Tuesday, February 3, 2015

जैसे ही मैंने अपनी पहचान जाहिर की तो मेरे घर के दरवाजे मेरे ही लिए बंद हो गए-रवीना बरिहा

छत्तीसगढ़ थर्ड जेंडर वेलफेयर बोर्ड की सदस्य एवं 'छत्तीसगढ़ मितवा संकल्प समिति की सचिव रवीना बरीहा से खास बातचीत 
रवीना बरीहा से बात करते डा. मुकेश
 अपने जीवन-संघर्षों के बारे में बताएं।  
इस मामले में मैं थोड़ा भाग्यशाली रहीहमारे समाज में थर्ड जेंडर को जितनी प्रताड़ना झेलनी पड़ती हैउतनी मुझे नहीं झेलनी पड़ी। सामाजिक उपेक्षा और बहिष्कार की जितनी पीड़ा हमारे समुदाय के अन्य लोगों को झेलनी पड़ती हैउसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। लेकिन मुझे यह सब कम झेलना पड़ा। छठी कक्षा की पढ़ाई मैंने अपने घर पर ही रह कर की। उस समय तक घर वालों को समझ ही नहीं आया कि मैं 'किन्नरहूँ। उसके बाद रायपुर के रामकृष्ण मिशन स्कूल में मेरा चयन हो गयाजहां रहकर मैंने बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई की। इस आश्रम में मेरी सही ढंग से परवरिश हुईमुझे कहीं से भी यह एहसास नहीं होने दिया गया कि मैं किन्नर’ हूँ। मानव के व्यक्तित्व के विकास के लिए शिक्षाभोजन-वस्त्र आदि जिन बुनियादी चीजों की आवश्यकता होती हैसारी चीजें मुझे वहाँ उपलब्ध हुईं। जीव-विज्ञान से 12वीं कक्षा पास करने के बाद मैंने रायपुर के दुर्गा महाविद्यालय से कला (दर्शनहिन्दी साहित्यराजनीति विज्ञान) में स्नातक किया। तदुपरांत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संबद्ध एक संस्थान से मैंने रायपुर में ही एक वर्ष का फिल्म मेकिंग (पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा इन डिजिटल विडियोग्राफी) कोर्स किया। इसी दौरान मैंने रायपुर के दैनिक अखबार हरीभूमि’ में काम किया। वहाँ मैं प्रूफ-रीडर और संपादकीय में प्रांतीय डेस्क देखती थी। मैंने तीन वर्षों तक वहां काम किया। वर्ष 2009 में हमलोगों ने खुद का एक संगठन बनाने के बारे में सोचा। और हमलोगों ने अन्य चार-पाँच किन्नर साथियों के साथ मिलकर मितवा’ नामक संस्था बनाई।
तब तक आपकी पहचान किन्नर के तौर पर समाज के सामने आ गई थी
हाँबारहवीं की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद मैं खुलकर अपनी जेंडर पहचान के साथ सामने आ गई थी। 
बारहवीं के बाद तक भी आपका अपने घरवालों से रिश्ता बना रहा?
बारहवीं के बाद भी मैं आश्रम में ही रही। अपनी पहचान स्पष्ट कर देने के बाद मुझको घर जाना नहीं पड़ा। पढ़ाई करते हुए मैंने टायपिंग भी सीख ली थी। इसी कारण मुझे अखबार में नौकरी मिल गई। प्रारंभ में मैंने देशबंधु अखबार में काम किया। इन पड़ावों से गुजरते हुए मुझे समझ में आया कि थर्ड जेंडर के प्रति समाज की धारणा कैसी है! तब से मेरे मन में एक बीज डल गया किमैं अपने लिंग- तृतीय लिंग के लोगों के लिए काम करूंगी। खासकर इन्हें सामाजिक समानता हासिल होइसके लिए काम करने का जज़्बा मेरे भीतर पैदा हुआ। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमने मितवा’ संस्था बनाई।
मितवा’ अत्यंत ही प्यारा नाम रखा आप लोगों ने अपनी संस्था का। इसके पीछे भावना क्या थी
तृतीय लिंग समुदाय के हक-अधिकार पर काम करने के लिए हम लोगों ने यह संस्था बनाई। हम यह बताना चाहते हैं किहम न कोई दैवीय रूप हैं और न ही उपेक्षा के पात्र। हम मित्र’ हैं। उपनिषदों के एक साथ चलेंएक साथ मिलकर उपभोग करेंएक साथ तेजस्वी बनें’ वाक्य के मद्देनजर हम लोगों ने मित्रता को इष्ट’ और श्रेष्ठ सदगुण समझा। इसी मित्रता के भाव को मितवा का नाम दिया गया। इस संस्था के जरिये हम लोग समाज की मुख्यधारा से थर्ड जेंडर को जोड़ने हेतु तरह-तरह की गतिविधियां चलाते हैं। हर वर्ष नवरात्रि के दिन हमलोग नर्सों का सम्मान करते हैं। उसी प्रकार ट्रैफिक पुलिस को अंबेडकर जयंती के दिन सम्मानित किया जाता है और रक्षा-बंधन के दिन पेड़-पौधों को हमलोग राखी बांधते हैं। रामनवमी में हमलोग गरीबों को भोजन कराते हैं। अस्पताल जाकर हम मरीजों को फल आदि वितरित करते हैं। इन गतिविधियों के जरिये हम समाज की मुख्यधारा से जुडने का लगातार प्रयास चला रहे हैं।
मितवा’ के लिए शुरुआती दिनों में आपलोगों ने फंड जेनरेट कैसे किया
मितवा’ के सारे सदस्य कहीं न कहीं काम कर रहे थेमैं खुद पत्रकारिता में थीऔर अन्य सदस्य में से एक वहीं के किसी होटल में वरिष्ठ कुक थेएक का बहुत अच्छा ब्यूटी-पार्लर थाएक-दो लोग बधाई मांगने का काम करते थे। इन सबके साझे आर्थिक सहयोग से संस्था का काम शुरू किया गया। संस्था को आज भारत सरकार के स्वास्थ मंत्रालय की ओर से लक्ष्यगत हस्तक्षेप परियोजना के अंतर्गत एक प्रोजेक्ट मिला हुआ है। एचआईवी-एड्स और टीबी पर जागरूकता के लिए इस प्रोजेक्ट के तहत संस्था के द्वारा पूरे रायपुर जिले में कार्य किया जा रहा है। इसके तहत जगह-जगह शिविर लगाकर खून की जांच करायी जाती है। स्वास्थ्य जागरूकता के लिए नुक्कड़-नाटककार्यशाला-सेमिनार आदि भी आयोजित किए जाते हैं। संस्था में आज 52 वेतनभोगी स्टाफ हैंजिसमें से सत्तर फीसदी थर्ड जेंडर हैं। संस्था ने यौन-रोगएचआईवी आदि से संबंधित निःशुल्क जानकारी देने के लिए एक सहायता केंद्र भी खोला थाजहां ऐसे मरीजों को जरूरी जानकारी व काउंसलिंग की जाती थी।
भारतीय समाज में थर्ड जेंडर’ को आप कहाँ पाते हैं
यदि हम भारतीय समाज को धार्मिक व व्यावहारिक दोनों दृष्टि से देखें तो जहां धार्मिक दृष्टि से थर्ड जेंडर- किन्नरों को पवित्र और ऊंचा स्थान दिया गया है। लेकिन व्यवहार में थर्ड जेंडर को अत्यंत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को हासिये पर रखा गया है। वस्तुतः थर्ड जेंडर आज न्यूनतम मानवाधिकारों से भी वंचित है।   
थर्ड जेंडर को लेकर भारतीय व पाश्चात्य अवधारणा में क्या भिन्नताएँ हैं?  
भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को सामाजिक मान्यता और जेंडर की भूमिका में देखा जाता है। जबकि पश्चिम में केवल यौनिकता ही इसका मूलआधार रहा है। हमारी यौन प्रवृत्तियौन-व्यवहार या यौनिकता के आधार पर इस जेंडर को अलग रखा गया है। पर भारतीय समाज में सामाजिक मान्यता और सामाजिक जेंडर के हिसाब से थर्ड जेंडर को देखा जाता है। यूं कहें कि जहां पश्चिम में हमारी बुनियाद यौनिकता’ है वहीं भारत में हमारी बुनियाद जेंडर’ है। 
भारत में थर्ड जेंडर को कैसे वर्गीकृत किया गया है
भारत में वर्गीकरण सामाजिक और पारंपरिक आधार पर किया गया है। जबकि पश्चिम में सेक्सुअलिटी के आधार पर। वहाँ कई ट्रांस जेंडर बाइ-सेक्सुअलहोमो-सेक्सुअल होते हैं। पश्चिम में आठ प्रकार की यौनिकता के आधार पर वर्गीकरण किया गया है। जबकि भारत में यौनिकता के बजाय परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति के आधार पर यह वर्गीकरण हुआ है। थर्ड जेंडर में जो भिक्षावृत्ति के पेशे में शामिल हैं उन्हें हिजड़ा’ कहा गयाघरों में रहकर सामान्य लोगों की भांति जीवन-यापन करने वालों को ट्रांस-जेंडर’, जो शर्ट-पेंट में रहते हैं उन्हें कोती’ कहा जाता है। कुछ थर्ड जेंडर जो धार्मिक-आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हैंउसे जोगप्पा’ कहा जाता है। यहां मैं यह भी कहना चाहूंगी किथर्ड जेंडर के वर्गीकरण की भारतीय और पश्चिमी दोनों अवधारणा अपने आप में एकांगी है। यौनिकता और सामाजिक-सांस्कृतिक दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर ही हमारे साथ वास्तविक न्याय किया जा सकता है और इसी से हमारा समुचित विकास भी होगा।
आपकी नज़र में सेक्स सेक्सुअलिटी और जेंडर के बीच क्या फर्क है?
सेक्स तीन हैं- एक पुरूषदूसरा स्त्री  और तीसरा जिनके सेक्स अंगों का सही विकास नहीं हो पाया। ये तीन ही सेक्स मानते हैं हम लोग। जबकि सेक्सुअलिटी कई प्रकार की होती है। हो सकता है किसी को होमो-सेक्सुअलिटी पसंद आयेकोई विषम लैंगिक होकोई ट्रांस-जेंडर के साथ सेक्से करना पसंद करेंतो कुछ लोग ऐसे होंगे जो स्त्रीी-पुरूष दोनों के साथ समान रूप से सेक्सुअल संबंध बनाना पंसद करेंगे। इसके और भी बहुत सारे प्रकार हो सकते हैं। हम मानते हैं कि सेक्सप प्रकृति-प्रदत्त अवस्थाएं हैं। जबकि यौनिकता मनुष्य का यौन-व्यवहार है। यह प्रवाहमान होता है और बदल भी सकता है। आज का विषम-लैंगिक कल समलैंगिक हो जा सकते हैंआदि-आदि। कहने का अभिप्राय यह कियौनिकता परिवर्तनशील धारणा है। वहीं जेंडर’ समाज प्रदत्त हैसामाजिक निर्मिति है। इसके जरिये समाज आपकी स्थिति को निरूपित करता है। 
आमतौर पर थर्ड जेंडर के प्रति समाज का नजरिया कैसा रहता हैयानी समाज आपके साथ कैसा बर्ताव करता है?  
थर्ड जेंडर के प्रति हम लोग समाज की मिलीजुली प्रतिक्रिया देखते हैं। समाज के जिन लोगों का थर्ड जेंडर-किन्नरों के साथ पहले कभी अथवा लगातार मेल-जोल रहा हैवे बहुत जल्दी हमलोगों को एक्सेप्ट (स्वीकार) करते हैं। हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं। कई बार तो हमलोगों को एक दैवीय रूप में देखा जाता है। लेकिन समाज का एक बड़ा तबका ऐसा हैजो अपने कुछ पूर्वाग्रहों के कारण हमसे दूर भागता है। शायद थर्ड जेंडर का समाज से पर्याप्त मेल-जोल नहीं होने से वे एक झिझक के कारण हमें कबूल नहीं करते। इस प्रकार हम लोग समाज से दो भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं देखते हैं – एक बहुत साकारात्मक तो दूसरा अत्यंत ही नाकारात्मक-उपेक्षात्मक है। 
इसका मतलब यह हुआ कि थर्ड जेंडर को समाज मनुष्य’ के तौर पर कबूल नहीं करताया तो उसमें देवत्व’ ढूंढा जाता है या फिर उसे हंसी-व्यंग्य और अपमान का पात्र समझा जाता है!  
आपने सही कहाहमारे प्रति ये दोनों नजरिया समाज का रहता है। हमें या तो दैवीय शक्ति’ के तौर पर देखा जाता अथवा उपेक्षा व उत्पीड़न का पात्र समझा जाता है। और समाज का ये दोनों ही अतिवादी नजरिया हमारे विकास के लिए सही नहीं हैबल्कि सच कहें तो बाधक है। क्योंकि हम समाज में यदि बहुत ऊंचेपूजनीय रूप में माने जायेंगे तो भी हम समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पायेंगे। और यदि हम उपेक्षित हैंतो वह हमारे लिए कष्टदायक है ही। इसलिए हम चाहते हैं कि हमारे साथ भी बाकी लोगों जैसा समानता का बर्ताव हो। हमें भी समानतान्याय व अवसर की मुकम्मल गारंटी मिले। तभी थर्ड जेंडर का समुचित विकास हो सकेगा और हम समाज की मुख्यधारा से जुड़कर समाज के समुचित-संतुलित बदलाव-विकास में योगदान कर सकेंगे।
आमतौर पर थर्ड जेंडर के साथ पुलिस-प्रशासन का व्यवहार कैसा रहता है ?        
हमारे प्रति पुलिस का व्युवहार नकारात्म क ज्यांदा है। कई बार गंभीर मामलों में भी पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं करती। यहां तक कि एफआईआर दर्ज कराने जाने पर पुलिस स्टेआशन से हमें भगा दिया जाता है। खासकर रेलवे स्टेकशन में तो मारा-पीटा तक जाता है। कई बार 'असलीहो या 'नकलीकह कर पुलिस हमारे समुदाय के लोगों से कपड़े तक उतरवाती है। सोचिये महज़ एफआईआर लिखाने के पहले कितनी प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है। पीड़ित को पुलिस द्वारा दोबारा उत्पींड़ित किया जाता है। जबकि एफआईआर तो कोई भी लिखा सकता है। चाहे वह स्त्री  – पुरूष या थर्ड जेंडर ही क्यों न हो। इस स्थिति को देखते हुए हमने रायपुर में पुलिस के साथ वर्कशॉप किया थावहां थोड़ी स्थिति बदली है। लेकिन ज्यादातर जगहों पर पुलिस का हमारे प्रति अमानवीय व्यीवहार ही रहता है। पुलिस को हमारे प्रति अपना व्यवहार नकारात्मक नहीं रखना चाहिए। आख़िर हम भी तो इंसान ही हैंहमें भी दर्द होता है इससे।                               
जाहिर है कि थर्ड जेंडर मूलतः एक उत्पीड़ित सामाजिक वर्ग है। भारतीय समाज में दलित-आदिवासी और महिला आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं। इस मायने में अन्य उत्पीड़ित समूहों से थर्ड जेंडर कैसे अलग है
थर्ड जेंडर से इतर जिन समूहों के बारे में आप कह रहे हैंवे सचमुच उत्पीड़ित हैं। किंतु कहीं न कहीं इन समूहों को कानून व राज्य का संरक्षण प्राप्त है। अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए कई कानूनी प्रावधान और आयोग बने हुए हैंस्त्रियों के लिए भी इसी प्रकार की व्यवस्था है। यहाँ तक कि बच्चोंपशु-पक्षियों व पेड़-पौधों के संरक्षण-विकास की व्यवस्था है। पर हमारा दुर्भाग्य है कि किन्नरों के लिए कुछ भी नहीं है। वर्ष 2014 में हमें सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से पहचान मिला। जबकि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुगलकाल और उससे पहले थर्ड जेंडर को बराबर या समानांतर दर्जा प्राप्त था। हमलोगों ने अपने अध्ययन में पाया कि औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने किन्नरों को दुरावस्था की स्थिति तक पहुंचाया। अंग्रेजों ने ऐसे-ऐसे कानून बनायेजो किन्नरों को अपराधी ठहराता था। इसी काल में धारा-377 भी बना। आज हम इन काले क़ानूनों को बदलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार से हमलोगों का इस मसले पर संवाद चल रहा है। हमें उम्मीद है कि इन काले क़ानूनों को जल्द ही बदला जा सकेगा। इसलिए इस मायने में हमारी उपेक्षा अन्य सामाजिक वर्गों से भिन्न प्रकार की है।
आपकी बातचीत से लगता है कि थर्ड जेंडर की स्थिति में साकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। इन बदलावों की आप क्या वजहें मानती हैं?
इस बदलाव के दो-तीन कारण हैं। पिछले दो दशकों में मानवाधिकारों को लेकर देश में आयी जागरूकता एक बड़ी वजह है। पहले इस दिशा में लोग बात तक करने के लिए तैयार नहीं थे। दूसरा कारणदेश के साकारात्मक सोच रखने वालेजो हमारे प्रति संकीर्ण-नाकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखतेउनलोगों की भूमिका रही है। ऐसे लोगों ने हमारा साथ दिया है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने भी इस सूरत-ए-हाल को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
थर्ड जेंडर की संस्कृति पर कुछ प्रकाश डालिए...  
भारतीय वर्गीकरणजिसकी चर्चा मैंने आपसे कीजिन सामाजिक-सांस्कृतिक आधारों पर किया गया हैवही उनकी संस्कृति है। हिजड़ा समुदायजो भिक्षावृत्ति करता हैउसमें गुरू-शिष्य की परंपरा होती है। उसी प्रकार जो आध्यात्मिक-धार्मिक परंपरा से संबद्ध होते हैंउनके पहनावे भिन्न होते हैं। वे जापभजन-कीर्तन आदि करते हैं। जो लोग घरों में रहते हैंवे सामान्य लोगों की ही तरह जीते-रहते हैं।
पर्व-त्योहारों में भी इनमें आपस में भिन्नता रहती है क्या
हांपर्व-त्योहार भी इसी वर्गीकरण के आधार पर है। हिजड़ों के पर्व-त्योहार अलग हैं। ये गौचरा माता’ को मानते हैं। गुजरात में इनका तीर्थ-स्थल है। अंतिम संस्कार का भी इनका विधि-विधान अलग है। घरों में रहने वाले अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा के मुताबिक होली-दीवालीईद मनाते हैं। मंदिरों में रहने वाले मंदिरों की मान्य सांस्कृतिक परंपरा को मानते हैं। इस प्रकार थर्ड जेंडर की कोई सर्वमान्य विशेष परंपरा नहीं है।दुर्भाग्यवश समाज हिजड़ों की संस्कृति को देखकर पूरे थर्ड जेंडर की एक ही संस्कृति मान लेता हैजबकि ऐसा है नहीं।
कुछ लोगों को लगता है कि हिजड़ा समुदाय को बगैर मेहनत के काफी पैसे मिल जाते हैं। एक प्रकार से इन्हें मुफ्तखोर के बतौर देखा जाता है। आपकी प्रतिक्रिया...
हांभिक्षावृत्ति के द्वारा कुछ लोग आजीविका प्राप्त करते हैं। लेकिन हमलोगों ने जब इस पर सर्वेक्षण किया तो यह बात सामने आयी कि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। गांव-कसबों  में रह रहे थर्ड जेंडर के ज़्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दयनीय है। ये अत्यंत ही कम मजदूरी की दर पर अपना पेट पालतेइनके पास वोटर-कार्ड तक नहीं है। ये जहां श्रम करतेकार्य-स्थल पर भी भेदभाव के शिकार बनते हैं। कुछ-कुछ जगह हैजहां किन्नर समुदाय के लोगों ने संगठित तौर पर भिक्षावृत्ति जैसी चीज को बढ़ावा दिया है। लेकिन इनकी संख्या बहुत अधिक नहीं। आज अगर पूरे भारतवर्ष में थर्ड जेंडर की स्थिति का अध्ययन करें तो हम पायेंगे कि इनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत ही निम्न है। चूंकि समाज में भिक्षावृत्ति करने वाले दीख जाते हैंइसलिए लोगों को ऐसा लग सकता है। किंतु थर्ड जेंडर के इससे कई गुना ज़्यादा लोग हैंजो मेहनत-मजदूरी करके बड़ी कठिनाई से अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।
हिजड़ों के बारे में समाज में कई तरह की भ्रांत धारणा है। अक्सर यह कहा जाता है कि इनके जो गुरू होते हैंवे पूरे रुतबे और भोग-विलास की जिंदगी जीते हैं ! इस पर आपकी टिप्पणी...
यह सही है कि मठाधीशों के पास जब बहुत पैसा आ जाता है तो वे विलासिता का जीवन जीने लग जाते हैं। इनमें से कुछ लोग बहुत संपन्न हो भी गये हैं। आज दिल्लीइंदौरजबलपुररायपुर आदि कुछ शहरों में उनके अपने बड़े-बड़े फ्लैट हैं। रायपुर में तो लगभग आधे किलोमीटर का उनका कॉम्प्लेक्स हैजिसमें बड़ी-बड़ी दुकानें चलती हैं। यह जो उनकी संपत्ति और विलासिता है उसके पीछे समाज का वह नजरियाकि लोगों ने उन्हें देवत्व के तौर पर माना है। लोगों ने उन्हें पैसा देना शुरू कर दिया। इसी कारण वे लोग भी अपने इसी दैवीय रूप को बरकरार रखना चाहते हैं। उन लोगों ने अपना अलग-अलग घराना’ बना लिया है। एक-एक घराने में कई शिष्य होते हैंजिन्हें गुरू का निर्देश रहता है कि बाहर के लोगों से एक सीमा के बाद दूरी बनाए रखें। अपने बारे में ज्यादा जानकारी न दें और न ही लोगों से घुलें-मिलें। अगर कोई बात भी करना चाहे तो उनसे उन्हें गाली-गलौज करने की शिक्षा दी जाती है। इस तरीके से उनको ऐसे नियमों में बांधा जाता है। इन घरानों में कायदे-कानून इतने सख्त हैं जिसके चलते थर्ड जेंडर के सभी लोग वहां नहीं जा सकते। उन्हें जानवरों की तरह रखा जाता है। यह एक बहुत बड़ा सामाजिक दोष है। उनकी स्थिति को बदलकर ही इस समस्या को दूर किया जा सकता है।
इस सबके बावजूद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस समय बच्चे को तीसरा लिंग’ का होने के कारण उनके मां-बाप द्वारा परिवार-समाज से निकाल दिया जाता हैये गुरू-मठाधीश ही उन्हें संरक्षण देते हैं। उनका भरण-पोषण करते हैंउन्हें ठौर देते हैं। इन दोनों पहलुओं को हमें देखना चाहिए। क्योंकि जब इनके पास खाने को नहीं थाफुटपाथ पर रात बिताते थेआए दिन कुछ न कुछ अप्रिय घटनाएँ घटती थींतब उन्होंने ही सहारा दिया।
आज की तारीख में देशभर में किन्नरों पर काम करने वाले कितने संगठन सक्रिय हैं?
2009 तक तो केवल संगठन ही सक्रिय थे। 2011 में अखिल भारतीय स्तर पर काम करने के लिए एक नेटवर्क – ‘हमसफर’ का निर्माण किया गया। यह हर राज्य में जाकर वहाँ के किन्नरों को संगठित करने के साथ संगठन को एक संस्था का रूप देता है। आज भारत में उत्तर-पूर्व के राज्यों को छोड़करक्योंकि वहाँ किन्नर शेष भारत की तुलना में पहले से ही बेहतर स्थिति में हैंहर राज्य की राजधानी में एक संस्था का गठन किया जा चुका है। ये संस्थाएं किन्नरों के हितों की एडवोकेसी’ करते हैं और उन्हें संगठित भी। 
थर्ड जेंडर को लेकर भारत में अब तक क्या-क्या कानूनी प्रावधान किये गए हैं
अभी सर्वोच्च न्यायालय ने थर्ड जेंडर को मान्यता दी है। सामाजिक न्याय मंत्रालय की एक टीम ने कुछ-कुछ बिन्दुओं पर राज्य सरकारों को निर्देश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय और मंत्रालय द्वारा दिये गये निर्देशों पर अमल करने का दायित्व राज्य सरकारों का है। जिन राज्य सरकारों ने इन सुझावों पर अमल किया वहां थर्ड जेंडर को सुविधाएं मिलनी शुरू हुई है। जैसे तमिलनाडू में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बहुत पहले से ही थर्ड जेंडर के लिए अलग से अधिनियम है। वहां 2002 में ही इसके लिए बोर्ड का गठन हो चुका है। राजस्थान में भी कुछ-कुछ कानून आया है। छत्तीसगढ़ में अभी हाल ही में अलग बोर्ड का गठन किया गया है। किन्नरों के हितों के मद्देनजर देश के सभी राज्यों की सरकारों को चाहिए कि इस दिशा में त्वरित कदम उठायेँ। इस हेतु हमलोग विभिन्न राज्य की सरकारों से संवाद भी चला रहे हैं।
थर्ड जेंडर के सशक्तीकरण के लिए आप लोगों की प्रमुख मांगें क्या हैं?  
हमलोगों ने दो-तीन चीजें निर्धारित की हैं। पहला तो शिक्षा है। आजीविका है। न्याय के समक्ष समानता है। आर्थिक अवसरों में उन्नति की समानता है। कुछ अधिनियम हैंजिन्हें सभी राज्यों में लाया जाना चाहिए। सभी राज्यों में बोर्ड का गठन होना चाहिए। केंद्र स्तर पर भी अनुसूचित जाति-जनजातिमहिला आयोग आदि की भांति थर्ड जेंडर के लिए भी स्वतंत्र आयोग का गठन किया जाना चाहिए। इन मांगों को लेकर शासन से हमलोग लगातार बात कर रहे हैं। तीन राज्यों- छतीसगढ़महाराष्ट्र और तमिलनाडु की सरकार ने अपने यहां बोर्ड का गठन किया भी है। मध्यप्रदेश और बिहार में यह प्रक्रियाधीन है। यदि हमारी इन मांगों पर राज्य सरकारें समुचित ध्यान दें तो किन्नरों की दशा-दिशा बदल सकती है।
थर्ड जेंडर के शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिए सरकार को क्‍या कदम उठाने चाहिएजिस प्रकार सरकार द्वारा बोर्डिंग स्कूहलनवोदय विद्यालयसैनिक स्कूरल और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए अलग आवासीय विद्यालय चलाये जा रहे हैंक्याच किन्नजरों के लिए भी उसी प्रकार की अलग से व्येवस्था  होनी चाहिए?
यह जरूरी है कि हमलोगों के लिए अलग से आवासीय विद्यालय की व्यजवस्था् हो। हर राज्यस में थर्ड जेंडर के लिए कम से कम एक आवासीय विद्यालय हो तो तत्काल हमारी शिक्षा की जरूरतें पूरी हो सकती है। इस दिशा में केन्द्रय और राज्यी सरकार को यथाशीघ्र कदम उठाना चाहिए। थर्ड जेंडर के लिए ब्यूटीशियनटेलरिंगबागवानी आदि के प्रशिक्षण की भी व्यकवस्थाय सरकार को करनी चाहिए। ताकि इनके स्वरोजगार का रास्ता खुल सके।
देश में अब तक किन-किन प्रांतों में थर्ड जेंडर को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा दी गयी है?
अभी आरक्षण केवल तमिलनाडू राज्यश में ही मिल पाया है। बाकि राज्योंि में यह प्रक्रियाधीन है। केन्द्रं सरकार ओबीसी कोटे के भीतर थर्ड जेंडर को आरक्षण देने की बात कर रही है। लेकिन हम लोग कह रहे हैं कि जो अनुसूचित जाति-जनजाति से आये किन्निर हैंउन्हेंं उसी कोटे से आरक्षण दिया जाना चाहिए। हालांकि अभी यह विचाराधीन हैइस पर अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।
पिछड़े-दलितों के कोटे से थर्ड जेंडर को आरक्षण देने की स्थिति में इनसे टकराहट की स्थिति भी पैदा हो सकती है। आपको क्या लगता है? 
मुमकीन है कि टकराहटें हों। हमें इसका डर भी है। इसी कारण हम लोग यह मांग कर रहे हैं कि हमें अल्प संख्यडकों की भांति संरक्षण प्रदान किये जायें। जातिगत दायरे में हमारे लिए आरक्षण की व्यसवस्था होने से राजनीतिक समीकरण प्रभावित होंगेजिससे तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। हमलोग दीर्घकाल तक आरक्षण के बजाय मात्र 10-20 वर्षों तक संरक्षण देने की मांग कर रहे हैं। बीस वर्ष बाद सरकार हमारी स्थिति का अध्य यन करा ले और जरूरी समझे तो उसे समाप्त् कर दे।
देश में व्याप्त बेरोजगारीगरीबीविषमताभ्रष्टाचारमंहगाई और यौन-हिंसा जैसी गंभीर समस्याओं को आप बतौर ट्रांस-जेंडर किस रूप में देखती हैं?
हमारी लड़ाई इसी समाज में जाने की है। इसलिए हमारी प्राथमिकता है कि यह समाज हमें अपना माने। यही वजह है कि अभी हमलोग इन सवालों पर बहुत सोच नहीं पा रहे हैं। हमारी पहली कोशिश सामाजिक समानता लाने की है। पर हम इतना जरूर चाहते हैं कि जो अशिक्षागरीबीभ्रष्टाचारयौन हिंसा आदि समस्याएँ हैंवे दूर हों। क्योंकि ये समस्याएँ ऐसी हैं जो पूरे समाज को प्रभावित करने वाली हैं और निश्चित रूप से हमें भी। इन समस्याओं को लेकर हम केंद्र-राज्य की सरकारों से मांग करते हैं कि वे इसका सार्थक समाधान निकालें। सरकार अपने काम-काज में पारदर्शिता लाये। मानवाधिकारों की गारंटी हो। हम चाहते हैं कि सरकार वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हुए इन सवालों का समाधान करे। ये समस्याएँ खत्म होंगी तो हमारे हालात भी बदलेंगे।
आपकी सद-इच्छाएं वाजिब हैं। किन्तु सरकारें बनाने-चलाने वाली पार्टियों की खास विचारधारा व खास समूहों के प्रति प्रतिबद्धताएं होती हैंसत्ता में रहते हुए इनके नीति-व्यापार सबके सब इसी बिना पर निर्धारित होते हैं। 
मुख्यधारा की इन पार्टियों का अपना एजेंडा रहता हैजिसपर ये पार्टियां काम करती हैं। इन पार्टियों के एजेंडे में थर्ड जेंडर’ को आप कहाँ पाती हैं?
इस बार लोकसभा चुनाव के पहले हमलोगों ने मुख्यधारा की पार्टियों के मेनिफेस्टो’ में अपने सवालों को शामिल कराने का प्रयास किया था। दक्षिण भारत के विभिन्न राजनीतिक दलोंपश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस पार्टीकांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी ने हमारे सवाल को अपने चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल किया भी था। हमारे संपर्क के पूर्व भाजपा का घोषणा-पत्र छप चुका थाइसलिए उसमें यह शामिल नहीं हो पाया। शेष राजनीतिक पार्टियों से हमलोग समय से संपर्क नहीं कर पाये इसलिए उनके घोषणा-पत्र में हमारी बात शामिल नहीं हो पाई। लेकिन मैं यहाँ एक बात कहना चाहूंगी कि जब हम लोगों ने इन पार्टियों का घोषणा-पत्र देखा तो हमें नहीं लगा कि उनमें बहुत अंतर है। सभी विकाससुशासनशिक्षागरीबी पर बात करते हैं। इसलिए हमलोगों ने तय किया कि हम किसी पार्टी विशेष का पक्ष नहीं लेंगे। इसलिए हमलोग किसी दल को फॉलो’ करने अथवा उनपर टिप्पणी करने से बचते हैं। बावजूद इसके यह बात तो है किहमारी कोशिश रहनी चाहिए कि सभी दलों तक हम अपनी बात पहुंचाएं। इस बार हमलोग यह पूरे तौर पर नहीं कर पायेक्योंकि किन्नर समाज में पढ़े-लिखे लोगों का काफी अभाव है और संगठन में सक्रिय लोगों की संख्या भी अभी पर्याप्त नहीं है। लेकिन आगे हम इसकी कोशिश जरूर करेंगे। जो राजनैतिक दल हमारे लिए काम करेंगे हम उनके साथ हैं।
इन आदर्शवादी अपेक्षाओं के बावजूद इतना तो मानना पड़ेगा कि व्यवहारतः मुख्यधारा की ये पार्टियां /गठबंधन – एनडीए-यूपीए अंतिम तौर पर समाज में यथास्थितावाद बहाल रखने के लिए ही प्रयत्नशील हैं। ऐसी स्थिति में उत्पीड़ित समूहचाहे वह दलित-आदिवासी व महिला हो या फिर ट्रांस-जेंडरइनके हक-अधिकार की मुकम्मल गारंटी तब तक संभव नहीं हो सकती जब तक इस यथास्थितिवाद को पलटते हुए पूरे समाज का क्रांतिकारी-समता आधारित मूल्यों के आधार पर पुनर्संगठन न किया जाय। इसी रास्ते उत्पीड़ित समूहों को मनुष्य’ का दर्ज़ा भी हासिल हो सकेगा। क्या कहना चाहेंगी आप
इस बात को हमलोगों ने भी महसूस किया। अगर कोई राजनीतिक पार्टी है तो वह बहुत सारे लोगों का जिस चीज पर दबदबा हैउसी को साथ लेकर चलती है। जिनकी संख्या कम हैवे हमेशा उपेक्षित रह जाते हैं। हम इस बात को मानते हैं कि पार्टी वोट बैंक से चलती हैजिस सामाजिक समूह से ज्यादा वोट हासिल होता हैउसी को वे देखती हैं। यह चलता आ रहा है और शायद आगे भी बहुत दिनों तक चलेगा। इसलिए हमलोग दो दिशाओं में काम कर रहे हैं – राजनीतिक पार्टियों से भी संपर्क-संवाद कर रहे हैं और न्यायपालिका का भी दरवाजा खटखटा रहे हैं। वर्तमान में हम देख रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने कई बड़े मामले पर हस्तक्षेप किया है और सरकारों को भी फटकार तक लगाई है। इसे देखते हुए हमलोगों ने महसूस किया कि हम केवल राजनीतिक पार्टियों के भरोसे नहीं रहेंगे बल्कि न्यायपालिका की भी मदद लेंगे। हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। इसलिए हमलोगों ने तय किया है किकानूनी लड़ाई भी लड़ेंगे और लगातार विधायिका-कार्यपालिका के समक्ष अपनी मांगें भी रखेंगे।                          
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डॉ. मुकेश कुमारपोस्ट डॉक्टोरल फ़ेलोआईसीएसएसआरमहात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालयवर्धा - 442005, महाराष्ट्र.मो.: 09431690824;                                           
 ई-मेल: drmukeshkumar.bgp@gmail.com 

डिसेन्ट कुमार साहूजूनियर रिसर्च फ़ेलोयूजीसीसमाज-कार्यमहात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालयवर्धा - 442005, महाराष्ट्र.मो.: 08855868445 ई-मेल: dksahu171@gmail.com 



बाबा साहब अम्बेडकर और स्त्री विमर्श

 अनुपमा पाण्डेय
नारीवादी सिद्धांतों का उद्देश्य लैंगिक समानता की प्रकृति को समझना तथा इसके फलस्वरूप पैदा होने वाले लैंगिक भेदभाव की राजनीति और शक्ति संतुलन के सिद्धांतों पर इसके असर की व्याख्या करना है । डॉ. अम्बेडकर दलित उत्थानकी दृष्टि से स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सर्वाधिक प्रभावशाली विचारक रहे हैं । परन्तु दलित उत्थान की विवेचना अधिकांश आलोचकों ने बहुत ही सीमित दृष्टि से की है और उसमें भी मात्र वर्ण व्यवस्था पर ही ध्यान दिया है । वस्तुतः दलितशब्द का तात्पर्य समाज के उस वर्ग से है जिसकी सदियों से उपेक्षा की गई है, तथा जिसकी इच्छा शक्ति को पनपने न देकर बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया है । डॉ. अम्बेडकर के विचारों में दलित शब्द अतिव्यापकता के साथ आया है जिसमें स्त्रियों सहित प्रत्येक वह व्यक्ति जो समाज के तथाकथित ठेकेदारों द्वारा उसके उसके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया । भारतीय नारी के संबंध में बाबा साहब का चिंतन प्रगतिशील रहा है ।
हम किसी भी विचार, संस्कृति और इतिहास को तबतक गंभीरतापूर्वक नहीं समझ पाएंगे, जब तक की उसके प्रभाव का विश्लेषण न करें । प्रभाव का विश्लेषण करते है तो सत्ता की संस्कृति समझ में आती है कि कैसे वह खुद को स्थापित करने के लिए सबको एक ही ढांचे में ढालने की चेष्टा करती है । वह जाति व्यवस्था में आधिपत्य के वर्चस्व एवं उसकी निरंतरता को बनाये रखना चाहता है । स्त्रीकरण एक अमानवीय व्यवस्था है, जिसके तहत पुरुष ने अपने विचारों एवं अवधारणा के अनुसार स्त्री का निर्माण किया है । ऐसे निर्माण में स्वाभाविक है कि स्त्री की सहमती नहीं रही होगी । साहित्य जगत के लेखकों नें भी अपनी कल्पना के अनुसार स्त्री-स्वरूप का निर्धारण किया है । स्त्री ने अपने बारे में, अपनी भावना, अपने इतिहास और अपनी इच्छा अनिच्छा के बारे में कभी कुछ नहीं कहा और ना ही उससे कभी पूछा गया है । पुरुष की संवर्धित चेतना, आधिपत्य की भावना, स्त्री देह के प्रति पूंजीकरण की प्रवृति ने ना केवल साहित्य-जगत में स्त्री की नुमाइंदगी का प्रयास किया, उसके अनुभवों की प्रमाणिकता पर न केवल अपना मत-अमत जाहिर किया बल्कि अपने स्त्री-विरोधी दृष्टिकोण एवं लेखकीय विद्वेष से एक ऐसा पाठक वर्ग तैयार किया जो स्त्री की कमजोरियों पर चुहलबाजी से बाज नहीं आता ।
बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों में स्त्री विमर्श-
स्त्री विमर्शशब्द हिंदी कथा साहित्य के केंद्र में पर्याप्त रूप से चर्चित रहा है । इसकी अभिव्यक्ति का मूलस्वर नारियों की आत्मनिर्भरता एवं स्त्री-पुरुष की समानता के आस-पास घूमता हुआ दिखाई देता है । आर्थिक स्वालंबन के अभाव में नारी अपने ही परिवार में शोषित होती रही है और अपने ही बुनियादी अधिकारों से वंचित होती रहती है । स्त्री को आर्थिक अधिकार पुरुषों के बराबर न होने के कारण विवाहिताएं अपने ही पति द्वारा छोड़ दिए जाने के भय से ग्रसित रहती हैं । वे जानती हैं कि परित्यक्ता स्त्री को समाज सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता है ।
बाबा साहब अम्बेडकर ने समाज में  स्त्रियों की स्थिति को बहुत ही करीब से अनुभव किया और उन्हें यह महसूस हुआ की वर्तमान समय में जो स्त्रियों की जो दशा है वह पशुओं से भी बत्तर है । उन्हें अपने ही परिवार के लोगों द्वारा शोषित किया जा रहा है । बचपन से लेकर बुढ़ापे तक उन्हें किसी न किसी रूप में प्रताड़ित किया जाता आ रहा है । उन्हें न ही स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार है और ना ही अपनी इच्छा के अनुरूप कुछ करने का ।
स्वतंत्रत भारत के कानून मंत्री के रूप में डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण विधेयक तैयार किया गया, जिसके द्वारा विवाह की आयु सीमा बढ़ाना, स्त्रियों को  विवाह विच्छेद का अधिकार देने, विरासत का अधिकार देने, भरण-पोषण के लिए धन देने तथा दहेज को स्त्री-धन माने जाने का प्रस्ताव दिया गया था । यद्यपि यह विधेयक ज्यों का त्यों पारित नहीं हो सका तथापि चार पृथक कानूनों के रूप में आज काफी सीमा तक स्त्रियों को आर्थिक व सामाजिक स्वतंत्रता दिलाने में मददगार रहा है ।
भारतीय समाज में स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग प्रतिमान देखे जा सकते हैं । स्त्रियों की शिक्षा भी इस दोहरे मापदंड का शिकार है । समाज की प्रगति नारी प्रगति के अभाव में अधूरी  है। क्योंकि वह समाज का हिस्सा होती हैं । नागपुर में संपन्न दलित वर्ग परिषदकी सभा में डॉ. अम्बेडकर का उक्त कथन अवलोकनीय है कि  -  “नारी जगत की प्रगति जिस अनुपात में होगी, उसी मानदंड से मैं उस समाज की प्रगति को आंकता हूँ उन्होंने गरीबी रेखा से निचे जीवन यापन करने वाली स्त्रियों से आग्रह किया था कि आप सफाई से रहना सिखों, सभी अनैतिक बुराइयों से बचो, हीन भावना को त्याग दो, शादी-विवाह जल्दी मत करो और अधिक संताने पैदा मत करो
नारी चेतना की दृष्टि से स्त्रियों में आत्मचेतना का विकास आवश्यक है । पुरुष और नारी जीवन-रथ के दो पहिये हैं दोनों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए । डॉ. अम्बेडकर का स्पष्ट कथन है, पत्नी को चाहिए की वह अपने पति के कार्यों में एक मित्र, एक सहयोगी के रूप में दायित्व निभाए लेकिन यदि पति गुलाम के रूप में वर्ताव करे तो उसका खुलकर विरोध करे बाबा साहब ने कहा था कि अगर किसी समाज की वास्तविक स्थिति को जानना हो तो उस समाज की स्त्रियों की स्थिति को जानना जरुरी है । स्त्रियों की स्थिति में समाज की वस्तुस्थिति परिलक्षित होती है ।  
बाल्ये पितृवंशे तिष्ठेत्पपणिग्राहस्य यौवने ।
पुत्राणा भर्तरि प्रेते न भजेत्स्त्री स्वतंत्रताम् ।।
                                                                                -मनुस्मृति: अध्याय -5 श्लोक-148
मनुस्मृति के पांचवे अध्याय में स्त्री की आजादी को लेकर दी गई हिदायतें (स्त्री को बाल्यकाल में पिता के, यौवनावस्था में पति के और बाद में पुत्रों के संरक्षण में रहना चाहिए) बेशक आज अप्रासंगिक और आउटडेटेडहो गई परंतु भारतीय समाज का एक बड़ा तबका आज भी इनसे पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है । छोटे शहर या कस्बे के निम्नमध्यवर्ग की एक तलाकशुदा लड़की जब शादी के कुछ दिनों या महीनों बाद मायके लौटती है  और दबी आवाज में कहती है कि मुझे अब उस घर में नहीं जाना’, तो माँ-बाप के घर में सदी का सबसे भयानक वज्रपात होता है । उसके इस निर्णय की तह में जाने या मिलजुलकर इसका कारण ढूढने की बजाय परिवार के सदस्य खेमे बनाकर उसके खिलाफ मोर्चा साध लेते हैं, और उसके बाद लोग व्यंग-बाण बोलने लगते हैं – ‘और पढ़ाओ लिखाओ उसको, और करवाओ उससे नौकरीआदि । स्त्री की सामाजिक स्थिति को विश्लेषित करने के कुछ तयशुदा सिधांत हैं, जिन्हें हम मनुस्मृति से लेकर केट मिलेट, जर्मेन ग्रियर और सिमोन द बुआ की किताबों में पढ़ते हैं उन पर यकीन करते हैं और जब तब उद्धरण देते हैं । किताबे कुछ और कहती हैं पर जीवन से जुड़े आपके निजी अनुभव एक दूसरा ही सच आपके सामने रखते हैं ।    
भारतीय समाज में पुरुष वर्चस्व के जड़े इतनी दूर तक और इतने गहरी पसरी हुई हैं कि अपने अगल-बगल, गली-नुक्कड़ जहाँ नजर दौडाएं आपको हर औरत में इस पितृसत्तात्मक समाज से मिले अवांछित दबाव की अलग-अलग किस्में नजर आएंगी । एक औसत पति अपने पत्नी को अपने बराबर की जगह पर भी देखना नही चाहता। वह अगर एक सीढी भी ऊपर दिखती है तो वह इर्ष्या के डंक से ग्रसित होकर व उसे काटछिल कर निचे लाने की ही कोशिश करता रहता है । दमयंती जोशी, सोनल मानसिंह, तीजन बाई जैसे सैकड़ों उदहारण है, जहाँ उनके पतियों ने उनकी कला से रीझकर शादी की और शादी के बाद कला को ही तिलांजली देने का आदेश दिया । जिन पत्नियों ने इस आदेश का पालन किया उनकी शादीयां बची रही, बाकी टूट गई। लेकिन यह भी देखा गया कि अधिकांश महिलाओं ने अपने सहयोगी पतियों से अलग होने के बाद भी अपनी पहचान बनाई और कामयाबी हासिल की । कहा जाता है कि हर कामयाब पुरुष के पीछे एक औरत होती है, पर कितनी कामयाब औरतों के पीछे पुरुषों को खड़ा पाया गया है? ज्यादातर उदहारण हमें ऐसे ही मिलेंगे जहां कामयाब औरत के पीछे एक असहयोगी, दंभी पुरुष होता है और वह स्त्री अपने कार्यक्षेत्र के प्रति एकाग्रता और समर्पण तभी ला सकती है जब वह अपने असहयोगी पुरुष के अरोधक बाड़े को लांघकर ऊससे बाहर आजाती है, क्योंकि औसत तथ्य यही सही है कि कामयाब औरत को एक सामान्य शावनिस्ट पुरुष बर्दाश्त ही नहीं कर सकता ।
बाबा साहब अम्बेडकर के द्वारा महिलाओं की स्थितियों में सुधार लाने की दृष्टि से किये गए प्रयास अनमोल थे । पति-पत्नी का तलाक देने का अधिकर होने का कानून सरकार से बनवाना, एक से ज्यादा पत्नियां यानि बहु-पत्निवाद का विरोध, कोयला खान में व अन्य असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली मजदूर, किसान, महिलाओं के लिए 21 दिन की छुट्टी, चोट आने पर मुआवजा, 20 साल की नौकरी होने पर कम से कम एक हर महिला को 15 रूपये मासिक पेन्शन देने की योजना, स्वास्थ्य मनोरंजन के साधन तथा काम के घंटे निश्चित कर कामगार महिलाओं के हित में प्रस्ताव पारित किए गए । बाबा साहब ने दलित महिलाओं की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘महिलाओं में जागृति का अटूट विश्वास है। सामाजिक कुरीतियां नष्ट करने में महिलाओं का बड़ा योगदान हो सकता है। मैं अपने अनुभव से यह बता रहा हूं कि जब मैने दलित समाज का काम अपने हाथों में लिया था तभी मैने यह निश्चय किया था कि पुरूषों के साथ महिलाओं को भी आगे ले जाना चाहिए। महिला समाज ने जितनी मात्रा में प्रगति की है इसे मैं दलित समाज की प्रगति में गिनती करता हूँ डॉ. अम्बेडकर ने दलित महिलाओं से अपनी बच्चियों की शादी कम उम्र में ना करने की अपील करते हुए उनको शिक्षित कर अपने पैरों पर खड़ा होने पर बल दिया तथा कम बच्चे पैदा करने व साफ सफाई से रहने का सन्देश देते हुए महिलाओं का परिवारों में समानता का स्तर हो इस पर भी बात की । डॉ. अम्बेडकर चाहते थे कि भारतीय स्त्री खासकर, हिन्दू स्त्री जिसमें सवर्ण तथा दलित दोनों की समाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन हो । उनकी दशा सुधारने के लिए वो एक ऐसा कानून बनाना चाहते थे जो विशुद्ध रूप से उनकी समाजिक, कानूनी स्थिति सुधारने में संजीवनी बूटी की तरह काम करें । इसलिए उन्होंने सौ फीसदी औरतों के हक में हिन्दू कोड बिलबनाया । इस हिन्दू कोड बिल और डॉ. अम्बेडकर दोनो को ही कट्टर पथियों का भयंकर विरोध सहना पड़ा । हिन्दू कोड बिल के विरोध में डॉ. अम्बेडकर को कई बार व्यक्तिगत अपमान झेलना पड़ा । उनके घर पर पत्थर तक बरसाये गये और संसद में भी उनका बहिष्कार किया गया। हिन्दू कोड बिलपास कराने के लिए डॉ. अम्बेडकर के साथ-साथ अनेक दलित गैर दलित महिलाओं ने भारतीय महिलाओं की समाजिक व आर्थिक लड़ाई लड़ी है । हिन्दू कोड बिलपर दुर्गाबाई देशमुख, लोकसभा की सदस्य श्रीमती पदमजी नायडू, राजश्री, सौ. चन्द्रकला, उर्मिला मेहता, मिसेस मिठान, महिला कांग्रेस की मन्त्री कुमारी मुकुल और उनके महिला जत्थे ने डॉ. अम्बेडकर के साथ गांव-गांव, नगर-नगर घूमकर सभा और जनसभाओं में भारतीय महिलाओं की समाजिक आर्थिक दुर्दशा के चित्र खींचे । अक्सर डॉ. अम्बेडकर और महिला साथियों द्वारा आयोजित हिन्दू कोड बिल चर्चा सभाओं में कट्टर पंथियों द्वारा सीधा हमला कर दिया जाता था, और चर्चा सभाओं को जबर्दस्ती बंद करा दिया जाता था । उस समय के अखबार भी हिन्दू कोड बिल के खिलाफ अनेक भड़काउ लेख छाप रहे थे उस समय देश का माहौल डॉ. अम्बेडकर और उनकी महिला साथियों के खिलाफ विषाक्त हो गया था । परन्तु ये सब डटे रहे। आखिर में जब हिन्दू कोड बिलसंसद में पास न हो सका तब डॉ. अम्बेडकर ने विरोध स्वरूप संसद से त्यागपत्र दे दिया ।
        बाबा साहब भारतीय स्त्रियों की उन्नति के लिए जितने प्रगतिशील कदम उठाते उतना ही कट्टरपथीं उनको पीछे खींचने के प्रयास में लगे रहते । कोड बिल जैसे प्रगतिशील कदम से चिढ़कर कट्टरपथिंयों ने डॉ. अम्बेडकर के खिलाफ चारों तरफ वैमनस्य, घृणा और तनाव का जाल बिछा दिया । पुरूष प्रधान संस्कृति पर प्रहार करते हुए इस बिल ने भारतीय महिलाओं को पुरूषों के बराबर कानूनी अधिकार देकर उनको गौरान्वित किया । इस बिल की वजह से हिन्दु स्त्री को विवाह, तलाक, आदि में पुरूषों जैसा ही हक दिया गया था । इस बिल में आठ अधिनियम बनाये गए जो इस प्रकार हैं-
1)      हिंदू विवाह अधिनियम
2)      विशेष विवाह अधिनियम
3)      गोद लेना दत्तकग्रहण अल्पायु संरक्षता अधिनियम
4)      हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम
5)      निर्बल तथा साधनहीन परिवार के भरण-पोषण अधिनियम
6)      अप्राप्तव्यय संरक्षण संबंधी अधिनियम
7)      उत्तराधिकारी अधिनियम और विधवा विवाह को पुनर्विवाह अधिकार अधिनियम
8)      पिता की संपत्ति में अधिकार अधिनियम
 हिंदू कोड बिल द्वारा किसी भी जाति की लड़की या लड़के का विवाह होना अवैद्य नही था । हिंदू कोड के अनुसार पत्नी और पति एक समय में एक ही विवाह कर सकते थे । अगर कोई पति अपनी पहली पत्नी के रहते और पत्नी पहले पति के रहते विवाह करतें हैं तो उसे कानूनी दण्ड मिलेगा । हिंदू कोड में पति के मर जाने पर हिन्दू स्त्री को पति की सम्पति में उसकी सन्तान के बराबर हिस्सा या अंश देने का नियम बनाया । हिंदू  धर्म शास्त्रों में विधवा के लिए दूसरी शादी का कोई विधान नही था और न ही जायदाद में उसे कोई हिस्सा या अंश मिलता था । हिंदू  कोड बिल की वजह से पिता की मृत्यु के पश्चात् पुत्री को भी भाइयों के बराबर जायदाद का वारिस बना दिया गया था । इसी तरह दतक या गोद लेने का अधिकार अपने कुल में से पैदा हुये बच्चे को ही प्राप्त था, किन्तु कोड के अनुसार किसी भी हिंदू परिवार में जन्मी लड़की या लड़के को गोद लिया जा सकता था और वह लड़का या लड़की चाहे वह किसी भी जाति के हों, गोद लिए जाने वाले की जायदाद के वारिस बन जाते हैं । इसमें सबसे अच्छी बात तो यह थी कि अब न केवल लड़का ही दतक बन सकता था, बल्कि लड़की भी दतक ली जा सकती थी ।
भारतीय स्त्रियां धार्मिक मान्यताओं के नाम पर तमाम ऐसी रुढियों को सहर्ष गले लगाकर बैठी रहती हैं जो उनके विरुद्ध ही रचे गए हैं । यह निश्चित है कि किसी बीमार को अपने इलाज की स्वयं जितनी चिंता होगी, किसी अन्य को नहीं होगी  धर्म ने  दलितों के उद्धार के लिए अन्य वर्णों की सेवा करने का नुस्का निर्धारित किया है तो स्त्रियों के लिए पति के चरणों को ही स्वर्ग की संज्ञा दी है । अन्य धर्मों का तो पता नही लेकिन इस्लाम कहता है कि अल्लाह के अलावा अगर किसी और के आगे स्त्री को सजदा करने की अनुमति होती है तो वह उसका पति ही होता है । डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का दहन वह टर्निंग प्वाइंटथा जिसने दलित आंदोलन को न केवल सही दिशा व गति दी, बल्कि इसके एजेंडे को वैज्ञानिक रूप भी प्रदान किया । आवैधानिक होने के बावजूद आज भी मनुस्मृतिऔर रामचरितमानसअभिजात्य हिंदू समाज के लिए आदर्श ग्रंथ है । मनुस्मृति का श्लोकार्द्ध  यत्र नार्यस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ (जहाँ स्त्री की पूजा होती है वहीं देवताओं का निवास होता है )  का गर्वपूर्ण वाचन करने में स्त्रियां पुरुषों की दशा में कम नहीं हैं; जबकि वास्तविकता यह है कि मनुस्मृति और रामचरितमानस दोनों ही दलित और स्त्री निंदक और विरोधी हैं और इस श्लोक का मंतव्य भी स्त्रियों की प्रशंसा नहीं, बल्कि निंदा ही है । सविधान और संसदीय प्रणाली द्वारा शासित इस लोकतांत्रिक देश की विडंबना का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि इसके एक प्रदेश राजस्थान के उच्च न्यायालय में मनु की प्रतिमा स्थापित की जाती है और वह भी वर्ष 2001 में। और इसमे कोई आश्चर्य नहीं कि राजस्थान में बलात्कृत महिला भंवरी देवी वहां कानूनी लड़ाई नहीं जीत पाती । प्रदेश के सबसे बड़े न्याय के मंदिर में यदि मनु का आदर्श ही मस्तिष्क पर छाया रहेगा तो न्याय का स्वरूप क्या होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है ।
डॉ. अम्बेडकर की हिंदू धर्म-ग्रंथो विशेषकर मनुस्मृति के प्रति भर्त्सनात्मक दृष्टि नें केवल दलित आंदोलन को ही सक्रीय किया हो ऐसी बात नहीं है । इसने कानून मंत्री के रूप में उन्हें हिंदू कोड बिल बनाने को भी प्रेरित किया । यह अलग बात है कि लोग आज उनके सामाजिक योगदान को भूलते जा रहे हैं । सुभाषिनी अली सहगल ने अपने लेख महिलाओं के हक़ की आगे और लड़ाई बाकी हैमें डॉ. अम्बेडकर को इन शब्दों में याद किया है- इस (न्याय मंत्री) हैसियत से वह संविधान तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष बने और इसी हैसियत से उन्होंने हिंदू महिलाओं को सम्पूर्ण अधिकार दिलाने के लिए हिंदू कोड बिल तैयार किया"। इस बिल के माध्यम से वह निम्न उद्देश्य प्राप्त करना चाह रहे थे
क)   संपति में जन्म के आधार की बजाय विरासत के अधिकार को दर्ज करवाना ।
ख)  महिलाओं को संपति का पूर्ण अधिकार दिलवाना ।
ग)    बेटियों को संपति के आधे हिस्से का उत्तराधिकारी बनाना ।
घ)    महिलाओं की सीमित संपदा को संपूर्ण संपदा में परिवर्तित करना ।
ङ)   शादी और गोद लेने के मामले में जाति का उन्मूलन करना ।
च)   बहुविवाह पर रोक लगाना और तलाक के सिधांत को मनवाना ।
हालांकि समूचा संविधान तो पारित हो सका, लेकिन इन  साधारण न्याय-संगत और तर्क-संगत बातों को हमारे देश के उच्च कोटि के नेता हजम नहीं कर पाए । उनका विरोध इतना तीखा था, कि उन्होंने बिल को समाप्त करने के लिए पैंतरे बदल-बदलकर इतने सारे हथियारों का इस्तेमाल कर डाला मनुस्मृति, रामायण, गीता की उन्होंने इतनी सौगंध खाई, डॉ. अम्बेडकर को इतना जलील करने की कोशिश की कि 1946 से 1951 तक बिल पर बहस होती रही और 1951में सरकार ने फैसला किया कि वह अब बिल वापस ले लेगी और डॉ. अम्बेडकर ने न्यायमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया ।

संदर्भ सूची-
1-     सं. सागर, शैलेन्द्र, रजनी गुप्त, आजाद औरत कितनी आजाद , सामायिक प्रकाशन ।
2-     खेतान, प्रभा, उपनिवेश में स्त्री (मुक्ति कामना की दस वार्ताएं), राजकमल प्रकाशन ।
3-     सं. दूबे अभय कुमार, आधुनिकता के आईने में दलित ।
4-     सिंधवी, डॉ. राजेंद्र कुमार , अम्बेडकर और स्त्री विमर्श ।
5-     कौसल्यायन, डॉ. भदंत आनंद , यदि बाबा साहब न होते ।
6-     अम्बेडकर, डॉ. भीमराव,  क्रांति और प्रतिक्रांति ।
7-     पाठक, डॉ.विनय कुमार, अम्बेडकरवादी सौंदर्य-शास्त्र और दलित आदिवासी जनजातीय विमर्श ।
8-     जाटव, डॉ. डी. आर., गांधी लोहिया और अम्बेडकर । 

 अनुपमा पाण्डेय
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
अनुवाद प्रद्योगिकी विभाग
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा
anuska.pantr@gmail.com