Showing posts with label Hindu code bill. Show all posts
Showing posts with label Hindu code bill. Show all posts

Saturday, March 24, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के चौथे दिन ग्रामीण स्वास्थ्य व अन्य मुद्दों पर हुई गहन चर्चा



वर्धा, 22 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषदहैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के चौथे दिन दत्ता मेघे इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस के संकायाध्यक्ष डॉ. अभय मूढ़े ने 'सामुदायिक स्वास्थ्य एवं स्वच्छता' विषय पर केन्द्रित सत्र को संबोधित किया। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति शहरों से अलग है। गांवों की स्थिति आज पहले से काफी बदल गई है। गांवों का कई मामलों में विकास हुआ है। गांवों में बिजली, इंटरनेट की सुविधाएं पहुंची है, गांवों में शौचालय बने हैं। बावजूद इसके आज भी ढेर सारे गांवों में जागरूकता का अभाव है। गाँव में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति आज भी बहुत बेहतर नहीं है। गाँव में आंगनबाड़ी केंद्र बने हैं। गांवों में स्कूल हैं, पर वहाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों के बीच में ही स्कूल छोड़ने की तादाद सबसे ज्यादा है। स्वच्छता की भारी कमी है। नालियाँ खुली पड़ी हुई हैं, उसके साफ-सफाई की नियमित व्यवस्था नहीं है।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए स्वास्थ्य केंद्र और स्वास्थ्य उपकेंद्र तो बने हुए हैं, किन्तु वहाँ चिकित्सकों का अभाव है। तीन हजार से ज्यादा आबादी वाले गाँव में छोटा स्वास्थ्य केंद्र का प्रावधान है, किन्तु ज़्यादातर गांवों में आज भी इसकी गारंटी नहीं हो पाई है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक पुरुष व महिला डाक्टर होना चाहिए। किन्तु ढेर सारे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां डाक्टर तो हैं, किन्तु जरूरी दवाओं की भारी कमी है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी आधा से अधिक गाँव में खुले में शौच जाना जारी है। इसका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इससे खाद्यान्न, शाक-सब्जी के संक्रमित होने का खतरा बढ़ जाता है। गाँव में शरीर और हाथों की साफ-सफाई को लेकर भी समुचित जागरूकता का अभाव है। भारत सरकार ने 1998 से सभी शहर और गाँव को स्वच्छ व निरोगी बनाने का संकल्प लिया है। सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान भी चलाया जा रहा है। इन सबके बीच ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल का अभाव बना हुआ है।
            आगे उन्होंने बताया कि निर्मल भारत अभियान के तहत ग्रामीण स्कूलों के बच्चों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जाता है। निर्मल ग्राम पुरस्कार भी दिए जाते हैं। स्वच्छता रथ के जरिए भी जागरूकता लाने की कोशिश की जा रही है। 9 से 15 अगस्त तक स्वच्छता सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। जनजागरूकता लाने में मीडिया की भी अहम भूमिका होती है।
            सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने और धन्यवाद डॉ. मुकेश कुमार ने किया।

चौथे दिन के दूसरे चर्चा सत्र में नेशनल इस्टिट्यूट आफ रुरल डेवलपमेंट एंड पंचायती राज, भारत सरकार, हैदराबाद के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर एवं मातृसेवा संघ इंटीट्यूट आफ सोशल वर्क, नागपुर में एसोसिएट प्रोफेसर रहे इंडियन जर्नल आफ सोशल वर्क एंड सोशल साइंसेज के इश्यू एडिटर रह चुके डॉ. अजित कुमार ने '14 वें वित्त आयोग: ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान' को दो केस स्टडी- सिंघाना ग्राम पंचायत (मध्यप्रदेश) एवं पटोदा (महाराष्ट्र) के संदर्भ में इसकी विस्तृत चर्चा की। महाराष्ट्र के प्रत्येक ग्राम पंचायत को औसतन 48 लाख रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ है। एंड, फंक्शन और फंक्शनरी के बीच बेहतर तालमेल के बगैर ग्राम पंचायतों का विकास मुश्किल है। कई राज्यों में ग्राम पंचायतों को शक्तियाँ तो दी गई हैं, किन्तु वहाँ स्टाफ वगैरह की व्यवस्था समुचित तौर पर नहीं किया गया है। केंद्र सरकार द्वारा ग्राम पंचायत को 29 तरह के अधिकार दिए हैं किन्तु ज़्यादातर राज्य सरकारों ने ग्राम पंचायतों को अब तक ये सारे अधिकार नहीं दिए हैं।
            उन्होंने कहा कि वित्त आयोग ही विभिन्न योजनाओं पर खर्च किए जाने वाली राशि का बंटवारा करता है। आज तक ग्राम पंचायतों को समुचित राशि उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है। ग्राम पंचायतों के पास आज न तो सत्ता है और न ही समुचित संसाधन है। भारत के कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों को एक हद तक शक्ति का हस्तांतरण किया गया है किन्तु ज़्यादातर राज्यों में ऐसा नहीं हो पाया है। हर ग्राम पंचायतों को अपनी परिस्थिति के विश्लेषण का भी वैधानिक प्रावधान है। ग्राम पंचायतों के पास जितने स्थानीय संसाधन हैं, उसका भी सम्पूर्ण ब्योरा ग्राम पंचायतों के पास होना चाहिए। देश में यथार्थपरक अध्ययन के तथ्य और आंकड़ों की भारी कमी है। इसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका हो सकती है।
            मध्यप्रदेश के धार जिले के मनावर ब्लाक के सिंघाना ग्राम पंचायत की केस स्टडी के आधार पर डॉ. अजित कुमार ने कहा कि यह मध्यप्रदेश के पिछड़े जिले में आता है। यहाँ ज्यादातर भीलों की आबादी है। 2005 के पूर्व इस ग्राम पंचायत के लोगों के पास पेय जल की व्यवस्था नहीं थी। लोगों का पानी की तलाश में ही ज़्यादातर वक्त खर्च हो जाता था। सड़क भी नहीं थी, दूसरे गाँव के लोग इस गाँव में अपनी लड़की की शादी करने तक को तैयार नहीं होते थे। इस ग्राम पंचायत में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आज गाँव की सड़क बन गई है, 60 फीसदी घरों में शौचालय है। पुल-पुलिया बन गए हैं। सामुदायिक भवन हैं। घर-घर नल का पानी पहुँच गया है। मनरेगा के तहत इस गाँव में जबरदस्त काम हुआ। ग्राम पंचायत अपनी सारी गतिविधियों का सुव्यवस्थित ढंग से दस्तावेजीकरण कर रहा है।
            उक्त गाँव में कृषि के उत्पादन में भी वृद्धि हुई है। सिंचाई के लिए कुएं खोदे गए हैं। सुव्यवस्थित ग्राम पंचायत भवन सुचारु ढंग से चल रहा है। यह सारा परिवर्तन 2005 से 2015 के बीच हुआ है। इसमें मनरेगा योजना की अहम भूमिका रही। मनरेगा से इस गाँव का विकास हुआ। संदीप अग्रवाल नामक एक स्थानीय व्यक्ति के कुशल नेतृत्व की इसमें अहम भूमिका रही। आज यह धार जिले का चमकता हुआ तारा बन चुका है। उन्होंने कहा कि मनरेगा योजना के ठप्प हो जाने से सिंघाना के लोग एक बार फिर पलायन करने को विवश हो गए हैं। यहाँ से छोटी उम्र के बच्चे को गुजरात के सूरत आदि जघों पर कपास बिनने के लिए ले जाया जाता है।  
            डॉ. अजीत कुमार ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के पटोदा ग्राम पंचायत की केस स्टडी के आधार पर बताया कि इस गाँव की आबादी 3350 है। यह मराठा बाहुल्य गाँव है। 2005 में जहां इस ग्राम पंचायत को 2,14,000 रुपए मात्र का अनुदान प्राप्त हुआ था वहीं 2012-13 में 28,30,627 रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ। पूर्व में गाँव में चार आटा चक्की था, जिसकी जगह पर ग्रामसभा ने चारों को बंद कर आपसी सहयोग से एक बड़ी आटा चक्की स्थापित की। इस गाँव में हुए अभिनव प्रयोग की उन्होंने विस्तृत चर्चा की। अंत में प्रतिभागियों के प्रश्नों का भी उन्होंने उत्तर दिया। इस सत्र का संचालन एवं आभार ज्ञापन डॉ. आमोद गुर्जर ने किया।   

तीसरे चर्चा सत्र का संयोजन एनसीआरआई के डीएन दास ने किया। सत्र में सभी सहभागियों ने सिलसिलेवार ढंग से अपने-अपने सबन्धित विषय पर प्रस्तुति दी। प्रथम सहभागी के रूप मे डॉ आमोद गुर्जर ने अपने शोध के अंतर्गत आनेवाली विभिन्न प्रक्रियाओं तथा टूल्स- टेकनिक्स की बात की। प्रस्तुति के दरम्यान उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में प्रयुक्त विभिन्न पद्धतियां जैस-पीआरए, आरआरए पर चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने पीएलए को केंद्र मे रखते हुए ग्रामीण क्षेत्र की सहभागिता पर अपनी बात रखी। प्रस्तुति के बाद प्रश्नोत्तरी में Practice Based Research Methodology पर बात हुई। दूसरे प्रतिभागी के रूप में डॉ. शिवसिंह बघेल ने शोध-प्रविधि के अंतर्गत आनेवाली पीआरए, आरआरए तथा एलएफए की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अपनी प्रस्तुति की। पीआरए पर विशेष रूप से बात करते हुए उन्होंने सोशल मैपिंग, चपाती डायग्राम तथा अन्य मैट्रिक्स पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने आगे बताया कि ग्रामीण सहभागिता के लिए गावों में प्रवेश करते ही पहले 'ट्रांज़िट वाक' करना पड़ता है। जिसमें गाँव के प्रति ज़्यादातर जानकारी शोधकर्ता को प्राप्त किया जा सकता है। सामाजिक मानचित्रण पर बात करते हुए उन्होंने गाँववालों को इस प्रक्रिया में सहभागिता की तकनीकों के बारे में बताया।
रिसोर्स मैपिक पर बात करते हुए ग्रामीणों की सहभागिता से ग्रामीण संसाधन की पहचान करने की तकनीक पर भी बात की। इसके बाद चपाती डायग्राम तथा Service Mapping के उपयोग की भी उन्होंने चर्चा की। डॉ. बघेल ने पीआरए के साथ-साथ एलएफए की प्रविधि की भी संक्षिप्त चर्चा की। इसके साथ ही केंद्र के विद्यार्थियों के द्वारा सेवाग्राम गाँव में प्रयुक्त पीआरए प्रविधि के अंतर्गत किए गए कार्य को भी उन्होंने प्रस्तुत किया।
            सत्र को आगे बढ़ाते हुए केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने ग्रामीण क्षेत्र में क्षेत्र सबंधी परियोजना पर शिक्षकों के सामने विभिन्न क्षेत्र तथा सुझाव प्रस्तुत किया। उन्होंने शिक्षकों का इस ओर ध्यान केन्द्रित किया कि हमें आदर्शवादी तरीके के बजाय इसे गाँव के लोगों की स्वीकार्यता से जोड़ना होगा। हम क्या चाहते हैं, इससे ज्यादा जरूरी है कि गाँव के लोग क्या चाहते हैं। इसी को मद्देनजर रखते हुए शोधकर्ता को गैप ढूँढने की कोशिश करनी होगी। अपने अनुभव बताते हुए उन्होंने बिहार के ग्रामीण क्षेत्र में प्रयुक्त पीएसपी की उपयोगिता को भी इसके साथ जोड़कर देखने की बात की। गांवों में कार्य करते समय एक दिन में समझकर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढा जा सकता, उसके लिए छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर गहन कार्य करने की आवश्यकता है।
            अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने सभी शिक्षकों से यह निवेदन किया कि दो दिन के क्षेत्र-कार्य में आपके द्वारा किए जाने वाले कार्य का कच्चा ड्राफ्ट तैयार करने की अपेक्षा जाहिर की। साथ ही उन्होंने शिक्षकों से यह अपेक्षा जाहिर की कि हम लोगों को ग्रामीण भारत के लोगों की प्राथमिकता तय करने में उनकी मदद करनी होगी अन्यथा उनका भटकाव देश के विकास को अवरुद्ध करेगा। गांधी, कुमारप्पा एवं शुमाखर की बात उद्घृत करते हुए उन्होंने इसके भटकाव को रोकने की प्रविधि को अपनाने पर ज़ोर दिया।
            सत्र में आगे नागपुर से आयी प्रतिभागी डॉ. समृद्धि डाबरे ने ग्रामीण महिलाओं से संबन्धित मुद्दों पर कार्य करने की जिज्ञासा व्यक्त की। डॉ. पल्लवी शुक्ला ने अपने विषय - पर्यावरण पर बात करते हुए सामाजिक पर्यावरण के अध्ययन में अपनी रुचि जाहिर की। अगले प्रतिभागी अभिषेक त्रिपाठी ने गांवों को समझने में नैतिकता की ओर ध्यान केन्द्रित किया। पार्थसारथी मणिकाम ने शोध एवं पाठ्यक्रम को एक-दूसरे के साथ जोड़ने की बात करते हुए कहा कि व्यावसायिक जीवन से बाहर निकलकर स्वतः प्रयत्न से आगे निकलना होगा। उन्होंने आगे थ्योरी एवं प्रैक्टिकल को जोड़ने की संभावना पर अपनी बात रखी। इसके लिए कम से कम 15 दिन से लेकर 1 माह तक क्षेत्र में रहकर समुदाय के जीवन को समझने की आवश्यकता जताई। साथ ही सहभागिता को महत्वपूर्ण टूल्स बताया। सुझाव देते हुए उन्होंने पिछले तीन दिनों के अनुभवों को शेयर करते हुए इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया कि सेसन लेक्चर मोड से ज्यादा समस्या ओरिएंटेड तथा प्रश्नोत्तरी आधारित होना चाहिए। श्री वाघमारे तथा डॉ. भरत खंडागले ने यह सुझाव दिया कि लेक्चर मेथड के साथ विडियो विजुअल का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करने की बात की तथा प्रतिभागियों से फीडबैक लेने की महत्ता को रेखांकित की।

चतुर्थ सत्र में समूह '' ने Socio-Economic and Educational Problem पर अपनी बात रखी। इसमें डॉ. सोनवाने, डॉ. सतपुते तथा अन्य ने अपनी प्रस्तुति दी। ग्रामीण विकास के समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने विभिन्न स्टेक होल्डरों को साथ लेते हुए ग्रामीणों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं पर अपनी बात रखी। इस कार्य में विभिन्न राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय तथा स्थानीय संगठनों की भूमिका का महत्व रेखांकित किया। पर्यावरणीय मुद्दों का घटना अध्ययन करते हुए उन्होंने अपनी बात रखी। समाज कार्य प्रविधियों में से एक सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य की 'सहायक प्रक्रिया' पर बात रखी। जिसमें उन्होंने 'एडिक्सन' की समस्या पर विस्तृत चर्चा की। इसके अंतर्गत एडिक्सन के विभिन्न प्रकारों व उसकी विशेषताएँ तथा उसके शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक आदि प्रक्रियाओं पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसको समझने के लिए उसके विभिन्न कारणों की चर्चा की। इसी कड़ी में आगे डॉ. अशोक सातपूते ने भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर अपनी बात रखी। इसमें उन्होंने जनसंख्या वृद्धि के कारणों तथा प्रभावों को बताते हुए उन्होंने उसके समाधान की बात की। इन समाधानों में समाज के विभिन्न संस्थाओं एवं संगठनों की भूमिका की चर्चा की। प्रस्तुति के अंत में 'भूमिका निर्वहन' में एडिक्सन समस्या में सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य की उपयोगिता को प्रस्तुत किया।
            सत्र के अंत में डॉ. मुकेश कुमार ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के मेंढ़ा-लेखा मॉडल विलेज की संक्षिप्त चर्चा की। तदुपरान्त एनसीआरआई के डीएन दास ने धन्यवाद ज्ञापन किया।


रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, गजानन एस. निलामे, डिसेन्ट कुमार साहू, सुधीर कुमार, माधुरी श्रीवास्तव, खुशबू साहू एवं सोनम बौद्ध.

Tuesday, February 3, 2015

बाबा साहब अम्बेडकर और स्त्री विमर्श

 अनुपमा पाण्डेय
नारीवादी सिद्धांतों का उद्देश्य लैंगिक समानता की प्रकृति को समझना तथा इसके फलस्वरूप पैदा होने वाले लैंगिक भेदभाव की राजनीति और शक्ति संतुलन के सिद्धांतों पर इसके असर की व्याख्या करना है । डॉ. अम्बेडकर दलित उत्थानकी दृष्टि से स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सर्वाधिक प्रभावशाली विचारक रहे हैं । परन्तु दलित उत्थान की विवेचना अधिकांश आलोचकों ने बहुत ही सीमित दृष्टि से की है और उसमें भी मात्र वर्ण व्यवस्था पर ही ध्यान दिया है । वस्तुतः दलितशब्द का तात्पर्य समाज के उस वर्ग से है जिसकी सदियों से उपेक्षा की गई है, तथा जिसकी इच्छा शक्ति को पनपने न देकर बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया है । डॉ. अम्बेडकर के विचारों में दलित शब्द अतिव्यापकता के साथ आया है जिसमें स्त्रियों सहित प्रत्येक वह व्यक्ति जो समाज के तथाकथित ठेकेदारों द्वारा उसके उसके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया । भारतीय नारी के संबंध में बाबा साहब का चिंतन प्रगतिशील रहा है ।
हम किसी भी विचार, संस्कृति और इतिहास को तबतक गंभीरतापूर्वक नहीं समझ पाएंगे, जब तक की उसके प्रभाव का विश्लेषण न करें । प्रभाव का विश्लेषण करते है तो सत्ता की संस्कृति समझ में आती है कि कैसे वह खुद को स्थापित करने के लिए सबको एक ही ढांचे में ढालने की चेष्टा करती है । वह जाति व्यवस्था में आधिपत्य के वर्चस्व एवं उसकी निरंतरता को बनाये रखना चाहता है । स्त्रीकरण एक अमानवीय व्यवस्था है, जिसके तहत पुरुष ने अपने विचारों एवं अवधारणा के अनुसार स्त्री का निर्माण किया है । ऐसे निर्माण में स्वाभाविक है कि स्त्री की सहमती नहीं रही होगी । साहित्य जगत के लेखकों नें भी अपनी कल्पना के अनुसार स्त्री-स्वरूप का निर्धारण किया है । स्त्री ने अपने बारे में, अपनी भावना, अपने इतिहास और अपनी इच्छा अनिच्छा के बारे में कभी कुछ नहीं कहा और ना ही उससे कभी पूछा गया है । पुरुष की संवर्धित चेतना, आधिपत्य की भावना, स्त्री देह के प्रति पूंजीकरण की प्रवृति ने ना केवल साहित्य-जगत में स्त्री की नुमाइंदगी का प्रयास किया, उसके अनुभवों की प्रमाणिकता पर न केवल अपना मत-अमत जाहिर किया बल्कि अपने स्त्री-विरोधी दृष्टिकोण एवं लेखकीय विद्वेष से एक ऐसा पाठक वर्ग तैयार किया जो स्त्री की कमजोरियों पर चुहलबाजी से बाज नहीं आता ।
बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों में स्त्री विमर्श-
स्त्री विमर्शशब्द हिंदी कथा साहित्य के केंद्र में पर्याप्त रूप से चर्चित रहा है । इसकी अभिव्यक्ति का मूलस्वर नारियों की आत्मनिर्भरता एवं स्त्री-पुरुष की समानता के आस-पास घूमता हुआ दिखाई देता है । आर्थिक स्वालंबन के अभाव में नारी अपने ही परिवार में शोषित होती रही है और अपने ही बुनियादी अधिकारों से वंचित होती रहती है । स्त्री को आर्थिक अधिकार पुरुषों के बराबर न होने के कारण विवाहिताएं अपने ही पति द्वारा छोड़ दिए जाने के भय से ग्रसित रहती हैं । वे जानती हैं कि परित्यक्ता स्त्री को समाज सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता है ।
बाबा साहब अम्बेडकर ने समाज में  स्त्रियों की स्थिति को बहुत ही करीब से अनुभव किया और उन्हें यह महसूस हुआ की वर्तमान समय में जो स्त्रियों की जो दशा है वह पशुओं से भी बत्तर है । उन्हें अपने ही परिवार के लोगों द्वारा शोषित किया जा रहा है । बचपन से लेकर बुढ़ापे तक उन्हें किसी न किसी रूप में प्रताड़ित किया जाता आ रहा है । उन्हें न ही स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार है और ना ही अपनी इच्छा के अनुरूप कुछ करने का ।
स्वतंत्रत भारत के कानून मंत्री के रूप में डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण विधेयक तैयार किया गया, जिसके द्वारा विवाह की आयु सीमा बढ़ाना, स्त्रियों को  विवाह विच्छेद का अधिकार देने, विरासत का अधिकार देने, भरण-पोषण के लिए धन देने तथा दहेज को स्त्री-धन माने जाने का प्रस्ताव दिया गया था । यद्यपि यह विधेयक ज्यों का त्यों पारित नहीं हो सका तथापि चार पृथक कानूनों के रूप में आज काफी सीमा तक स्त्रियों को आर्थिक व सामाजिक स्वतंत्रता दिलाने में मददगार रहा है ।
भारतीय समाज में स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग प्रतिमान देखे जा सकते हैं । स्त्रियों की शिक्षा भी इस दोहरे मापदंड का शिकार है । समाज की प्रगति नारी प्रगति के अभाव में अधूरी  है। क्योंकि वह समाज का हिस्सा होती हैं । नागपुर में संपन्न दलित वर्ग परिषदकी सभा में डॉ. अम्बेडकर का उक्त कथन अवलोकनीय है कि  -  “नारी जगत की प्रगति जिस अनुपात में होगी, उसी मानदंड से मैं उस समाज की प्रगति को आंकता हूँ उन्होंने गरीबी रेखा से निचे जीवन यापन करने वाली स्त्रियों से आग्रह किया था कि आप सफाई से रहना सिखों, सभी अनैतिक बुराइयों से बचो, हीन भावना को त्याग दो, शादी-विवाह जल्दी मत करो और अधिक संताने पैदा मत करो
नारी चेतना की दृष्टि से स्त्रियों में आत्मचेतना का विकास आवश्यक है । पुरुष और नारी जीवन-रथ के दो पहिये हैं दोनों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए । डॉ. अम्बेडकर का स्पष्ट कथन है, पत्नी को चाहिए की वह अपने पति के कार्यों में एक मित्र, एक सहयोगी के रूप में दायित्व निभाए लेकिन यदि पति गुलाम के रूप में वर्ताव करे तो उसका खुलकर विरोध करे बाबा साहब ने कहा था कि अगर किसी समाज की वास्तविक स्थिति को जानना हो तो उस समाज की स्त्रियों की स्थिति को जानना जरुरी है । स्त्रियों की स्थिति में समाज की वस्तुस्थिति परिलक्षित होती है ।  
बाल्ये पितृवंशे तिष्ठेत्पपणिग्राहस्य यौवने ।
पुत्राणा भर्तरि प्रेते न भजेत्स्त्री स्वतंत्रताम् ।।
                                                                                -मनुस्मृति: अध्याय -5 श्लोक-148
मनुस्मृति के पांचवे अध्याय में स्त्री की आजादी को लेकर दी गई हिदायतें (स्त्री को बाल्यकाल में पिता के, यौवनावस्था में पति के और बाद में पुत्रों के संरक्षण में रहना चाहिए) बेशक आज अप्रासंगिक और आउटडेटेडहो गई परंतु भारतीय समाज का एक बड़ा तबका आज भी इनसे पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है । छोटे शहर या कस्बे के निम्नमध्यवर्ग की एक तलाकशुदा लड़की जब शादी के कुछ दिनों या महीनों बाद मायके लौटती है  और दबी आवाज में कहती है कि मुझे अब उस घर में नहीं जाना’, तो माँ-बाप के घर में सदी का सबसे भयानक वज्रपात होता है । उसके इस निर्णय की तह में जाने या मिलजुलकर इसका कारण ढूढने की बजाय परिवार के सदस्य खेमे बनाकर उसके खिलाफ मोर्चा साध लेते हैं, और उसके बाद लोग व्यंग-बाण बोलने लगते हैं – ‘और पढ़ाओ लिखाओ उसको, और करवाओ उससे नौकरीआदि । स्त्री की सामाजिक स्थिति को विश्लेषित करने के कुछ तयशुदा सिधांत हैं, जिन्हें हम मनुस्मृति से लेकर केट मिलेट, जर्मेन ग्रियर और सिमोन द बुआ की किताबों में पढ़ते हैं उन पर यकीन करते हैं और जब तब उद्धरण देते हैं । किताबे कुछ और कहती हैं पर जीवन से जुड़े आपके निजी अनुभव एक दूसरा ही सच आपके सामने रखते हैं ।    
भारतीय समाज में पुरुष वर्चस्व के जड़े इतनी दूर तक और इतने गहरी पसरी हुई हैं कि अपने अगल-बगल, गली-नुक्कड़ जहाँ नजर दौडाएं आपको हर औरत में इस पितृसत्तात्मक समाज से मिले अवांछित दबाव की अलग-अलग किस्में नजर आएंगी । एक औसत पति अपने पत्नी को अपने बराबर की जगह पर भी देखना नही चाहता। वह अगर एक सीढी भी ऊपर दिखती है तो वह इर्ष्या के डंक से ग्रसित होकर व उसे काटछिल कर निचे लाने की ही कोशिश करता रहता है । दमयंती जोशी, सोनल मानसिंह, तीजन बाई जैसे सैकड़ों उदहारण है, जहाँ उनके पतियों ने उनकी कला से रीझकर शादी की और शादी के बाद कला को ही तिलांजली देने का आदेश दिया । जिन पत्नियों ने इस आदेश का पालन किया उनकी शादीयां बची रही, बाकी टूट गई। लेकिन यह भी देखा गया कि अधिकांश महिलाओं ने अपने सहयोगी पतियों से अलग होने के बाद भी अपनी पहचान बनाई और कामयाबी हासिल की । कहा जाता है कि हर कामयाब पुरुष के पीछे एक औरत होती है, पर कितनी कामयाब औरतों के पीछे पुरुषों को खड़ा पाया गया है? ज्यादातर उदहारण हमें ऐसे ही मिलेंगे जहां कामयाब औरत के पीछे एक असहयोगी, दंभी पुरुष होता है और वह स्त्री अपने कार्यक्षेत्र के प्रति एकाग्रता और समर्पण तभी ला सकती है जब वह अपने असहयोगी पुरुष के अरोधक बाड़े को लांघकर ऊससे बाहर आजाती है, क्योंकि औसत तथ्य यही सही है कि कामयाब औरत को एक सामान्य शावनिस्ट पुरुष बर्दाश्त ही नहीं कर सकता ।
बाबा साहब अम्बेडकर के द्वारा महिलाओं की स्थितियों में सुधार लाने की दृष्टि से किये गए प्रयास अनमोल थे । पति-पत्नी का तलाक देने का अधिकर होने का कानून सरकार से बनवाना, एक से ज्यादा पत्नियां यानि बहु-पत्निवाद का विरोध, कोयला खान में व अन्य असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली मजदूर, किसान, महिलाओं के लिए 21 दिन की छुट्टी, चोट आने पर मुआवजा, 20 साल की नौकरी होने पर कम से कम एक हर महिला को 15 रूपये मासिक पेन्शन देने की योजना, स्वास्थ्य मनोरंजन के साधन तथा काम के घंटे निश्चित कर कामगार महिलाओं के हित में प्रस्ताव पारित किए गए । बाबा साहब ने दलित महिलाओं की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘महिलाओं में जागृति का अटूट विश्वास है। सामाजिक कुरीतियां नष्ट करने में महिलाओं का बड़ा योगदान हो सकता है। मैं अपने अनुभव से यह बता रहा हूं कि जब मैने दलित समाज का काम अपने हाथों में लिया था तभी मैने यह निश्चय किया था कि पुरूषों के साथ महिलाओं को भी आगे ले जाना चाहिए। महिला समाज ने जितनी मात्रा में प्रगति की है इसे मैं दलित समाज की प्रगति में गिनती करता हूँ डॉ. अम्बेडकर ने दलित महिलाओं से अपनी बच्चियों की शादी कम उम्र में ना करने की अपील करते हुए उनको शिक्षित कर अपने पैरों पर खड़ा होने पर बल दिया तथा कम बच्चे पैदा करने व साफ सफाई से रहने का सन्देश देते हुए महिलाओं का परिवारों में समानता का स्तर हो इस पर भी बात की । डॉ. अम्बेडकर चाहते थे कि भारतीय स्त्री खासकर, हिन्दू स्त्री जिसमें सवर्ण तथा दलित दोनों की समाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन हो । उनकी दशा सुधारने के लिए वो एक ऐसा कानून बनाना चाहते थे जो विशुद्ध रूप से उनकी समाजिक, कानूनी स्थिति सुधारने में संजीवनी बूटी की तरह काम करें । इसलिए उन्होंने सौ फीसदी औरतों के हक में हिन्दू कोड बिलबनाया । इस हिन्दू कोड बिल और डॉ. अम्बेडकर दोनो को ही कट्टर पथियों का भयंकर विरोध सहना पड़ा । हिन्दू कोड बिल के विरोध में डॉ. अम्बेडकर को कई बार व्यक्तिगत अपमान झेलना पड़ा । उनके घर पर पत्थर तक बरसाये गये और संसद में भी उनका बहिष्कार किया गया। हिन्दू कोड बिलपास कराने के लिए डॉ. अम्बेडकर के साथ-साथ अनेक दलित गैर दलित महिलाओं ने भारतीय महिलाओं की समाजिक व आर्थिक लड़ाई लड़ी है । हिन्दू कोड बिलपर दुर्गाबाई देशमुख, लोकसभा की सदस्य श्रीमती पदमजी नायडू, राजश्री, सौ. चन्द्रकला, उर्मिला मेहता, मिसेस मिठान, महिला कांग्रेस की मन्त्री कुमारी मुकुल और उनके महिला जत्थे ने डॉ. अम्बेडकर के साथ गांव-गांव, नगर-नगर घूमकर सभा और जनसभाओं में भारतीय महिलाओं की समाजिक आर्थिक दुर्दशा के चित्र खींचे । अक्सर डॉ. अम्बेडकर और महिला साथियों द्वारा आयोजित हिन्दू कोड बिल चर्चा सभाओं में कट्टर पंथियों द्वारा सीधा हमला कर दिया जाता था, और चर्चा सभाओं को जबर्दस्ती बंद करा दिया जाता था । उस समय के अखबार भी हिन्दू कोड बिल के खिलाफ अनेक भड़काउ लेख छाप रहे थे उस समय देश का माहौल डॉ. अम्बेडकर और उनकी महिला साथियों के खिलाफ विषाक्त हो गया था । परन्तु ये सब डटे रहे। आखिर में जब हिन्दू कोड बिलसंसद में पास न हो सका तब डॉ. अम्बेडकर ने विरोध स्वरूप संसद से त्यागपत्र दे दिया ।
        बाबा साहब भारतीय स्त्रियों की उन्नति के लिए जितने प्रगतिशील कदम उठाते उतना ही कट्टरपथीं उनको पीछे खींचने के प्रयास में लगे रहते । कोड बिल जैसे प्रगतिशील कदम से चिढ़कर कट्टरपथिंयों ने डॉ. अम्बेडकर के खिलाफ चारों तरफ वैमनस्य, घृणा और तनाव का जाल बिछा दिया । पुरूष प्रधान संस्कृति पर प्रहार करते हुए इस बिल ने भारतीय महिलाओं को पुरूषों के बराबर कानूनी अधिकार देकर उनको गौरान्वित किया । इस बिल की वजह से हिन्दु स्त्री को विवाह, तलाक, आदि में पुरूषों जैसा ही हक दिया गया था । इस बिल में आठ अधिनियम बनाये गए जो इस प्रकार हैं-
1)      हिंदू विवाह अधिनियम
2)      विशेष विवाह अधिनियम
3)      गोद लेना दत्तकग्रहण अल्पायु संरक्षता अधिनियम
4)      हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम
5)      निर्बल तथा साधनहीन परिवार के भरण-पोषण अधिनियम
6)      अप्राप्तव्यय संरक्षण संबंधी अधिनियम
7)      उत्तराधिकारी अधिनियम और विधवा विवाह को पुनर्विवाह अधिकार अधिनियम
8)      पिता की संपत्ति में अधिकार अधिनियम
 हिंदू कोड बिल द्वारा किसी भी जाति की लड़की या लड़के का विवाह होना अवैद्य नही था । हिंदू कोड के अनुसार पत्नी और पति एक समय में एक ही विवाह कर सकते थे । अगर कोई पति अपनी पहली पत्नी के रहते और पत्नी पहले पति के रहते विवाह करतें हैं तो उसे कानूनी दण्ड मिलेगा । हिंदू कोड में पति के मर जाने पर हिन्दू स्त्री को पति की सम्पति में उसकी सन्तान के बराबर हिस्सा या अंश देने का नियम बनाया । हिंदू  धर्म शास्त्रों में विधवा के लिए दूसरी शादी का कोई विधान नही था और न ही जायदाद में उसे कोई हिस्सा या अंश मिलता था । हिंदू  कोड बिल की वजह से पिता की मृत्यु के पश्चात् पुत्री को भी भाइयों के बराबर जायदाद का वारिस बना दिया गया था । इसी तरह दतक या गोद लेने का अधिकार अपने कुल में से पैदा हुये बच्चे को ही प्राप्त था, किन्तु कोड के अनुसार किसी भी हिंदू परिवार में जन्मी लड़की या लड़के को गोद लिया जा सकता था और वह लड़का या लड़की चाहे वह किसी भी जाति के हों, गोद लिए जाने वाले की जायदाद के वारिस बन जाते हैं । इसमें सबसे अच्छी बात तो यह थी कि अब न केवल लड़का ही दतक बन सकता था, बल्कि लड़की भी दतक ली जा सकती थी ।
भारतीय स्त्रियां धार्मिक मान्यताओं के नाम पर तमाम ऐसी रुढियों को सहर्ष गले लगाकर बैठी रहती हैं जो उनके विरुद्ध ही रचे गए हैं । यह निश्चित है कि किसी बीमार को अपने इलाज की स्वयं जितनी चिंता होगी, किसी अन्य को नहीं होगी  धर्म ने  दलितों के उद्धार के लिए अन्य वर्णों की सेवा करने का नुस्का निर्धारित किया है तो स्त्रियों के लिए पति के चरणों को ही स्वर्ग की संज्ञा दी है । अन्य धर्मों का तो पता नही लेकिन इस्लाम कहता है कि अल्लाह के अलावा अगर किसी और के आगे स्त्री को सजदा करने की अनुमति होती है तो वह उसका पति ही होता है । डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का दहन वह टर्निंग प्वाइंटथा जिसने दलित आंदोलन को न केवल सही दिशा व गति दी, बल्कि इसके एजेंडे को वैज्ञानिक रूप भी प्रदान किया । आवैधानिक होने के बावजूद आज भी मनुस्मृतिऔर रामचरितमानसअभिजात्य हिंदू समाज के लिए आदर्श ग्रंथ है । मनुस्मृति का श्लोकार्द्ध  यत्र नार्यस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ (जहाँ स्त्री की पूजा होती है वहीं देवताओं का निवास होता है )  का गर्वपूर्ण वाचन करने में स्त्रियां पुरुषों की दशा में कम नहीं हैं; जबकि वास्तविकता यह है कि मनुस्मृति और रामचरितमानस दोनों ही दलित और स्त्री निंदक और विरोधी हैं और इस श्लोक का मंतव्य भी स्त्रियों की प्रशंसा नहीं, बल्कि निंदा ही है । सविधान और संसदीय प्रणाली द्वारा शासित इस लोकतांत्रिक देश की विडंबना का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि इसके एक प्रदेश राजस्थान के उच्च न्यायालय में मनु की प्रतिमा स्थापित की जाती है और वह भी वर्ष 2001 में। और इसमे कोई आश्चर्य नहीं कि राजस्थान में बलात्कृत महिला भंवरी देवी वहां कानूनी लड़ाई नहीं जीत पाती । प्रदेश के सबसे बड़े न्याय के मंदिर में यदि मनु का आदर्श ही मस्तिष्क पर छाया रहेगा तो न्याय का स्वरूप क्या होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है ।
डॉ. अम्बेडकर की हिंदू धर्म-ग्रंथो विशेषकर मनुस्मृति के प्रति भर्त्सनात्मक दृष्टि नें केवल दलित आंदोलन को ही सक्रीय किया हो ऐसी बात नहीं है । इसने कानून मंत्री के रूप में उन्हें हिंदू कोड बिल बनाने को भी प्रेरित किया । यह अलग बात है कि लोग आज उनके सामाजिक योगदान को भूलते जा रहे हैं । सुभाषिनी अली सहगल ने अपने लेख महिलाओं के हक़ की आगे और लड़ाई बाकी हैमें डॉ. अम्बेडकर को इन शब्दों में याद किया है- इस (न्याय मंत्री) हैसियत से वह संविधान तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष बने और इसी हैसियत से उन्होंने हिंदू महिलाओं को सम्पूर्ण अधिकार दिलाने के लिए हिंदू कोड बिल तैयार किया"। इस बिल के माध्यम से वह निम्न उद्देश्य प्राप्त करना चाह रहे थे
क)   संपति में जन्म के आधार की बजाय विरासत के अधिकार को दर्ज करवाना ।
ख)  महिलाओं को संपति का पूर्ण अधिकार दिलवाना ।
ग)    बेटियों को संपति के आधे हिस्से का उत्तराधिकारी बनाना ।
घ)    महिलाओं की सीमित संपदा को संपूर्ण संपदा में परिवर्तित करना ।
ङ)   शादी और गोद लेने के मामले में जाति का उन्मूलन करना ।
च)   बहुविवाह पर रोक लगाना और तलाक के सिधांत को मनवाना ।
हालांकि समूचा संविधान तो पारित हो सका, लेकिन इन  साधारण न्याय-संगत और तर्क-संगत बातों को हमारे देश के उच्च कोटि के नेता हजम नहीं कर पाए । उनका विरोध इतना तीखा था, कि उन्होंने बिल को समाप्त करने के लिए पैंतरे बदल-बदलकर इतने सारे हथियारों का इस्तेमाल कर डाला मनुस्मृति, रामायण, गीता की उन्होंने इतनी सौगंध खाई, डॉ. अम्बेडकर को इतना जलील करने की कोशिश की कि 1946 से 1951 तक बिल पर बहस होती रही और 1951में सरकार ने फैसला किया कि वह अब बिल वापस ले लेगी और डॉ. अम्बेडकर ने न्यायमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया ।

संदर्भ सूची-
1-     सं. सागर, शैलेन्द्र, रजनी गुप्त, आजाद औरत कितनी आजाद , सामायिक प्रकाशन ।
2-     खेतान, प्रभा, उपनिवेश में स्त्री (मुक्ति कामना की दस वार्ताएं), राजकमल प्रकाशन ।
3-     सं. दूबे अभय कुमार, आधुनिकता के आईने में दलित ।
4-     सिंधवी, डॉ. राजेंद्र कुमार , अम्बेडकर और स्त्री विमर्श ।
5-     कौसल्यायन, डॉ. भदंत आनंद , यदि बाबा साहब न होते ।
6-     अम्बेडकर, डॉ. भीमराव,  क्रांति और प्रतिक्रांति ।
7-     पाठक, डॉ.विनय कुमार, अम्बेडकरवादी सौंदर्य-शास्त्र और दलित आदिवासी जनजातीय विमर्श ।
8-     जाटव, डॉ. डी. आर., गांधी लोहिया और अम्बेडकर । 

 अनुपमा पाण्डेय
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
अनुवाद प्रद्योगिकी विभाग
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा
anuska.pantr@gmail.com