हजार साल पहले का है. इसका मतलब है कि शहर में जल संरक्षण शुन्य के बराबर हैं. जंगल के नाम पर वैसे भी शहर का नाम दुनिया के किसी भी मरुस्थल के बराबर हो गया है. इस बार तो पानी मिलेगा 700-1000 फिट के निचे का किन्तु अगले साल कहाँ से मिलेगा पानी. इसके बारे में कोई सोचना नहीं चाहता है. बस मिल रहा है तब तक ठीक है. लेकिन इस बार सूखे ने सोचने का आखरी मौका दिया है, इस बार भी नहीं सोंचेगे तो ये मंजर मौत बनकर अगली बार दिखेगा जब कोई कानून भी इससे बचा नहीं पाएगा. जितने सुराख लातूर के जमीन पर बोअर के नाम पर पड़े है उनमें से कुछ में से पानी के अलावा कुछ और (पिछले महीने लोकमत में खबर थी कि एक बोअर से सोने जैसा पदार्थ निकल रहा है लेकिन वो सोना नहीं था अब तक पता नहीं चला है कि वह क्या हैं) ही निकल रहा है. तब भी लोगों की आँखे नहीं खुल रहीं है. 

सुनो शहरवालों अब वो दिन लद गए जब आपके पास एक मसीहा था, किसी दुसरे की बाँट जोहने से अच्छा होगा कि आप खुद ही इस काम में आगे आएं वरना वो दिन दूर नहीं जब आप आने वाली पीढ़ियों को एक मरुस्थल भेंट देंगे.
फोटो आभार: गूगल इमेज  



निलामे गजानन सूर्यकांत
निलामे गजानन सूर्यकांत 
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र,
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा।  
gajanannilame@gmail.com

Saturday, April 9, 2016

फोटो कोलाज उन मेहनत कश इंसानों का जो हमारे लिए आरामगाह बनाते हैं.

फोटो कोलाज उन मेहनत कश इंसानों का जो हमारे लिए आरामगाह बनाते हैं. और खुद टीन के डब्बों में रहते हैं. वर्धा में इस समय तामपान 50डिग्री से अधिक हो जाता है. जब लोग घरों से निकलने के बारे में भी नहीं सोचते, उस वक्त यह लोग हमारे लिए काम कर रहे होते हैं. और मजदूरी के नाम पर सिर्फ दो वक्त की रोटी ही मिलपाती है.    





















Photo:- नरेश गौतम
महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 
nareshgautam0071@gmail.com