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Saturday, March 24, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के चौथे दिन ग्रामीण स्वास्थ्य व अन्य मुद्दों पर हुई गहन चर्चा



वर्धा, 22 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषदहैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के चौथे दिन दत्ता मेघे इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस के संकायाध्यक्ष डॉ. अभय मूढ़े ने 'सामुदायिक स्वास्थ्य एवं स्वच्छता' विषय पर केन्द्रित सत्र को संबोधित किया। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति शहरों से अलग है। गांवों की स्थिति आज पहले से काफी बदल गई है। गांवों का कई मामलों में विकास हुआ है। गांवों में बिजली, इंटरनेट की सुविधाएं पहुंची है, गांवों में शौचालय बने हैं। बावजूद इसके आज भी ढेर सारे गांवों में जागरूकता का अभाव है। गाँव में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति आज भी बहुत बेहतर नहीं है। गाँव में आंगनबाड़ी केंद्र बने हैं। गांवों में स्कूल हैं, पर वहाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों के बीच में ही स्कूल छोड़ने की तादाद सबसे ज्यादा है। स्वच्छता की भारी कमी है। नालियाँ खुली पड़ी हुई हैं, उसके साफ-सफाई की नियमित व्यवस्था नहीं है।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए स्वास्थ्य केंद्र और स्वास्थ्य उपकेंद्र तो बने हुए हैं, किन्तु वहाँ चिकित्सकों का अभाव है। तीन हजार से ज्यादा आबादी वाले गाँव में छोटा स्वास्थ्य केंद्र का प्रावधान है, किन्तु ज़्यादातर गांवों में आज भी इसकी गारंटी नहीं हो पाई है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक पुरुष व महिला डाक्टर होना चाहिए। किन्तु ढेर सारे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां डाक्टर तो हैं, किन्तु जरूरी दवाओं की भारी कमी है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी आधा से अधिक गाँव में खुले में शौच जाना जारी है। इसका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इससे खाद्यान्न, शाक-सब्जी के संक्रमित होने का खतरा बढ़ जाता है। गाँव में शरीर और हाथों की साफ-सफाई को लेकर भी समुचित जागरूकता का अभाव है। भारत सरकार ने 1998 से सभी शहर और गाँव को स्वच्छ व निरोगी बनाने का संकल्प लिया है। सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान भी चलाया जा रहा है। इन सबके बीच ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल का अभाव बना हुआ है।
            आगे उन्होंने बताया कि निर्मल भारत अभियान के तहत ग्रामीण स्कूलों के बच्चों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जाता है। निर्मल ग्राम पुरस्कार भी दिए जाते हैं। स्वच्छता रथ के जरिए भी जागरूकता लाने की कोशिश की जा रही है। 9 से 15 अगस्त तक स्वच्छता सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। जनजागरूकता लाने में मीडिया की भी अहम भूमिका होती है।
            सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने और धन्यवाद डॉ. मुकेश कुमार ने किया।

चौथे दिन के दूसरे चर्चा सत्र में नेशनल इस्टिट्यूट आफ रुरल डेवलपमेंट एंड पंचायती राज, भारत सरकार, हैदराबाद के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर एवं मातृसेवा संघ इंटीट्यूट आफ सोशल वर्क, नागपुर में एसोसिएट प्रोफेसर रहे इंडियन जर्नल आफ सोशल वर्क एंड सोशल साइंसेज के इश्यू एडिटर रह चुके डॉ. अजित कुमार ने '14 वें वित्त आयोग: ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान' को दो केस स्टडी- सिंघाना ग्राम पंचायत (मध्यप्रदेश) एवं पटोदा (महाराष्ट्र) के संदर्भ में इसकी विस्तृत चर्चा की। महाराष्ट्र के प्रत्येक ग्राम पंचायत को औसतन 48 लाख रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ है। एंड, फंक्शन और फंक्शनरी के बीच बेहतर तालमेल के बगैर ग्राम पंचायतों का विकास मुश्किल है। कई राज्यों में ग्राम पंचायतों को शक्तियाँ तो दी गई हैं, किन्तु वहाँ स्टाफ वगैरह की व्यवस्था समुचित तौर पर नहीं किया गया है। केंद्र सरकार द्वारा ग्राम पंचायत को 29 तरह के अधिकार दिए हैं किन्तु ज़्यादातर राज्य सरकारों ने ग्राम पंचायतों को अब तक ये सारे अधिकार नहीं दिए हैं।
            उन्होंने कहा कि वित्त आयोग ही विभिन्न योजनाओं पर खर्च किए जाने वाली राशि का बंटवारा करता है। आज तक ग्राम पंचायतों को समुचित राशि उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है। ग्राम पंचायतों के पास आज न तो सत्ता है और न ही समुचित संसाधन है। भारत के कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों को एक हद तक शक्ति का हस्तांतरण किया गया है किन्तु ज़्यादातर राज्यों में ऐसा नहीं हो पाया है। हर ग्राम पंचायतों को अपनी परिस्थिति के विश्लेषण का भी वैधानिक प्रावधान है। ग्राम पंचायतों के पास जितने स्थानीय संसाधन हैं, उसका भी सम्पूर्ण ब्योरा ग्राम पंचायतों के पास होना चाहिए। देश में यथार्थपरक अध्ययन के तथ्य और आंकड़ों की भारी कमी है। इसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका हो सकती है।
            मध्यप्रदेश के धार जिले के मनावर ब्लाक के सिंघाना ग्राम पंचायत की केस स्टडी के आधार पर डॉ. अजित कुमार ने कहा कि यह मध्यप्रदेश के पिछड़े जिले में आता है। यहाँ ज्यादातर भीलों की आबादी है। 2005 के पूर्व इस ग्राम पंचायत के लोगों के पास पेय जल की व्यवस्था नहीं थी। लोगों का पानी की तलाश में ही ज़्यादातर वक्त खर्च हो जाता था। सड़क भी नहीं थी, दूसरे गाँव के लोग इस गाँव में अपनी लड़की की शादी करने तक को तैयार नहीं होते थे। इस ग्राम पंचायत में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आज गाँव की सड़क बन गई है, 60 फीसदी घरों में शौचालय है। पुल-पुलिया बन गए हैं। सामुदायिक भवन हैं। घर-घर नल का पानी पहुँच गया है। मनरेगा के तहत इस गाँव में जबरदस्त काम हुआ। ग्राम पंचायत अपनी सारी गतिविधियों का सुव्यवस्थित ढंग से दस्तावेजीकरण कर रहा है।
            उक्त गाँव में कृषि के उत्पादन में भी वृद्धि हुई है। सिंचाई के लिए कुएं खोदे गए हैं। सुव्यवस्थित ग्राम पंचायत भवन सुचारु ढंग से चल रहा है। यह सारा परिवर्तन 2005 से 2015 के बीच हुआ है। इसमें मनरेगा योजना की अहम भूमिका रही। मनरेगा से इस गाँव का विकास हुआ। संदीप अग्रवाल नामक एक स्थानीय व्यक्ति के कुशल नेतृत्व की इसमें अहम भूमिका रही। आज यह धार जिले का चमकता हुआ तारा बन चुका है। उन्होंने कहा कि मनरेगा योजना के ठप्प हो जाने से सिंघाना के लोग एक बार फिर पलायन करने को विवश हो गए हैं। यहाँ से छोटी उम्र के बच्चे को गुजरात के सूरत आदि जघों पर कपास बिनने के लिए ले जाया जाता है।  
            डॉ. अजीत कुमार ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के पटोदा ग्राम पंचायत की केस स्टडी के आधार पर बताया कि इस गाँव की आबादी 3350 है। यह मराठा बाहुल्य गाँव है। 2005 में जहां इस ग्राम पंचायत को 2,14,000 रुपए मात्र का अनुदान प्राप्त हुआ था वहीं 2012-13 में 28,30,627 रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ। पूर्व में गाँव में चार आटा चक्की था, जिसकी जगह पर ग्रामसभा ने चारों को बंद कर आपसी सहयोग से एक बड़ी आटा चक्की स्थापित की। इस गाँव में हुए अभिनव प्रयोग की उन्होंने विस्तृत चर्चा की। अंत में प्रतिभागियों के प्रश्नों का भी उन्होंने उत्तर दिया। इस सत्र का संचालन एवं आभार ज्ञापन डॉ. आमोद गुर्जर ने किया।   

तीसरे चर्चा सत्र का संयोजन एनसीआरआई के डीएन दास ने किया। सत्र में सभी सहभागियों ने सिलसिलेवार ढंग से अपने-अपने सबन्धित विषय पर प्रस्तुति दी। प्रथम सहभागी के रूप मे डॉ आमोद गुर्जर ने अपने शोध के अंतर्गत आनेवाली विभिन्न प्रक्रियाओं तथा टूल्स- टेकनिक्स की बात की। प्रस्तुति के दरम्यान उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में प्रयुक्त विभिन्न पद्धतियां जैस-पीआरए, आरआरए पर चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने पीएलए को केंद्र मे रखते हुए ग्रामीण क्षेत्र की सहभागिता पर अपनी बात रखी। प्रस्तुति के बाद प्रश्नोत्तरी में Practice Based Research Methodology पर बात हुई। दूसरे प्रतिभागी के रूप में डॉ. शिवसिंह बघेल ने शोध-प्रविधि के अंतर्गत आनेवाली पीआरए, आरआरए तथा एलएफए की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अपनी प्रस्तुति की। पीआरए पर विशेष रूप से बात करते हुए उन्होंने सोशल मैपिंग, चपाती डायग्राम तथा अन्य मैट्रिक्स पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने आगे बताया कि ग्रामीण सहभागिता के लिए गावों में प्रवेश करते ही पहले 'ट्रांज़िट वाक' करना पड़ता है। जिसमें गाँव के प्रति ज़्यादातर जानकारी शोधकर्ता को प्राप्त किया जा सकता है। सामाजिक मानचित्रण पर बात करते हुए उन्होंने गाँववालों को इस प्रक्रिया में सहभागिता की तकनीकों के बारे में बताया।
रिसोर्स मैपिक पर बात करते हुए ग्रामीणों की सहभागिता से ग्रामीण संसाधन की पहचान करने की तकनीक पर भी बात की। इसके बाद चपाती डायग्राम तथा Service Mapping के उपयोग की भी उन्होंने चर्चा की। डॉ. बघेल ने पीआरए के साथ-साथ एलएफए की प्रविधि की भी संक्षिप्त चर्चा की। इसके साथ ही केंद्र के विद्यार्थियों के द्वारा सेवाग्राम गाँव में प्रयुक्त पीआरए प्रविधि के अंतर्गत किए गए कार्य को भी उन्होंने प्रस्तुत किया।
            सत्र को आगे बढ़ाते हुए केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने ग्रामीण क्षेत्र में क्षेत्र सबंधी परियोजना पर शिक्षकों के सामने विभिन्न क्षेत्र तथा सुझाव प्रस्तुत किया। उन्होंने शिक्षकों का इस ओर ध्यान केन्द्रित किया कि हमें आदर्शवादी तरीके के बजाय इसे गाँव के लोगों की स्वीकार्यता से जोड़ना होगा। हम क्या चाहते हैं, इससे ज्यादा जरूरी है कि गाँव के लोग क्या चाहते हैं। इसी को मद्देनजर रखते हुए शोधकर्ता को गैप ढूँढने की कोशिश करनी होगी। अपने अनुभव बताते हुए उन्होंने बिहार के ग्रामीण क्षेत्र में प्रयुक्त पीएसपी की उपयोगिता को भी इसके साथ जोड़कर देखने की बात की। गांवों में कार्य करते समय एक दिन में समझकर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढा जा सकता, उसके लिए छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर गहन कार्य करने की आवश्यकता है।
            अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने सभी शिक्षकों से यह निवेदन किया कि दो दिन के क्षेत्र-कार्य में आपके द्वारा किए जाने वाले कार्य का कच्चा ड्राफ्ट तैयार करने की अपेक्षा जाहिर की। साथ ही उन्होंने शिक्षकों से यह अपेक्षा जाहिर की कि हम लोगों को ग्रामीण भारत के लोगों की प्राथमिकता तय करने में उनकी मदद करनी होगी अन्यथा उनका भटकाव देश के विकास को अवरुद्ध करेगा। गांधी, कुमारप्पा एवं शुमाखर की बात उद्घृत करते हुए उन्होंने इसके भटकाव को रोकने की प्रविधि को अपनाने पर ज़ोर दिया।
            सत्र में आगे नागपुर से आयी प्रतिभागी डॉ. समृद्धि डाबरे ने ग्रामीण महिलाओं से संबन्धित मुद्दों पर कार्य करने की जिज्ञासा व्यक्त की। डॉ. पल्लवी शुक्ला ने अपने विषय - पर्यावरण पर बात करते हुए सामाजिक पर्यावरण के अध्ययन में अपनी रुचि जाहिर की। अगले प्रतिभागी अभिषेक त्रिपाठी ने गांवों को समझने में नैतिकता की ओर ध्यान केन्द्रित किया। पार्थसारथी मणिकाम ने शोध एवं पाठ्यक्रम को एक-दूसरे के साथ जोड़ने की बात करते हुए कहा कि व्यावसायिक जीवन से बाहर निकलकर स्वतः प्रयत्न से आगे निकलना होगा। उन्होंने आगे थ्योरी एवं प्रैक्टिकल को जोड़ने की संभावना पर अपनी बात रखी। इसके लिए कम से कम 15 दिन से लेकर 1 माह तक क्षेत्र में रहकर समुदाय के जीवन को समझने की आवश्यकता जताई। साथ ही सहभागिता को महत्वपूर्ण टूल्स बताया। सुझाव देते हुए उन्होंने पिछले तीन दिनों के अनुभवों को शेयर करते हुए इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया कि सेसन लेक्चर मोड से ज्यादा समस्या ओरिएंटेड तथा प्रश्नोत्तरी आधारित होना चाहिए। श्री वाघमारे तथा डॉ. भरत खंडागले ने यह सुझाव दिया कि लेक्चर मेथड के साथ विडियो विजुअल का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करने की बात की तथा प्रतिभागियों से फीडबैक लेने की महत्ता को रेखांकित की।

चतुर्थ सत्र में समूह '' ने Socio-Economic and Educational Problem पर अपनी बात रखी। इसमें डॉ. सोनवाने, डॉ. सतपुते तथा अन्य ने अपनी प्रस्तुति दी। ग्रामीण विकास के समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने विभिन्न स्टेक होल्डरों को साथ लेते हुए ग्रामीणों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं पर अपनी बात रखी। इस कार्य में विभिन्न राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय तथा स्थानीय संगठनों की भूमिका का महत्व रेखांकित किया। पर्यावरणीय मुद्दों का घटना अध्ययन करते हुए उन्होंने अपनी बात रखी। समाज कार्य प्रविधियों में से एक सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य की 'सहायक प्रक्रिया' पर बात रखी। जिसमें उन्होंने 'एडिक्सन' की समस्या पर विस्तृत चर्चा की। इसके अंतर्गत एडिक्सन के विभिन्न प्रकारों व उसकी विशेषताएँ तथा उसके शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक आदि प्रक्रियाओं पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसको समझने के लिए उसके विभिन्न कारणों की चर्चा की। इसी कड़ी में आगे डॉ. अशोक सातपूते ने भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर अपनी बात रखी। इसमें उन्होंने जनसंख्या वृद्धि के कारणों तथा प्रभावों को बताते हुए उन्होंने उसके समाधान की बात की। इन समाधानों में समाज के विभिन्न संस्थाओं एवं संगठनों की भूमिका की चर्चा की। प्रस्तुति के अंत में 'भूमिका निर्वहन' में एडिक्सन समस्या में सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य की उपयोगिता को प्रस्तुत किया।
            सत्र के अंत में डॉ. मुकेश कुमार ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के मेंढ़ा-लेखा मॉडल विलेज की संक्षिप्त चर्चा की। तदुपरान्त एनसीआरआई के डीएन दास ने धन्यवाद ज्ञापन किया।


रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, गजानन एस. निलामे, डिसेन्ट कुमार साहू, सुधीर कुमार, माधुरी श्रीवास्तव, खुशबू साहू एवं सोनम बौद्ध.

Thursday, May 18, 2017

'हमारा होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है'

जिन लोगों के जेंडर तथा यौनिक व्यवहारों को लेकर हमारे समाज में ढेर सारी गालियां बनी हो, वहाँ ऐसे लोगों पर उपहास करना, उनके साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार व उन्हें समाज में कलंकित मान लेना अभी भी आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन जब शोषित समूह के लोग स्वयं को छुपाने के बजाए समाज के सामने ढ़ोल की ताल पर थिरकते हुए, लाउडस्पीकर पर अपनी पहचान को समाज के सामने रखते हुए नारा लगाए कि 'हमारा होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है।', 'हमें चाहिए आज़ादी -प्यार करने की आज़ादी, भेदभाव के बिना जीने की आज़ादी।'  तो लोगों को यह दृश्य आश्चर्यचकित कर रही थी। यह मौका था नागपुर में आयोजित दूसरे LGBTQ प्राइड मार्च का जिसमें समूह के लोग तथा देशभर से आए LGBTQ अधिकारों के समर्थक एकत्रित हुए थे। मार्च के द्वारा धारा 377 का विरोध करते हुए स्वीकार्यता, सम्मान, स्वतन्त्रता, शिक्षा, रोजगार, जैसे मानवीय अधिकारों की मांग भी की गई।
बैंगलोर से आए समीर कहते है - 'आज मैं विशेष तौर से इस मार्च में शामिल होने के लिए आया हूँ। मैं इस लड़ाई में अपने लोगों के साथ हूँ। आज इतने सारे लोगों को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। संविधान में हमें जो भी वैयक्तिक अधिकार मिले है वो हमें भी मिलना चाहिए। धारा 377 हटाई जाए और संवैधानिक अधिकार दी जाए, हमें भी जीने का अधिकार है।'
प्राइड मार्च समाज के लिए जरूरी क्यों है? पुछें जाने पर मुख्य अतिथि के रूप में गुजरात से आए मानवेंद्र गोहील ने कहा कि 'जरूरत इसलिए है कि हमें समाज को बताना है कि हमारी संख्या भले ही कम है, लेकिन हमारी उपस्थिती है और हमें गर्व है कि हम क्या है। प्रत्येक इंसान को आज़ादी से जीने का हक है तो हमें क्यों नहीं मिला है? जब भारतीय संविधान में सभी लोगों को समानता और सम्मान से जीने का हक है तो हमें क्यों नहीं? हमें हमारे तरीके से जीने दिया जाए, प्यार करने की आज़ादी हो। हम पैदाइशी ही ऐसे है, हमारा कोई दोष नहीं कि हम ऐसे है। ये हमारे लिए आज़ादी की लड़ाई है।'
आगे उन्होंने कहा कि 'हमें अब दूसरे लोगों का भी सहयोग मिल रहा है, कुछ माँ-बाप भी समझने लगे है कि बच्चों से ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती, उन्हें अपने जीवन साथी चुनने का अधिकार देना होगा।' मीडिया किस तरह से उन्हें अब पेश कर रही है? पुछे जाने पर उन्होंने कहा कि 'LGBTQ समूह को लेकर मीडिया प्रेजेंटेशन में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है। मीडिया काफी सकारात्मक हुई है, अब हमारी समस्याओं के बारे में भी लिख रहे है। युवाओं में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है, अब वे भी इन विविधताओं के बारे में जानना चाहते है।'

पिऊ जो नागपुर की ही है, वे कहती है 'आज पहली बार लड़कियों की तरह तैयार होकर इस मार्च में शामिल हो रही हूँ। थोड़ी सी डरी हुई हूँ कि कहीं घर वालों को पता न चल जाएँ, लेकिन मैं खुश हूँ कि जैसा मैं महसूस करती हूँ उसी रूप में समाज के सामने हूँ।'

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 अप्रैल 2014 को ट्रान्सजेंडर को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता देने तथा उनके स्थिति में सुधार के लिए उचित कदम उठाने के दिशानिर्देश के बावजूद अभी भी सरकारी प्रयास न के बराबर ही है। यही कारण है की पिऊ तथा पिऊ के जैसे हजारों ट्रान्सजेंडर को अपनी पहचान छुपाकर जीवन व्यतित करने के लिए मजबूर हैं।

जब भी LGBTQ अधिकारों की बात की जाती है तो समलैंगिकता को लेकर प्राकृतिक-अप्राकृतिक, नैतिक-अनैतिक, वैध-अवैध कि बहसे तेज हो जाती है। धारा 377 को हटाने के लिए एक लंबी बहस समलैंगिकता के अपराधीकरण को मानव अधिकारों के हनन के रूप में हुई है। संवैधानिक बहसो में जिन अधिकारों को लेकर चर्चा हुई है उनमें समानता, सम्मान, गोपनियता तथा भेदभाव व स्वतन्त्रता शामिल है। इन तमाम बहसों के बाद भी भारतीय कानून समलैंगिकता को अपराध मानता है। भारतीय दंड संहिता, धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) इस प्रकार से है - “जो भी कोई स्वेच्छा से किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध कामुक संभोग करता है, उसे आजीवन कारावास या फिर 10 वर्षों तक बढ़ाई जा सकती है और जुर्माना भी हो सकता था।" धारा यह स्पष्ट नहीं करती कि 'अप्राकृतिक' यौन क्या-क्या है, इसके साथ ही लिंग प्रवेश यौनिक संभोग को स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।' इस व्याख्या के कारण इसमें मुख व गुदा भी शामिल हो जाता है।  

यह कानून औपनिवेशिक काल में 'यौन आनंद' के निषेध के लिए बनाया गया था इस तरह ऐसे सभी यौनिक व्यवहारों को आपराधिक करार देने के लिए बनाया गया था जो प्रजनन प्रक्रिया से जुड़े नहीं है। यह कानून समलिंगी गतिविधियों के साथ विषमलैंगिक व्यवहार वाले जोड़े पर उस दशा में लागू होता है जब वह मुख मैथुन (oral sex), गुदा मैथुन (anal sex) या हस्तमैथुन करते हैं। फिर भी होमोफोबिया (समलैंगिकता के प्रति भय) के कारण हमेशा ही समलैंगिक गतिविधियों वाले लोगों को ही निशाना बनाया जाता रहा है। इसलिए धारा 377 का विरोध सभी नागरिकों को करना चाहिए, इसे सिर्फ समलैंगिक सम्बन्धों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत में समलैंगिकता को लेकर राजनैतिक मांग के रूप में धारा 377 के खिलाफ संघर्ष की शुरुवात वैश्विक परिदृश्य की तुलना में बहुत बाद में 1990 से मान सकते हैं जब पहचान आधारित आंदोलनों के उभार ने हाशिए के समाजों को अपने अधिकारों के लिए संगठित किया।   

डिसेन्ट कुमार साहू
शोधार्थी - समाजकार्य विभाग
म. गां. अं. हि. वि. वि. वर्धा 

Wednesday, February 4, 2015

यात्रा अनुभव : वर्धा से कन्याकुमारी

नरेश गौतम
वर्धा से कन्याकुमारी दिनांक 15/10/2014 दिन बुधवार समय दोपहर 1:30 सेवाग्राम रेलवे स्टेशन। हमारी यात्रा उसी ऐतिहासिक ट्रेन से शुरू होती है जिसमें कभी गांधी यात्रा किया करते थे। इस ट्रेन में मेरी यह पहली यात्रा नहीं थी। इससे पहले मैं कई बार दिल्ली से सेवाग्राम आता-जाता रहा हूँ, पर यह यात्रा इसलिए खास थी क्योंकि हम सभी एक ही लिबास में थे और वह भी  खादी में। दूसरा यह भी खास था कि हम सभी पहली बार एक साथ किसी यात्रा पर जा रहे थे। आखिर इंतजार के बाद हमारा सफर शुरू होता है और हम सभी एक-एक कर अलग-अलग डिब्बों में बैठ जाते हैं वह भी अपनी सुविधानुसार या कहें कि अपने पसंद के लोगों के साथ। व्यक्तियों की संख्या अधिक होने से अपनी पसंद का चुनाव करने में काफी आसानी थी। वैसे तो हमें एक ही कोच में जाना चाहिए था। लेकिन टिकटों के न मिलने और यात्रा का समय ठीक से तय न होने के कारण हमारे टिकट कई कोचों में थे जिसमें एम. ए. के छात्र अलग एम. फिल. छात्र अलग और पी-एच.डी. के अलग।हमारे विभागाध्यक्ष और डॉ. मुकेश जी, डॉ. मिथलेश जी एवं उनकी पत्नी सुप्रिया जी के साथ बेटी आद्या, दिलीप वाकड़े जी अलग कोच में। शाम का खाना हमारे साथ था जो हमने काकी (काफ्का से) के यहाँ से बनवा लिया था। इसलिए खाने की चिंता करने की आवश्यकता नहीं थी लेकिन खाना खाते वक्त यह चिंता जरूर बढ़ गई- कारण था कि खाना रखते समय उसे गरम पैक कर दिया गया था और उसी अवस्था में वह पूरे समय रहा। कई घंटे बंद रहने की वजह से सब्जी खराब हो गई, लेकिन खाने का प्रबंध करने वाली टीम ने इसे आसानी से सुलझा लिया, बस थोड़ा समय जरूर लगा और भूख भी। हम सभी सुबह चेन्नई पहुँचते हैं। चूंकि अगली यात्रा शाम को शुरू होनी थी, इसलिए पूरे दिन का समय हमारे पास था। सभी ने वहीं स्टेशन पर नहाने-धोने या नित्यक्रिया का काम किया। इसके बाद सभी नाश्ते के लिए नीचे जन आहार जाते हैं। नाश्ते में इडली और दालबड़ा था, दालबड़ा मुझे पहले से ही पसंद है और इडली भी मैं खा लेता हूँ इसलिए मुझे तो कोई दिक्कत नहीं हुई लेकिन हमारे बीच के कई लोगों को यह नाश्ता बिल्कुल पसंद नहीं आया। नाश्ता करने के बाद सभी को मरीन बीच पर जाना था। उन्हें लेजाने का काम ट्रैवलटीम को करना था। यात्रा ठीक से तय न होने की वजह से बस या टैक्सी नहीं मिल पाईऔर जो मिल भी रही थी, वह पैसा अधिक ले रहे थे। इसी कारण से सभी को ऑटो लेकर जाना पड़ा जिससे थोड़ी असुविधा हुई। लेकिन यह असुविधा मरीन बीच पर पहुँचते ही ख़त्म हो गई। क्योंकि जब हम बीच पर पहुँचे तब तक गर्मी अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। सभी पसीने से लथपथ थे। समुद्र की लहरें देखते ही सभी अपना समान रख कर बस पानी में कूद गए बस मेरे जैसे कुछ लोग बचे रह गए जो थोड़ा साहस जुटा रहे थे। लेकिन पानी का आकर्षण इतना था कि कोई भी अपने को समुद्र में जाने से रोक नहीं सका। बस सभी ने जम कर लहरों का मजा लिया और करीब तीन से चार घंटे का समय हमने समुद्र के किनारे बिताया। इसी बीच हमारे हैंडीकैम ने मेरा साथ छोड़ दिया और वह भी समुद्र की लहरों से बच नहीं सका। पानी जाने की वजह से वह बंद पड गया। अफसोस बहुत हुआ क्योंकि हम चाहते थे कि पूरी यात्रा को शूट किया जाएगा, लेकिन हैंडीकैम की कमी स्टिल कैमरे ने पूरी की जो मैं अपनी समझ और जगह के हिसाब से शूट करता रहा।
मरीन बीच से हम लोग करीब 12 बजे पुनः स्टेशन की ओर बढ़ते हैं। उसी तरह ऑटो या बस के माध्यम से। जाते वक्त आने से अधिक दिक्कत का सामना करना पड़ा। उसका एक कारण यह भी था कि उसी समय बारिश होने लगी। सभी को बारिश में भीगना अच्छा लग रहा था पर समान साथ होने और ऑटो न मिलने की वजह से समस्या थोड़ी बढ़ गई। मरीन बीच से एग्मोर रेलवे स्टेशन पहुँचने में 30 से 45 मिनट का समय लगा। लगभग सभी आगे पीछे स्टेशन पहुँच गए। अब एक बार फिर खाने की समस्या थी। हमारे जैसे कुछ लोग बाहर रुककर कुछ न कुछ खा चुके थे। समस्या तो लड़कियों के लिए अधिक थी क्योंकि वह बाहर रूक नहीं सकती थीं। अब हम सभी फिर से वेटिंग रूम में थे। सभी वहाँ बने शौचालय में नहाने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। कुछ लोग खाने का। खाने वाली टीम ने अपनी जिम्मेदारी अच्छी से निभाते हुए एक से दो घंटे के अंदर खाने का इंतजाम किया। जिनको ज्यादा भूख लगी थी वो पहले खाने चले गए बाकी धीरे-धीरे जाते रहे। करीब तीन बजे तक सभी का खाना हो गया था। अब कुछ लोग आराम कर रहे थे और कुछ लोग पान तंबाकू की और बाजार घूमने की तैयारी कर रहे थे। हमने भी बाजार जाने का निर्णय लिया और बाजार गए, जहाँ से हमने कुछ कपड़ों की खरीदारी की। 6:50 पर हमारी ट्रेन कन्याकुमारी के लिए थी। हम सभी अगले सफर के लिए तैयार थे और आखिर वो टाइम आ गया जिसका हम सब को बेहद शिद्दत से इंतज़ार था। आखिर हम सभी पुनः ट्रेन पर बैठ जाते हैं, उसी क्रम में जिस क्रम में हम पहले से चले थे। बस थोड़ा बहुत फेरबदल था। उसी दिन शाम चार बजे के आस-पास हमें पता चला कि हमारे एक साथी का जन्मदिन है। जाहिर सी बात थी कि केक की तैयारी तो करनी ही थी। केक आया और करीब 7 से 8 बजे के बीच ट्रेन में हमारे विभागाध्यक्ष जी के साथ हमने मिलकर केक काटा और सभी ने शुभकामनाएं देते हुए केक खाया। उसके बाद कुछ गीतों का सिलसिला चालू हुआ जो अक्सर सफर में टाइम पास के लिए समूह में जा रहे लोग करते हैं और अपने सह यात्रियों का बिलकुल ख्याल नहीं रखते। हमने भी वही किया अपने सहयात्रियों को थोड़ा परेशान करते हुए देर रात तक यह कार्यक्रम चलता रहा। पुनः खाने का वक्त आ चुका था। सभी ने खाना खाया। खाना संतोष जनक नहीं था पर पेट तो भरना ही था। बल्कि कुछ लोगों के पेट ठीक से भरे भी नहीं। बावजूद इसके सभी ने बहुत मजे किए। दिनभर की यात्रा, इंतजार और थकान ने सभी को सोने पर मजबूर कर दिया। अगली सुबह हम अपनी मंजिल के आस-पास ही अपनी आँखें खोलते हैं। नजारा देखते ही ऐसा लगा जैसे हम अपने देश में नहीं कहीं और ही हैं। हल्की-हल्की बारिश,ठंडी-ठंडीहवा चल रही थी, बहुत ही मनोरम दृश्य था। पवन-चक्की, सूरज की हल्कीरोशनी और पीछे दिखते पहाड़। पहाड़ों को छूता हुआ हल्का-हल्का कोहरा, ऐसा लग रहा था जैसे कि आसमान और पहाड़ एक दूसरे से मिल रहे हो। पहाड़ों पर हरियाली और आसमान का नीला रंग। ऐसे लग रहा था जैसे हम इस दुनिया में ही नहीं हैं। इससे पहले भी हमने हरियाली देखी थी, पहाड़ देखे थे पर आज तो पहाड़, बारिश और आसमान का नीला रंग जैसे अपने शबाब पर था। ट्रेन भी साथ निभारही थी और काफी धीमी गति से चल रही थी। बारिश की हल्की-हल्की फुहारें और पहाड़ों से उठता धुआँ, दृश्य ऐसा था जो कभी फिल्मों में दिखाई देता था पर आज सामने था। आखिर हमारा इंतजार ख़त्म हुआ और फिर से हम पहुँच जाते हैं उसी परिवेश में जहाँ आदमी ही आदमी और गंदगी दिखाई दे रही थी। अब हम नागरकोली रेलवे स्टेशन पर थे। जहाँ से हमें 15 से 20 किलो मीटर की या थोड़ी ज्यादा दूरी तय करके विवेकानन्द आश्रम जाना था। यहाँ से हमारा सफर बिना रुके बारिश की हल्की फुहारों के साथ चार गाड़ियों में अपनी पसंद के लोगों के साथ शुरू होता है। स्टेशन से निकलते ही रास्ते साफ दिखायी देने लगते है। धीरे-धीरे हम वापस प्रकृति के करीब होते हुए अपने गंतव्य स्थान तक पहुँच जाते हैं और पहले से ही अपने रहने के लिए स्थान सुरक्षित कर लिया गया था। औपचारिक लिखा-पढ़ी के बाद हम सभी जिसमें महिलाएँ और पुरुष दोनों को पुनः बाँट दिया जाता है। पुरुषों को दो बड़े कमरे, जिसमें सोने के लिए सिर्फ एक पतली दरी की व्यवस्था मात्र थी जो कुछ लोगों के लिए कष्ट दायक भी थी। थोड़े रोष के साथ हमने उसे भी स्वीकार कर लिया। सभी अपने-अपने समान रख कर कुछ लोग, जो बिना चाय के शौचालय नहीं जाते वह अपनी तलब की तलाश में बाहर निकल गए और जो लोग बिना गुटखा या तंबाकू के शौच नहीं जाते, वह अपनी हथेलियों को रगड़ रहे थे। थोड़ी ही देर में आगे जाने की योजना आ जाती है। सभी को सामूहिक नाश्ता करना था। सामूहिक नाश्ते में इडली और सांभर था जो कई लोगों को अच्छा नहीं लगा बल्कि इससे उनकी भूख भी कम नहीं हुई। उत्तर भारतीयों के साथ एक समस्या भी है कि वह दूसरे की संस्कृति, खाना-पीना, रहन-सहन, सब अपने से कमही समझते हैं। उसे स्वीकार करना उनके लिए बड़ा ही कठिन होता है। वैसे यह बात सब पर लागू नहीं होती पर लगभग सभी पर लागू भी होती है। खैर संतुष्टि और असंतुष्टि तो हमेशा बनी रहती है। उसके बाद आगे की योजना में सुविधानुसार जो आराम करना चाहे वह आराम करे, पर कुछ छात्रों को परिसर के अंदर कैसे और क्या-क्या होता है, यह देखना और उस पर सेमिनार देना था। उनके लिए यह थोड़ा चिंताजनक था। हमने भी निश्चय किया कि रात को आराम तो करना ही है, क्यों न परिसर का भ्रमण किया जाए। सब के लिए एक बजे तक वापस खाने के हॉल में मिलना तय था। सो हमने भी इन्हीं लोगों के साथ परिसर का दौरा किया। पूरा परिसर तो नहीं पर सूर्य उदय केंद्र से लेकर लेकिन कुछ मुख्य केंद्र जैसे वहाँ का विद्यालय जो काफी बड़ा बना है, मुझे अच्छा लगा। सबसे अच्छा तो मेरे लिए वहाँ छोटे बच्चों का विद्यालय देखना था। जब हम वहाँ पहुँचे तो बच्चे अपना खाना खा रहे थे। छोटी-छोटी बच्चियाँ अपने बालों पर फूलों की माला लगाए हुए बहुत ही सुंदर लग रही थीं। कुछ बच्चे तो वहाँ बहुत छोटे थे जिन्हें वहाँ की अध्यापिकाएं खाना खिला रही थीं। छोटी-छोटी बच्चियाँ अपनी पूरी ड्रेस में बालों पर परम्परागत तरीके से लगाए गए रंग-बिरंगे फूलों में बहुत ही सुंदर लग रही थीं। छात्र-छात्राओं के रहने की व्यवस्था परिसर में ही थी। यहाँ हम ठीक से उनसे बात तो नहीं कर पाए क्योंकि भाषा की समस्या लगातार बनी हुई थी और यह सब बिना योजना के था, इसलिए भाषा को लेकर थोड़ी समस्या बनी रही। हालांकि परिसर को जानने तथा वहाँ हो रहे प्रयोगों को बताने के लिए संस्था ने गाइड की व्यवस्था कर रखी है जो वहाँ हो रहे प्रयोगों के बारे में जानकारी देने का कार्य कई भाषाओं में करते हैं। खैर हमने वहाँ पुस्तकालय से लेकर विद्यालय, छात्रावास, योगा केंद्र, पशुपालन केंद्र, मयूर अभ्यारण्य के साथ कृषि पर हो रहे प्रयोगों को भी देखने और जानने की कोशिश की। हमारा समय जो पहले से निश्चित था यानि 1 बजे हमें पुनः खाने के हॉल में मिलना था। हम अपने समय से वहाँ पहुँच गए और धीरे-धीरे लगभग सभी वहाँ 30 से 40 मिनट के अंतराल में पहुँच गए। खाने वाली टीम ने खाने के लिए पूरी व्यवस्था कर रखी थी। हमने फिर से साउथ का खाना खाया जिसमें कई लोगों को फिर से थोड़ी परेशानी हुई। खाना लगभग सभी ने 2:30 तक समाप्त कर लिया था। आगे की योजना शायद कन्याकुमारी को देखने की थी पर मुझे नहीं पता था कि कहाँ जाना है। बल्कि सभी जाने वालों को नहीं पता था कि कहाँ जाना है। कुछ को वहां जाने तक पता भी नहीं चला। हमने वहाँजाने के बाद विवेकानन्द रॉक देखा जहाँ विवेकानन्द ने तीन दिन रुक कर ध्यान लगाया था या कहें कि उन्हें वहाँ से नए तरह के ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। हमने वहाँ से विवेकानन्द को जानने के लिए उनका लिखित साहित्य भी खरीदा। अंदर के परिसर में फोटो लेना वर्जित था। जिस वजह से हम वहाँ अंदर की तस्वीरे तो नहीं ले पाए लेकिन हमने बाहर से लगभग पूरे परिसर को तस्वीरों में कैद किया। लगभग दो से तीन घंटे में हमने सारे परिसर को देख लिया। कुछ देर और भी रुकते, लेकिन बारिश होने की वजह से हम और अधिक वक्त वहाँ नहीं दे सके। शायद मौसम भी नहीं चाह रहा था कि हम वहाँ अधिक शोर शराबा करें तो हम लोग बाहर आ गए। 
अब इसके बाद वहाँ के बाजार का भ्रमण करना था। बाजार भ्रमण का सीधा सा मतलब था खरीददारी, क्योंकि बाजार तो हमेशा से व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करता है। सो हम लोग भी बाजार के आकर्षण से नहीं बच पाए। लगभग सभी लोगों ने वहाँ से कुछ न कुछ खरीददारी की। कुछ ने वहाँ के मंदिरों को घूमा, कुछ ने समुद्र के संगम से लेकर गांधी मंडप को देखा। कुछ लोग चाय और पान तंबाकू की तलाश में ही घूमते रहे। धीरे-धीरे शाम हो रही थी और सभी को पुनः अपने स्थान तक पहुँचना था। 6 बजे से शाम 8 बजे तक सभी विवेकानन्द आश्रम में पहुँच चुके थे। सभी अपनी पसंद के लोगों के साथ बाजार और विवेकानन्द रॉक के अनुभव बांट रहे थे। उन्हीं अनुभवों के साथ हमें फिर से खाने के स्थान पर पहुँचना था। हम सभी क्रमानुसार अपने-अपने स्थान पर भोजन के लिए आ चुके थे। आज भोजन में चावल-सब्जी के साथ पराठे, दही और सांभर था। जाहिर सी बात है कि आज हमारी पसंद का खाना था या ये भी कहा जा सकता है कि ये उन लोगों की पसंद का खाना था जो किसी और परिवेश में अपने आप को फिट नहीं कर सकते। बस उन्हें अपना ही सबसे अच्छा लगता है। दो दिन के इस सफर के बाद आज कुछ अच्छा या कहें कि पेट भरने वाला खाना मिला था। खैर खाना-पीना तो सभी के साथ जुड़ा रहता है और यह तो बहुत सामाजिक और सांस्कृतिक मामला भी है। पर एक समाजकार्यकर्ता के साथ यह उम्मीद करना कि उसे सभी जगह उसके जैसा परिवेश और खान-पान मिले, यह थोड़ा शोचनीय हो जाता है। खाने के बाद जो लोग तंबाकू-बीड़ी के आदी हैं, वे बाजार की तरफ चले गए। कुछ अपना खाना पचाने के लिए परिसर में ही कुछ देर सैर करते रहे। कुछ लोग जो बहुत अधिक चलने के आदी नहीं हैं, वे जल्दी ही अपने बिस्तर की ओर रुख कर गए। इसी बीच हमारे विभागाध्यक्ष जो कमरे कम होने की वजह से हम लोगों के साथ ही सोने की योजना बना रहे थे, भी आए। आने के बाद थोड़ी बहुत चर्चा वहाँ के परिवेश और परिसर के बारे में हुई। इसी बीच किसी ने जनवादी गीतों के बारे में चर्चा शुरू की। धीरे-धीरे जनवादी गीत शुरू होते हैं। माहौल में एक गर्मी आ जाती है। विभागाध्यक्ष से आग्रह करने पर उन्होंने भी एक जनवादी गीत गाया। परिसर में ज्यादा शोर करना मना था। इसी वजह से हम लोगों को थोड़ा सा संतुलित होकर अपना यह कार्यक्रम यहीं स्थगित करना पड़ा। शायद और देर तक चलता पर। पर इसी बीच डॉ मिथलेश जी ने सूचना दी की कमरे की व्यवस्था हो गई है। सभी के आग्रह पर डॉ. मुकेश जी ने भी एक गीत गया। विभागाध्यक्ष के आदेशानुसार हम लोगों को सुबह जल्दी उठना था। क्योंकि सुबह सभी को सूर्य उदय देखना था। रात कब गुजर गई किसी को भी शायद पता नहीं चला। सुबह शायद 4:30 के आस-पास हम लोगों की नींद उठ जाग मुसाफिर, भोर भयो, अब रैन कहाँ जो सोवत है गीत के साथ खुलती है जब मनोज सर ने इसे गाते हुए इंट्री मारी। अब सभी का उठना मजबूरी थी। धीरे-धीरे मन मार कर सभी अपना बिस्तर छोड़ नित्यक्रिया के लिए बाहर बने शौचालय में अपनी बारी का इंतजार करने लगे। जो लोग अब भी नहीं उठे थे, सर ने अपने पैरों से उनके पैर दबाने शुरू कर दिये। अब तो न उठना चाहने वालों को भी अपना बिस्तर छोड़ना ही पड़ा और सभी कामों से ज्यादा जरूरी अपनी प्यारी नींद को अलविदा कहना पड़ा। हम सभी 30 मिनट में तैयार होकर बाहर आ जाते हैं। दो-चार लोगों का इंतजार कर हम सभी उस जगह पहुँच जाते हैं, जहाँ से सूरज का आगमन होता है। हमने पहले भी सूरज को उगते हुए देखा था। पर वहाँ पर समुद्र की लहरों के साथ उसे देखना अपने आप में एक अलग तरह का अनुभव था। भारत में सूरज की पहली किरण वहीं से उगती है। लेकिन अफसोस कि हम सभी के अरमान जल्द ही पानी में बह गए - कारण मौसम का साफ न होना। हल्की बारिश और बादलों ने आज सूरज को ढँक लिया था। लेकिन सूरज की रोशनी को कौन रोक सकता था। चारो तरफ लालिमा छा चुकी थी। हम सभी अब समुद्र के किनारे थे। कुछ लोग सुबह भी अपने आप को समुद्र की लहरों के आकर्षण से नहीं रोक सके और लहरों से टकराने लगे। हमने भी अपना काम करना यानि उस पल को कैमरे में कैद करना शुरू कर दिया। मौसम में रोशनी अभी भी कम थी। इसलिए तस्वीरे बहुत अच्छी तो नहीं आईं पर बस आ ही गईं। हम सभी ने अपने मन मुताबिक साथियों के साथ उस पल को कैमरे में कैद करने की कोशिश की। जैसे-जैसे सूरज ऊपर चढ़ रहा था वैसे-वैसे समुद्र की लहरे भी बढ़ रही थी। हल्की-हल्की बारिश, हल्की रोशनी और बहुत तेज गति से आती लहरें। बहुत ही अद्भुत नजारा था। बस सूरज को न देख पाने का अफसोस जरूर था। सभी ने खूब आनंद लिया। जिनको अच्छा नहीं लग रहा था या किसी और तरह की समस्या थी, वह वापस जा चुके थे। समुद्र अपने उफान पर बढ़ रहा था। वहाँ खड़े सुरक्षा गार्ड के बार-बार आग्रह करने पर सभी को जल्दी वापस आना पड़ा। इसके बाद अपने चुने हुए साथियों के साथ सभी अलग-अलग टोलियों में बंट जाते हैं। रास्ता ज्यादा लंबा नहीं था। इसलिए बहुत जल्दी ख़त्म हो गया। अब सभी को तैयार होकर नाश्ते के लिए जाना था जो हमारे रहने के स्थान से बस 100 मीटर की दूरी पर था। उससे पहले ही हम लोगों को सूचना मिलती है कि आज आप सभी फ्री हैं तो जिसका जहाँ मन करे, वहाँ घूम सकता है, जो देखना चाहे, देख सकता है। किसी के लिए किसी भी तरह की कोई बंदिश नहीं थी पर समस्या यह थी कि आखिर हम सभी जाए कहाँ ? क्योंकि कल ही हम सबने कन्याकुमारी में जो मुख्य केंद्र थे, उन्हें देख लिया था। अब एक ही चीज रह गई थी और वो था बाजार। बाजार अभी बाकी था उन सभी के लिए जो कुछ न कुछ खरीदना चाहते थे। नाश्ता ख़त्म होने के साथ ही सब आजाद थे। ये आजादी उनके लिए ज्यादा अच्छी थी जो एकांत चाहते थे। आज का खाना भी सब के लिए बाहर था। उसके लिए पैसे निर्धारित कर दिए गए थे। 
इसके बाद हम सब फिर से अपनी पसंद के लोगों (जिसमें कुछ को शायद नापसंद भी मिल गए हों) के साथ अलग-अलग बाजार की तरफ निकल जाते हैं। जाना तो सभी को एक ही दिशा में था, बस अपनी सुविधानुसार जाना था और जिन्हें वहाँ नहीं जाना था, उनकी दिशा अलग होनी ही थी। ऐसे कुछ ही लोग थे। इनके अलावा बाकी सब घूमते हुए उसी बाजार में उमड़-घुमड़ रहे थे। अपने बजट के हिसाब से सब खरीददारी करते हैं। जिन लोगों को बाजार की समझ थी, वो अन्य लोगों के साथ गाइड का काम कर रहे थे। पूरे दिन आपस में एक दूसरे से टकराते हुए लोग बाज़ार का अपना अनुभव बताते और फिर अलग हो जाते। सब ने साड़ियाँ खरीदी, क्योंकि सभी खरीद रहे थे। मैंने ये काम चेन्नई में पहले ही कर लिया था, इसलिए मैं तो उन सभी के साथ दर्शक मात्र था। आज के दिन वहाँ से सब ने कुछ न कुछ खरीदा जरूर और आखिर क्यों न खरीदते जब सभी खरीद रहे थे। खरीदने का दूसरा कारण था कि सबकी छात्रवृत्ति आ गई थी और सब के पास पैसा था। बाजार तो पैसे को खींचता ही है। खैर, आधे से अधिक दिन बीत चुका था और अब हम लोग खाने की तलाश में थे कि आज कहीं ठीक खाना मिल जाए। आखिर तलाश करते-करते हमें एक जगह मिल ही गई जहाँ हमने अपनी पसंद का खाना खाया। आज शायद सभी ने अपनी-अपनी पसंद का खाया होगा। हम लोग खाना खा कर वापस उसी बाजार में गए जहाँ से अभी आए थे। वापस जाने का कारण फिर से खरीददारी करना या कुछ देखना नहीं था बल्कि यह था कि मुझे और कुछ साथियों को पान खाना था। हमने वहाँ से पान खाए और शाम के लिए भी बनवा लिए। आने की तैयारी कर ही रहे थे कि मौसम ने अपनी करवट बदली और तेज बारिश शुरू हो गई। कुछ देर इंतजार करने पर भी बारिश नहीं रुकी तो हमने तय किया कि अब ऑटो लेकर चलते हैं। यदि बारिश नहीं होती तो शायद और देर तक रुकते। थोड़ी ही देर में हम वापस अपने स्थान पर आ जाते हैं। अब सिलसिला शुरू होता है अपने-अपने अनुभव बताने का। बाजार को हमने ठगा या बाजार ने हमें। जिसने जो भी खरीदा था, सबने अपने तजुर्बे बताने शुरू किए। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। कुछ ने एक ही कपड़े को महंगे दाम में खरीदा तो कुछ ने उसी को सस्ते दाम में। कुछ लोग अपनी ठगी पर शर्मिंदा हो रहे थे और कुछ लोग अपनी ही पीठ थपथपा रहे थे। जिन्हें यह अनुभव हो रहा था कि वह महंगा लेकर आए हैं, उनके लिए अभी एक दिन और बाकी था। इसी सब में फिर से खाने का टाइम हो गया। शाम को भी सबको अपने हिसाब से ही खाना तय था तो एक बार फिर से सब अपनी सुविधा और बजट के अनुसार होटलों और ढाबों की ओर रुख करते हैं। 
बस एम. ए. तृतीय छमाही के सभी छात्रों को संगोष्ठी पत्र की प्रस्तुति करनी थी, इसलिए वह भोजन के लिए बाहर नहीं जा सके। उनके लिए भोजन की वहीं व्यवस्था थी। खैर हम सभी खाने के बाद वापस अपनी कुटिया में आते हैं और अपने-अपने अनुभवों के साथ सो जाते हैं। अगले दिन का प्रोग्राम केरल जाने का तय हुआ था, इसलिए आज भी जल्दी उठना था। नींद आज सुबह भी मनोज सर के गाने की आवाज के साथ टूटती है। सर ने न उठने वालों के पैरों से पैर दबाने शुरू कर दिए। अब तो सभी को उठना ही था। सभी उठकर नित्यक्रिया का काम निपटा रहे थे और हमारे जैसे कुछ गिने-चुने व्यक्ति चाय की व्यवस्था में लगे हुए थे। जो लोग पहले तैयार हो गए, वे आज फिर से सूर्य उदय देखने चले गए। हमारे ठहरने की जगह से वह ज्यादा दूर नहीं थी। सात बजे से आठ बजे के बीच हमें अपनी केरल की यात्रा तय करनी थी। सभी यात्री तैयार थे। ट्रैवल टीम ने गाड़ियों की व्यवस्था पहले ही कर दी थी। सभी लोग फिर अपनी-अपनी पसंद के लोगों के साथ गाड़ियों में बैठ चुके थे। यह दूरी लगभग 100 किलोमीटर से ज्यादा ही रही होगी। सभी को वहाँ के प्रसिद्ध मंदिर पद्मनाभन जाना था। जिन्हें वहाँ पूजा करनी थी, वे उसकी तैयारी के साथ गए थे। बाकी कुछ लोग बस बाहर से दर्शन करने वाले थे। मंदिर में प्रवेश वहाँ के पारंपरिक परिवेश यानि लुंगी में ही संभव था। मंदिर से बस कुछ ही दूर पर एक दुकान है जहाँ लुंगियों का व्यापार होता है। कुछ लुंगियाँ वहाँ से खरीदी गईं, कुछ रास्ते में एक बड़ी कपड़े की दुकान पर ही ले ली गईं थी। जो श्रद्धा के साथ जाने वाले थे, वे श्रद्धा के साथ गए। जो ऐसे ही देखना चाहते थे, वे ऐसे ही गए। उन्हें तो बस यह देखना था कि ऐसा क्या है मंदिर में। मैं भी मंदिर में प्रवेश करता हूँ। मंदिर बहुत ही आलीशान बना हुआ है। शिल्प और काठ कला का एक बेहतरीन नमूना। वैसे भी साउथ के मंदिरों की बनावट पूरे देश में विशिष्ट मानी जाती है। अंदर कई मंदिर हैं जिनमें बहुत से देवी-देवता हैं। वहाँ एक छोटे से मंदिर की मुख्य बैठक में क्लासिकल संगीत गाया जा रहा था। यह मेरे लिए बहुत ही अद्भुत था क्योंकि मैं उत्तर भारत के कई मंदिरों में गया हूँ पर वहाँ कानफोड़ू संगीत ही सुनाई देता है। हो सकता है कि ऐसा महसूस करना सिर्फ मेरे लिए ही रहा हो पर यह मैं पहली बार देख रहा था। खैर, मैंने अंदर दर्शन तो नहीं किए क्योंकि मैं लाइन में खड़ा नहीं होना चाह रहा था। मैं और मेरे साथी जल्दी ही वापस, जिस दिशा से गए थे उसी दिशा से आ गए। बाकी लोगों को काफी समय लगा। कुछ लोगों ने अंदर प्रसाद का भी आनंद लिया जिसकी वजह से थोड़ा समय अधिक लग गया। यह उन सभी के लिए कष्टदायक था जो अंदर नहीं गए थे क्योंकि आज धूप बहुत तेज़ थी। रुकने की वहाँ कोई उचित व्यवस्था भी नहीं थी। दूसरा यह था कि सभी को एक साथ कोवलाम बीच पर जाना था। गाड़ियों के ड्राइवरों ने आपस में तय कर लिया था कि सभी गाड़ियों को एक साथ ही जाना है। 
इसलिए उन सभी का इंतजार तो करना ही था जो अब तक वापस नहीं आए थे। धीरे-धीरे सभी वापस आते हैं। विभागाध्यक्ष जी की थोड़ी सी फटकार सुनने के बाद सभी वापस उसी क्रम में अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठ गए जैसे पहले आए थे। अब हम सभी कोवलाम बीच के लिए निकल पड़े थे जो यहाँ से अधिक दूर नहीं था। जल्दी ही हम बीच पर पहुँच चुके थे। अभी तक किसी ने नाश्ता नहीं किया था। सभी लोगों को अब तक बहुत जोरों की भूख लग चुकी थी। नाश्ता सभी को एक साथ कोवलाम बीच के आसपास करना तय हुआ था पर वहाँ पहुँच कर योजना बदल गई। अब सभी को नाश्ता(वैसे तो नाश्ते का समय ख़त्म हो चुका था, अब सभी को खाना ही खाना था)या अपने खाने का इंतजाम खुद ही करना था। आस-पास रेस्टोरेंट है, होटल है, जिसका जहाँ मन करे, वहाँ खा सकता है। खाने का मूल्य जो पहले से निर्धारित किया गया था, वह यहाँ भी लागू था। वैसे यह निर्णय छात्रों के लिए ठीक था, पर शायद छात्राओं के लिए नहीं। खैर बाद में तय हुआ कि यहीं से कुछ नमकीन-बिस्किट खाकर काम चलाया जाए क्योंकि अब समय कम था। यहाँ से निकलते समय रास्ते में कहीं खा लिया जाएगा। अब हमारे पास लगभग दो से तीन घंटे का समय था। जिसमें हमें कोवलाम बीच का मजा लेना था। धीरे-धीरे सभी ने यहाँ भी समुद्र की लहरों का लुत्फ उठाया। यहाँ पानी की लहरें मरीन बीच से अधिक तेज थी। सभी ने यहाँ भी खुल कर आनंद उठाया। समय ख़त्म हो चुका था। सभी को फिर से निकलने की तैयारी करनी थी और इसी बीच खाना भी खाना था। हमारी ट्रैवल टीम ने खाने के लिए निश्चित स्थान तो बताया था पर हम लोग उस निश्चित स्थान तक नहीं पहुँच सके। हमने दूसरी जगह भोजन किया। कुछ लोगों ने वहाँ भी भोजन किया। पर सभी के लिए पर्याप्त भोजन वहाँ उपलब्ध नहीं था। इसलिए कुछ लोगों को अपने भोजन की तलाश अन्य जगहों पर करनी पड़ी। यहाँ सब के खाने के अनुभव अलग-अलग रहे पर फिर भी सभी को पेट तो भरना ही था जो किसी तरह भर ही गया। इसके बाद आगे की यात्रा पुनः शुरू होती है। अब हमें बोटिंग के लिए बैक वाटर रिवर जाना था और वहाँ से होते हुए गोल्डन बीच तक। थोड़े इंतजार के बाद हम सभी बोटिंग पॉइंट पर पहुँच जाते हैं। वहाँ से हम सभी आठ-आठ के जोड़ो के साथ बोट पर बैठ कर सैर के लिए निकलते हैं। यह उन सभी जगहों से सुंदर और मनोरम था। पानी पर चल रहे हम आस-पास नारियल के पेड़ों से घिरे जंगल, आती-जाती दूसरी नावें, उनमें बैठे सैलानियों और एक-दूसरे को बाय-बाय कर रहे थे। मैं अपने कैमरे में यह सब कैद करना चाह रहा था। जहाँ तक हो सका किया भी। पानी पर बने घरों को देखा। वहाँ जंगलों के बीच बने रेस्टोरेंट बहुत ही मनोरम लग रहे थे। अब हम गोल्डन बीच पर पहुँच चुके थे। वहाँ का नजारा सभी जगहों से अधिक सुंदर दिख रहा था। सभी ने वहाँ उठती समुद्र की लहरों का आनंद उठाया। हमने समुद्र की लहरों के साथ समूह में तस्वीरों को उतारा। सबने अपने-अपने तरीके से इस पल को कैद करने की कोशिश की। दो से तीन घंटे का समय हमारे पास यहाँ के लिए था। अब हमें वापस भी आना था। सभी धीरे-धीरे पुनः अपनी-अपनी नावों पर सवार होकर वापस गाड़ियों के पास जा पहुँचे। यहाँ हम सब बिना देर किए अपनी-अपनी गाड़ियों में सवार हो गए। अभी तक खाना खाने के बाद किसी ने चाय नहीं पी थी। अब सभी को बहुत ज़ोर से चाय की तलब लगी पर रास्ते में हम सभी को एक और मंदिर देखना था। आखिर हम लोग बिना रुके वहाँ पहुँचे। मंदिर बाहर से बहुत ही भव्य दिख रहा था लेकिन हमारे अंदर पहुँचते-पहुँचते मंदिर बंद हो चुका था। सभी ने बाहर से मंदिर की तस्वीरें उतारी। पास में एक चाय की दुकान से सभी ने अपनी सुविधानुसार कुछ न कुछ खाया और चाय की चुस्कियाँ ली। थकान अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। गुटखा-तंबाकू वाले उसकी तलाश में लगे थे जिनमें मैं भी शामिल था। आखिर थोड़ी खोजबीन के बाद हमें सब मिल गया जिसकी तलाश हम कर रहे थे। अब यहाँ से सभी को विवेकानन्द आश्रम पहुँचना था। कुछ दूरी तय करने के बाद हम अपनी सीमा में प्रवेश कर चुके थे। हम लोग सात बजे तक आश्रम में आ चुके थे। थकान की वजह से अब कोई भी खाने के लिए बाहर नहीं जाना चाहता था। सब ने आज शाम का खाना एक साथ परिसर में ही खाया। खाने के बाद अपने-अपने आज के अनुभवों के साथ जल्दी ही नींद के आगोश में आ गए। सुबह सभी को जल्दी उठना था क्योंकि विवेकानन्द आश्रम में हो रहे प्रयोगों को देखने और सीखने जाना तय हुआ था और आज ही हम लोगों के वापस आने की ट्रेन भी थी। पहले यह तय था कि हम सभी बस से वहाँ जाने वाले हैं पर बाद में पता चला कि सिर्फ एम. फ़िल वाले ही जायेंगे। अभी भी किसी को ठीक से नहीं पता था कि कौन जाने वाला है और कौन नहीं। नाश्ता करने के बाद सब तैयार थे। थोड़ी देर बाद सूचना मिली कि जहाँ जाना है, वह व्यक्ति यहीं आने वाले हैं। पहले उनका व्याख्यान होगा और बाद में वहाँ जायेंगे। उनका इंतजार और व्याख्यान सुनने में इतना वक्त गुजर गया कि अब वहाँ जाना और वहाँ से वापस आना संभव नहीं था। व्याख्यान होने के बाद वहाँ हो रहे प्रयोगों को देखने के लिए एम. फिल. वाले छात्रों को वहीं रोक दिया गया क्योंकि उन सभी छात्रों को वहाँ हो रहे प्रयोगों पर संगोष्ठी पत्र प्रस्तुत करना था जबकि बाकी सब फ्री थे। पी-एच. डी. के सभी शोधार्थियों को मनोज सर के साथ गांधी मंडप देखने जाना था। गांधी मंडप में देखने जैसा कुछ भी नहीं है पर देखना तो था कि आखिर क्या बनाया गया है गांधी के नाम पर। यह काम 30 मिनट में ही पूरा हो गया। अब फिर से एक बाजार का दर्शन करना था। आज बाजार में स्थितियाँ ऐसी थीं कि लगभग हर दुकानदार हम सब से परिचित हो चुका था। हममें से कोई न कोई किसी न किसी दुकान पर पहले मोल-भाव कर चुका था या शायद उन्हें चेहरा देख कर मालूम हो गया था कि आज ये लोग अपना खाली समय पास करने आए हैं। आज भी जिनको जो कुछ खरीदना था उन्होंने खरीदा और जिन्हें अपना टाइम पास करना था, उन्होंने टाइम पास किया। अभी भी समय हमारे पास था। आज दोपहर का खाना हम कुछ लोगों ने बाहर मनोज सर के साथ खाया। बाकी लोगों ने अपना खाना परिसर में स्थित भोजनगृह में खाया। अब थोड़े इंतजार के बाद निकलना था। लगभग सभी अपना काम ख़त्म कर चुके थे। जिन्हें जो लेना था, वो ले चुके थे। सिर्फ स्टेशन जाना ही बाकी था। उसके लिए दो छोटी बसों की व्यवस्था ट्रैवल टीम ने कर रखी थी। अब हमारे पास आराम के लिए सिर्फ एक ही हॉल था जिसमें आदमी से अधिक सामान दिख रहा था। कुछ लोगों को पहले आओ पहले पाओ की रणनीति पर काम करना पड़ा तब वे थोड़ा आराम कर पाए। कुछ लोग बाहर बनी बेंचों पर अपना-अपना अनुभव बाँट रहे थे। मैं भी उन्हीं लोगों में शामिल था। कुछ लोग अभी भी खरीददारी करने गए थे। आखिर हमारे आश्रम से निकलने का समय आ गया। सभी अपने सामान और अच्छे-बुरे अनुभवों के साथ एक बार फिर अपने चुने हुए साथियों के संग बस में बैठ गए। हम कुछ ही घंटे की दूरी तय करके नागरकोविल जं. रेलवे स्टेशन पर पहुँच चुके थे। जिस ट्रेन से हमें यात्रा करनी थी, वह ट्रेन यहीं से शुरू होती है। वह उस समय हम सभी को ले जाने के लिए तैयार थी। फिर हमें अपने-अपने टिकट दिये गए और हमने अलग-अलग कोचों में अपने-अपने पसंद के लोगों के साथ यात्रा शुरू की। रात के खाने का इंतजाम फूड कमेटी को करना था। पैंट्री कार वालों से बात हो गई थी, इसलिए अब सब लोग अपनी-अपनी थकान मिटा रहे थे। कुछ लोग सो रहे थे। कुछ लोग अभी भी यात्रा और अपने खरीदे गए समान के बारे में बात कर रहे थे। आखिर खाने का समय आ गया। आज का खाना ठीक था। मतलब जैसा ट्रेन में हम लोग खाते रहे हैं, उससे शायद अच्छा था। यह इसलिए भी हो सकता है कि इतना सारा खाना एक साथ ऑर्डर किया गया था। सुबह हुई और हम सभी चेन्नई पहुँच चुके थे। हमें फ़्रेश होने का समय ट्रेन में ही मिल चुका था। इसलिए वहाँ से उतरते ही हम नाश्ते यानि जन आहार की तरफ गए। सभी ने वहाँ नाश्ता किया उसके बाद अगली ट्रेन जो हमे वर्धा तक पहुँचाने वाली थी, उसके स्टेशन पर लगने में अभी एक से डेढ़ घंटे का समय था। जिसे भी यहाँ कुछ खाने-पीने के लिए खरीदना था, उसके पास पर्याप्त समय था। सभी ने रास्ते में पीने के लिए पानी की अपनी-अपनी व्यवस्था कर ली थी। वहाँ पीने वाले पानी के लिए जीरो 'बी' की मशीनें लगी थीं जो आरो का पानी 3 रुपए लीटर उपलब्ध करा रही थीं। हम सभी ने वहाँ से अपनी खाली बोतलें भरवा लीं। अब हमारी यात्रा फिर शुरू होने वाली थी। इस बार हम लोग मनोज सर के कोच में यात्रा करने वाले थे। यात्रा शुरू होती है इसी माहौल में दोपहर और रात का खाना-पीना भी हुआ जो कि ठीक-ठाक ही था। वैसे यात्रा की थकान सभी के चेहरों पर साफ दिख रही थी और जल्द से जल्द सब अपने-अपने कुनबों में पहुँच जाना चाह रहे थे। रात के करीब 2 बजे जब हम वर्धा स्टेशन पर उतरे तो इस उतरने में बरसों बाद की घर-वापसी जैसा सुकून था। यहाँ से विश्वविद्यालय जाने के लिए हमारे पास कोई साधन नहीं था। स्टेशन पर दो ऑटो थे जो बारी-बारी से विश्वविद्यालय परिसर छोड़ने के लिए तैयार हो गए। बाकी बचे लोग बस स्टॉप की ओर आ गए जहाँ से सब के लिए ऑटो मिल गया और रात के तीन बजे जब पूरा हॉस्टल नींद के आगोश में था तो एक लंबी, थकाऊ मगर यादगार यात्रा के तजुर्बों के साथ हम अपने-अपने कमरों की ओर जा रहे थे– अकेले।
 













नरेश गौतम
शोधछात्र
महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा
nareshgautam0071@gmail.com