Thursday, May 18, 2017

मनुष्यता से जुड़ा हुआ है पर्यावरण का मुद्दा: प्रो. मनोज कुमार


तथाकथित विकास से उत्पन्न समस्याओं ने आज पूरे विश्व को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि विकास की इस राह पर ज्यादा दिनों तक चला नहीं जा सकता है। वैसे तो यह सोचते-सोचते 50 वर्ष से भी अधिक का समय गुजर चुका है क्योंकि इसकी शुरुवात 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के स्टाकहोम सम्मेलन से होती है, जहां विकास से उपजे पर्यावरणीय प्रदूषण और संसाधनों के खत्म होने की चिंता को लेकर सौ से अधिक देशइकट्ठा हुए। विकास की इन समस्याओं को देखते हुए 'बुंटलैंड आयोग' ने 'स्थायी विकास' का नारा दिया। तब से लेकर अब तक विभिन्न मंचों से सतत या स्थायी विकास का नारा बुलंद किया जाता रहा है। इस वर्ष के विश्व समाज कार्य दिवस का उद्देश्य भी पर्यावरण और इंसानी अस्तित्व की निरंतरता (Sustainability) को बढ़ावा देना रहा। इसी क्रम में 21 मार्च को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी समाज कार्य अध्ययन केंद्र के द्वारा विश्व समाजकार्य दिवस, 2017 पर एक परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। परिचर्चा इस वर्ष का विषय ग्लोबल एजेंडे का तीसरा स्तम्भ 'सामुदायिक और पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देना' रहा।
केन्द्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि पर्यावरणीय मुद्दे पर दुनिया की तमाम सरकारें एक तरह से सोच रही हैं और जनता दूसरे तरीके से सोच रही है। जब तक हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित नहीं करेंगे तब तक पर्यावरण की सुरक्षा नहीं होगी। आगे उन्होने कहा कि पर्यावरण का मुद्दा मनुष्यता से जुड़ा हुआ है। इस परिचर्चा को आगे बढ़ते हुए सहायक प्रोफेसर श्री आमोद गुर्जर ने कहा कि सतत विकास की अवधारणा व्यक्ति केन्द्रित है जबकि इसे समग्र उपागम (holisticapproach) को अपनाना होगा। हमने मानव अस्तित्व पर संकट आने के बाद ही 'सतत विकास' की अवधारणा अपनाई।डॉ. शिव सिंह बघेल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए यह कहा कि विद्यार्थियों को अपना लक्ष्य ऐसा बनाना चाहिए ताकि वे स्वयं को वैश्विक एजेंडे से जोड़ सके और ग्राम स्तर तक पहुंचाए।
डॉ. मिथिलेश ने कहा कि वैश्विक स्तर तथा भारत में भी संसाधनों के बड़े भाग पर चंद लोगों का आधिपत्य है जबकि एक बड़ा भाग अपना जीवन गरीबी और अभाव में व्यतीत कर रहा है इसलिए हमें संसाधनों के न्याय पूर्ण वितरण पर ध्यान देना होगा। परिचर्चा के दौरान उपस्थित सभी सहभागियों नेइस मुद्दे पर अपनी बात रखी। ज़्यादातर विद्यार्थियों ने अपने आस-पास विकास के नाम पर उत्पन्न हो रहे विसंगतियों को प्रमुखता के साथ रखा।
कार्यक्रम का संचालन नरेन्द्र कुमार दिवाकर ने किया। प्रास्ताविक डिसेन्ट कुमार साहू ने रखा और आभार गजानन निलामे ने किया। इस परिचर्चा में केंद्र के निदेशक प्रो.मनोज कुमार,डॉ. मिथिलेश कुमार, डॉ. शिव सिंह बघेल, सहायक प्रोफेसर श्री आमोद गुर्जर तथा केंद्र केनरेश गौतम, श्याम सिंह, आशुतोष, छविनाथ यादव,विलास चुनारकर, अनुराग पाण्डेय, शीना नेगी, सुधीर कुमार,अदिति, आनीता और शुभांगी सहित बड़ी संख्या में समाज कार्य के शोधार्थी/विद्यार्थी और एन जी ओ प्रबंधन के विद्यार्थी उपस्थित रहे।
नरेंद्र कुमार दिवाकर
शोधार्थी समाजकार्य

Tuesday, May 9, 2017

महिलाओं का कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न कानून के प्रावधान



-नरेंद्र कुमार दिवाकर
महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा तथा उत्पीड़न की घटनाएँ आज उभरकर सामने आ रही हैं इसका एक कारण शायद यह है कि जेण्डर के आधार पर समानता और न्याय को लेकर जागरूकता बढ़ी है। क्योंकि पहले जागरूकता के अभाव में इस तरह के मामले प्रायः उभर कर सामने नहीं आ पाते थे। इसके साथ ही साथ महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी भी है। इसका बड़ा कारण पितृसत्तात्मक समाज का महिलाओं के प्रति नजरिया है। आज भी हमारे समाज में महिलाओं को एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार्यता नहीं मिली है। सामंती मानसिकता के कारण स्त्री को सिर्फ एक यौन वस्तु के रूप में देखा जाता रहा है। यह स्थिति तब है जब महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध कानूनी संरक्षण हासिल है।

जेण्डर के आधार पर समानता प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इस अधिकार के अंतर्गत महिलाओं का किसी भी स्थान या कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न या ऐसे किसी भी प्रकार के शोषण से सुरक्षा का अधिकार भी शामिल है। इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार यौन उत्पीड़न को विशाखा एवं अन्य बनाम राजस्थान सरकार एवं अन्य (1997) के मामले में परिभाषित करते हुए एक शिकायत समिति का गठन करने का दिशा-निर्देश दिया था। इसके बाद ही महिलाओं का कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के रूप में 22 अप्रैल, 2013 को अस्तित्व में आया। इसे और अधिक व्यापक बनाने व इस कानून को और बेहतर तरीके से अमल में लाने के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने उसी वर्ष दिसंबर माह में “महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध एवं प्रतितोष) नियम, 2013” एक अधिसूचना जारी की।
 
किसी भी तरह का यौन व्यवहार (छेड़-छाड़ आदि) जो महिला की ‘इच्छा के खिलाफ’ उसके साथ हो, यौन उत्पीड़न है, भले ही वह दूसरों की नजर में मामूली हो या गंभीर। कार्यस्थल पर यदि इस तरह की घटना घटित होती है तो न केवल पीड़िता के मानवाधिकारों का हनन होता है बल्कि उसके श्रम का मोल भी घट जाता है। यौन उत्पीड़न अपने आप में हिंसा का ही एक रूप है। कोई भी यौन व्यवहार महिला के निजी जीवन, स्वास्थ्य और कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। कई बार उन्हें अवसरों को भी खोना पड़ता है। यौन उत्पीड़न से न केवल कार्यस्थल अपितु देश की अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ता है।
अधिनियम की धारा 2 (ढ) के अनुसार शरीर को छूना या छूने का प्रयास करना, यौन संबंध बनाने की माँग करना या प्रयास करना, यौनिक शब्दों वाली बातें या व्यवहार करना और अन्य कोई भी ऐसा शारीरिक, मौखिक, इशारा आदि ऐसा व्यवहार करना जो यौन स्वभाव का हो और अस्वीकार्य हो यौन व्यवहार के अंतर्गत आते हैं। सरल शब्दों में इसे इस तरह से समझा जा सकता है-अगर कोई व्यक्ति किसी महिला को जबरदस्ती गले लगाए, महिला के शरीर के बारे में दो अर्थों वाली बात करे, घूरे, गाली-गलौच करे, यौन स्वभाव के विडियो किसी महिला के सामने देखे या दिखाने का प्रयास करे, फोन आदि से यौन व्यवहार के संदेश भेजे, महिला से यौन संबंध बनाने हेतु दबाव डाले, अपने दफ्तर में यौन स्वभाव वाले चित्र लगाए, इशारे आदि करे तो यौन उत्पीड़न कहलाएगा।
उपरोक्त कोई भी व्यवहार तभी यौन उत्पीड़न कहलाएंगे जब वह महिला की ‘मर्जी के विरुद्ध’ या इच्छा के खिलाफ हो। अर्थात ऐसे कृत्य जिन्हें महिला नापसंद करे या जिस पर उसे ऐतराज हो। अगर यह कार्य महिला की ‘मर्जी’ से होता है तो यौन उत्पीड़न नहीं माना जाएगा।
 
अधिनियम की धारा 2 (ण) के अनुसार कार्यस्थल का तात्पर्य कोई विभाग, संस्था, कार्यालय, शाखा, अस्पताल व नर्सिंग होम, स्टेडियम, स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स, व्यक्तिगत या सार्वजनिक क्षेत्र में चल रहा संगठन जैसे व्यापारिक, व्यावसायिक, औद्योगिक, शैक्षणिक, मनोरंजनात्मक, स्वास्थ्य संबंधी गतिविधि चलाने वाली संस्था, असंगठित क्षेत्र आदि से है।
 
ऐसा कोई भी कागज या दस्तावेज, जिसमें महिला के काम को नुकसान पहुंचाने या धमकी देने की बात हो, महिला यौन उत्पीड़न के मामले की सुनवाई के दौरान देती है तो वह एक महत्वपूर्ण सबूत माना जाता है। मामले की सुनवाई के दौरान यदि महिला को तरक्की देने की बात वाला कोई भी दस्तावेज मिल जाता है तो वह यौन उत्पीड़न के मामले में सबूत के रूप में काम करेगा। आरोपी का ई-मेल, संदेश, पत्र आदि चीजों को संभालकर रखना चाहिए। किसी भी महिला को यह चाहिए कि यथासंभव यथाशीघ्र अपने साथ हुई घटनाओं के बारे में अपने किसी परिचित व्यक्ति को भी बताए, क्योंकि वह भी मामले की सुनवाई/न्याय की लड़ाई के दौरान काम आता है।

 
यौन उत्पीड़न के दौरान या बाद में पीड़िता को घबराहट, मानसिक कमजोरी या तनाव आदि हो सकता है, जिससे उसके स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है और इसके इलाज के लिए यदि उसे किसी डॉक्टर के पास जाना पड़े तो डॉक्टर के सलाह और दावा की पर्ची भी संभाल कर रखनी चाहिए क्योंकि इन्हें भी सबूत के तौर पर काम में लाया जा सकता है।
 
प्रायः यह कह कर कि महिला ने घटना की शिकायत देर से की, मामले को हलका करने/मानने की कोशिश की जाती है। लेकिन घटना में देरी से घटना की प्रकृति और पीड़िता के कार्यवाही के अधिकार में कोई फर्क नहीं पड़ता। धारा 9 (1) के अनुसार कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत लिखित में घटना घटित होने के 3 माह के अंदर की जानी चाहिए। यदि घटनाएं लगातार हो रही हैं तो शिकायत अंतिम घटना घटित होने के तीन महीने के भीतर की जानी चाहिए। यदि ऐसा होता है कि पीड़िता लिखित शिकायत नहीं दे सकती है तो समिति के अधिकारी या सदस्य शिकायत लिखने में जरूरी मदद करेंगे। यदि समिति को यह समाधान हो जाता है कि घटना की शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी के वाजिब कारण हैं तो समिति कारण बताते हुए अधिकतम 3 महीने तक का समय बढ़ा सकती है।
 
वैसे तो पीड़िता या महिला को शिकायत संबंधित दस्तावेज, गवाहों के नाम और पते, तथा सबूतों की छः कापियाँ शिकायत समिति को देनी होती है परंतु यदि वह ऐसा नहीं कर पाती तो उसकी शिकायत करने के बाद समिति स्वयं ऐसा कर लेती है और समिति को इसी में से एक कॉपी आरोपी/प्रतिवादी को देनी होगी।
धारा 9 (2) के अनुसार पीड़िता के शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम होने की स्थिति में उसके घर का कोई सदस्य, रिश्तेदार, मित्र, सहकर्मी, या कोई ऐसा व्यक्ति जिसे घटना के बारे में पता हो शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इनके अतिरिक्त विशेष शिक्षक, मनोवैज्ञानिक, संरक्षक या देखभाल करने वाले व्यक्ति की सहायता से भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
यदि पीड़िता कि मृत्यु भी हो जाए तो वह व्यक्ति जिसे घटना के बारे में पता हो, पीड़िता के उत्तराधिकारी की लिखित सहमति से शिकायत दर्ज करा सकता है।
शिकायत की कापियाँ मिलने के 7 दिनों के भीतर ही समिति इसकी कॉपी सहायक दस्तावेज और गवाहों की सूची प्रतिवादी/आरोपी को भेजेगी। प्रतिवादी को यह सब दस्तावेज प्राप्त करने के 10 दिन के अंदर अपना जवाब दाखिल करना होगा। जिसकी एक कॉपी समिति पीड़िता या शिकायतकर्ता महिला को देगी। इसके बाद शिकायत समिति जांच प्रक्रिया प्रारंभ कर 90 दिन के अंदर ख़त्म कर देगी।
 
धारा 10 के अनुसार यदि पीड़िता शिकायत कर चुकी है और इसी दौरान मामले को बात-चीत से सुलझाना चाहती है तो जांच पड़ताल शुरू करने से पहले समिति द्वारा इस दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं पर समझौते का आधार पैसे का लेन-देन कतई नहीं होगा। समझौते में सारी बातें साफ-साफ लिखी जाएंगी। समझौते की एक-एक प्रति पीड़िता और आरोपी दोनों को दी जाएगी तथा जांच कार्यवाही को स्थगित कर दिया जाएगा। समझौते के अनुपालन न करने की दशा में पीड़िता की शिकायत पर समिति उस मामले की जांच शुरू करेगी या उसे पुलिस में दर्ज कराएगी। समिति को किसी भी मामले से जुड़ी जांच 90 दिन के अंदर पूर्ण करना होगा।
समिति जांच प्रक्रिया ख़त्म होने के 10 दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट अभियुक्त के खिलाफ उचित कार्यवाही करने की सलाह के साथ नियोक्ता (मालिक/संस्थान का मुखिया) या जिलाधिकारी के पास प्रस्तुत कर देगी। रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद नियोक्ता (मालिक/संस्थान का मुखिया) या जिलाधिकारी 60 दिन के अंदर इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करेंगे। समिति की रिपोर्ट आने के 90 दिन के अंदर शिकायतकर्ता अपील दायर कर सकती है।
जांच के बाद यदि समिति इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं तो वह यह लिखकर भेज सकती है कि इसमें कार्रवाई की कोई आवश्यकता नहीं है। समिति पर यह जिम्मेदारी है कि पीड़िता या शिकायतकर्ता का नाम गुप्त रखा जाय। अगर कोई भी सदस्य पीड़िता का नाम या पहचान जाहिर कर देता है तो नियोक्ता उसे पद से हटा सकता है और रू. 5000/- तक जुर्माना भी लगा सकता है।
संपूर्ण जांच प्रक्रिया के दौरान दोनों पक्षों को स्वयं अपनी बात (किसी भी पक्ष को वकील रखने का अधिकार नहीं) रखने का पूरा समय और पूरा अवसर दिया जाएगा। समिति को दोनों पक्षों की बातें निष्पक्ष रूप से सुननी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ कई शिकायतें हैं तो एक साथ मिलाकर सुनवाई की जानी चाहिए।
समिति को महिलाओं के बारे में फैले तमाम पूर्वाग्रहों, जाति, धर्म, यौनिकता, समलैंगिकता और वर्ण आदि से संबंधित पूर्वाग्रहों से परे होकर शिकायत सुननी चाहिए। समिति को पीड़िता की स्थिति को ध्यान में रखते हुए जांच की कारवाई करनी चाहिए। यदि पीड़िता चाहती है तो समिति उसकी बात को अकेले में भी सुन सकती है। पीड़ता या शिकायतकर्ता महिला के खिलाफ कोई विरोधी शिकायत यौन उत्पीड़न मामले की जांच पूरी होने तक नहीं दायर की जा सकती।
जांच के दौरान अध्यक्ष सहित कम से कम 3 सदस्य उपस्थित रहेंगे। जांच के बाद फैसला समिति के सदस्यों की सहमति या भागीदारी से होगा। सिर्फ अध्यक्ष अकेले फैसला नहीं ले सकती। अध्यक्ष महिला ही होगी और समिति में सदस्यों की कुल संख्या का 50 प्रतिशत सदस्य महिलाएं होंगी।
समिति को यदि शुरुआती जांच में यह लगता है कि जिन तथ्यों पर शिकायत आधारित है वह साफ नहीं हैं या यौन उत्पीड़न का मामला नहीं बनता तो शिकायत को ख़ारिज किया जा सकता है। यदि यौन उत्पीड़न का मामला बनता है और शिकायत स्पष्ट नहीं है तो शिकायतकर्ता महिला को मौका दिया जाएगा कि वह अपनी शिकायत स्पष्ट करे। अगर समिति को यह लगता है कि पीड़िता ने महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश नहीं किया गया है तो समिति उसे महत्वपूर्ण तथ्यों को समावेश करने का मौका दे सकती है।
 
जिन भी गवाहों की गवाही या सबूत लिए जाएँगे उन पर उन गवाहों के हस्ताक्षर अवश्य लेने चाहिए। अगर दोनों (पीड़िता और प्रतिवादी) में से कोई भी बिना किसी वाजिब कारण के लगातार 3 सुनवाइयों में अनुपस्थित रहता है तो 15 दिन का नोटिस दिया जाएगा। जवाब न मिलने पर समिति मामले में एकतरफा निर्णय ले सकती है।
यदि यह साबित होता है कि शिकायतकर्ता ने आरोप बदनीयती से लगाए हैं तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई कि जा सकती है बशर्ते उसकी बदनीयती साबित हो जाय।
समिति को चाहिए कि पीड़िता/महिला से नरमी से पेश आए जिससे वह अपनी बात बिना डरे रख सके। समिति को इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि पीड़िता का प्रतिवादी के साथ कब और कैसे रिश्ते थे। उसका यौन इतिहास, समिति की जांच का हिस्सा या निष्कर्ष रिपोर्ट का आधार नहीं बन सकता। शिकायत करने वाली/पीड़िता/महिला के कार्य पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए, अगर कोई उसे डराता-धमकाता है या कोशिश करता है तो समिति द्वारा इसकी जांच की जानी चाहिए। अगर पीड़िता प्राथमिकी (एफ़आईआर) दर्ज करवाना चाहे तो इसमें समिति को उसकी मदद करनी चाहिए और प्राथमिकी की कॉपी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
समिति को यह अधिकार है कि वह पीड़िता को स्वयं या माँगने पर परिस्थिति अनुसार राहत प्रदान करे। शिकायत दायर होने के बाद या जांच प्रक्रिया के दौरान पीड़िता के अनुरोध पर समिति नियोक्ता (मालिक/संस्थान का मुखिया) या जिलाधिकारी से सिफारिश कर सकती है कि दोनों में से किसी का तबादला किसी और कार्यस्थल पर कर दिया जाय। इसी के तहत शिक्षण संस्थानों में जब ऐसे मामले होते हैं तब प्रतिवादी या आरोपी को परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाता है जिससे वह पीड़िता को डरा धमका कर प्रभावित न कर सके। पीड़िता को 3 माह की छुट्टी दी जा सकती है जो कि उसके कर्मचारी के रूप में दी जाने वाली छुट्टी से अलग होगी।

प्रतिवादी को कोई ऐसा कार्य नहीं दिया जाएगा जिससे वह वादी या पीड़िता को नुकसान पहुँचा सके। प्रतिवादी या आरोपी के दोषी पाए जाने पर ‘जितना दोष, उतना दंड’ के आधार पर कारवाई की जानी चाहिए। महिला को पहुँचे मानसिक आघात, दर्द, व्यथा और भावनात्मक पीड़ा, यौन उत्पीड़न के कारण जीवन वृत्त के अवसर में हुए नुकसान, शारीरिक या मानसिक चिकित्सा के लिए पीड़िता द्वारा खर्च की गई राशि और प्रतिवादी/आरोपी की वित्तीय स्थिति के अनुसार पीड़िता को मुआवजा भी मिल सकता है। समिति को दोषी के खिलाफ ‘कार्रवाई का अनुपात’ भी अपनी निष्कर्ष रिपोर्ट में रखना चाहिए। दंड का निर्धारण दोष की गंभीरता को देखते हुए किया जाना चाहिए। जैसे कि अगर सिर्फ घूरने तक का मामला है तो लिखित में माफी, चेतावनी दी जा सकती है। अगर यौन उत्पीड़न का स्वरूप इससे बड़ा है जैसे छूना, यौन संबंध की माँग करना या इसके लिए धमकाना तो नौकरी से या परिसर से निलंबित किया जाना चाहिए।
 
एक बात यह दीगर है कि यौन उत्पीड़न और हिंसा, भारतीय दंड संहिता (आई पी सी) के अंतर्गत भी अपराध की श्रेणी में आते हैं और इसके अंतर्गत सजा और जुर्माने की भी व्यवस्था है। इसलिए पीड़िता चाहे तो भारतीय दंड संहिता के तहत भी शिकायत कर सकती है या दोनों प्रक्रियाओं (आंतरिक प्रशासनिक या महिला समिति और भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत भी) को एक साथ चला सकती है, क्योंकि दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं या किसी एक प्रक्रिया के तहत ही अपनी शिकायत दर्ज करवाए। फर्क बस इतना है कि समिति की जाँच में दोषी पाए जाने पर आरोपी को दोषी मानकर प्रशासनिक कार्रवाई ही की जा सकती है परंतु भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत चलाए गए मामले में अपराध साबित होने पर जुर्माना या जेल जाने की सजा (या दोनों) भी हो सकती है।

-नरेंद्र कुमार दिवाकर.
पी.एच.डी.(शोध छात्र) – समाज कार्य, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय

Friday, March 31, 2017

बेड़िया समुदाय: जाति, यौनिकता और राष्ट्र–राज्य के पीड़ित

photo google
बेड़िया समुदाय जो कि कभी एक घुमंतू और आपराधिक प्रवृत्ति वाला समुदाय माना जाता रहा है लेकिन राज्य ने उसे अनुसूचित जाति की श्रेणी में श्रेणीबद्ध किया है और उनके विकास लिए तमाम तरह की योजनाएं भी चला रहा है ताकि उनका उत्थान हो सके लेकिन जैसा कि हमेशा होता है वैसा ही इन योजनाओं के साथ भी हुआ है। यह भी मात्र कागजों पर ही सीमित रह गयी हैं।
मध्य प्रदेश के जिला सागर और अशोकनगर, बीना के आस पास बहुत से गाँव है, जहाँ बेड़िया समुदाय के लोग निवास करते हैं। सिर्फ एक ही गाँव जिसका नाम पथरिया है वहाँ परिवर्तन देखने को मिलता है। उसके भी कारण हैं क्योंकि वहाँ 1984 से सत्य शोधन आश्रम की शुरुआत चम्पा बेन के द्वारा की गयी जिसका मुख्य उद्देश्य बेड़िया समुदाय का उत्थान करना था।
चम्पा बेन के द्वारा सबसे पहला कार्य बेड़िया समुदाय की बालिकाओं को शिक्षा देना था और वहाँ देह व्यापार में लगी महिलाओं को जागरूक करना था ताकि वह देह व्यापार जैसे कार्य से बाहर निकल सकें। साथ ही बेड़िया समुदाय में इससे पहले शादी जैसे संस्कारों का भी कोई मूल्य नहीं था, इसके लिए भी लोगों को जागरूक करने का काम किया गया। बाकी गाँव जहाँ बेड़िया समुदाय के लोग निवास करते हैं, वहाँ की स्थितियाँ बहुत ही खराब हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन राज्य की नीतियाँ भी इसके लिए बहुत हद तक जिम्मेदार हैं।

बेड़िया समुदाय पहले से ही शोषित रहा है क्योंकि उनके संपर्क हमेशा राजे-रजवाड़े, जमींदारों, मालगुजारों जैसे सामन्ती लोगों के साथ रहे हैं, जहाँ लगातार उनका शोषण किया गया। जिस तरह से सामन्ती लोगों ने इनका शोषण किया उसी तरह से आज भी हो रहा है।
 सरकार ने भूमिहीनों के लिए कृषि हेतु जो भूमि आवंटित की है, वह  इन्हें भी आवंटित की गयी, लेकिन यह उनके निवास स्थान से 20 या 35 किलोमीटर की दूरी पर है। इनमें से बहुत सारे लोगों को आज भी उस भूमि पर कब्जे नहीं मिले हैं। बहुत सारे ऐसे भी लोग हैं जिन्हें आज तक यह भी नहीं पता है कि उनकी भूमि आखिर आवंटित कहाँ है? जब भी बेड़िया समुदाय के लोगों ने अपने आप को परम्परागत पेशे से बाहर निकालना चाहा है तो उनके सामने कई तरह के सवाल खड़े हो जाते हैं। सबसे पहला सवाल उनकी पहचान का बनता है। जैसे ही लोगों को पता चलता है कि वे बेड़िया समुदाय से हैं तो लोग सहज उपलब्धता के कारण उनसे यौन संबंधो की अपील करते हैं या उन्हें उसी नजरिये से देखते हैं। इस तरह के सामाजिक दबाव को झेलना पड़ता है। यह समुदाय हमेशा किसी न किसी पर आश्रित होकर अपना जीवन निर्वाह करता रहा है। दूसरा यह समुदाय कभी कृषि कार्य से भी नहीं जुड़ा रहा। अब जिन परिवारों में दलित चेतना का विकास हुआ है और जिन्होंने अपने आप को अनुसूचित जाति की श्रेणी में भी गिनना शुरू कर दिया है, और अपने आप को इस कलंक से बाहर भी निकालना चाहते हैं, न तो उन्हें समाज इस कार्य से बाहर निकलने दे रहा है और न सरकार उनके लिए कोई ठोस कदम उठा रही है।

पूरा समुदाय हमेशा से ही उपेक्षा की नजर से देखा जाता है। यदि आप उस गाँव का नाम तक लेते हैं तो आप को लोग ओछी नजर से देखते हैं। लोगों की मानसिकता जाकर वहीं रुकती है कि आप उनके साथ अपने यौन संबंध बनाने जा रहे हैं। बुंदेलखंड में बसे ये लोग अपने लिए ही जीवन और नयी संभावनाएँ तलाश करने में जुटे तो हैं लेकिन यह सभ्य समाज ही उन्हें इस दलदल से बाहर नहीं निकलने दे रहा है। दूसरा कारण यह भी है कि राज्य सरकार इनको अनुसूचित जाति की श्रेणी में श्रेणीगत करती है, लेकिन इस समुदाय में आज भी वह चेतना नहीं जागी है। यहाँ तक कि बहुत से बेड़िया आज भी अपने को उच्च श्रेणी में ही गिनते हैं। ये उन लाभों को भी नहीं ले पाते हैं, जो सरकार अनुसूचित जाति के लिए देती है। पूरे समुदाय में शिक्षा की कमी भी इनके विकास में सबसे बड़ी अवरोधक है, जो इन्हें इस काम से बाहर नहीं निकलने दे रही है।

यदि पूरे बुंदेलखंड और उसकी परिस्थितियों को देखेँ तो ये भी कृषि के लिए अनुकूल नहीं है। जब इनके इतिहास पर नजर डालते हैं तो यह समुदाय कभी भी कृषि कार्य या अन्य व्यवसाय से जुड़ा दिखायी नहीं देता है। अतः इनके लिए कृषि कार्य से जुड़ना अपने आप में एक मुश्किल कार्य है। जिस तरह से इस समुदाय कि निर्मिति के साक्ष्य मिलते हैं उससे तो यही लगता है कि इस समुदाय के उत्थान के लिए सरकार या अन्य संस्थायें इनको इस देह व्यापार के व्यवसाय से बाहर निकालना नहीं चाहती हैं, अन्यथा इनके लिए किसी उचित व्ययसाय की व्यवस्था की जानी चाहिए थी।

ग्राम परसरी की बेला कहती हैं कि- “मुझे यह काम छोड़े काफी साल हो गए हैं। अभी तक मेरा पूरा परिवार इस काम से बाहर आ गया है लेकिन जब से हमने देह व्यापार और राई को छोड़ा है, तब से हम लोग अपने लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ भी ठीक से नहीं कर पाते हैं। हमारे ही गाँव के लोग आज हमसे बहुत धनी हैं और उनके पास आधुनिक सुख सुविधा के साधन हैं, रहने के लिए अच्छे घर हैं। हम तो रोटी के लिए भी मोहताज हैं, बीड़ी बनाने और मजदूरी से घर का खर्च तो किसी तरह चल जाता है लेकिन किसी और काम के लिए पैसे नहीं बचते हैं। कई बार तो यही लगता है कि हमने राई को छोड़ कर बहुत गलत किया। कई बार वापस जाने का मन भी करता है लेकिन फिर सोच कर रह जाती हूँ ”।

यह कहानी किसी एक महिला की नहीं है। बेड़िया समुदाय में इस तरह के बहुत से परिवार मिल जाएंगे। करीला की एक महिला बताती हैं कि सामाजिक दबाव के चलते मैंने राई तो छोड़ दी, लेकिन कोई और काम भी नहीं था। घर के मर्द कुछ भी नहीं करते और पूरे दिन दारू के नशे में घूमते हैं। दारू के लिए भी पैसे मुझसे ही माँगते हैं, इसलिए वापस यहाँ करीला मंदिर पर ‘बधाई’ करती हूँ। शाम तक 2-3 सौ रुपए मिल जाते हैं पर कभी-कभी कुछ भी नहीं मिलता, लेकिन अपने साथ साज वाले को रोज पैसे देने पड़ते हैं।  यह किस्सा किसी एक महिला का नहीं है ऐसे किस्सों से बेड़िया समुदाय भरा पड़ा है।

बेड़िया समुदाय की पहचान एक यौन कर्म करने वाले समुदाय के रूप में सभ्य समाज करता है, लेकिन किसी भी समुदाय और उसके व्यवसाय को समझने के लिए, उस समुदाय की निर्मिति एवं इतिहास को देखना आवश्यक है, क्योंकि बिना किसी की निर्मिति के बारे में जाने उसके बारे में ठीक-ठीक कुछ कहना मुश्किल हो जाता है या कई बार हम उनके लिए गलत निर्णय भी ले लेते हैं। बेड़िया समुदाय को राज्य एक वेश्यावृत्ति करने वाला समुदाय मानता है। क्योंकि यह समुदाय अपने सेक्सुअल रिलेशन कई पुरुषों और सभ्य समाज के संबंधों से इतर बनाता है और उन संबंधो में काफी खुलापन भी होता है। यह समुदाय इस तरह के संबंध बनाने को बुरा नहीं मानता। लेकिन राज्य की विधि और सभ्य बनाने की जो राज्यजनित अवधारणा है, यह समुदाय एक ख़तरे के रूप में उसके सामने खड़ा है। जब इस समुदाय में कभी भी यौन कर्म को बुरा नहीं माना गया और समुदाय यौन कर्म को मान्यता भी देता है, तो उस समुदाय को यह सभ्य समाज या राज्य बुरा कर्म करने वालों की नजर से क्यों देखता है? जब कि इनकी संस्कृति का यह एक अहम हिस्सा भी है। यदि इनके पूरे इतिहास को देखा जाए तो यह एक घुमंतू समुदाय रहा है और कभी भी शादी-ब्याह जैसे संस्कारों को मान्यता न देते हुये अपना विकास करता रहा है। इस समुदाय के लिए यह एक सहज प्रक्रिया है लेकिन राज्य और समाज की नजर में तो नहीं।

राज्य इस तरह के समुदाय को मुख्य धारा में लाने के प्रयास में लगा है, क्योंकि यह समुदाय मुख्य धारा के विपरीत अपने संबंध मुख्य धारा के लोगों के साथ ही स्थापित करता है। लेकिन वही समाज जो इन्हें अपनी रखैल या जो भी नाम दिया जाए के रूप में इस्तेमाल करता है तब ये बेड़िया उनके लिए असभ्य क्यों नहीं होते? यही वो सभ्य समाज है जो इन्हें वेश्यावृत्ति करने वाला भी कहता है और इन्हीं के साथ अपने अनैतिक संबंध भी स्थापित करता है।  
    
समुदाय की निर्मिति में सामन्ती लोगों की भूमिका अधिक दिखायी देती है क्योंकि ऐतिहासिक तथ्यों को देखें तो बेड़िया समुदाय की महिलाएँ राजे-रजवाडों और सामन्ती लोगों से ही अपने संबंध बनाती दिखती हैं। इसका यह कारण भी था कि बेड़िया समुदाय की महिलाएँ अन्य समुदायों की अपेक्षा अधिक सुंदर होती थीं तो इन्हें अन्य समुदायों की अपेक्षा ख़तरे भी अधिक थे। अपने संरक्षण और आर्थिक जरूरतों को पूर्ण करना भी इसमें शामिल था। यहाँ तक इनके सामने कोई समस्या नहीं थी। ब्रिटिश काल में इन्हें पहचान कर, श्रेणी बद्ध किया गया और अपराधी प्रवृत्ति की  संज्ञा दी गयी। लेकिन आजादी के बाद से इनके लिए संकट बढ़ गए। उसके कारण यह थे कि भारत के लगभग सभी ऐसे समुदायों को मुख्य धारा में लाने के लिए जनजाति से जाति व्यवस्था में लाना था क्योंकि राज्य की सत्ता जाति व्यवस्था पर चलती है। इसमें शामिल होने के लिए आप को जाति व्यवस्था में आना पड़ेगा। इनके साथ भी वही किया गया। इन्हें अब जनजाति से बदल कर अनुसूचित जाति में परिवर्तित कर दिया गया। अब जब यह जाति व्यवस्था में आ चुके थे, तो राज्य की विधि के अनुसार ही इन्हें भी चलना था।

हालांकि समुदाय में खुले तौर पर संबंध बनाने की छूट थी। इसी आधार को देखते हुये राज्य ने इन्हें वेश्यावृत्ति करने वाले समुदाय के रूप में पहचान दी। औपनिवेशिक मानसिकता के साथ इन्हें शिक्षित करने की प्रक्रिया और उनकी संस्कृति को समाप्त करने के प्रयास शुरू किए गए। अब इनके सामाजिक मूल्यों, इनकी संस्कृति सभी पर हमला होना तय था। अब इन्हें ‘Open Relation रखने वाले समुदाय या व्यक्ति कभी सभ्य नहीं हो सकते’ इस मानसिकता के साथ सभ्य बनाने के लिए शिक्षित करना था। लेकिन यहाँ एक बात सबसे जरूरी हो जाती है कि इस राष्ट्र-राज्य की अवधारणा में जहाँ इस तरह के समुदाय (बेड़िया समुदाय) जो शादी ब्याह जैसे संस्कारों और सभ्य समाज के बनाए मूल्यों से अलग थे, जो किसी भी पुरुष से अपने स्वच्छंद संबंध बना सकता था, जब राज्य उसे वेश्या का संबोधन दे रहा है तब उसने कभी इस बात पर गौर नहीं किया कि इनके लिए आखिर ग्राहक कहाँ से आ रहें हैं? जो राज्य इन्हें वेश्या का संबोधन दे रहा है दरअसल वही राज्य ही इन्हें ग्राहक भी उपलब्ध कराने का कार्य करता है। अभी तक जिन भी संस्थाओं ने इनके लिए काम करने शुरू किए, वे सभी इन्हें सभ्य समाज की धारा में लाना चाहते हैं। आखिर एक ऐसा समुदाय जो अपने आप को अलग रखकर स्वच्छंद रहता है, किसी से भी अपने संबंध स्थापित करता है और अपने किसी भी निजी मामले में बंधन नहीं रखता, तो उन्हें बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ी? लेकिन जिन भी संस्थाओं ने इनके उत्थान के लिए काम शुरू किये, वे भी इन्हें राज्य की नजर से ही देखते रहे।

जब हम इन्हें सभ्य बनाने की बात करते हैं तो हम उन्हें खुद संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में ला रहे हैं। लेकिन कार्य के आधार से समुदाय की पहचान को देखें तो राज्य उन्हें निम्न श्रेणी में ही श्रेणीबद्ध करता है। तो जाहिर सी बात है एक जाति से उठकर यदि वह दूसरी नीची जाति में प्रवेश करते है तो इनके लिए संकट और बढ़ जाते हैं।
राज्य की भूमिका पर गौर किया जाए तो राज्य जहाँ एक तरफ वेश्यावृत्ति को खत्म करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ उन्हीं जगहों को पहचान कर जहाँ वेश्यावृत्ति होती है, वहाँ एड्स जैसे प्रोग्राम चला कर, घर-घर में condom बाँट रहा है, यानि राज्य उन्हें संरक्षण देता हुआ प्रतीत होता है। दूसरी तरफ समुदाय के साथ व्यवहार का रवैया मुख्य धारा की मूल्य व्यवस्था (value system) से मिलता हुआ दिखयी देता है। The Hindu[1] में छपी एक रिपोर्ट को यदि देखा जाए तो राम सनेही जो एक समाज कार्यकर्ता हैं, वह इसे अनैतिक बताते हैं और बेड़िया समुदाय की परंपराओं को खत्म करने के लिए सरकार पर दबाव बना रहे हैं। जब कि सरकार की तमाम एजेंसियां इन्हें संरक्षण दे रही हैं। मुख्य धारा की मूल्य व्यवस्था के आग्रह वाले राम सनेही अकेले नहीं हैं, बल्कि अन्य कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थायें भी इसमें संलग्न हैं। कुल मिला कर बेड़िया समुदाय की यौनिकता समाज और राष्ट्र-राज्य के विरोधाभासी दबाव का शिकार बनती है। जहाँ एक तरफ राष्ट्र-राज्य समुदाय की यौनिकता को अपनी यौनिक अर्थव्यवस्था के तहत बचाए भी रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ मुख्य धारा के समाज के नैतिक और सांस्कृतिक आग्रहों को ख़ारिज भी नहीं करना चाहता। ये संस्थायें अपने सामुदायिक कार्यों में बेड़िया समुदाय के साथ सांस्कृतिक राजनीति की एजेंट दिखाई देती हैं।

समुदाय यौनिकता के संस्कृतिकरण की प्रक्रिया खास संदर्भों में घटित होती है, जहाँ सामुदायिक/संस्कृति विशेष ज्ञान को अपनी व्यवस्था में शामिल करने से पहले उसका रूपांतरण व प्रसंस्करण होना अनिवार्य हो जाता है। बेड़िया समुदाय के चलायमान होने की जीवनशैली से उपजी संस्कृति उनकी सांस्कृतिक विशेषताओं में परिलक्षित होगी। इस आधार पर सेक्सुअलिटी व उनके स्त्री-पुरुष संबंधों, उनके औपचारिक-अनौपचारिक व्यवहारों, यहां तक कि जीवन और नृत्य-गीतों की अल्हड़ता का अध्ययन और व्याख्या अपनी सम्पूर्णता में गैर विषयीकृत (Non Subjectifed) होकर ही संभव है।
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नरेश गौतम
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा
nareshgautam0071@gmail.com
8007840158


Thursday, May 12, 2016

अब की बार तीसरी फसल शहर में...


राजनैतिक मसीहा के निर्वाण के बाद कुछ पढ़े लिखे लोगों ने शहर में पाँव पसारने शुरू किए हैं. विभिन्न संगठन, मंडल, मित्र मंडल आदि का निर्माण, जमीन की खरीद-फरोक्त आदि काम ये लोग करने लगें हैं. शहर एजुकेशन हब हैं इसलिए यहाँ बहुत सारे शैक्षिक संस्थान है साथ ही प्रायवेट कोचिंग क्लासेस भी भरे पड़े हैं. व्यापारी सदा से यह चाहते हैं कि शान्ति बनी रहें ताकि ग्राहक माल खरीद सकें, इन सब को सेक्युरिटी के लिए इन संगठनों की आवश्यकता होती हैं. इस आवश्यकता की पूर्ती इन सफेदपोश लोगों द्वरा समय-समय पर होती रहती हैं. शहर का ज्यादातर हिस्सा बाहरी लोगों का होने के कारण स्थानीय लोगों की दबंगई जरुर दिखती है लेकिन वह भी शहर के शान्ति के नाम पर सहनीय है. शायद यही राज है शहर के शान्ति का? ऐसे शांतिप्रिय शहर में अचानक धारा 144 कैसे लागू हुयी. सवाल यह है कि क्या वाकई शहर पहले से शांत था? या ये व्यापारियों द्वारा तैयार शान्ति थी? ऐसा क्या हुआ है जो पानी को लेकर इस शहर में धारा 144 लगाईं गई? बहुत से लोगों के मन में यह सवाल हैं कि ऐसा क्यों?

लातूर शहर धनी व्यापारियों का शहर हैं जिसका भार यहाँ के प्रत्येक सामान्य व्यक्ति पर है. एक ओर से हैदराबाद की नजदीकी व्यापारियों को कम कींमत में माल उपलब्ध कराता है वहीँ दूसरी ओर उस माल के लिए यहाँ साक्षर और ग्रामीण ग्राहक तैयार है. शायद ही शहर का ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो मुंबई, पुणे में अपनी किस्मत आजमाने न गया हो. काम-काज ढूंढने न सही शिक्षा के लिए तो जरुर ही वे लोग इन बड़े शहरों में चले गए होंगे. लेकिन यह भी सही है कि अगल-बगल के परभणी, उस्मानाबाद, बीड के ग्रामीण लोग रोजगार के लिए पिछले सत्ता परिवर्तन के पहले तक आते रहें थे. लेकिन आज-कल उनका आना भी केवल ‘आना’ है. कई सारे मामले में लातूर इन बाकी तीन जिलों से बेहतर माना गया जिसमें शिक्षा अहम् थी, रोज बढ़ने वाला शहर मकान बनाने के लिए मजदूरों की मांग रखता था इसलिए मुंह मांगी मजदूरी मिल जाया करी थी इसलिए भी बाकी जिलों के लोगों को यह शहर आकर्षित करता रहा. व्यापारी घरानों की परंपरा ने यहाँ उद्योग के लिए नई आशा निर्माण कि जिसके चलते मजदूरों की मांग भी बढ़ गयी हालांकि यह उद्योग केवल रोजमर्रा के उपयोगी उत्पादन बनाने तक सिमित हैं.

शहर के रामभाऊ बताते हैं कि हम कभी किताबों में पढ़ा करते थे कि एशिया का सबसे बढ़ा शक्कर कारखाना लातूर में हैं तो हमारी छाती फुल जाती थी किन्तु बाद के सालों में पता चला कि उसको नीलाम किया जा रहा है. जब कोई मुझसे पूछता है कि आप के शहर में क्या है तो मैं कुछ नहीं बता सकता हालांकि यह सवाल इससे पहले कोई ज्यादातर नहीं पूछता था और अगर कोई पूछता तो जवाब में कोई न कोई कह देता कि विलासराव देशमुख का शहर, या किलारी भूकंप ये दो चीजे थी जो शहर को वैश्विकता के साथ जोड़ने में मदद करती थी. पहले वाले जवाब में सामने वाले के विचारों से जलन का आभास कर लिया जाता जिससे हम शहरवाले गर्व महसूस कर लेते और दुसरे से करुणा झलकती थी इसे भी हम हमारी प्रसिद्धि के साथ जोड़कर देखते न की कमजोरी. परंतु आज-कल पानी की कमी ने हमें हमारी औकात दिखाई. हमारा ‘लै भारी’ का भारीपन हमें बोझ लगने लगा है. इस सूखे ने हमें हमारी क्षमताओं को जानने का मौका दिया है. हालांकि शहर का बुद्धिजीवी वर्ग अब भी इस समस्या की और आकर्षित नहीं हो पाया है. इसका यह भी कारण है कि लातूर के साक्षर लोग तुरंत ही किसी समस्या को अपने उपर हावी नहीं हो देते. हमारा कोपिंग मेकनिज्म गजब का है. ये तो सरकारी महकमें की करतूत है कि उसने १४४ लगाकर हमारी खामियों को उजागर कर रखा है. वरना इससे पहले भी हमने बड़े-बड़े सुखों को मुहतोड़ जवाब दिया है.
पिछले साल पानी की कमी ने हमारे खेतों का बूरा हाल किया तब भी हम नहीं डरें, पिछले महीने एक्कड़ भर खेत से 8000 खर्च कर आधी बोरी सोयाबीन जो इस मौसम की पूरी फसल का हिस्सा था उसे घर ले जाते समय मैं ज़रा भी आशंकित नहीं था कि इतने पैसे के बदले केवल इतना धान. क्योंकि हम खेती तो केवल बचाने के लिए करते है ताकि हमें भी लगे की हम भी किसान है. लातूर शहर का किसान होने में भी अजीब सा गर्व महसूस होता है. करोड़ों की किंमत पर बेचीं जाने वाली जमीन में हम हजार-बारासों का उत्पादन लेकर हम केवल यह जताना चाहते हैं कि हमने अभी अपनी जमीन बेची नहीं हैं. ऐसे में पानी गिरने न गिरने से हमारा कुछ नहीं होने वाला. इससे ज्यादा फिक्र वाली बात यह है कि पडोसी की जमीन को मैं अपना कैसे बनाऊं. शहर के अगल बगल का शायद ही ऐसा कोई गाँव होगा जिसकी जान पहचान कोर्ट में न हो. इन लोगों ने वकीलों और न्यायधीशों के घर पैसे से भरे हैं. वो समय अब दूर नहीं जब यहाँ का कोई किसान नौसिखिए वकील को सलाह दे रहा होगा. मृदा परिक्षण जैसे आम काम यहाँ के किसान तब तक नहीं करवाते जब तक कि इसके लिए कोई फंड न मिले. हम केवल उस जमीन के मालिक होने का फर्ज अदा करते है साथ ही यह ध्यान रखते हैं कि कोई हमारे इस फर्ज के आड़े न आए. चार साल पहले की बात है शहर के नजदीक का एक गाँव शहर में समाविष्ट होने जा रहा था. पूरे गाँव में केवल इसी की चर्चा थी लोगों ने अपने पैसे खर्च कर मुंबई में जाकर मंत्रियों से बातचीत कर मसला हल करवाया तब जाकर वो जमीन बची है. लेकिन यह जमीन बचाने का असल कारण उस जमीन की कींमत ही थी. जो आसमान छु रही है. आज तक मुझे नहीं पता चला कि ख़बरों में वो बूढा किसान उभाड खाबड़ जमीन पर बैठ कर माथे से हाथ लगाकर आसमान की और देख रहा है वह कहाँ हैं. यहाँ का किसान तो रॉयल एनफील्ड पर घूम रहा है. विट बनाने का कारखाना लगा रहा है. एक नहीं दो बीवियां बना रहा है. वो दबंग हैं और चौक-चौराहे पर बैठकर निम्नवर्गियों का मज़ाक उड़ा रहा है. उसके बच्चे भी उसी के क़दमों पर चल रहे है. मध्यकाल के जमींदारों से कम प्रस्थिति इन दो-चार एक्कड़ वालों की नहीं हैं.


ऐसा ही एक उदाहरण है रशीद चाचा. रशीद चाचा की शहर से नजदीक ही खुली जमीन है. इस बार सूखे का प्रभाव बढ़ने वाला है इस बात की फ़िक्र यहाँ के व्यपारियों को ज्यादा थी इसलिए उन्होंने रशीद चाचा को पहले ही पैसे दे रखे हैं बोरिंग के लिए जिससे लगने वाला पानी वह उन्हें उसी दाम पर देगा जो पहले से तय होगा. ऐसे में उसने अपने खेत में तीन बोरिंग करवाई लगभग 700 फिट के आसपास चार इंच पानी लगा दो बोर को बाकी एक को एक इंच पानी लगा. अब तो उनकी निकल पड़ी आज-कल वो रोज पंद्रह-बीस हजार का पानी बेच रहें हैं. बताइये इतना पैसा कमाने के लिए एक किसान को कितने दिन लग जाएंगे. कौन करेगा किसानी अब रशीद चाचा तो चाहेंगे की हर साल ऐसा ही सुखा पड़े तब तो वह पैसा कमा पाएंगे. दो फसलों में तो उनको कुछ न मिला लेकिन इस सूखे में उनकी ‘तीसरी फसल’ कामयाब रहीं. 

यह केवल किसानों का ही नहीं शहर में जिस किसी के बोअर को पानी है वे लोग इस तीसरी फसल को ले रहें हैं. लागत बहुत कम है और मुनाफ़ा तगड़ा मिल रहा है. जैसे बोअर लगातार दो ड्रम पानी निकालता है तो ग्राहक के आने की राह देखने नहीं हैं. एक हजार लीटर का एक टैंक लगवाना है उसको एक प्लंबर से टोटी फिट कर दे बस. अब दिन भर दो-दो घंटे में बोर चलाकर पानी टंकी में ऐसे जमा करते है जैसे पैसे. माँ-बाप कही बाहर चले जाए तो बच्चों को बार-बार फोन करके याद दिलाते हैं कि दो घंटे हो गए है चालु करो. नौकरीपेशा आदमी भी इस उपरी कमाई के लिए घर में अपना योगदान छुट्टी लेकर दे रहा हैं. तो बच्चे अपनी कोचिंग को त्यागकर माता-पिता के सामने अपना गौरव प्राप्त करने में लगे हैं. अनपढ़ साँस की साक्षर बहुएं अपना इक्का जमाने में लगी हैं. पता चलता है इनके लिए भी सुखा किसी सुख से कम नहीं है
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पिछले बार के इलेक्शन में हारे हुए प्रत्याशी बड़े जोरों से सत्ता आजमाइश में लगें हैं. वो इस मौके को गवाना नहीं चाहते है इसलिए किसी भी हालत में वह अपने प्रभाग में पानी पहुंचाकर ही दम लेंगे. इसके लिए कुछ बड़े आसामियों ने अपने निजी कुओं से पानी निकालकर प्रभागों में बांटने का काम शुरू किया है. जिसके पीछे यही लालसा है कि अगली बार लोग याद रखें? पानी लेने वाले लोग भी खूब आशीर्वाद दे-देकर पानी ले रहें हैं. फिर प्रत्याशी इस काम को समाचार पत्रों में भेजने के लिए तैयार हैं. 850 रूपए के टैंकर में 25-30 परिवार खुश इधर प्रत्याशी का सोशल नेटवर्किंग भी मजबूत. अब इन प्रत्याशियों की बात तो समझ में आती है किन्तु जो पहले से सत्ता में है वो भी पीछे नहीं हैं. महानगरनिगम ने प्रत्येक प्रभाग में एक टैंकर नियुक्त किया है जिसमें प्रत्येक घर में आठ दिन में एक पानी दिया जाना तय है. शुरुआत में इतनी भीड़ उमड़ने लगी जिसके चलते ज्यादातर पानी निचे बहने लगा. इस समस्या का समाधान पार्षदों ने अपने हिसाब से किया टैंकर घर-घर जाएगा और आधा ड्रम पानी देगा. पानी का बंटवारा खुद पार्षद करेगा. पार्षदों ने अपने हिसाब से पानी के बंटवारे के नियम बनाए है जिसमें यह है कि आपके पास आधार-कार्ड और वोटर आय डी होनी चाहिए. अर्थात आपके पास ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे आपको इसी वार्ड का वोटर माना जाए. कुछ सनकी बुढो ने उनको इसी बिच याद भी दिलाया कि वोट माँगते समय ये ताम-झाम नहीं करते हो बस गिडगिडाते हो और अब हमें ही पुछ रहें हो कि पहचान दिखाओ. तब पार्षद का चेहरा देखने लायक हो जाता है. फिर भी वह सत्ता को फिर से पाने के चक्कर मे इस बार भी वोट की फसल काटना चाहता है इसलिए मनमानी कर कुछ अवैध लोगों को पानी दिलाता ही है. पानी वितरण का एक नियम यह भी है कि जिसके घर में किराएदार हैं वह अपने मालिक के हिस्से से पानी ले उनके लिए अलग से पानी नहीं देंगे. इस तरह कैचिं लगाकर वह भी पानी को बचाने की कोशिश कर रहा है. वाह रे पानी वितरण ये तो पीडीएस से आगे निकल गए. वहां तो केवल राशन कार्ड दिखाना पड़ता है यहाँ तो रोज नित-नए नियमों पर पानी मिल रहा है.


 तो यह हाल है लातूर के सूखे का लेकिन इस सूखे का असर लातूर के मध्यवर्ग पर नहीं दिखता. सब के पास खुद के बोअर हैं और जिनके बोअर बंद है वे अक्सर यह कहते हैं कि हम तो पिछले महीने से ही टैंकर से पानी मंगवा रहे हैं. यह कहते हुए उनके गर्व को महसूस किया जा सकता हैं. तो सवाल यह है कि यह सुखा किसके लिए है व्यापारियों के लिए, किसानों के लिए,मजदूरों के लिए नौकरीपेशा के लिए किसके लिए. इन सब वर्गों के बावजूद गरीब किसान, खेतिहर, मजदुर छोटे-मोटे व्यवसायी, ठेले वाले आदि इन पर इस सूखे का कम इस तीसरी फसल का असर जरुर दिख रहा है.
पानी न मिलने के कारण कुछ लोग जो बाहर से थे उन्होंने मकान खाली कर दिए. महनगरनिगम ने केवल 144 लगाकर लोगों को पानी के स्त्रोतों से दूर रखा है किन्तु उन स्त्रोतों में पानी ही नहीं हैं तो लोग वहां क्यों जाएंगे. बोअर-अधिग्रहण जैसा फैसला काफी पहले लेना चाहिए था जो अब तक नहीं लिया गया. उलट आरटीओ ऑफिस वाले निजी पानी-वाहक वाहनों को लायसंस बाँट रहे हैं. और पानी के निजी ठेकेदारों को यह हिदायत दे रहें हैं कि जिसके पास लायसंस हैं उन्ही को पानी देना. इस पुरे मामले में सरकार भी खूब मजा ले रही है. एक तरफ १४४ धारा लगने के बाद देश के सारे समाचार पत्रों में इस बात को प्रचारित किया गया कि लातूर सूखे की चपेट में हैं. दूसरी ओर उनके पास इस समस्या से निबटने के प्लान क्या है? यह सवाल जब उठाया गया तो जवाब- डेढ़ लाख लोग मायग्रेट हो जाएंगे. स्कूल और कोचिंग क्लासेस समय से पहले ही खत्म कर दिए जाएंगे. यह किसी शहर का प्लान कैसे हो सकता है जिसमें हो जाएंगे, कर दिए जाएंगे जैसे शब्द हो. यह तो भविष्यकालीन योजना है लेकिन असल में जो हो रहा है उस पर कारवाई के लिए इनके पास कोई प्लान नहीं है. जिस डेढ़ लाख लोगों की बात हो रही हैं वो तो बाहरी ही है वो तो मायग्रेट होंगे ही लेकिन जो स्थानीय आम जनता है जिनको रोज 2 रूपये प्रति घड़ा से पानी खरीदना पड रहा है उनके लिए इनके पास कोई प्लान नहीं हैं. कुछ ख़ास किस्म के व्यापारी-बुद्धिजीवीयों ने एलान किया कि शहर में १० रूपए में 20 लीटर शुद्ध पानी दिलाया जाएगा इसके लिए एटीएम नुमा मशीन लगवाई जाएगी जिसमें पैसे डालने के बाद पानी आएगा. ऐसे नवाचारों पर हँसे या रोये. पानी खरीद रहें हैं इसलिए रोये या पानी मिल रहा है इसपर हँसे. कुछ समझ नहीं पाएंगे. हालांकि यह भी तीसरी फसल निकालने का एक ख़ास तरिका है जो हर बार पूंजीपतियों द्वारा अख्तियार किया जाता है.



पिछले दो साल से लगातार शहर में मिनरल वाटर की कंपनियों की तादाद बढ़ी है. इस क्षेत्र की सबसे पुरानी कंपनी आज कल समाचारपत्रों में प्रचार कर रही है कि लातूर शहर के वासियों के लिए शुद्ध पानी केवल 40 रूपए में 20 लीटर, शुद्ध के साथ ठंडा चाहिए तो 60 रुपये में 20 लीटर. यह कींमत देश के किसी भी इलाके से ज्यादा ही होगी. शायद राजस्थान से भी. लेकिन शहर के लोग इसके आदि हो गए हैं यह बीस लीटर का जार पिछले साल ३० रुपये में था अब चालीस हो गया है. और शायद इसकी किंमत लगातार बढती ही जाएगी. जब पता है कि शहर सुखा ग्रस्त है, जिसे गैजेटियर में भी सुवर्णाक्षरों से लिखा गया हैं. तब भी सरकार पानी के बर्बादी का लायसंस कैसे बेच रही है. यह समझ से बाहर है.




शहर का प्राकृतिक रूप देखे तो भूगर्भशास्त्रियों का मानना है कि आज जो पानी शहर के लोग बोअर से निकाल रहे हैं वो पांच-दस हजार साल पहले का है. इसका मतलब है कि शहर में जल संरक्षण शुन्य के बराबर हैं. जंगल के नाम पर वैसे भी शहर का नाम दुनिया के किसी भी मरुस्थल के बराबर हो गया है. इस बार तो पानी मिलेगा 700-1000 फिट के निचे का किन्तु अगले साल कहाँ से मिलेगा पानी. इसके बारे में कोई सोचना नहीं चाहता है. बस मिल रहा है तब तक ठीक है. लेकिन इस बार सूखे ने सोचने का आखरी मौका दिया है, इस बार भी नहीं सोंचेगे तो ये मंजर मौत बनकर अगली बार दिखेगा जब कोई कानून भी इससे बचा नहीं पाएगा. जितने सुराख लातूर के जमीन पर बोअर के नाम पर पड़े है उनमें से कुछ में से पानी के अलावा कुछ और (पिछले महीने लोकमत में खबर थी कि एक बोअर से सोने जैसा पदार्थ निकल रहा है लेकिन वो सोना नहीं था अब तक पता नहीं चला है कि वह क्या हैं) ही निकल रहा है. तब भी लोगों की आँखे नहीं खुल रहीं है. 

सुनो शहरवालों अब वो दिन लद गए जब आपके पास एक मसीहा था, किसी दुसरे की बाँट जोहने से अच्छा होगा कि आप खुद ही इस काम में आगे आएं वरना वो दिन दूर नहीं जब आप आने वाली पीढ़ियों को एक मरुस्थल भेंट देंगे.
फोटो आभार: गूगल इमेज  



निलामे गजानन सूर्यकांत
निलामे गजानन सूर्यकांत 
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र,
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा।  
gajanannilame@gmail.com

Saturday, April 9, 2016

फोटो कोलाज उन मेहनत कश इंसानों का जो हमारे लिए आरामगाह बनाते हैं.

फोटो कोलाज उन मेहनत कश इंसानों का जो हमारे लिए आरामगाह बनाते हैं. और खुद टीन के डब्बों में रहते हैं. वर्धा में इस समय तामपान 50डिग्री से अधिक हो जाता है. जब लोग घरों से निकलने के बारे में भी नहीं सोचते, उस वक्त यह लोग हमारे लिए काम कर रहे होते हैं. और मजदूरी के नाम पर सिर्फ दो वक्त की रोटी ही मिलपाती है.    





















Photo:- नरेश गौतम
महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 
nareshgautam0071@gmail.com 






















Thursday, March 24, 2016

इतिहास, राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता

प्रो. रोमिला थापर
[प्रो. रोमिला थापर द्वारा जेएनयू में 6 मार्च, 2016 को दिये गए व्याख्यान पर आधारित लेख]
प्रो. रोमिला थापर ने अपना व्याख्यान शुरू करते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा कि उन्हें लगता है कि वे और उनके कई अन्य वरिष्ठ सहकर्मी “जेएनयू के डायनासोर” हैं। गौरतलब है कि प्रो. रोमिला थापर उन लोगों में से हैं, जो जेएनयू के विकास की प्रक्रिया के न सिर्फ साक्षी रहे हैं, बल्कि जिन्होंने इस विवि के आरंभिक क्षणों से लेकर (प्रो. थापर नवंबर 1970 में जेएनयू से जुड़ीं), इसके विकसित होने की प्रक्रिया में अतुलनीय योगदान दिया है। उन्होंने बताया कि जेएनयू के आरंभिक दिनों में, उन लोगों का उद्देश्य जेएनयू को एक ऐसे विवि के रूप में परिणत करना था, जहां बेहतर अकादमिक गुणवत्ता के साथ-साथ खुली चर्चा और विमर्श का माहौल उपलब्ध हो।
विषय पर आते हुए प्रो. थापर ने कहा कि वे इतिहास और राष्ट्रवाद के संबंधों की चर्चा करेंगी और इसके जरिये वे उस प्रक्रिया की गहराई में भी जाएंगी, जिसके अंतर्गत हम अपने समाज को समझते हैं और उसमें अपनी अस्मिता को खोजते हैं। राष्ट्रवाद का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार एरिक हाब्सबौम को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि “राष्ट्रवाद को इतिहास की तलब उतनी ही होती है, जितनी कि एक अफीमची को अफीम की” ("history is to nationalism what poppy is to an opium addict."). इस कथन की व्याख्या करते हुए प्रो. थापर ने कहा कि इतिहास राष्ट्रवाद के लिए न सिर्फ एक स्रोत होता है, बल्कि यह राष्ट्र की अस्मिता का भी निर्माण करता है।
रोमिला थापर ने कहा कि राष्ट्रवाद आधुनिक काल में ऐतिहासिक बदलावों के फलस्वरूप उपजा है, और यह आधुनिक काल से पूर्व मौजूद नहीं था। 17वीं सदी के यूरोप का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यूरोपीय देशों में पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के विस्तार, मध्यम वर्ग के उदय ने ‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा की उत्पत्ति में योगदान दिया। इसके अंतर्गत एक सेकुलर अस्मिता की भी बात की गई, जो समावेशी होने के साथ-साथ एकता को भी सुनिश्चित करती। यह समावेशी अस्मिता सामाजिक जागरूकता से उपजी थी। और इस पूरी प्रक्रिया में, “साझा इतिहास” का महत्त्व बढ़ गया क्योंकि यह लोगों को एक सूत्र में बांधता था। प्रो. थापर ने यह बात ज़ोर देकर कही कि राष्ट्र कभी एकल अस्मिता के बल पर नहीं खड़ा हो सकता, उसे समावेशी होना ही पड़ेगा।
राष्ट्रवाद की अवधारणा में आखिरकार अतीत के कुछ हिस्सों को “स्वर्ण काल” (गोल्डेन एज़) के रूप में देखने की घातक प्रवृत्ति शामिल हो गई। यह तथाकथित “स्वर्ण काल” अतीत के समाजों के भ्रामक इतिहास पर आधारित था, जबकि हम वर्तमान में जी रहे हैं। प्रो. थापर ने अपवर्जी राष्ट्रवाद (एक्सक्लूसिव नेशनलिज़्म) के रूप में, जर्मनी में 20वीं सदी के तीसरे दशक में उपजे ‘राष्ट्रवाद’ का उदाहरण दिया और समावेशी राष्ट्रवाद (इनक्लूसिव नेशनलिज़्म) के रूप में अफ़्रीकी राष्ट्रवाद का उदाहरण दिया। और यह जोड़ा कि दुनिया भर को अफ़्रीकी राष्ट्रवाद के समावेशी चरित्र को अपनाना चाहिए।
भारत में राष्ट्रवाद के उदय पर टिप्पणी करते हुए प्रो. रोमिला थापर ने कहा कि भारत में राष्ट्रवाद उपनिवेशवादविरोधी आंदोलन के दौरान पनपा। प्राक-औपनिवेशिक भारत में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की बहुतेरी अस्मिताएं एक-साथ अस्तित्व में थीं। धर्म के अंतर्गत भी कोई एकाश्मी (मोनोलीथिक) धर्म न होकर अनेक संप्रदाय अस्तित्व में थे। यह विविधता से भरा-पूरा समाज था, जहाँ भिन्न-भिन्न समूह अपने स्तर से संवाद कर रहे थे। पर ब्रिटिश शासन के दौरान जेम्स मिल सरीखे उपनिवेशवादी इतिहासकारों ने इस पूरी विविधता को धर्म तक सीमित कर दिया। जेम्स मिल ने 1818 में लिखी अपनी पुस्तक में काल-विभाजन के लिए शासक वंश के धर्म का इस्तेमाल किया और इस तरह पूरे भारतीय इतिहास को “हिन्दू काल”, “मुस्लिम काल” और “ब्रिटिश काल” में बाँट दिया।
काल-विभाजन की इस अवधारणा के पीछे द्विराष्ट्रवाद का वही सिद्धान्त काम कर रहा था, जिसके अंतर्गत यह माना जाता था कि ‘हिन्दू और मुस्लिम, स्थायी तौर पर एक-दूसरे के विरोधी और शत्रु हैं और उन्हें शांत रखने के लिए किसी बाह्य शक्ति जैसे ब्रिटिश साम्राज्य की जरूरत होगी’। द्विराष्ट्रवाद के इसी सिद्धान्त ने “अल्पसंख्यक” और “बहुसंख्यक” सरीखी श्रेणियाँ गढ़ दीं। इसने एकाश्मी धार्मिक अस्मिता को सुदृढ़ करने का (consolidated monolithic religious identity) काम किया। हेमचन्द्र रायचौधुरी, रमेश चंद्र मजूमदार और नीलकंठ शास्त्री सरीखे राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने एक ओर जहाँ प्राच्य निरंकुशता (Oriental Despotism) के सिद्धान्त को चुनौती दी, वहीं दूसरी ओर इन लोगों ने जेम्स मिल के काल-विभाजन को स्वीकार कर लिया। भले ही अब “हिन्दू”, “मुस्लिम” और “ब्रिटिश” काल की जगह प्राचीन, मध्यकाल और आधुनिक काल ने ले ली थी, पर इतिहास को धर्म के चश्मे से देखने की मूल अवधारणा में कोई बदलाव नहीं आया।
उपनिवेशवादी इतिहासलेखन ने भारतीय इतिहास में “आर्य नस्ल का सिद्धान्त” भी आरोपित कर दिया। प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि ‘आर्य भाषा’ मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची’। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत ही के स्थानीय निवासी थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! बावजूद इसके कि हड़प्पा सभ्यता की भाषा अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है और न ही हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति के स्रोत ज्ञात हो सके हैं।
एक तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, जब अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थियोसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थियोसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे। लोकमान्य तिलक का कहना था कि आर्य आर्कटिक प्रदेश से आए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में आर्यों से जुड़े मुद्दे का इतना अधिक राजनीतिकरण हो चुका है कि जो विद्वान ‘आर्यों के भारत में ही उत्पन्न होने’ की अवधारणा पर सवाल उठाते हैं, उन्हें सोशल मीडिया और इंटरनेट का गुस्सा और अपमान झेलना पड़ता है। ऐसी स्थिति ऐतिहासिक विषयों से जुड़ी परिचर्चा और वाद-विवाद-संवाद की संभावना को घटा देती है।
जहां एक ओर उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवाद सेकुलर, लोकतान्त्रिक और बराबरी के सिद्धान्त पर आधारित समाज और मुख्य अस्मिता के रूप में “भारतीयता” की वकालत करता था। वहीं दूसरी ओर, धार्मिक राष्ट्रवाद एक धर्म, संस्कृति, भाषा आदि के सबसे अलग होने को रेखांकित करता है। यह अक्सर, राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए जान-बूझकर गढ़ा जाता है, जैसा हिंदुत्व के उदाहरण में हमें स्पष्ट दिखता है। ‘हिंदुइज़्म’ और हिंदुत्व दोनों एक ही चीज नहीं हैं। ‘हिंदुइज़्म’ एक धर्म है, जबकि हिंदुत्व एक आधुनिक राजनीतिक विचारधारा। हिंदुत्व एक विचारधारा है जो कुछ बातें तो ज़रूर ‘हिंदुइज़्म’ से लेती है, पर यह ‘हिंदुइज़्म’ से बहुत अलग है।
इतालवी फासीवाद से प्रेरणा प्राप्त करने वाली हिंदुत्व की अवधारणा 20वीं सदी में अस्तित्त्व में आई, और इसका उद्देश्य था - हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए हिंदुओं को राजनीतिक रूप से संगठित करना। धर्म पर आधारित विचारधारा के निर्माण में ज़रूरत पड़ने पर धर्म की आधारभूत बातों को भी फिर से रचा जा सकता है। यह पुनर्रचना अक्सर धर्म के अभिजात्य और पुरातनपंथी अनुयायियों को ध्यान में रखकर की जाती है। जब हम ‘हिन्दू’ होने को परिभाषित करते हैं तो सामान्यतया ऐसा उच्च जाति के लोगों के संदर्भ में ही किया जाता है। क्योंकि इस परिभाषा का आधार वे टेक्स्ट होते हैं, जो इन्हीं जाति-समूहों के हैं। हिंदुत्व एक निश्चित भू-भाग, एकल संस्कृति और नृजातीय उत्पत्ति, एक भाषा और एक धर्म की बात करता है। यह हिंदुओं की साझी ‘पुण्यभूमि, पितृभूमि’ की भी बात करता है और अन्य सभी धर्मावलंबियों को विदेशी बतलाता है। हिंदुत्व अपने धार्मिक पक्ष में, सामी (सेमिटिक) धर्मों की रूपरेखा का ही अनुसरण करता है, मसलन, ‘ऐतिहासिकता’ पर ज़ोर और एकाश्मी (मोनोलिथिक) धर्म, एक पवित्र ग्रंथ, चर्च जैसे धार्मिक संगठन।
चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई या सिख, इस तथ्य की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता कि बहुतेरे धर्मावलंबी ऐसे होते हैं जो अपने धार्मिक ग्रंथों से थोड़ा ही परिचय रखते हैं। उनके लिए धर्म एक अलग ही मसला होता है। असल व्यवहार में, ये लोग अपना खुद का धर्म/पंथ निर्मित कर लेते हैं, अपने चुने हुए तरीके से अपने देवताओं, गुरुओं, पीरों या बाबाओं की पूजा करते हैं, प्रो. रोमिला थापर ने इन धर्मों को मुख्य धर्म से अलग करते हुए इन्हें “गुरू-पीर धर्म” की संज्ञा दी। धर्म के इतिहासकारों को इसका मूल्यांकन करना चाहिए कि आखिर लोगों के धर्म और उनके विश्वास किस हद तक धार्मिक टेक्स्ट पर या व्यवहारों पर निर्भर या उनतक सीमित होते हैं।
भारतीय इतिहास में धर्म की अवधारणा को पारिभाषित करने वाली दो प्रमुख धाराएँ थीं: ब्राह्मणवादी और श्रमण परंपरा। यह द्वैधता ईसा की पहली सहस्राब्दी में भी कायम रही। वैयाकरण पातंजलि ने इनके बीच के संबंधों की तुलना साँप और नेवले से की थी, यानि इन दोनों के संबंध संघर्षमय थे। हम भारत में धर्मों के इतिहास के बारे में समझने की कोशिश करें और जानना चाहें कि कैसे धर्मों ने समाजों को प्रभावित किया तो हमें उन पंथों के बारे में जानना होगा, जो इन धर्मों से उत्पन्न हुए, और साथ ही, इन पंथों के परस्पर जटिल संबंधों का अध्ययन करना होगा, जिसमें अक्सर इन पंथों के विश्वासों और व्यवहार की पूरी फेहरिस्त शामिल होगी। धर्मों और उनसे निकले पंथों/संप्रदायों का अध्ययन करते हुए हमें उनके बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा और आदान-प्रदान को भी समझना होगा। ये पंथ अक्सर किसी-न-किसी जाति से जुड़े होते थे, अतः इस संबंध का भी अध्ययन करना होगा।
अंत में, प्रो रोमिला थापर ने ज़ोर देते हुए कहा कि राष्ट्रवाद को विश्वसनीय इतिहास पर निर्भर होना होगा न कि किसी व्यक्ति या खास विचारधारा के लोगों की अतीत से जुड़ी फंतासियों पर। ज्ञान का विस्तार हो इसके लिए यह जरूरी है कि आलोचनात्मक सवाल उठाए जाएँ, इसलिए विवि परिसर स्वस्थ बहस और वाद-विवाद-संवाद का केंद्र होना चाहिए। राष्ट्र को सभी नागरिकों के समान अधिकारों और उनके बीच बराबरी को सुनिश्चित करना होगा, तभी हम सच्चे अर्थों में अपने देश को सेकुलर लोकतन्त्र बना सकेंगे।

(प्रस्तुति एवं अनुवाद- शुभनीत कौशिक)

मैं हिजड़ा... मैं लक्ष्मी


डिसेंट कुमार साहू
उत्पीड़ित समूहों द्वारा लिखी जाने वाली आत्मकथाओं ने हाल के समय में ब्राम्हणवादी-पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्वकारी मूल्यों को उद्घाटित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इन आत्मकथाओं ने दमन, शोषण तथा वर्चस्व के अमानवीय पहलुओं को सामने रखा। आत्मकथा लेखक के जीवनानुभव होते हैं. जिसके माध्यम से वह अपनी जीवन, सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य तथा महत्वपूर्ण घटनाओं को रेखांकित करते हैं। इसी क्रम में यह आत्मकथा पितृसत्तात्मक दमन का शिकार हिजड़ा समूह के लक्ष्मी का है। जिस समूह को स्वयं के 'मैं' के पहचान में वर्षों लग जातेहैं, इस 'मैं' के प्रकट होने पर समाज बदले में सिर्फ अपमान, घृणा, तिरस्कार तथा कलंकित जीवन प्रदान करता है। उस 'मैं' का प्रकटीकरण हमारे सामने आत्मकथा के रूप में है। इस आत्मकथा के माध्यम से लक्ष्मी, हिजड़ा पहचान के साथ ही एक मानव होने तथा मानवीय क्षमताओं को बिना किसी भेद-भाव के स्वीकार करने का आग्रह करती है। हमारे समाज व्यवस्था में मुख्य रूप से द्विलिंगीय समाज है। जहां सिर्फ स्त्री-पुरुष को ही मान्यता प्राप्त है तथा इनके बीच होने वाले उत्पादक यौन संबंध ही कानूनी रूप से वैध हैं। नारीवादी विमर्श से पहले तक 'शिश्न' आधारित पहचान की बात की जाती थी अर्थात, 'मैं' का केंद्र 'शिश्न' रहा। इसलिए माना जाता रहा हैं कि बालिका 'शिश्न अभाव' के कारण अपने को बालकों की तुलना में हिन मानती है, इस तरह वह पुरुष सत्ता को स्वीकार कर लेती है। हालांकि फ्रायड के इन विचारों का व्यापक रूप से विरोध हुआ।

नवफ्रायडवादियों में कैरेन हर्नी फ्रायड के विचारों की आलोचना करती हैं। उनका कहना है कि प्रत्येक लिंग(सेक्स) के व्यक्ति समान होते हैं, जरूरत उन्हें प्रोत्साहित करने की होती है। स्त्री-पुरुष के अलावा हमारे समाज में तीसरे लिंग के लोगों का भी अस्तित्व है.जिन्हें हिजड़ा, किन्नर तथा स्थानीय भाषाओं में विभिन्न नामों से जाना जाता है। थर्ड जेंडर लोगों का उल्लेख पौराणिक मिथकीय ग्रन्थों से लेकर कामसूत्र तथा बौद्ध साहित्य में भी मिलता है। इसके बाद भी यह समूह समाज से बहिष्कृत होकर अमानवीय परिस्थितियों में जीवन गुजारने के लिए अभिशप्त है। लक्ष्मी की आत्मकथा इस देश में रहने वाले लाखों थर्ड जेंडर की दिन-प्रतिदिन के अनुभवों का प्रतिनिधित्व करती है। अपनी आत्मकथा के माध्यम से थर्ड जेंडर समूह के व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक तथा संस्थानिक जीवनानुभव को साझा करने का प्रयास किया है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी एक समूह ऐसा है जो अपने इंसानी पहचान तथा मूलभूत मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। अप्रैल 2014 में थर्ड जेंडर के रूप में कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी आज तक अधिकतर सरकारी तथा गैर-सरकारी आवेदन पत्रों में दो ही जेंडर का उल्लेख मिलता है। क्या इस व्यवस्था में आज भी इस तरह की भिन्नता रखने वाले लोगों के लिए कोई जगह नहीं है?

हमारे समाज में हिजड़ा समूह को लेकर सच्चाई कम और भ्रांतियाँ ज्यादा फैलाई गई हैं। शारीरिक-मानसिक संरचना से लेकर उनके सामाजिक संरचना के बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है। यह पुस्तक लगभग उन सभी प्रश्नों का उत्तर देते हुए थर्ड जेंडर के लिए इस समाज में मानवीय गरिमा की मांग करता है। नारीवादी विमर्श ने पितृसत्ता का आधार स्त्री की प्रजनन क्षमता पर नियंत्रण को माना। यही कारण है कि समाज में विवाहित स्त्री-पुरुष (स्वजाति, स्वधर्म में) जो प्रजनन कर सकें, ऐसे जोड़े पितृसत्तात्मक व्यवस्था के केंद्र में होते हैं। जबकि इस व्यवस्था को चुनौती देने वाले लोगों को हाशिये पर ढाकेल दिया जाता है। इस दृष्टिकोण से विचार करें तो तीसरे लिंग के व्यक्ति, जेंडर आइडेंटिटी तथा सेक्सुयलिटी दोनों ही स्तर पर पितृसत्ता के सामने चुनौती पेश करती हैं। यह पुस्तक एक खास तरह के नजरिए के साथ पढ़े जाने की मांग करती है. कि अगर थर्ड जेंडर के लोगों को पारिवारिक तथा सामाजिक सहयोग प्राप्त हो तो वे लोग भी स्त्री-पुरुष के साथ कंधा मिलाकर चल सकते हैं।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए जेंडर तथा सेक्स का विभेद भी स्पष्ट होता है। जन्म के बाद जैविक सेक्स के साथ जेंडर भी निर्धारित कर दिया जाता है. लेकिन थर्ड जेंडर बच्चे समाज द्वारा निर्धारित जेंडर को स्वीकार्य नहीं करते हैं। 'उचित व्यवहार' के साँचे में ढालने के लिए समाज में गाली समझे जाने वाले शब्दों (हिजड़ा, छक्का, मामू, गांडु, नामर्द, मऊगा आदि) से चिढ़ाया जाता है, कई बार परिवार के लोगों द्वारा हिंसात्मक व्यवहार भी किया जाता है। थर्ड जेंडर होने वाले बच्चे को अधिकांशतः 13-14वर्ष की उम्र में अपने अलग होने का एहसास हो जाता है। लेकिन उनके लिए यह एक असमंजस की स्थिति होती है। "मैं अन्य लड़के/लड़कियों से अलग हूँ, इसका एहसास होने पर मन में बेचैनी होने लगती है.वह चिंतित होने लगते हैं,उन्हें खुद पर गुस्सा आने लगता है। वह लड़का इस एहसास को दबाकर पुरुषों जैसा बर्ताव करने की कोशिश करता है। लेकिन किशोरावस्था में अपने इस अंतर का एहसास उसे प्रखरता से होता है। उसे लड़कियों-जैसा जीने में खुशी मिलती है और लड़कों-जैसा व्यवहार करने में मुश्किल लगने लगता है।" इसी तरह का अनुभव कोलकाता की थर्ड जेंडर सामाजिक कार्यकर्ता राजर्षि चक्रवर्ती भी लिखती हैं- "चौदह साल की उम्र में मैं हस्तमैथुन करने लगा। मुझे लगा कि कोई बीमारी हो गई है। उसे बंद करने के ख्याल दिमाग में कौंधने लगे। मैं लिंग के ऊपर के बालों को साफ किया करता था। मैं पवित्र बनना चाहता था।" वास्तव में थर्ड जेंडरव्यक्ति बहुसंख्यक समाज (स्त्री-पुरुष की द्विलिंगी समाज) में अपने व्यवहार को घृणित तथा असामान्य मानने लगते हैं तथा इसे समाज में प्रचलित मानकों के अनुरूप ढालने का प्रयत्न भी करते हैं।

लक्ष्मी थर्ड जेंडर होने के साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं. उन्होंने जीवन के वे तमाम पहलूओं कोइस पुस्तक के माध्यम से सामने रखने की कोशिश की है, जो सभ्य कहें जाने वाले समाज में सामाजिक बदनामी के डर से छिपा दिऐजाते हैं । उनकी कोशिश है कि समाज थर्ड जेंडर लोगों को जाने, उनसे बात करें, उनके साथ किसी परग्रही (एलियन) की तरह व्यवहार न किया जाए, इस तरह वह पब्लिक स्पेस में थर्ड जेंडर लोगों की उपस्थिती चाहती हैं। एक थर्ड जेंडर के सामने अपनी पहचान स्थापित करने से पहले खुद भी उस पहचान को स्वीकार करने की चुनौती होती है। इस तरह पहचान का संघर्ष पहले व्यक्तिगत फिर पारिवारिक और बाद में सामाजिक होता है। किसी भी थर्ड जेंडर के लिए अपने जेंडर की पहचान (आइडेंटिटी) निर्धारित करना सबसे बड़ी चुनौती होती है। क्योंकि आस-पास स्वयं (थर्ड जेंडर) जो महसूस कर रहा है. ऐसे लोग दिखायी नहीं देते. ऐसे में खुद को कई बार असामान्य भी मान लिया जाता है। यही कारण है कि जब लक्ष्मी अपने जैसे अन्य लोगों से मिलती है तो उसे बहुत अच्छा लगता है। लक्ष्मी के परिवार वालों ने थोड़ी-बहुत समस्याओं के बाद उसकी पहचान को स्वीकार कर लिया। लक्ष्मी के पापा कहते हैं- "अपने ही बेटे को मैं घर से बाहर क्यों निकालु? मैं बाप हूँ उसका, मुझ पर ज़िम्मेदारी है उसकी। और ऐसा किसी के भी घर में हो सकता है। ऐसे लड़कों को घर से बाहर निकालकर क्या मिलेगा? उनके सामने हम भीख मांगने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं छोड़ते हैं।" अधिकांश थर्ड जेंडर बच्चों के सामने आजीविका का ही प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण होता है। परिवार तथा समाज में किए जा रहे भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण ऐसे बच्चे अपने पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। लक्ष्मी इसे थर्ड जेंडर समूह के पिछड़ेपन का मुख्य कारण मानती हैं। वह कहती हैं कि "मुझे प्रोग्रेसिव हिजड़ा होना है...और सिर्फ मैं ही नहीं अपनी पूरी कम्यूनिटी को मुझे प्रोग्रेसिव बनाना है..."

लक्ष्मी, हिजड़ा पहचान स्वीकार करते हुए, गुरु-चेला परंपरा में रहते के बाद भी उन नियमों तो चुनौती देती है जो उसके सम्पूर्ण विकास में बाधा के रूप में सामने आती हैं। ऐसे कई वाकये हैं जब लक्ष्मी अपने समुदाय के हितों के लिए कदम उठाती है। ऐसी ही एक घटना है जब एचआईवी एड्स की स्थिति को लेकर मीटिंग में शामिल होने के लिए लक्ष्मी को बुलाया जाता है तो उनकी गुरु कहती है-"क्यों जाना चाहिए वहाँ...क्या जरूरत है इतना सामने आने की? हम भले, हमारा समाज भला और अपना काम भला। लेकिन मुझे (लक्ष्मी) ऐसा नहीं लगता था। बाकी समाज में हम जितना घुल-मिल जाएंगे, समाज हमें और भी उतना जानने लगेगा, ऐसा मुझे लगता था।" इस पुस्तक में गुरु-चेला परंपरा का विस्तृत वर्णन पढ़ने को मिलता है। वास्तव में परिवार से निकाले गए थर्ड जेंडर बालक के लिए गुरु-चेला संबंधों का जाल सुरक्षा, अपनेपन तथा आजीविका के दृष्टि से एकमात्र स्थान होता है। हिजड़ा समूह स्वीकार कर लेने के बाद परिवार वालों तथा पिछली ज़िंदगी से संबंध समाप्त करताहै। समूह के नियमानुसार बधाई मांगना या नाचना ही उनकी जीविका का साधन होता है, लेकिन लक्ष्मी अपने परिवार वालो के साथ संबंध रखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करती है। इस तरह उसकी लड़ाई समाज तथा अपने ही समूह के नियमों के विरुद्ध दोनों ही स्तर पर जारी रहती है। थर्ड जेंडर सामाजिक कार्यकर्ता होने के कारण लक्ष्मी की आत्मकथा से तत्कालीन हिजड़ा समाज की स्थिति, उनके प्रति तथाकथित मुख्यधारा के समाज का नजरिया तथा हिजड़ा समुदाय की स्थिति में परिवर्तन के लिए किए जा रहे कार्यों का पता चलता है। ये कार्य व्यक्तिगत तथा पारिवारिक स्तर पर काउन्सलिन्ग, संस्थानिक स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पुलिस प्रशासन के लोगों के साथ बातचीत आदि शामिल है। नीति निर्माण के लिए भी संवैधानिक स्तर पर हस्तक्षेप किया जाना भी आवश्यक है।

बहुत सारे पहलू ऐसे होते हैं जिनसे प्रत्येक थर्ड जेंडर को गुजरना पड़ता है, लक्ष्मी उन पहलुओं को पाठक के सामने रखती है। "पहले पुरुषों के शरीर के अंदर की औरत के मन का दम घुटना... बाद में हिजड़ा होने पर परिवार का सहारा छुटना... करीबी कोई नहीं था... समाज द्वारा किया हुआ क्रूर व्यवहार, उसकी वजह से होने वाली तकलीफ... उत्पादन का साधन नहीं... कोई नौकरी नहीं देता था... पर जीने के लिए पैसा तो चाहिए था... फिर उसके लिए किया गया सेक्स वर्क... मन में हमेशा डर... तनाव... हमेशा उपस्थित होने वाला सवाल... 'मैं कौन हूँ?'... उसके जवाब तो मिलते ही नहीं थे, उल्टा आनेवाले नाना तरह के अनुभवों से मन की उलझनें बढ़ती जाती थी। उससे आने वाला नैराश्य, संभ्रम... ज़िंदगी की कोई कीमत ही नहीं... ना परिवार में, ना समाज में... और फिर खुद की ही नजरों से खुद गिर जाना... साला क्या लाइफ है?" वास्तव में ये विवरण प्रत्येक थर्ड जेंडर व्यक्ति के जीवन की कहानी है, शायद ही कोई ऐसाथर्ड जेंडर हो जो इस तरह के अनुभव से न गुजरा हो।
हिजड़ा समूह तथा उनके जीवन संघर्षों के बारे में बहुत शुरुआती लेखन होने के बाद भी लगभग सभी पक्षों को इसमें शामिल करने की कोशिश की गई है। बिना किसी औपचारिक अध्यायीकरण के यह आत्मकथा पाठकों के सामने 176 पृष्ठों में है। यह आत्मकथा मराठी में लिखी गई आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद है इसलिए वाक्य संरचना के स्तर पर मराठी वाक्य संरचना का प्रभाव दिखायी देता है। आत्मकथा की शुरुआत लक्ष्मी के बचपन से होती है और उम्र के अलग-अलग पड़ाओं को रेखांकित करते हुए आगे बढ़ती है। इसके बावजूद घटनाओं में क्रमबद्धता नहीं है, घटनाओं को सुविधानुसार लिया गया है। इससे पहले भी हिन्दी में कुछ उपन्यास हिजड़ा समुदाय तथा उनकी ज़िंदगी के बारे में लिखेगएहैं लेकिन यह आत्मकथा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वयं उस समूह के व्यक्ति के द्वारा लिखा गया है। जो इस दंभ को झेल रहा है. हिन्दी के पाठकों के लिए बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो नयी होंगी, लेकिन वह इस बात को समझने की कोशिश करेंगे कि हिजड़ा व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक संरचना किस तरह की होती है।

लक्ष्मीनारायण  त्रिपाठी की आत्मकथा हिन्दी में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है .

लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के समाजकार्य विभाग में शोधार्थी हैं . संपर्क : dksahu171@gmail.com