Tuesday, February 3, 2015

सामाजिक न्याय और थर्ड जेण्डर

दिनांक-09/01/2015
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र में संचालित शोध-वार्ता की पहली कड़ी में सामाजिक न्याय और थर्ड जेंडर विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें प्रमुख वक्ता के रूप में रवीना बरिहा और विद्या राजपूत उपस्थित थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. देवराज जी ने की।
इस कार्यक्रम में रवीना बरिहा जी ने कहा कि हम ज्ञान के सीमित दायरे में रहते हैं। आज समाज सिर्फ स्त्री और पुरुष के रूप में बंटा है यहाँ थर्ड जेंडर के अस्तित्व को नहीं माना जाता। आने वाले समय में थर्ड जेंडर समाज के सभी दायरे तोड़ सकते हैं। इतिहास से साक्ष्य देते हुए उन्होंने कहा कि हमारा अस्तित्व तो प्राचीन समय से ही है लेकिन आज भी हमारे लिए इस समाज में कोई जगह नहीं। वात्सायान के कामसूत्र का ग्यारहवां अध्याय ही तृतीय पंथी पर लिखा गया है। जिस उम्र में हमारे लिए घर का दरवाजा खुलना चाहिए उस समय में दरवाजा तो खुलता है लेकिन बाहर के लिए। ऐसा क्यों? जिस उम्र में हमें अपनों का प्यार मिलना चाहिए। उस उम्र में मिलती है दुत्कार।   

दूसरी विशेषज्ञ विद्या राजपूत का कहना है कि हम समाज को क्यों नहीं दिखाई देते? बचपन से हमारे अंदर घाव बनते हैं। हमें इस समाज में शारीरिक, मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। हमारी किसी भी आवश्यकता की पूर्ति इस समाज द्वारा नहीं की जाती है। भिक्षावृत्ति एवं वेश्यावृत्ति के सिवाय हमारे सामने कोई विकल्प नहीं हैं। 2005 में इन्होंने छत्तीसगढ़ में तृतीय पंथियों के कल्याण के लिए मितवा संकल्प समिति स्थापित की। संगठन की विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से तृतीय पंथियों की समस्याओं की वकालत कर रही हैं। उन्होंने आगे कहा कि माँ-बाप बच्चों पर दबाव ना बनाए। उन्हें जो चुनाव करना है उसे चुनाव की आज़ादी होनी चाहिए। हम प्यार की तलाश में होते हैं लेकिन हमें प्यार नहीं मिल पाता बल्कि सभी जगह वह चाहे घर हो या बाहर, दुत्कार ही मिलती है। आर्थिक रूप  से कमजोर होने के कारण हम लोगों को ट्रेनों में या घर-घर जा कर नाच-गाना करना पड़ता है। नाच-गाना करने वाले कोती, किन्नर, सखी, आदि हैं। इनके लिए अलग-अलग संस्थाएं लगातार काम कर रही हैं पर यह लोग हम लोगों से भी अपनी दूरी बनाते हैं।
अध्यक्षीय भाषण में अनुवाद प्रौद्योगिकी विभाग के अध्यक्ष प्रो. देवराज ने कहा कि थर्ड जेण्डर को सुनकर संवेदना नहीं बल्कि मस्तिष्क में आग और नए विचार होने चाहिए। प्राचीन काल से हम उन्हें स्वीकारने में असफल रहे हैं। समाज का कोई भी वर्ग छोटा हो या बड़ा जब तक उसे स्वीकार नहीं करते तब तक हम विकास नहीं कर सकते। केंद्र के निदेशक  प्रो. मनोज कुमार ने आभार में सभी वक्ताओं का धन्यवाद व्यक्त किया और भविष्य में शोध वार्ता के तहत ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ताओं व बौधिक व्यक्तित्वों को इसमें शामिल करने के बारे में विस्तार से बताया। प्रो. मनोज कुमार का कहना था कि हम इस तरह की अनेक गतिविधियों और परिचर्चाओं के द्वारा शोध व शोधार्थीयों को परिसर के संकुचित दायरे से निकाल कर ज़मीनी हकीकत से लगातार रूबरू करना चाहते हैं । यह केंद्र इस तरह के प्रयास जारी रखेगा। कार्यक्रम का संचालन डॉ. शिव सिंह बघेल ने किया। विषय प्रवेश एवं परिचय डिसेंट कुमार साहू ने किया। इस अवसर पर कार्यक्रम को सफल बनाने में शोध वार्ता के छात्र समन्वयक के रूप में नरेंद्र दिवाकर, गजानन निलामे, शिवाजी, नरेश गौतम एवं समस्त विभाग की सराहनीय भूमिका रही। इस कार्यक्रम में समाज कार्य विभाग के साथ ही अन्य विभागों के शिक्षक शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

नरेश गौतम
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र,
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा।  
nareshgautam0071@gmail.com

Monday, February 2, 2015

Restoring Mental Health In India: Pluralistic Therapies and concepts

    
प्रस्तुत पुस्तक ब्रिगिट्टे सेबास्तिया के संपादन में और ऑक्सफोर्ड यूनी. प्रेस द्वारा प्रकाशित है। शीर्षक से ही पता चल जाता है कि इसमें भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न रूपों में मानसिक स्वास्थ्य पर उपचार कर लाभ पहुंचानेवाली थेरेपिज का विश्लेषण है, विभीन्न लेखकों द्वारा किए गए शोध अध्ययनों के अंतर्गत पाए गए विश्लेषण को इस किताब में लेखिका ने संपादित किया है.  तीन भागों में वर्गीकृत इस किताब के पहला भाग रिस्टोरिंग मेंटल हेल्थ विथ कोडिफाइड इन्डियन मेडिसिन्स इस उपशीर्षक के अंतर्गत है। द्वितीय भाग में सांस्कृतिक आधार बताते हुए लोकाचार में निहित थेरेपिज का विश्लेषण दिया है, जिसका उपशीर्षक रेस्टोरिंग मेंटल हैल्थ विथ फ़ोक थेरेपी है। तीसरे भाग में रेस्टोरिंग मेंटल हेल्थ विथ स्यायकियाट्रि पर चर्चा की है.
प्रथम भाग में ओ. शामसुंदरम द्वारा तमिलनाडु में मनोविकार से संबंधित सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं चिकित्सात्मक दृष्टिकोण का विश्लेषण किया गया है. तमिलनाडु में द्रविडीयन संस्कृति के अनुसार मनोविकार पर सिद्धा’ (तमिल में सिट्टा (Citta)) चिकित्सा व्यवस्था प्राचीन काल से चलती आ रही है उसी व्यवस्था का आज के समय में उपयोग की ओर लेखक ने ध्यान खिंचना चाहा है. लेखक का मानना है कि यह व्यवस्था पश्चिमी अवधारणा के अनुसार देखे तो कायिक (Somatotype) जैसा लगती है. सिद्धा व्यवस्था के अनुसार मानवी शरीर को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता रहा है. इस वर्गीकरण के अनुसार व्यक्तित्व- एक सामान्य व्यक्तित्व होता है, दुसरा, Alal Utal (सामान्य से थोड़े होशियार और प्रभावकारी व्यक्तित्व), तीसरे में, Iya Utal (इस वर्ग में आनेवाले लोग खुशनुमा व्यक्तित्व के होते है और शारीरिक रूप से भी बड़े स्वस्थ होते हैं) आते हैं. इन तीनों के साथ ही इन्हें मिलाकर और छ: उपप्रकारों में बांटकर व्यक्तित्व का विश्लेषण किया गया है. लेखक ने इस आलेख में तमिलनाडु के आत्महत्याओं के कारणों की भी खोज करने की कोशिश की हैं. जिसमें वह इतिहास में उसके साक्ष्यों को खोजते हुए राजा चेरा (King Chera) तक पहुँच जाते है. वहां के मंदिरों में भी मनोचिकित्सा जैसी व्यवस्था पायी गयी है, इस ओर ध्यान खींचते है,  लेखक ने गुनासिलम (Gunasilam), तिरुविदाईमारुतुर (Tiruvidaimaruthur) एवं शोलिंगुर (Sholingur) के मंदिरों की मनोचिकित्सा व्यवस्था का विश्लेषण किया है. निष्कर्ष के रूप में लेखक का कहना है कि पश्चिमी मनोचिकित्सा के शब्दावली से साम्य रखनेवाले सभी साक्ष्य तमिल साहित्य और संस्कृति में मिलते हैं, मनोचिकित्सा के लिए उपयोगी थेरेपिज भी आज के पश्चिमी मनोचिकित्सा में पाए जाने वाले कायिक दृष्टिकोण (Somatotype) की तरह ही दीखाई देती हैं. 
प्रथम भाग के द्वितीय आलेख नादिया गिग्युरे (Nadiya Giguere) द्वारा केरल के गवर्मेंट आयुर्वेदिक मेंटल हॉस्पिटल में किया गया एथनोग्राफिक अध्ययन है. लेखिका ने कुछ ख़ास शब्दों पर जोर देते हुए वहां की व्यवस्था और उस व्यवस्था में उपचार प्राप्त करने वाले रोगी दोनों का व्यक्तिक अध्ययन किया है. लेखिका ने डोसा (Dosa), सत्वबलम् (Satvabalam), जेनेस (Genes) और पूजा जैसे शब्दों का नृवंशीय वर्णन किया है. लेख का नाम Dosa, Satvabalam, Genes and Poojaa: A God for Everything; An Ethnographic Study Of Government Ayurvedic mental Hospital है. लेखिका का कहना है कि सरकारी आयुर्वेदिक मेंटल हॉस्पिटल मुलत: चरक संहिता, सुश्रुत संहिता एवं अष्टांगह्रदय जैसे आयुर्वेदिक ग्रंथों पर आधारित उपचार पर मान्यता रखता है, अत: मानसिक रोगियों पर वह इसीका उपयोग करते हैं. यहाँ पर मनोरोग को छ: उन्मादों के रूप में देखा जाता है और उसी के आधार पर उन्माद संबंधी विकारों का वर्गीकरण किया जाता है. जैसे- पित्तउन्माद (पित्त से), कफोन्माद (कफ से), वातोन्माद (वायु से), सन्निकोन्माद (उक्त तीनों के मिश्रण से), अधिजोन्माद (मानसिक धक्का या सदमा) और अंत में विषजोन्माद (जहर या उससे संबंधित चीजों के बनने से)। साथ ही शरीर को देखने का दृष्टिकोण बताते हुए लेखिका हॉस्पिटल में अभ्यासकों (Practissioner)  द्वारा उपयोग में लाए जानेवाले शब्द जैसे- डोसा शब्द का उपयोग करती हैं। डोसा से तात्पर्य यहाँ अलग है, यह शरीर को समझने के लिए किया गया है. उनका मानना है कि  इसी आधार पर वह शरीर के स्वस्थता की जांच करते हैं. इसे आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में थ्री डोसा व्यवस्थाके नाम से भी जाना जाता है. लेखिका ने इस व्यवस्था को जानने की कोशिश की है साथ ही काउन्सलिंग जैसी पश्चिमी अवधारणा की जगह लेता हुआ सत्वबलम (शक्ति को बढ़ाना), को भी व्याख्यायित किया है. लेखिका के अनुसार आयुर्वेदिक मनोचिकित्सा में उपयोग किए जाने वाले सभी उपकरण खुले और लचीले होने के कारण वहां के समाज-सांस्कृतिक परिदृश्य में उसका उचित प्रभाव मनोरोगियों पर पड़ता नजर आता है.  
सी. कुमार बाबू ने The Relevance of Yoga and Mediatation in the Management of Common Mental Disorder में यह दर्शाने की कोशिश की है कि योग किस तरह सामान्य मानसिक विकारों के उपचार में सहायक बन रहा है, साथ ही आज के समय में योग थेरेपी पर पश्चिमी मनोचिकित्सा जगत में किस तरह की चर्चा हो रही है, इस ओर भी ध्यान खींचना चाहा है. इसके लिए उन्होंने मनोचिकित्सा के जर्नलों में छपे आलेखों का आधार लिया है. महत्वपूर्ण बात यह है कि योगा को एक थेरेपी के रूप में प्रयोग करने वाले किस तरह उसे मनोचिकित्सा का एक बेहतर उपकरण बता रहे हैं इस ओर लेखक ने  ध्यान खींचना चाहा है. लिखते हैं...
2004  में एस. बी. एस. खालसा ने संदर्भ जालीय विश्लेषण  (Bibiometric Analysis) का आधार लिया जिसमें Indian Journal of Physiology एवं Pharmacology महत्वपूर्ण थे. 2004 तक १८१ प्रकाशित जर्नलों में से ८१ जर्नल  लगभग 50 अलग-अलग राष्ट्रों से प्रकाशित हो चुके थे; भारतीय जर्नलों में 96 में से 27, U.S. जर्नल में ४३ में से 24, ब्रिटिश जर्नल में २१ में से ११ और अन्य 12 राष्ट्रों से छपने वाले २१ में से १९ जर्नल योगा पर आधारित थे, साथ ही ३४ प्रकाशन ऐसे थे जो केवल योगा विशेषज्ञता वाले जर्नल को प्रकाशित करते थे. यह सब दबावजन्य रोग एवं चिंता से संबंधित बीमारियों पर किए जाने वाले उपचार के आधार पर दिया गया है.
ग्रोवर (१९९४;१५५) द्वारा किए गए अध्ययन का हवाला देते हुए लेखक लिखते है कि कॉम्प्रेहेंसिव योगा थेरेपीका समान्य मानसिक रोगों पर किए गए उपचारों के परिणाम काफी महत्त्वपूर्ण है, लगभग 50 प्रतिशत या उससे अधिक मात्रा में इस थेरेपी ने ऐसे रोगों के लक्षणों को नष्ट कर दिया है. ७३.९ प्रतिशत रोगियों की प्रतिक्रयाएं अच्छी रही अन्य थेरेपिज को ४२.५ प्रतिशत प्रतिक्रयाएं  मिली. यह अध्ययन १९८२ में बी.बी. सेठी द्वारा किया गया था.
            १९७९ में बालकृष्णा ने अध्ययन किया जिसका हवाला ग्रोवर देते है. योगा थेरेपी एवं ड्रग थेरेपी का तुलनात्मक अध्ययन  था, इसमें 75 न्युरोटीक रोगियों को शामिल किया गया था. योगा थेरेपी इन मरीजों को दो महीने तक सप्ताह में छः बार दी गयी जिसका प्रत्येक सेशन 45-60 मिनट का होता था. चिकित्सकों द्वारा जांचने के बाद पता चला कि ड्रग थेरेपी योगा थेरेपी से ज्यादा प्रभावशाली रही परन्तु मनोवैज्ञानिक परीक्षणों ने यह दिखाया कि चिंता व सामाजिक समायोजन में ड्रग थेरेपी से ज्यादा अच्छी योगा थेरेपी रही. मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के अनुसार ड्रग थेरेपी के कारण केवल दबाव में महत्त्वपूर्ण कमी आयी लेकिन चिंता और सामाजिक समायोजन में परिणाम न के बराबर रहा. इस अंतर्विरोध में योगा थेरेपी का के कारण चिंता, दबाव स्तर एवं सामाजिक समायोजन में महत्त्वपूर्ण सुधारात्मक परिणाम देखा गया.
            इसी को मद्देनजर रखते हुए WHO मानसिक स्वास्थ्य के घटकों को एक समेकित स्वरूप देकर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के रूप में इससे संबंधित कार्यकर्ताओं की मांग से संबंधित तकनीक की सूचनाएं प्रदान कर रही है. साथ ही जिला स्तर के प्रत्येक मानसिक स्वास्थ्य अस्पतालों में इसे चलाने की कोशिश में हैं इसके लिए रोटरी एवं लायन्स क्लबों से बातचीत जारी है. (Sebastia, 2009, पृ. 91)
            द्वितीय भाग में Restoring mental Health with Folk Therapy पहला आलेख पिलार गलियाना अबाल (Pilar Galiana Abal) द्वारा When God Heals... Can Darsan be a Therapy? द्वारा लिखा गया है,  इस आलेख में लेखक द्वारा पिछले तीन वर्षों से मुंबई के बाबुलनाथ मंदिर में किए गए क्षेत्र अध्ययन के दौरान पाए गए तथ्यों का विश्लेषण है. मंदिर में विभिन्न जाति-धर्मों के आने वाले दर्शनार्थियों के साक्षात्कार एवं अवलोकन के आधार पर हिन्दू धर्म में प्राचीन से चली आ रही दर्शनपरम्परा को एक थेरेपी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है और इसके लिए पुरानों के तथ्य देने की कोशिश की गयी है.
लेखक ने कैथरीन बेल (Cathrine Bell) (१९९७) की Rituals Perspectives and Dimentions का हवाला देते हुए लिखा है दर्शन को आने वाले सभी पुरुष प्रतिभागियों की दर्शन परंपरा को को एक गिफ्ट एक्सचेंज धर्मकृत्य (Rite of Gift Exchange) के रूप में देखा जा सकता है, उनके लिए यह कोई मनस्ताप पूर्ण धार्मिक कृत्य नहीं हैं क्योंकि यह प्राथमिक रूप से प्रतिभागी द्वारा किया गया मानवी भक्ति का लेनदेन’ (Human Divine Transanctions) है जिसमें सीधे गुणगान, प्रार्थना, याचना के सामर्थ्य से एक मांग रखी जाति है साथ ही भक्त अपने भलाई (Well-Being) के लिए अपनी इस भक्तिमय भागीदारी को वापस लेने का सामर्थ्य भी शामिल होता है. (Sebastia, 2009, पृ. 97)  अर्थात दर्शनके पीछे मुख्य उद्देश्य यह होता है कि भक्त उस भगवान् के प्रति प्रेम और भक्ति दिखाएं जिसके बदले दर्शनार्थी यह मानकर चलता है कि भगवान् भी उसे प्रेम सुरक्षा प्रदान करेगा.
लेखक के अनुसार दर्शनार्थियों में कुछ को बीमारियों के विभीन्न दशाओं के अनुभव के साथ पाया गया, जैसे- निद्रारोग, चिंता, दबाव और   व्योमोहाभ लक्षण (Paranoid Syndrome). कुल ३५ दर्शनार्थियों में से ज्यादातर लोगों के साथ साक्षात्कार किया गया जिसमें प्रतिभागियों ने यह दावा किया कि वे दर्शन से मानसिक सहायता प्राप्ति की कोशिश कर रहे थे, जिसके बाद उनके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार भी आया है.
आलेख के पहले हिस्से में लेखक ने दर्शन के धार्मिक कृत्य को ‘Seeing And Touching’के परम्परा के साथ जोड़कर देखा है. साथ ही भारतीय धर्मग्रंथों का आधार लेते हुए इस दर्शनका विश्लेषण किया है. द्वीतीय भाग में लेखक द्वारा बबुलनाथ मंदिर में आनेवाले दर्शनार्थियों के पूरे दर्शन पद्धति का ब्योरा दिया है जिसमें उनके द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कृत्य का मनोविश्लेषनात्मक पद्धति से विवेचन किया है, जैसे- प्रतिभागियों का मंदिर में प्रवेश, शिवलिंग पर चढ़ावे के लिए फूल-पत्ते ले जाना उसे शिवलिंग पर चढ़ाना, शिवलिंग को चूमना, स्पर्श करना, यहाँ तक कि भीड़ के कारण पुरोहित द्वारा दबाव में जल्दी करोकहना उसके बाद भी किसी भक्त का मंदिर में किसी कोने में जाकर वहीँ से शिवलिग के प्रति समर्पित भाव से देखना, इन सभी छोटी-छोटी चीजों का मनोवैज्ञानिक अर्थ निकालकर लेखक ने इसे Ethno-Psychoanalytical  Approach से विश्लेषित किया है.  राजू की केस स्टडी से उन्होंने इस बात को स्थापित करने की कोशिश की है कि दर्शन एक थेरेपी के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है.
तीसरे भाग में Restoring Mental Health With Psychiatry  प्रतिमा मूर्ति एवं संजीव जैन द्वारा बैंगलोर में पागलखानों में दिए जाने वाले उपचार के दृष्टिकोणों का अध्ययन किया है जिसमें एतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देकर ब्रिटिश पूर्व भारत, ब्रिटिशकालीन भारत एवं समकालीन समय में इसकी स्थितियों का विवरण अपने आलेख Dignosis and Treatment Approches at the Asylum in Bangalore  में किया है. 
स्वास्थ्य संबंधी आधुनिक प्रशानिक उपकरणों, हॉस्पिटल का उदय मध्य पूर्व में दिखाई देता है. भारतीय परिदृश्य में देखें तो दक्षिण एशियाई प्रदेशों में हॉस्पिटल्स जैसे प्रबंध दिखाई देते हैं. (वर्मा,१९५३, ‘History of Psychiatry  in India and Pakistan, Indian Journal of Neurology and Psychiatry, Vol-4. P.P.-138-64)
लेखक ने भारतीय द्वीप में शुरुआती समय में प्रचलित व्ययक्तिक रूप से चिकित्सा सेवा में लगे वैद्य एवं हाकिम दोनों का 14 वी सदी तक के साक्ष्य दिए हैं. मोहम्मद तुग़लक एवं उसके बाद फिरुज तुगलक को रेखांकित करते हुए इस बात को बाल दिलाते है कि उस समय में हॉस्पिटल जैसी अवधारणा थी किन्तु वह मुख्यत: सैनिकों, खानाबदोश-घुमक्कड़ एवं परदेशियों के लिए थी. (Sebastia, 2009, पृ. 213) 
लेखक के अनुसार १५००-१७५० यह वह समय था जब भारत में यूरोपीय प्रभाव बढता गया इसका सीधा प्रभाव दक्षिण एशिया पर हुआ, जिससे वहां के लोगों में यूरोपियन मेडिसिनके प्रति जागरूकता बढ़ने लगी. युद्धों की श्रुंखला के बाद 18 वी शताब्दी के आते तक पश्चिमी एवं भारतीय चिकित्सा एकत्रित रूप से कार्यरत होने लगी. १९ वी सदी के मध्य तक इन दोनों चिकित्सा प्रणालियों में उपयुक्त शरीरविज्ञान आधारित ज्ञान ही बुनियाद बन गया. ह्यूमोरल(शरीर द्रवीय) कंसेप्ट टू जस्टिफाई द कॉउजेशन ऑफ़ डिजीज जो पश्चिम से बनी है और भारतीय अवधारणा के अनुसार थ्योरी ऑफ़ एलिमेंट इन दोनों में कोई समानता नहीं दीखाई देती थी फिर भी आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में समानता पर आधारित चर्चा एवं लेन-देन शुरू हुआ था. (Sebastia, 2009, पृ. 214)
तीसरा भाग इसी तरह के अन्य आलेखों से भरा है. मनोचिकित्सा प्राणाली से मानसिक स्वास्थ्य को किस तरह से पुनः प्रस्थापित किया जा सकता है, इस बात पर जोर दिया गया है.
समकालीन समय में यह किताब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारतीय चिकित्सा पद्धतियों का ऐतिहासिक एवं समकालीन विश्लेषण प्राथमिक तथ्यों पर आधारित है. मनोवैज्ञानिक एवं मनोचिकित्सा के अध्ययन कर्ताओं के लिए यह किताब महत्त्वपूर्ण है. किन्तु लेखिका ने समकालीन सामाजिक विमर्श या नव सामाजिक विज्ञान को दरकिनार किया है. इस किताब में भारतीय चिकित्सा विद्याओं को देशज ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करने की बजाय मुख्यधारा के चिकित्सा प्रणाली के साथ साम्य जुटाने पर ज्यादा बल दिया है. तीन हिस्सों में से किसी भी आलेख में कारपोरेट अर्थव्यवस्था के दबाव के कारण भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को मिलने वाला स्थान, इस पर बात नहीं की गई. किताब पूरी तरह से निष्क्रिय अकादमिक संश्लेषण का नतीजा लगती है. हालांकि इस तरह के तथ्य जुटाने में ज्यादा समय खर्च होता है और ऐसे में इन तथ्यों को केवल एकांगी रूप से देखने का नजरिया मानसिक स्वास्थ्य से ज्यादा शरीरक्रिया चिकित्सा प्रणाली का रूप धारण करता है. किताब इतनी सरल लिखी गई है कि सामान्य से सामान्य समझ वाला भी इसे समझ सकता है. मानसिक स्वास्थ्य के शोधार्थियों के लिए ऐतिहासिक तथ्य एवं समकालीन थेरेपिज का स्वरूप देखने के लिए इसे एक बार जरूर पढनी चाहिए.       
-Brigitte Sebastia (edi.), 2009






निलामे गजानन सूर्यकांत 
पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी
महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र,
म॰ गाँ॰ अं॰ हिं॰ विश्वविद्यालय, वर्धा।  
gajanannilame@gmail.com

Sunday, February 1, 2015

दोहरे दमन का संयुक्त अवचेतन : भारतीय दलित


-Nilame Gajanan Suryakant


“...दुनिया ऐसी है जिसमें स्त्रियों से अधिक मर्दों पर, बच्चों से अधिक प्रोढ़ों पर, पारम्पारिक और जंगली से अधिक आधुनिक या प्रगतिशील पर, अऐतिहासिक से अधिक ऐतिहासिक पर, अमानव और लघुमानव से ज्यादा मानव की पूर्ण श्रेष्ठता में विश्वास रखा जाता है.”[1] पृ. १०

 दलितों का दमन कोई नई परिघटना नहीं है, और इसपर पहली बार नहीं लिखा जा रहा है. दलितों के सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, व्यावसायिक आदि प्रकार के दमन का परिणाम उनके अवचेतन को बना रहा है, और इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण कारक जिसकी ओर दलित सिद्धांतकारों की नजर कम ही गई वह है मनोविज्ञान. बुल्हान ए. एच. अपनी किताब Frantz Fanon and Psychology of oppression में लिखते है कि मनोविज्ञान ने समाज को समझने के विपरीत समाजिक दमन में सक्रीय भागीदारी निभाते हुए अपने भरपूर विशेषाधिकारों से शांतिपूर्ण तरीके से लाभ प्राप्त किए हैं. (Bulhan, 1985 , पृ. vii) फ्रान्त्ज़ फानों इस मामले की गुत्थी थोड़ी सुलझाते हैं, और इस लिए उन्होंने कृष्णवर्णीय के पक्ष में मुख्यधारा के मनोविज्ञान को नकारते हुए, उनके लिए अलग मनोविज्ञान एवं फ्रायड के मनोविश्लेषण से अलग मनोविश्लेषण की मांग की. भारतीय दलितों में ऐसी कोई मांग उठती नजर नहीं आती इसका मतलब ही है कि भारतीय दलित चिन्तक या तो मनोविज्ञान की ताकत को नहीं जानते या फिर अब तक इन्हें इससे अलग-थलग रखा गया है. फ्रान्त्ज़ फानों से प्रेरित आशीष नंदी भारतीय सन्दर्भ में उपनिवेश काल को रेखांकित करते हुए उपनिवेशिक मानसिकता का राजनैतिक मनोविज्ञान समझाने की कोशिश द इंटिमेट एनिमी (१९८३) में करते हैं, किन्तु इसमें भी वह केवल अंग्रेजी शासन तक के समय का ही विश्लेषण शामिल कर पाते है. भारतीय दलितों के लिए यह इसलिए बेबुनियादी हो जाता है क्यों कि इसमें उनके पूरे समग्र चेतन एवं अवचेतन की समालोचना नहीं हो पाती.
फानों के अनुसार दुनिया में एक तबका हर समय में अपने आपको बाकी से अलग एवं उच्च दर्शाने के लिए अन्य तबकों को दबाता आ रहा है. इन दमितों में महिला, बच्चे, बूढ़े, अपाहिज, को प्राकृतिक रूप से भेद्यतापूर्ण (Vulnereble) के रूप में रेखांकित किया जाता है, और वर्गीय दमन में मालिक और गुलाम, गौरवर्णीय और कृष्णवर्णीय, सामंत और दास, आदि को देखा जाता है. हालांकि वैश्विक धरातल पर दमन प्रत्येक देश-काल में देखा जाता है, इसमें गुलामी प्रथा भी महत्त्वपूर्ण थी. परन्तु भारत के सन्दर्भ में यह बिलकुल अलग है. क्योंकि भारत में दमन के महामारी की शुरुआत वर्ण व्यवस्था से शुरू होती है और जाति व्यवस्था उसे और भी ज्यादा मजबूत बना देती है. कर्मकांडों की गिरफ्त से गैरदलितों ने दलितों के ऊपर जो अत्याचार किए वह सब आज भी दलितों के अवचेतन में भरे पड़े हैं. इसलिए आज भी जन्म के साथ पूर्वजों से जो ‘सामूहिक स्मृति‘[2] प्राप्त होती है, उससे वह उसे प्राप्त कर लेते हैं. समाजीकरण के साथ-साथ उस दमन में और इजाफा होते रहता है. इसका साफ़ मतलब है कि विश्व में अन्य जगहों पर ज्यादातर ‘एक तरह’ (one fold) का दमन दिखता है, किन्तु भारत में जो दलित है वह ‘दोहरे दमन’ (Two fold) का शिकार है. सही मायने में दलित और दमन में अंतर करना हो तो इसी आधार पर किया जा सकता है कि जो एक बार किसी व्यवस्था से दबाया जाता है वह दमित होता है और जो बार-बार न चाहते हुए भी ऐसी कई सारी व्यवस्थाओं से दमित होता है वह दलित कहलाता है. इस आलेख में इसी दमन की महामारी का विश्लेषण किया जाएगा. दलितों के दमन की सूचि इतनी बड़ी है कि इसे केवल दोहरा दमन कहना भी एक तरह से अन्याय ही होगा. फिर भी अकादमिक तौर पर बात रखने के लिए इसे दो भागों में वर्गीकृत कर समझा जा सकता है. दलितों पर पहला दबाव है मनुष्य बनने का और दुसरे में सभ्यता के साथ चलने का दबाव है. परन्तु लगातार दलितों के मनुष्यत्व को नकारा जाता है और साथ ही सभ्यता के अनुरूप संस्कृति से भी बाहर खदेड़ दिया जाता रहा है, इसलिए दलित गैरदलितों के इस दोहरे दमन का सदा से शिकार रहे है. इसी दमन की संस्कृति और इससे बनने वाले दलितों के संयुक्त अवचेतन पर इस आलेख में चर्चा की जाएगी.

इस आलेख में भारतीय दलितों के दोहरे दमन को समझने के लिए अंग्रेजी शासन पुर्व समय को मनुष्य बने रहने का दबाव के रूप में व्याख्यायित किया गया है. लेखक का मानना है कि अंग्रेजों के आने से पूर्व दलितों का जिस तरह से दमन शुरू था उसमें मुख्यत: सेवक बानाए रखने तक सिमित था. अंग्रजों के आने के बाद व्हाईट कॉलर दबाव ने भारतीय जनमानस को सभ्यता के प्रति सजग किया जिसमें अपना अस्तित्व बनाने की कोशिश सबने की और लगातार करते आ रहें हैं. पहले दबाव से मुक्ति मिली नहीं थी की दुसरे दबाव ने दलितों को और दबा दिया.
मनुष्य बने रहने का दबाव
आर्यों के आगमन से दलितों को लगातार कई सारी व्यवस्थाओं का निर्माण कर मनुष्य बनने से रोका गया है, प्रत्येक बार नयी तिकड़म बिछा कर गैरदलित जनमानस ने इनके मनुष्य होने पर सवाल उठाये हैं. भारतीय साहित्य में इसके कई सारे साक्ष्य मिलते हैं जिसमें दलितों का जानबूझकर अमानवीयकरण किया गया है. नाम बदल गए, प्रक्रिया बदली लेकिन शोषित वही रहे, इसका उदाहरण है यह पक्तियां जो हर बार दलितों को जानवरों के समक्ष लाकर खड़ी कर देती है; ढोर शुद्र पशु और नारी सब है ताडन के अधिकारी. इस तरह के हजारों मिथकों से भरा पडा है पूरा गैरदलित साहित्य. ऐसे मिथकों के सन्दर्भ में पाओलो फ्रेरे अपनी किताब पेड्गोजी ऑफ़ ओप्रेस्ड में लिखते है, व्यक्ति स्वतंत्रता से डरता है, फ्रेरे के अनुसार वह ‘स्वतंत्रता का डर’ होता है, इसलिए वह मिथक गढ़ता है जिससे संकीर्णवाद (Sectarianism) पैदा होता है चूँकि संकीर्णतावाद मिथक गढ़ता है और यहीं से अविवेक पैदा होता है और फिर यह यथार्थ को एक मिथ्या (अपरिवर्तनीय) ‘यथार्थ’ में बदल देता है. फ्रेरे का मानना है कि ‘संकीर्णतावाद, जो मतांधता पर पलता है, हमेशा नपुंसक बनाता है. (फ्रेरे, १९९६-१९९७, पृ. ०३ ) इस पूरी प्रक्रिया में देखे तो भारतीय दलितों के साथ भी प्राचीन काल से यही हो रहा है, उनकी स्वतंत्रता को अमान्य कर, मिथक गढ़ते हुए उन्हें नपुंसक बनाया गया. ताकि वह सवतंत्र होने से भी डरे. यही डर उनमें दलितत्व को ज़िंदा रखता है.
फ्रेरे उत्पीडित की पांच विशेषताओं पर चर्चा करते है जिसमें, आत्म अवमूल्यन (सेल्फ-डेप्रिसिएशन), भाग्यवादी, निष्क्रियता, पराधीनता एवं एरिक फ्राम के हवाले शवकामी व्यवहार महत्वपूर्ण हैं(फ्रेरे, १९९६-१९९७, पृ. २७). यह पांचो विशेषताएं दलितों के निर्धारण में खरी उतरती है. इन विशेषताओं के आधार पर दुनिया का कोई भी विज्ञान ऐसे प्राणी को मनुष्य होने का अधिकार नहीं देगा. वर्ण-व्यवस्था में दलित केवल वस्तु बनकर रह गए, सारे कानून-नियम उच्च वर्णों के हातो में थे. वे सब कुछ जानते थे और दलित कुछ भी नहीं, वे सोचते थे और दलितों के बारे में सोचा जाता था, वे अनुशासन लागू करनेवाले थे और दलित अनुशासित होनेवाले, वे अपनी मर्जी के मालिक है और दलितों को उनके मर्जी के अनुसार चलना पड़ता है, वे सबकुछ प्राप्त कर सकते हैं और दलितों को इस प्राप्ति का भय और भ्रम दोनों दिखाए जाएंगे, इनके पास वह सारे अधिकार थे जिन्हें दलितों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता हो. इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने के लिए पवित्रता की आड़ में दलितों के मनुष्यत्व को नकारा जाता रहा, जोकि उनका पृकृति से से प्रदत्त अधिकार था.     
सभ्यता में समायोजित होने का दबाव   
प्रबोधन के पश्चात यूरोपीय राष्ट्रों के ओपनिवेशिक लालच का शिकार भारत भी बना. अंग्रेजों के आने के पश्चात भारत का देशज ज्ञान तितर-बितर हो गया और अंग्रेजों ने अपने व्हाईट कॉलर बर्डन के तले भारतीयों को सभ्यता के एक नए फ्रेम में जकड़ना शुरू किया आशीष नंदी जो एक राजनीतिक मनोवैज्ञानिक है, के अनुसार इसकी “शुरुआत १७५७ के प्लासी की हार से होती है और इसका अंत १९४७ में अंग्रेजों के हातो भारत के स्वाधीनता प्राप्ति पर होता है.” (पृ.१६) अंगेजों द्वारा लादी गयी नयी सभ्यता में दलितों को लगा की अब मुक्ति का मार्ग खुलेगा, जाति और वर्ण व्यवस्था के बंधन टूटेंगे इस धारणा से ज्यादातर समाज सुधारकों ने ओपनिवेशिक काल में सामाजिक सुधार की मांग के लिए आन्दोलन किए जिसमें फुले, शाहू, पेरियार, आंबेडकर आदि अग्रणी थे. लेकिन हिंदुत्व के नाम पर कभी तिलक ने, सर्वसमावेशकता के नाम पर गांधी ने इस आंदोलन को मोड़ने की कोशिश की. इस समय में दलित नामांतरण धर्मांतरण के प्रक्रिया में व्यस्त रहे और अंत में आरक्षण और संविधानिक सुरक्षा तक सिमित रहे. बाकी जस के तस रहा लोकतंत्र में लिखित स्वातंत्र के अलावे व्यवहार में रूढिवादिता बनी रही. केवल दमन के तरीकों में बदलाव आया.
इस समय को समझने के लिए हमारे पास दो प्रमुख टेक्स्ट है पहला फ्रान्त्ज़ फानों का ब्लैक स्किन व्हाईट मास्क (१९५२) जिसमें उसने कृष्ण वर्णीय के दमन की बात की है. दुसरा टेक्स्ट भारत के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है जिसे आशीष नंदी ने द इंटिमेट एनिमी (१९८३) के नाम से लिखा है. फ्रान्त्ज़ फानों ब्लैक स्किन व्हाईट मास्क में कृष्णवर्णीयों के दमन की बात करते हैं, उसमें वह जिस मालिक और गुलाम की बात करते है. उसकी मानसिकता की बात करते हुए कहते है कि ब्लैक मैन कौन है? और जवाब देते हैं कि ब्लैक मैन वह है जिसमें हीनता की एक मनोग्रंथि होती है और वह दोहरे प्रक्रिया से बनता है जिसमें दो कारक महत्त्वपूर्ण है पहला, आर्थिक और दुसरा, आत्मसातीकरण, इस पूरी प्रक्रिया को वह एक शब्द गढ़ते है Epidermalization जिसका अर्थ है, सामाजिक-आर्थिक असमानता पर आधारित एक हीनतापूर्ण मनोग्रंथि और जिसकी इच्छा है कि ‘गोरों की दौड़’ में शामिल हो. (Fanon, 1952, p. 47)  
दूसरी और आशीष नंदी इसे विकृत राजनैतिक-अर्थशास्त्र के उत्पाद मानते है जो ओपनिवेशवाद के बाद के अर्थतंत्र में स्थापित हुए है, इस प्रक्रिया में भी दलित ओपनिवेशवादी मानसिकता के अलावा जाति व्यवस्था के अनवरत प्रभुत्व (Perpetual domination) के नीचे दबा पडा था. उसे इस ढूढ में शामिल भी होना है और उस जाति के अनवरत प्रभुत्व को नकारना भी है जो उनके मनुष्य होने पर सवाल करती है.  
इस दमन के महामारी विज्ञान को सुलझना और भी कठिन होता है जब वैश्विक धरातल पर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बी. एफ. स्किनर का आगमन होता है, जो व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक है. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इसने अमेरिकन सरकार पर सवाल उठाया और अपनी किताब वाल्डेन टू में बताया कि अमेरिका जितना खर्च वेलफेयर, शिक्षा, डिफेन्स, स्वास्थ्य आदि पर कर रही है यह सब गैरजरूरी है और इसपर जितने विभाग चल रहें है कितने लोग काम कर रहे हैं और बडी मात्र में बजट भी खर्च हो रहा है. बुद्धि के बदले ज्ञान या निर्णय प्रक्रिया में सामान्य बोध स्थानापन्न नहीं होगा. ("knowledge is no substitute for wisdom or common sense in making decisions.") (Skinner, 1976, p. vii) इससे बचने के लिए उनका कहना था कि निति निर्माताओं के समिति में बीहेवरियल सायन्स के भी सदस्य हो, उन्होंने यह संभावना जताई, लिखते है “मैं सुझाव दूंगा कि यह सब हम कर सकते है और वह भी इसके बिना.”(Am I suggesting that we can get along without that?) (Skinner, 1976, p. xiv) “क्या जरुरी है एक राजनैतिक नेता या एक नई तरह की सरकार, नहीं है लेकिन, आगे जरुरी है मानव व्यवहार का ज्ञान और उस ज्ञान के सांस्कृतिक व्यवहारकुशलता के प्रारूप को लागू करने के नए तरीके.”[3] (Skinner, 1976, पृ. xvi) यह वह तरीके हैं जिससे मानवी मन पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है, और मानवी मन पर नियंत्रण ही विजय का सबसे बड़ा हतियार है

इस नियंत्रित माहोल से भारत भी बच नहीं पाया और उसने अपने कल्याणकारी राज्य के दायित्व से हाथ खींचने शुरू किए ऐसे में दलितों के मुक्ति के मार्ग में बड़ी बाधा पैदा हो गयी है. संज्ञानात्मक विज्ञान एवं बीहेवरियल सायन्स के जमाने में दलितों का मुक्ति का वह अधजला स्वप्न जो पूना पैक्ट की तरह जल रहा है.    
तब सवाल उठता है कि इतने दबे कुचले लोगों का मानस्य कैसा होगा, कैसा होगा इनका अवचेतन जिसमें वह सारी बर्बरताएं और शर्मनाक व्यवहार भरा पड़ा है, हजारों सालों से इनका मन इस अवचेतन से मुक्ति की लड़ाई लड़ रहा है. समय के अनुसार मुक्तिदाता बदल गए लेकिन लड़ाई वही है जहां से शुरू हुयी थी. कभी वह आर्यों के खिलाफ द्राविड बनकर, कर्मकांडों के खिलाफ बुद्ध बनकर, शान्ति के लिए सम्राट अशोक बनकर प्रतिकार शुरू है.  तो कभी फुले, शाहू, आंबेडकर, पेरियार के रूप में दलितों का प्रतिकार शुरू रहा है. इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा की भारतीय दलित दोहरे दमन का संयुक्त अवचेतन हैं, इसे अभी इतिहास पुनर्लेखन के माध्यम से निजात दिलाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन उसमें भी केवल प्रतिष्ठा ही प्राप्त होगी न की मुक्ति.  

निष्कर्ष
वैश्विक धरातल पर किसी भी समय के गुलाम, दास, सेवको, के साथ तुलना करे तो वह दोहरी प्रक्रिया से हीन होते हैं, किन्तु भारतीय दलितों की हीनता तीहरे प्रक्रिया से बनती है, समाजिक-आर्थिक असमानता, और आत्मसातीकरण के अलावे जन्म/जाति भी दलितों के स्व निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इसलिए भारतीय दलित तीहरे प्रक्रिया से दबते है, और इनका अवचेतन इसी तिहरे दमन से ही बनता है. इसके अलावे सभ्य समाज में सभ्य बनने की पूरी प्रक्रिया का दबाव भी इन पर हावी होता ही है.
दलित अगर मुक्ति चाहते हैं तो वह गैरदलित न्याय के आधार पर ही मिलेगी और दलित जानते है की इसके लिए उनको कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी. क्योंकि उनके पास ऐसा कुछ है ही नहीं, अगर कीमत चुकानी पड़ेगी तो वह गैरदलितों को ही चुकानी पड़ेगी इसलिए गैरदलित नहीं चाहेंगे की दलित को मुक्ति मिले और इसलिए जरूरी है कि इन्हें इस मुक्तिगामी मार्ग से हटाया जाए, दलितों में मूल्य भरा जाए ताकि जब न्याय की बारी आए तो इनके पास भी कुछ हो जिसके लिए दलितों को कीमत चुकानी चुकानी पड़े. वैश्वीकरण के माहोल ऐसे ही नहीं कोई आपको मुक्ति के मार्ग पर चलने देगा, कोई चीज अगर ऐसे ही मिल रही है तो खतरा और भी बढ़ जाता है, क्योंकि पूरा विश्व ही नियंत्रित है. ऐसे में अगर दलित यह समझ रहे है की लोकतंत्र में हमें बाबासाहब के कारण संगठित होने की शक्ति, संघर्ष की जमीन और शिक्षा मिल रही है तो यह केवल भ्रम ही होगा.इस भ्रम को समझना है तो इस पूरी व्यवस्था को समझना होगा और इस व्यवस्था को समझना है, तो वर्तमान के राजनैतिक मनोविज्ञान को समझना होगा, उस पूरे वातावरण को समझना होगा जिससे दलितों का ‘मानस्य’ बन रहा है. ‘बिहेवारियल इंजीनियरिग’[4] के समय में तो इसपर सवाल भी करना होगा कि यह कहीं मैन्युफ्रेक्चर तो नहीं किया जा रहा, क्योंकि यह दमन का महामारी विज्ञान (Epidemiology of Oppression[5]) है और इसे बड़े ही व्यवस्थित ढंग से लागू किया जा रहा है. 
आंबेडकर विचारों के अनुसार उपनिवेशिक समय में इस वर्ग ने इस दमन के खिलाफ आवाज उठायी और खुद आंबेडकर ने ही इसका नेतृत्व किया था. उनके बाद राजनैतिक रूप से दलितों को कभी एकत्रित होने नहीं दिया गया. बौद्धिक स्तर पर भले ही बात आंबेडकर से शुरू होती हो लेकिन फिर वह व्यवहार में आकर कहीं गुम हो जाती है. और यह लगातार हो रहा है. सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? दलितों ने वह सब कुछ प्राप्त करने की कोशिश की जिससे प्रतिष्ठा प्राप्त होनी चाहिए फिर भी गिने-चुने लोगों के अलावा कोई सफलता नहीं दिखती, ‘संस्कृतिकरण’ के दौर से गुजरकने वालों को दलित ब्राम्हण कहा जाता है. और हाल में देखा जाए तो दलित विचारधारा को लेकर आर्मचेयर फिलोसोफर और अकादमिक थ्योरीस्टों की बाढ़ सी आ गयी है, लेकिन जमीनी स्तर पर कमोबेश पारम्पारिक परिदृश्य ही देखने को मिलता है, जिसमें दलितों का दमन निश्चित है.




[1] ...a world view which believes in the absolute superiority of the human over the nonhuman and the subhuman, the masculine over the feminine, the adult over the child, the historical over the ahistorical, and the modern or progressive over the traditional or the savage.
[2] मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग की अवधारणा के अनुसार.  
[3] What is needed is not a new political leader or a new kind of government but further knowledge about human behavior and new ways of applying that knowledge to the design of cultural practices.
[4] बी.एफ. स्किनर (1948) अपनी किताब वाल्डेन टू में इस अवधारणा को स्पष्ट करते हैं, जिसके अनुसार बिहेवारियल इंजीनियरिग’ मानवों के व्यवहार परिष्करण एवं नियंत्रण की विधि हैं.
[5] इस पद को जियाउद्दीन सरकार (Ziauddin Sarkar) ने फ्रान्त्ज़ फानों की किताब ब्लैक स्किन व्हाईट मास्क को अग्रेषित करते हुए किया है.  


Nilame Gajanan Suryakant
Research Scholor
M.G. F. G. Center for peace studies, M. G. A. H. V. Wardha (MH) 442005
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कुँवारी माँ(Single Mother) – आदिवासी स्त्री और हिंसा के नए रूप


-नरेश गौतम
समाज व्यवस्था के विपरीत आदिवासी समाज की अपनी एक अलग व्यवस्था रही है। एक जमाने में आदिवासी समाज में दो बातें मुख्य तौर पर देखी जाती थी। पहली उनकी अपनी सामुदायिक पंचायत और दूसरा गाँव से दूर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्षिक्षण के बतौर उनके युवागृह। पिछले दो-तीन दशकों में कुछ ऐसी स्थितियाँ-परिस्थितियाँ निर्मित हुई हैं कि अचानक से या कहें कि बड़े सुनियोजित तरीके से इन पर हमले हुए हैं और आज हालत यह है कि आदिवासी समाज की पहचान के ये दोनों प्रमुख आधार अब अपने अंतिम समय में महज कुछ अवशेषों के ज़रिए ही देखे-जाने-पहचाने जा सकते हैं। मुख्यधारा के बरक्स आदिवासी समुदाय का जीने का एक अलग जीवन-ढ़ंग और जीवन-दृष्टि थी जो अधिकाधिक समुदाय केंद्रित और अपने प्राकृतिक परिवेश के साथ आबद्ध थी लेकिन एक बनते हुए राष्ट्र-राज्य की ज़रूरतें और अधिकाधिक मुनाफ़े के लिए अधिकाधिक दोहन (चाहे वह व्यक्ति का हो या प्रकृति का) के नव पूंजीवादी रुझानों ने अपनी छोटी और अलग दुनिया में खुश इन समुदायों पर बाहरी हमलों को जन्म दिया। ये हमले भी दोतरफा रहे जहाँ एक तरफ इनके अलग एवं स्वायत्त सिस्टम को वाह्य प्रभावों की घुसपैठ ने कमजोर किया, वहीं इनकी सहजता-सरलता और खुलेपन का फायदा भी उठाया गया। घने जंगलों के भीतर जहाँ सड़कें-रेल जैसे आवाजाही के साधन न पहुँचते हों, वहाँ किसी बाहरी व्यक्ति के आसानी से न पहुँच पाने का अर्थ राष्ट्र-राज्य के न पहुँच पाने से भी था और इस तरह यह राष्ट्र के अंदर एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में बड़ी चुनौती भी था। पिछले डेढ़-दो सौ सालों में (औपनिवेशिक शासन और आज़ादी के बाद) राष्ट्र-राज्य के मजबूत होने के साथ ही इस चुनौती से निपटने के क्रम में इन पर हुए हमलों और इन इलाक़ों में यातायात साधनों के विकास को देखा जा सकता है। यद्यपि पिछले कुछ समय से इन हमलों में आई तेज़ी संकटग्रस्त पूंजीवाद को, यहाँ संसाधनों के रूप में दिख रही अथाह खनिज-सम्पदा एवं इन पिछड़े इलाकों के विकास के नाम पर वैश्विक आर्थिक मंदी से मुक्ति की उम्मीद के कारण भी है। कुल मिलाकर हमले बढ़े हैं चाहे वह विकास के नाम पर हों या फिर संस्कृति के नाम पर।    

इन हमलों में उनकी सामुदायिकता एवं स्वायत्तता को ख़त्म कर उनका मुख्यधारीकरण करना शामिल है, साथ ही उन्हें सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाना भी। इसी के तहत जहाँ उनकी सामुदायिक पंचायत पर पंचायतीराज व्यवस्था ने हमला किया, वहीं युवागृहों को अनैतिक एवं अ-सांस्कृतिक कह कर विकास के नाम पर वहाँ तक पहुँची मुख्यधारा की पूर्वाग्रही चेतना ने ख़त्म कर दिया। आदिवासी समाज के सांस्कृतिक मूल्यों पर गैर-आदिवासियों (मुख्य धारा समाज) ने जम कर आघात पहुँचाया। एक तरफ तो उन्होंने इसे असभ्यता और उच्छृंखलता कहा, वहीं दूसरी तरफ नैतिकता के छद्म से परे दैहिक संबंध बनाने की सहजता ने उन्हें अपनी दबी-छिपी यौन कुंठाओं के साथ इस तरफ आकर्षित भी किया। इस दोतरफ़े हमले ने दोहरा नुकसान किया। जैसा कि हम जानते हैं कि मुख्यधारा के बरक्स आदिवासी समाज एक अधिक मुक्त समाज रहा है और यहाँ पितृसत्ता के वैसे सुदृढ़ रूप भी नहीं दिखते लेकिन इनके संस्कृतिकरण के नाम पर जो कोशिशें हुईं, उसने यहाँ पितृसत्ता के नए रूप रचे-गढ़े हैं। चूंकि कोई भी संस्कृति हमेशा स्त्रियों की नैतिकता पर ही निर्मित होती है, इसलिए इनके संस्कृतिकरण ने एक ओर इन्हें मुख्यधारा नैतिकता की तरफ मोड़ा है और इनके पारंपरिक स्त्री-पुरुष संबंधों में बदलाव आया है, वहीं दूसरी ओर ये संस्कृतिकरण कोई ऐसी प्रक्रिया भी नहीं जो एकबारगी पूरी हो जाए। किसी जीवन-ढंग के सैकड़ों सालों से चले आ रहे अभ्यास कुछेक दिनों-महीनों-वर्षों में भूले भी नहीं जाते, इसलिए यौनिक खुलेपन का सामाजिक व्यवहार संस्कृतिकरण के साथ-साथ जारी रहा। यह तब तक समस्या नहीं बना जब तक कि उनके अपने सामुदायिक जीवन के पारंपरिक नियम-कानूनों में संस्कृतिकरण के मुख्यधारीकृत नैतिक मूल्यों ने जगह बनानी शुरू नहीं कर दी। आदिवासी समाज के लिए दैहिक संबंध कभी कोई टैबू नहीं रहे क्योंकि निजी संपत्ति, परिवार और विवाह को लेकर यहाँ की सामाजिक संरचना एवं मान्यताएं दूसरी हैं। कुछ समुदाय जो मातृवंशीय हैं, वहाँ बच्चों को माँ के नाम से जाना जाता है लेकिन जहाँ ऐसा नहीं है, वहाँ भी पिता के नाम को लेकर वैसी रूढ़ता नहीं है। बिना विवाह माँ बनना (कुँवारी माँ) यहाँ कभी कोई समस्या नहीं रही क्योंकि इसके बावजूद माँ और बच्चा दोनों ही समाज में सहज स्वीकार्य थे लेकिन मुख्यधारा के साथ इनकी अन्तरक्रिया ने सांस्कृतिक एवं नैतिक मान्यताओं को बदला है। विवाह की अनिवार्यता और अवैधता की धारणाओं ने इस समाज में भी अब अपनी जगह बना ली है और इसलिए अब यह एक समस्या के रूप में हमारे सामने है।

यद्यपि इसकी शुरुआत तभी हो गयी थी, जब कानून-व्यवस्था का इनके निजी जीवन में दखल शुरू हुआ। पहले आदिवासियों की परंपरा के सरोकार जंगलों से जुड़े थे। जंगल अपने थे, व्यवस्था अपनी थी और सरकार भी अपनी थी। वे जंगलों में रहते थे, कुदरत के भरोसे जल-जंगल-जमीन के साथ ज़िंदगी जीते थे और उनके लिए ही संघर्ष करते हुये मर जाते थे। लेकिन एक समय ऐसा आया जब जंगल के व्यापारिक महत्व को तो समझते हुए, पर आदिवासियों की मानसिकता और उनकी भावनाओं को नज़रअंदाज़ करते हुए सरकार ने जंगल से जुड़े जो कानून बनाए, उसकी आदिवासियों की हालत को बदतर बनाने में एक बड़ी भूमिका रही। इन कानूनों के अंतर्गत आदिवासियों का जंगल में जाना अपराध घोषित हुआ और जंगलों को सभ्य समाज के लिए संरक्षित किया जाने लगा। जंगल से बाहर जो रोजगार थे, उन पर बाहरी (मुख्य धारा के) लोगों का कब्जा था। इस तरह अब यह आदिवासियों की लाचारी हो गयी कि वह जंगल से बाहर रोजगार देखें और बाहर के लोगों के सामने हाथ फैलाएं। लोगों ने उन्हें काम तो दिया लेकिन काम के बदले उनसे कुछ और भी अपेक्षाएं की। आदिवासी स्त्री के लिए दैहिक संबंध एक बहुत ही स्वाभाविक सा व्यवहार है। उस समाज में जहाँ ऐसी मानसिकता थी कि दैहिक संबंध बनाना पाप नहीं है, इससे वन देवी नाराज हो सकती है, तो इस कारण वहाँ बड़ी सहजता के साथ उन युवतियों ने बाहर के लोगों से संबंध बनाए। इसके बदले उन्हें रोटी मिलती थी, रंगीन कपड़े मिलते थे और सौंदर्य सामग्री भी। ये तमाम उपहार वे सहज स्वीकार करते गए। 'विकास' के नाम पर इस सहजता का 'विकास' करने वाले लोगों ने भरपूर लाभ उठाया और इस तरह आदिवासी स्त्रियाँ खुले सेक्स संबंधों की प्रतीक बन गईं। सड़कों के विकास ने इसे और मजबूती दी। साथ ही वस्तु विनिमय के स्थान पर अब संग्रहणीय रुपए ने इन मुसीबतों को और बढ़ा दिया है। चूंकि आदिवासी समाज में स्त्रियाँ रीढ़ होती हैं और घर-बाहर के कामों में उनकी समान भागीदारी होती है जबकि मुख्यधारा समाज अपनी स्त्रियों को घरों में रखते हुए बाहरी दुनिया की इन महिलाओं के साथ इनकी 'यौन उन्मुक्तता' एवं 'आसान उपलब्धता' की अपनी पूर्व धारणाओं के साथ अन्तरक्रिया करता है और इस तरह अपनी यौन कुंठाओं के लिए इन्हें एक 'सॉफ्ट टार्गेट' के रूप में देखता है। यह एक नयी तरह की हिंसा है जो मुख्यधारा समाज के पुरुष और आदिवासी समुदाय की स्त्री के बीच उनके असमान एवं हायर्रिकल संबंधों से पैदा होती है।

महाराष्ट्र का ऐसा ही एक जिला यवतमाल है। इस जिले की तालुका झरीजामणी में आधे से भी अधिक आबादी आदिवासियों की है जिनमें मुख्यतः कोलाम, गोंड, परधान, जनजाति के लोग निवास करते हैं। पिछले कुछ वर्षों से यहाँ कुँवारी लड़कियों के माँ बनने की काफी घटनाएँ सामने आ रही हैं। झरीजामणी तालुका में 55 ग्राम पंचायत आती है। इन 55 ग्राम पंचायतों में अब तक 216 से भी अधिक लड़कियाँ कुंवारी माँ बन चुकी हैं। वैसे तो आदिवासी समाज में कभी भी कुवांरी माँ बनने में हीनता नहीं थी,  लेकिन जैसे-जैसे आदिवासी समुदाय मुख्यधारा के साथ विकास की प्रक्रिया में आ रहा है, वैसे ही उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताएं भी बदल रही हैं और इसी क्रम में अब तक जिसे प्रजनन की सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया माना जाता था, उसे अब इस समाज ने भी अपराध की श्रेणी में गिनना शुरू कर दिया है। मुख्यधारा समाज में बिना ब्याह के किसी लड़की के माँ बनने का मतलब ही है कि वह चरित्रहीन है,  कुलटा है और इसे एक अपराध की ही तरह देखा जाता है। अब यही धारणा मुख्य समाज के संपर्क में आने से आदिवासी समाज की भी बनने लगी है। सिर्फ यही नहीं मुख्यधारा की तरह ही इस तथाकथित अपराध की सज़ा के बतौर स्त्री का सामाजिक बहिष्कार और बच्चे को अवैध कह कर बहिष्कृत कर दिया जाता है। वह गाँव में अपने परिवार के साथ नहीं रह सकती, किसी महामारी की तरह ही उसे गाँव के बाहर कर दिया जाता है। कुछ इस तरह कि जैसे वह यहाँ रहेगी तो और भी लोगों को यह बीमारी हो सकती है। यह सामाजिक बेदख़ली और आधारहीनता उसे और भी शोषित एवं प्रताड़ित होने को विवश करती है।
 
झरीजामणी तालुका में अब तक 216 महिलाये कुँवारी माँ बन चुकी है। उन्हें माँ बनने के बाद घर तक नसीब नहीं है। कुछ-कुछ लड़कियाँ तो दो से तीन बार माँ बन चुकी है। पंचायत में इस तरह का कोई केस सामने आने पर ऐसा है कि अगर वहाँ की पंचायत चाहे तो उस व्यक्ति से शादी करा दे और यदि न चाहे तो लड़की को ऐसे ही बच्चे को जन्म देना होगा। इस संबंध में अभी तक एक भी केस पुलिस में नहीं गया है। यदि कोई लड़की अपने ही समाज में प्रेम करती है और उससे बच्चा होता है तो पंचायत उसे शादी के लिए कहती है लेकिन बहुत से ऐसे भी मामले है जहाँ बाहर से लोग आकर लड़कियों को बहला-फुसला कर अपना शिकार बनाते हैं और उसके बाद वह जीवन भर उसे ढोती रहती है। परंतु यह घटना सिर्फ किसी एक यवतमाल की ही नहीं है बल्कि जहाँ-जहाँ आदिवासियों को जंगल से निकाला जा  रहा है और जंगलों को पर्यटकों के लिए संरक्षित किया जा रहा है, वहाँ ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। वह मामला चाहे यवतमाल के झरीजामणी का हो या उड़ीसा के कालाहांडी, बेलगीर, माल्कनगिरि या उत्तर प्रदेश के सोनभद्र का, सभी जगह एक जैसी ही स्थितियाँ है। सभी जगह आदिवासियों को जंगल से निकाला जा रहा है, जंगलों को संरक्षित किया जा रहा है, रिजॉर्ट बनाए जा रहे हैं और उन्हीं जगहों पर आने वाले लोग भोली-भाली लड़कियों को अपने भोग-विलास का साधन भी बना रहे हैं। दूसरी तरफ वही लोग, वही समाज उन्हें अपराधी भी ठहरा रहा है। वहाँ न तो ये घटनाएं सरकारी महकमे को दिखायी देती हैं और न ही समाज के ठेकेदारों को। वैसे गौर करें तो जिस विकास के नाम पर इस तरह के कृत्य शुरू हुए हैं, वह विकास अपनी अवधारणा में पश्चिम से आयातित है और वहाँ सिंगल मदर कोई अनोखी या आपराधिक चीज़ नहीं है, बल्कि इसे पूर्ण सामाजिक मान्यता प्राप्त है। दूसरी तरफ यहाँ भारत में विकास का पैमाना तो पश्चिम से तय किया जा रहा है, लेकिन सामाजिक संबंधों में आज भी वही जाति-धर्म आधारित उच्च वर्ग और निम्न वर्ग को मान्यता दी जाती है और वही सड़े-गले संस्कार हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं दिखाई देता।
सवाल सिर्फ ये नहीं है कि यवतमाल की उन 216 कुँवारी माँओं और उनके बच्चों या सोनभद्र से लेकर उड़ीसा तक जंगलों में रह रहे आदिवासी जो अपनी समस्याओं को लेकर ऐसे ही दोराहे पर खड़े हैं, का क्या होगा या होना चाहिए? सवाल ये भी नहीं है कि आदिवासी समाज की सामुदायिकता, रीति-रिवाज, जीवन-ढंग और संसाधनों पर हमले बढ़े हैं और इन्हें बंद होना चाहिए? सवाल इससे कहीं ज्यादा गहरे और व्यापक हैं और वो यह कि क्या हम एक समाज के रूप में कभी अपने से अलग और ठीक विपरीत चीज़ों को भी बर्दाश्त करने की काबिलियत हासिल कर सकेंगे या नहीं? या कि हायरार्कीज (पदानुक्रमता) पर टिकी सत्ता-संरचनाएं जो हमेशा ही हिंसा के नए-नए रूपों को जन्म देती हैं, वहाँ इन सत्ता-संरचनाओं को ख़त्म किए बिना क्या हम एक अहिंसक समाज के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकते हैं क्या? क्योंकि हमारा दावा तो यही है लेकिन हमारी ज्यादातर कोशिशें इसी संबंध में की जा रही बेमतलब की उछल-कूद जैसी ही हैं।     

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नरेश गौतम

76, गोरख पाण्डेय हॉस्टल
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा