Saturday, March 24, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के चौथे दिन ग्रामीण स्वास्थ्य व अन्य मुद्दों पर हुई गहन चर्चा



वर्धा, 22 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषदहैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के चौथे दिन दत्ता मेघे इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस के संकायाध्यक्ष डॉ. अभय मूढ़े ने 'सामुदायिक स्वास्थ्य एवं स्वच्छता' विषय पर केन्द्रित सत्र को संबोधित किया। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति शहरों से अलग है। गांवों की स्थिति आज पहले से काफी बदल गई है। गांवों का कई मामलों में विकास हुआ है। गांवों में बिजली, इंटरनेट की सुविधाएं पहुंची है, गांवों में शौचालय बने हैं। बावजूद इसके आज भी ढेर सारे गांवों में जागरूकता का अभाव है। गाँव में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति आज भी बहुत बेहतर नहीं है। गाँव में आंगनबाड़ी केंद्र बने हैं। गांवों में स्कूल हैं, पर वहाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों के बीच में ही स्कूल छोड़ने की तादाद सबसे ज्यादा है। स्वच्छता की भारी कमी है। नालियाँ खुली पड़ी हुई हैं, उसके साफ-सफाई की नियमित व्यवस्था नहीं है।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए स्वास्थ्य केंद्र और स्वास्थ्य उपकेंद्र तो बने हुए हैं, किन्तु वहाँ चिकित्सकों का अभाव है। तीन हजार से ज्यादा आबादी वाले गाँव में छोटा स्वास्थ्य केंद्र का प्रावधान है, किन्तु ज़्यादातर गांवों में आज भी इसकी गारंटी नहीं हो पाई है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक पुरुष व महिला डाक्टर होना चाहिए। किन्तु ढेर सारे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां डाक्टर तो हैं, किन्तु जरूरी दवाओं की भारी कमी है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी आधा से अधिक गाँव में खुले में शौच जाना जारी है। इसका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इससे खाद्यान्न, शाक-सब्जी के संक्रमित होने का खतरा बढ़ जाता है। गाँव में शरीर और हाथों की साफ-सफाई को लेकर भी समुचित जागरूकता का अभाव है। भारत सरकार ने 1998 से सभी शहर और गाँव को स्वच्छ व निरोगी बनाने का संकल्प लिया है। सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान भी चलाया जा रहा है। इन सबके बीच ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल का अभाव बना हुआ है।
            आगे उन्होंने बताया कि निर्मल भारत अभियान के तहत ग्रामीण स्कूलों के बच्चों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जाता है। निर्मल ग्राम पुरस्कार भी दिए जाते हैं। स्वच्छता रथ के जरिए भी जागरूकता लाने की कोशिश की जा रही है। 9 से 15 अगस्त तक स्वच्छता सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। जनजागरूकता लाने में मीडिया की भी अहम भूमिका होती है।
            सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने और धन्यवाद डॉ. मुकेश कुमार ने किया।

चौथे दिन के दूसरे चर्चा सत्र में नेशनल इस्टिट्यूट आफ रुरल डेवलपमेंट एंड पंचायती राज, भारत सरकार, हैदराबाद के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर एवं मातृसेवा संघ इंटीट्यूट आफ सोशल वर्क, नागपुर में एसोसिएट प्रोफेसर रहे इंडियन जर्नल आफ सोशल वर्क एंड सोशल साइंसेज के इश्यू एडिटर रह चुके डॉ. अजित कुमार ने '14 वें वित्त आयोग: ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान' को दो केस स्टडी- सिंघाना ग्राम पंचायत (मध्यप्रदेश) एवं पटोदा (महाराष्ट्र) के संदर्भ में इसकी विस्तृत चर्चा की। महाराष्ट्र के प्रत्येक ग्राम पंचायत को औसतन 48 लाख रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ है। एंड, फंक्शन और फंक्शनरी के बीच बेहतर तालमेल के बगैर ग्राम पंचायतों का विकास मुश्किल है। कई राज्यों में ग्राम पंचायतों को शक्तियाँ तो दी गई हैं, किन्तु वहाँ स्टाफ वगैरह की व्यवस्था समुचित तौर पर नहीं किया गया है। केंद्र सरकार द्वारा ग्राम पंचायत को 29 तरह के अधिकार दिए हैं किन्तु ज़्यादातर राज्य सरकारों ने ग्राम पंचायतों को अब तक ये सारे अधिकार नहीं दिए हैं।
            उन्होंने कहा कि वित्त आयोग ही विभिन्न योजनाओं पर खर्च किए जाने वाली राशि का बंटवारा करता है। आज तक ग्राम पंचायतों को समुचित राशि उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है। ग्राम पंचायतों के पास आज न तो सत्ता है और न ही समुचित संसाधन है। भारत के कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों को एक हद तक शक्ति का हस्तांतरण किया गया है किन्तु ज़्यादातर राज्यों में ऐसा नहीं हो पाया है। हर ग्राम पंचायतों को अपनी परिस्थिति के विश्लेषण का भी वैधानिक प्रावधान है। ग्राम पंचायतों के पास जितने स्थानीय संसाधन हैं, उसका भी सम्पूर्ण ब्योरा ग्राम पंचायतों के पास होना चाहिए। देश में यथार्थपरक अध्ययन के तथ्य और आंकड़ों की भारी कमी है। इसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका हो सकती है।
            मध्यप्रदेश के धार जिले के मनावर ब्लाक के सिंघाना ग्राम पंचायत की केस स्टडी के आधार पर डॉ. अजित कुमार ने कहा कि यह मध्यप्रदेश के पिछड़े जिले में आता है। यहाँ ज्यादातर भीलों की आबादी है। 2005 के पूर्व इस ग्राम पंचायत के लोगों के पास पेय जल की व्यवस्था नहीं थी। लोगों का पानी की तलाश में ही ज़्यादातर वक्त खर्च हो जाता था। सड़क भी नहीं थी, दूसरे गाँव के लोग इस गाँव में अपनी लड़की की शादी करने तक को तैयार नहीं होते थे। इस ग्राम पंचायत में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आज गाँव की सड़क बन गई है, 60 फीसदी घरों में शौचालय है। पुल-पुलिया बन गए हैं। सामुदायिक भवन हैं। घर-घर नल का पानी पहुँच गया है। मनरेगा के तहत इस गाँव में जबरदस्त काम हुआ। ग्राम पंचायत अपनी सारी गतिविधियों का सुव्यवस्थित ढंग से दस्तावेजीकरण कर रहा है।
            उक्त गाँव में कृषि के उत्पादन में भी वृद्धि हुई है। सिंचाई के लिए कुएं खोदे गए हैं। सुव्यवस्थित ग्राम पंचायत भवन सुचारु ढंग से चल रहा है। यह सारा परिवर्तन 2005 से 2015 के बीच हुआ है। इसमें मनरेगा योजना की अहम भूमिका रही। मनरेगा से इस गाँव का विकास हुआ। संदीप अग्रवाल नामक एक स्थानीय व्यक्ति के कुशल नेतृत्व की इसमें अहम भूमिका रही। आज यह धार जिले का चमकता हुआ तारा बन चुका है। उन्होंने कहा कि मनरेगा योजना के ठप्प हो जाने से सिंघाना के लोग एक बार फिर पलायन करने को विवश हो गए हैं। यहाँ से छोटी उम्र के बच्चे को गुजरात के सूरत आदि जघों पर कपास बिनने के लिए ले जाया जाता है।  
            डॉ. अजीत कुमार ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के पटोदा ग्राम पंचायत की केस स्टडी के आधार पर बताया कि इस गाँव की आबादी 3350 है। यह मराठा बाहुल्य गाँव है। 2005 में जहां इस ग्राम पंचायत को 2,14,000 रुपए मात्र का अनुदान प्राप्त हुआ था वहीं 2012-13 में 28,30,627 रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ। पूर्व में गाँव में चार आटा चक्की था, जिसकी जगह पर ग्रामसभा ने चारों को बंद कर आपसी सहयोग से एक बड़ी आटा चक्की स्थापित की। इस गाँव में हुए अभिनव प्रयोग की उन्होंने विस्तृत चर्चा की। अंत में प्रतिभागियों के प्रश्नों का भी उन्होंने उत्तर दिया। इस सत्र का संचालन एवं आभार ज्ञापन डॉ. आमोद गुर्जर ने किया।   

तीसरे चर्चा सत्र का संयोजन एनसीआरआई के डीएन दास ने किया। सत्र में सभी सहभागियों ने सिलसिलेवार ढंग से अपने-अपने सबन्धित विषय पर प्रस्तुति दी। प्रथम सहभागी के रूप मे डॉ आमोद गुर्जर ने अपने शोध के अंतर्गत आनेवाली विभिन्न प्रक्रियाओं तथा टूल्स- टेकनिक्स की बात की। प्रस्तुति के दरम्यान उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में प्रयुक्त विभिन्न पद्धतियां जैस-पीआरए, आरआरए पर चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने पीएलए को केंद्र मे रखते हुए ग्रामीण क्षेत्र की सहभागिता पर अपनी बात रखी। प्रस्तुति के बाद प्रश्नोत्तरी में Practice Based Research Methodology पर बात हुई। दूसरे प्रतिभागी के रूप में डॉ. शिवसिंह बघेल ने शोध-प्रविधि के अंतर्गत आनेवाली पीआरए, आरआरए तथा एलएफए की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अपनी प्रस्तुति की। पीआरए पर विशेष रूप से बात करते हुए उन्होंने सोशल मैपिंग, चपाती डायग्राम तथा अन्य मैट्रिक्स पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने आगे बताया कि ग्रामीण सहभागिता के लिए गावों में प्रवेश करते ही पहले 'ट्रांज़िट वाक' करना पड़ता है। जिसमें गाँव के प्रति ज़्यादातर जानकारी शोधकर्ता को प्राप्त किया जा सकता है। सामाजिक मानचित्रण पर बात करते हुए उन्होंने गाँववालों को इस प्रक्रिया में सहभागिता की तकनीकों के बारे में बताया।
रिसोर्स मैपिक पर बात करते हुए ग्रामीणों की सहभागिता से ग्रामीण संसाधन की पहचान करने की तकनीक पर भी बात की। इसके बाद चपाती डायग्राम तथा Service Mapping के उपयोग की भी उन्होंने चर्चा की। डॉ. बघेल ने पीआरए के साथ-साथ एलएफए की प्रविधि की भी संक्षिप्त चर्चा की। इसके साथ ही केंद्र के विद्यार्थियों के द्वारा सेवाग्राम गाँव में प्रयुक्त पीआरए प्रविधि के अंतर्गत किए गए कार्य को भी उन्होंने प्रस्तुत किया।
            सत्र को आगे बढ़ाते हुए केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने ग्रामीण क्षेत्र में क्षेत्र सबंधी परियोजना पर शिक्षकों के सामने विभिन्न क्षेत्र तथा सुझाव प्रस्तुत किया। उन्होंने शिक्षकों का इस ओर ध्यान केन्द्रित किया कि हमें आदर्शवादी तरीके के बजाय इसे गाँव के लोगों की स्वीकार्यता से जोड़ना होगा। हम क्या चाहते हैं, इससे ज्यादा जरूरी है कि गाँव के लोग क्या चाहते हैं। इसी को मद्देनजर रखते हुए शोधकर्ता को गैप ढूँढने की कोशिश करनी होगी। अपने अनुभव बताते हुए उन्होंने बिहार के ग्रामीण क्षेत्र में प्रयुक्त पीएसपी की उपयोगिता को भी इसके साथ जोड़कर देखने की बात की। गांवों में कार्य करते समय एक दिन में समझकर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढा जा सकता, उसके लिए छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर गहन कार्य करने की आवश्यकता है।
            अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने सभी शिक्षकों से यह निवेदन किया कि दो दिन के क्षेत्र-कार्य में आपके द्वारा किए जाने वाले कार्य का कच्चा ड्राफ्ट तैयार करने की अपेक्षा जाहिर की। साथ ही उन्होंने शिक्षकों से यह अपेक्षा जाहिर की कि हम लोगों को ग्रामीण भारत के लोगों की प्राथमिकता तय करने में उनकी मदद करनी होगी अन्यथा उनका भटकाव देश के विकास को अवरुद्ध करेगा। गांधी, कुमारप्पा एवं शुमाखर की बात उद्घृत करते हुए उन्होंने इसके भटकाव को रोकने की प्रविधि को अपनाने पर ज़ोर दिया।
            सत्र में आगे नागपुर से आयी प्रतिभागी डॉ. समृद्धि डाबरे ने ग्रामीण महिलाओं से संबन्धित मुद्दों पर कार्य करने की जिज्ञासा व्यक्त की। डॉ. पल्लवी शुक्ला ने अपने विषय - पर्यावरण पर बात करते हुए सामाजिक पर्यावरण के अध्ययन में अपनी रुचि जाहिर की। अगले प्रतिभागी अभिषेक त्रिपाठी ने गांवों को समझने में नैतिकता की ओर ध्यान केन्द्रित किया। पार्थसारथी मणिकाम ने शोध एवं पाठ्यक्रम को एक-दूसरे के साथ जोड़ने की बात करते हुए कहा कि व्यावसायिक जीवन से बाहर निकलकर स्वतः प्रयत्न से आगे निकलना होगा। उन्होंने आगे थ्योरी एवं प्रैक्टिकल को जोड़ने की संभावना पर अपनी बात रखी। इसके लिए कम से कम 15 दिन से लेकर 1 माह तक क्षेत्र में रहकर समुदाय के जीवन को समझने की आवश्यकता जताई। साथ ही सहभागिता को महत्वपूर्ण टूल्स बताया। सुझाव देते हुए उन्होंने पिछले तीन दिनों के अनुभवों को शेयर करते हुए इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया कि सेसन लेक्चर मोड से ज्यादा समस्या ओरिएंटेड तथा प्रश्नोत्तरी आधारित होना चाहिए। श्री वाघमारे तथा डॉ. भरत खंडागले ने यह सुझाव दिया कि लेक्चर मेथड के साथ विडियो विजुअल का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करने की बात की तथा प्रतिभागियों से फीडबैक लेने की महत्ता को रेखांकित की।

चतुर्थ सत्र में समूह '' ने Socio-Economic and Educational Problem पर अपनी बात रखी। इसमें डॉ. सोनवाने, डॉ. सतपुते तथा अन्य ने अपनी प्रस्तुति दी। ग्रामीण विकास के समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने विभिन्न स्टेक होल्डरों को साथ लेते हुए ग्रामीणों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं पर अपनी बात रखी। इस कार्य में विभिन्न राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय तथा स्थानीय संगठनों की भूमिका का महत्व रेखांकित किया। पर्यावरणीय मुद्दों का घटना अध्ययन करते हुए उन्होंने अपनी बात रखी। समाज कार्य प्रविधियों में से एक सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य की 'सहायक प्रक्रिया' पर बात रखी। जिसमें उन्होंने 'एडिक्सन' की समस्या पर विस्तृत चर्चा की। इसके अंतर्गत एडिक्सन के विभिन्न प्रकारों व उसकी विशेषताएँ तथा उसके शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक आदि प्रक्रियाओं पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसको समझने के लिए उसके विभिन्न कारणों की चर्चा की। इसी कड़ी में आगे डॉ. अशोक सातपूते ने भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर अपनी बात रखी। इसमें उन्होंने जनसंख्या वृद्धि के कारणों तथा प्रभावों को बताते हुए उन्होंने उसके समाधान की बात की। इन समाधानों में समाज के विभिन्न संस्थाओं एवं संगठनों की भूमिका की चर्चा की। प्रस्तुति के अंत में 'भूमिका निर्वहन' में एडिक्सन समस्या में सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य की उपयोगिता को प्रस्तुत किया।
            सत्र के अंत में डॉ. मुकेश कुमार ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के मेंढ़ा-लेखा मॉडल विलेज की संक्षिप्त चर्चा की। तदुपरान्त एनसीआरआई के डीएन दास ने धन्यवाद ज्ञापन किया।


रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, गजानन एस. निलामे, डिसेन्ट कुमार साहू, सुधीर कुमार, माधुरी श्रीवास्तव, खुशबू साहू एवं सोनम बौद्ध.

Wednesday, March 21, 2018

वर्धा : संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के तीसरे दिन ग्रामीण स्वास्थ्य और कृषि समस्या पर हुई चर्चा



वर्धा, 21 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के तीसरे दिन के प्रथम चर्चा सत्र 'विश्वविद्यालयों का समाज से जुड़ाव की आवश्यकता' विषय पर गांधी ग्राम रुरल इंस्टीट्यूट तमिलनाडु एवं उत्तरप्रदेश के चित्रकूट विश्वविद्यालय के कुलपति रहे एग्रोइंडस, वर्धा के निदेशक प्रो. टी. करुणाकरण ने संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा और समाज के बीच गहरा अंतरसंबंध होता है। वर्तमान शिक्षा पद्धति किताबी हो गई है। भारत में शिक्षा व्यवस्था अत्यंत ही समृद्ध रही है। हमारे यहाँ प्राचीन भारत में नालंदा विश्वविद्यालय जैसा शिक्षा का विश्व प्रसिद्ध हुआ करता था। पुराने समय की गुरुकुल पद्धति में स्वावलंबी जीवन दर्शन की शिक्षा गुरु के सान्निध्य में दी जाती थी। नालंदा विश्वविद्यालय का समाज से गंभीर जुड़ाव था और विश्वविद्यालय समाज पर निर्भर था।
स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन विश्वविद्यालय बनाया था। वहाँ श्रीनिकेतन था, जो ग्रामीण समुदाय से जुड़ा हुआ था। जिसे उनके शिष्य जी. रामचंद्रन ने 'गांधीग्राम रुरल विश्वविद्यालय' के रूप में आगे विकसित किया था। उन्होंने कहा कि देश के मौजूदा विश्वविद्यालय अत्यंत ही बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं। विश्वविद्यालय ज्ञान का केंद्र है। इस ज्ञान का समाज के बदलाव-विकास में भूमिका होनी चाहिए। टैगोर और गांधी ने शिक्षा और समाज के बीच तालमेल स्थापित करने का प्रयास किया था। गांधी की बुनियादी शिक्षा पद्धति शिक्षा का बेहतरीन मॉडल है। शिक्षा को व्यवहारिक और प्रायोगिक दोनों होना चाहिए। सिद्धान्त और व्यवहार के बीच समुचित तालमेल आवश्यक है।
 उन्होंने टैगोर, गांधी के साथ-साथ उत्तरप्रदेश के चित्रकूट विश्वविद्यालय के शिक्षा मॉडल की चर्चा की। आदर्शवाद और व्यवहारिकता के बीच तालमेल की जरूरत को भी उन्होंने रेखांकित किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वर्तमान हालात को बदलने में शिक्षण शालाओं की भूमिका होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में लाखों ग्राम पंचायत हैं। किन्तु ग्राम पंचायतों के अधिकार और कर्त्तव्य की लोगों को कोई समुचित जानकारी तक नहीं है। पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित किए जाने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। विश्वविद्यालयों की इस कार्य में भूमिका हो सकती है। विश्वविद्यालयों का समाज को अपराधीकरण से मुक्त करने में तथा सामाजिक चुनौतियों के सार्थक समाधान में अहम योगदान हो सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को सृजनात्मक कार्य की तरफ बढ़ना होगा।
सत्र के अंत में प्रतिभागियों ने भी अपनी जिज्ञासा रखी जिसका समाधान विषय विशेषज्ञ ने किया। सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया और धन्यवाद एनसीआरआई के डी. एन. दास ने किया।

महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के डिपार्टमेन्ट ऑफ मेडिसिन के प्रो. प्रदीप देशमुख ने 'सामुदायिक सशक्तिकरण : पद्धति और तकनीक' विषयक चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि सामुदायिक सशक्तिकरण अत्यंत ही प्रचलित शब्द है। समुदाय के साथ अंतरसंबंध स्थापित करते हुए ही सामुदायिक सशक्तिकरण किया जा सकता है। समुदाय की जरूरतों की शिनाख़्त करते हुए उसे प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाना आवश्यक है। समुदाय के साथ अर्थपूर्ण ढंग से जुड़ाव के जरिए सामुदायिक सशक्तिकरण के लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है। सामुदायिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया में यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि सभी किस्म की शक्तियाँ समुदाय को अनिवार्य तौर पर हस्तांतरित हों। पीआरए प्रक्रिया की भी उन्होंने विस्तृत चर्चा की। सत्र का संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया।

तीसरे दिन भोजनावकाश के उपरांत चर्चा सत्र में राष्ट्रीय संत तुकड़ोजी महाराज विश्वविद्यालय, नागपुर के राजनीति विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विकास जांभुलकर ने 'पॉलिसी प्लानिंग इन इंडिया' विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत में शहरी और ग्रामीण प्लानिंग अलग-अलग है। इसी कारण 'इंडिया' और 'भारत' की भी संकल्पनाएँ चर्चा में आती रहती हैं। प्लानिंग की पूरी प्रक्रिया में नौकरशाही की प्रधान भूमिका होती है और नौकरशाही के सोचने का अपना अलग ढर्रा होता है। प्लानिंग में विश्वविद्यालय महज बाजार की जरूरतों के अनुरूप वर्कर तैयार करने का केंद्र मात्र बनकर रह गया है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना 2016 से चल रही है। इससे पूर्व इंदिरा आवास योजना चलाई जा रही थी। अभी ग्रामीण क्षेत्र के लिए 1, 20,000 रुपए की राशि आवास के लिए दी जा रही है। दुर्गम क्षेत्र के लिए एक लाख तीस हजार रुपए दिए जाते हैं। इस योजना में 20 हजार घर बनाने वाले कारीगरों को वर्ष 2022 तक ट्रेनिंग दिए जाने की भी योजना है। उसी प्रकार मनरेगा योजना में वर्ष 2017-18 के लिए 48 हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस योजना के तहत कंक्रीट की सड़कें बनी है, गाँव को नजदीकी मुख्य सड़क से जोड़ा गया है। सरकार ने 'मेरी सड़क' नाम से एप भी शुरू किया है, जिसपर शिकायत दर्ज किया जा सकता है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर चलाई जाने वाली कई महत्वपूर्ण योजना, उसके निर्धारित लक्ष्य, योजना हेतु आवंटित की जाने वाली राशि आदि की विस्तृत चर्चा की। उन्होंने बताया कि दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल विकास योजना के 2 लाख लक्ष्य के विरुद्ध अब तक मात्र 83 हजार लोग ही प्रशक्षित किए जा सके हैं। और इसमें से मात्र 40 हजार लोगों को ही जॉब दिया जा सका है। उन्होंने योजनाओं के निर्माण के पीछे की राजनीति की भी चर्चा करते हुए कहा कि योजनाओं के निर्माण में लक्षित समूह का प्रतिनिधत्व ही नहीं होता, यह भारी कमी है।

तीसरे दिन के अंतिम चर्चा सत्र में विदर्भ के किसान आंदोलन एवं सर्व सेवा संघ से जुड़े चर्चित किसान नेता अविनाश काकड़े द्वारा भारत में कृषि परिवर्तन पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कृषि परिवर्तन को उच्च स्तर पर जाकर देखना होगा। समाज द्वारा कृषि को देखने के नजरिए को हमें समझना होगा। भारतीय कृषि पर यहाँ की जाति, वर्ग से लेकर आज के ग्लोबलाइजेशन आदि प्रक्रियाओं का असर पड़ा है। भारतीय कृषि व्यवस्था की समस्याओं को सरकार के सामने लाने का कार्य पहली बार ज्योतिबा फुले द्वारा 18वीं सदी में हुआ। उन्होंने 'किसान का कोड़ा' नामक अपनी पुस्तिका में जो समस्याएं बतायी थी वह आज भी अनुत्तरित है।
1930 के बाद की कृषि में कुछ खास परिवर्तन नहीं हुआ है। उस समय कृषि उत्पादन का मूल्यांकन उसी वर्ष के आधार पर होता था, जिस वर्ष फसल अच्छी होती थी। आंदोलनों से कृषि मुद्दे जुड़े थे, जैसे कि नील खेती का आंदोलन। ऐसे कई सारे मुद्दों की ख़ासी भूमिका आज़ादी आंदोलन में रही है। उन्होंने आगे कहा कि अंग्रेजों के समय में अंग्रेजों ने अपनी व्यवस्था के लिए यहाँ पाटिल, कुलकर्णी तथा देशपांडे जैसे वर्ग का निर्माण किया था किन्तु आज़ादी के बाद 'लगान' पद्धति को बंद कराया गया था, जिसके चलते कृषकों को 50% तक हिस्सा सरकार को देना पड़ता था।
उन्होंने आगे कहा कि सौ में से 99 फीसदी कृषकों में अपने व्यवसाय के प्रति अज्ञानता है। इसके कारण उनका बड़े पैमाने पर शोषण हुआ है। आज़ादी के बाद की सरकारों ने कृषि सुधार हेतु निम्न कार्य किए- जमींदारी उन्मूलन कानून, सीलिंग कानून, देश में कृषि उत्पादन की बढ़ोत्तरी हेतु प्रयास करना आदि कई महत्वपूर्ण कार्य किए गए थे। इन सभी मामलों को लेकर केंद्र व राज्य की सरकारों ने कई कार्य किया किन्तु जनसंख्या नियंत्रण जैसे चीज छुट गई। आज हम जितना उत्पादन कर रहे हैं उतने में ही काफी हो जाता, अगर हमने शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों पर ध्यान दिया होता। नतीजतन इतनी बड़ी जनसंख्या का भार कृषि पर पड़ने लगा और जमीन का छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटवारा होने लगा। 80 फीसदी कृषक अन्य भू-धारक के रूप में तब्दील हो गए। 2011 का एक सर्वे बताता है कि गांवों के 39 फीसदी लोगों के पास अब जमीन ही नहीं बची है। स्वतन्त्रता के बाद 4 फीसदी एरिगेशन को हम 40 फीसदी पर ले गए। 8 करोड़ हेक्टेयर एरिगेशन तथा बड़े बांधों से तथा 12 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर खेती की जा सकती है। लेकिन सुरक्षित खेती के लिए कम से कम 50 से 60 फीसदी एरिगेशन होना चाहिए। ऐसे में हमारा यह लक्ष्य एरिगेशन क्षेत्र का विस्तार करना होना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा 75 लाख हेक्टेयर जमीन के एरिगेशन का लक्ष्य रखा गया और 10-12 लाख हेक्टेयर ही अब तक पहुँच पाया है।

अंत में उन्होंने यह कहा कि जब हम सोचते हैं कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है तब हमें अपनी ओर देखना होगा। बिना शिक्षा के किसानों की समझ में नहीं आएगा कि हमें करना क्या है। हमारे साथ क्या हो रहा है? उचित शिक्षा से ही उनका विवेक जागृत हो सकता है। इसके बाद ही वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकेंगे। उन्होंने कहा कि भारत का विकास खेती के विकास के बगैर मुमकिन नहीं है। भारत की शुरुआती दो पंचवर्षीय योजनाएँ कृषि से संबन्धित रही है। 80 के दशक के पूर्व लोग नौकरी से ज्यादा खेती को प्राथमिकता देते थे। किन्तु आज स्थिति ऐसी होती जा रही है कि लोग खेत बेचकर चपरासी की भी नौकरी करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने आज़ादी के पूर्व भारत में हुए किसानों के आंदोलन का जिक्र किया। उन्होंने महात्मा फुले, महात्मा गांधी से लेकर अन्य नेताओं के योगदानों की चर्चा की। उन्होंने आज़ादी के बाद किसानों के हित में उठाए गए कदमों की भी विस्तृत चर्चा की। आज़ादी के बाद किसानों का लगान माफ कर दिया गया। पूर्व में अंग्रेज़ बड़े पैमाने पर किसानों से लगान वसूलते थे। उन्होंने कहा कि कृषक आज भी अपने व्यवसाय को लेकर, बाजार को लेकर अशिक्षित हैं। किसान आज कर्ज में डूबते जा रहे हैं। पूर्व में भी अंग्रेजी राज में किसान महाजनों के कर्ज में डूबकर अपनी जमीन गंवा बैठते थे। आज वे आत्महत्या करने पर विवश हैं।  
उन्होंने कहा कि भूमि उसी की होनी चाहिए जो कृषि का कार्य करें। विनोबा जी को 42 लाख एकड़ जमीन दान में मिली थी, किन्तु उसमें से आधी से ज्यादा खेती योग्य नहीं थी। केवल 12 लाख एकड़ जमीन ही वितरित हो पायी है। सरकार ने सीलिंग एक्ट बनाया, सीलिंग से फाजिल भूमि एक हद तक ही किसानों के बीच वितरित की जा सकी। भारत में कृषि के लिए आवश्यक सिंचाई व्यवस्था का अभाव आज भी बना हुआ है। यहाँ की ज्यादातर खेती मानसून पर निर्भर है। 1200 लाख हेक्टेयर भूमि असिंचित है जबकि सरकार का लक्ष्य मात्र 75 लाख हेक्टेयर सिंचित करने का ही है, जो 10 फीसदी से भी कम है। इस सत्र का संचालन डॉ. मुकेश कुमार ने किया और आभार ज्ञापन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया।

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, गजानन निलामे, नरेश गौतमडिसेन्ट कुमार साहू, सुधीर कुमारकुमारी आशु, माधुरी श्रीवास्तव, खुशबू साहू एवं सोनम बौद्ध.


Tuesday, March 20, 2018

संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के दूसरे दिन ग्रामीण समुदाय की समस्याओं पर हुई गहन चर्चा


वर्धा, 20 मार्च 2018. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र एवं राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यशाला के दूसरे दिन चर्चा सत्र के पूर्व पाँच राज्यों के विभिन्न विश्वविद्यालय से आए प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए।

दूसरे दिन के प्रथम चर्चा सत्र में मातृ सेवा संघ इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क, नागपुर के एसोसिएट प्रोफेसर केशव वाल्के ने 'ग्रामीण समुदाय की समस्याएं' विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत की लगभग 70 फीसदी आबादी गाँवों में रहती है। आज विकास के नाम पर गाँव की भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। इससे विस्थापन की समस्या पैदा हो रही है। महाराष्ट्र सरकार की इस वर्ष 13 करोड़ वृक्ष लगाने की योजना है तब सवाल यह उठता है कि क्या इतनी जमीन उपलब्ध है। वहीं दूसरी तरफ अंबानी व रामदेव जैसे व्यापारियों को राज्य की सैकड़ों एकड़ वनभूमि दी गई है। अंतर्विरोधी बात तो यह भी है कि पूंजीपतियों को कृषि भूमि वनभूमि तो दी जा रही है किन्तु भूमिहीनों को जमीन नहीं दी जा रही है। भूमि अधिग्रहण के बदले किसानों को मुआवजे के बतौर पैसे दिये जा रहे हैं। इस पैसे का सदुपयोग होने के बजाय विलासिता की वस्तुओं को खरीदने में खर्च हो रहा है। आज विस्थापित परिवारों की स्थिति बेहद दयनीय होती जा रही है। विस्थापितों के मुकम्मल पुनर्वास की सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है। रोजगार नहीं होने की वजह से अपराधीकरण बढ़ रहा है। गाँव में रहने वाले ज़्यादातर लोग कृषि पर निर्भर हैं। मिट्टी और कृषि की समुचित जानकारी के अभाव में बहुफ़सली कृषि नहीं हो पा रही है। सरकार ने योजना में सभी के लिए ऑन लाइन आवेदन करने का प्रावधान किया है। किन्तु गाँव के लोगों को इसकी समुचित जानकारी ही नहीं है। कर्जमाफ़ी वगैरह को भी सही ढंग से जमीन तक पहुंचाया जा सका है। किसानों को सही वक्त पर बैंक से लोन नहीं मिल पाता है। इसके विपरीत समर्थ लोगों को सैकड़ों करोड़ रूपये का लोन आसानी से मिल जाता है और वे पैसा हजम कर जा रहे हैं।
            उन्होंने महाराष्ट्र में वन अधिकार प्राप्त करने वाले आत्मनिर्भर गाँवों की भी विस्तृत चर्चा की। उन्होंने बताया कि गाँव की सबसे बड़ी समस्या रही है कि यहाँ भूमि का वितरण अत्यंत ही असमान है। गाँव की जमीन आज शहर के धनी लोग खरीद ले रहे हैं। टाइगर रिजर्व आदि के नाम पर किसानों की जमीन तो ले ली जा रही है किन्तु वही जमीन बड़े-बड़े रेस्टोरेन्ट और होटल खोलने के लिए पूंजीपतियों को मुहैया कराई जा रही है। गाँव वालों की जमीन अधिग्रहण कर जो जल परियोजनाएं बन रही हैं, उसके लाभ से भी गाँव वंचित हो रहा है। गाँवों का पानी शहरों को आपूर्ति की जा रही है। ग्रामीण संसाधनों के लाभ से गाँव को वंचित करते हुए उसे शहर के हवाले किया जा रहा है। पूरे देश में बाघ अभयारण्य में से 6 अकेले विदर्भ में ही हैं। विदर्भ का पूरा जंगल अगर आरक्षित है तो गाँव के पशु कहाँ जाएंगे? आज यह सवाल उठ खड़ा हुआ है। मध्यप्रदेश के 90 गाँव बाघ परियोजना के दायरे में आ गए हैं। वहीं दूसरी तरफ जनपक्षधर क़ानूनों को राष्ट्रीय विकास का तर्क देते हुए बदला जा रहा है। ग्राम सभाओं के अधिकारों को अध्यादेश के जरिये छीना जा रहा है। परियोजनाओं के लिए भूमि दिये जाने का निर्णय लेने का अधिकार ग्राम सभा से अपहृत कर लिए गए हैं। जिनकी जमीनें अधिग्रहित की जाती हैं उन्हें प्रशिक्षण देकर उच्च पदों पर नौकरी देने के बजाए उन्हें चपरासी और गार्ड आदि की नौकरियों तक सीमित कर दिया जाता है। उन्होंने गाँव में व्याप्त अशिक्षा की समस्या की भी विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि गाँव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। जहां गाँव के स्कूल खिचड़ी विद्यालयों में तब्दील हो चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ शहरों-कस्बों में निजी स्कूल-अंग्रेजी स्कूल खुल गए हैं। गाँव के स्कूल भवन मात्र बनकर रह गए हैं। आज भी सरकारी स्कूलों में जातिगत भेदभाव जारी है। कमजोर तबकों के छात्रों के लिए चलाई जा रही योजनाएं भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रहा है। गाँव में स्वास्थ्य सुविधाओं का भी भारी अभाव बना हुआ है। आशा कार्यकर्ताओं और आंगनबाड़ी केन्द्रों पर गाँव की स्वास्थ्य व्यवस्था निर्भर है। बीमार पड़ने पर ग्रामवासियों को नजदीकी शहर जाना पड़ता है। गाँव से शहर तक पहुँचने हेतु समुचित यातायात सुविधाओं का आज भी भारी अभाव है। सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों में चिकित्सकों और स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है। सरकारें पूँजीपतियों को तो कर्जमाफी दे रही है। किन्तु गरीबों- किसानों से ब्याज समेत पाई-पाई वसूल कर रही है आज लोग स्वकेन्द्रित स्वार्थी होते जा रहे हैं। लोगों की मानसिकता बदल गई है या यूं कहें कि बाजारवाद ने इसे बदल दिया है। गाँव में आज निवेश की मात्रा न्यून है। ज़्यादातर निवेश शहर केन्द्रित हो रहा है। सिंचाई की व्यवस्था भी संकटग्रस्त है। डैम बन गए हैं, लेकिन पानी निकासी के लिए कैनल नहीं बन पाये हैं।
            आगे उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल और राजनेताओं की प्राथमिकता में भी गाँव की बदहाली दूर करना शामिल नहीं रह गया है। आज डिजिटल इंडिया की बात तो हो रही है पर देश की 30 फीसदी आबादी निरक्षर है। आधारभूत सुविधाओं की गारंटी के बगैर गाँव का विकास मुमकिन नहीं है। दूसरे देशों की परिस्थितियां भिन्न है, उसकी हु-ब-हु नकल भारत में नहीं की जा सकती है। भारत में आज भी अंधविश्वास बड़े पैमाने पर व्याप्त है, जो फिजूलखर्ची को बढ़ावा देता है। सामाजिक कुरीतियां भारतीय समाज के विकास में बहुत बड़ी बाधक हैं। भारत के गाँव के लोगों में सरकारी लोक कल्याणकारी योजनाओं और जनपक्षधर क़ानूनों की जानकारी का अभाव देखा जाता है। ग्राम पंचायत विकास कार्यक्रम भी सही ढंग से अमल में नहीं आ पाया है। सामाजिक न्याय विभाग की ढेर सारी योजनाओं से लाभुक वंचित रह जाते हैं। आज गाँव के लोगों को प्रशिक्षित करने वाले सहयोगियों का अभाव है। उपभोक्तावादी संस्कृति की चपेट में गाँव भी आ गए हैं। इस कारण कर्जखोरी की समस्या बढ़ रही है। नौकरशाही की भी गाँव की समस्या दूर करने में रुचि नहीं दिखाई पड़ती है।

दूसरे तकनीकी सत्र में 'भारत के ग्रामीण युवाओं की समस्या' विषय पर चर्चा करते हुए मातृ सेवा संघ इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क, नागपुर के एसोसिएट प्रोफेसर केशव वाल्के ने कहा कि आजकल भारत में 34.3 फीसदी युवा हैं। 13 से 35 वर्ष के लोगों को युवा कहा जाता है। युवाओं में लिंगानुपात तेजी से असंतुलित होता जा रहा है। महिलाओं की तादाद में भारी गिरावट आ रही है। बिहार, राजस्थान, चंडीगढ़, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में लिंगानुपात चिंताजनक गति से असंतुलित होते जा रहे हैं।
            ग्रामीण युवाओं को केंद्र में रखकर उनके मुद्दों को देखें तो युवाओं की शिक्षा व्यवस्था संकट में है। बेरोजगारी का सवाल भी भयावह होता जा रहा है। गाँव से युवाओं को शिक्षा, रोजगार आदि के लिए बड़े पैमाने पर पलायन करना पड़ता है। रोजगार के अभाव में युवा अपराध की तरफ जाने को विवश हैं। ग्रामीण युवाओं को राजनीतिक शक्तियों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए गुमराह किया जा रहा है। राजनीतिक दलों के आईटी सेल युवाओं को टार्गेट कर अपने स्वार्थ में इस्तेमाल कर रहे हैं। ग्रामीण युवाओं को सूचनाओं की सही जानकारी नहीं मिल पा रही है। ग्रामीण युवाओं में बाजार के अनुरूप कौशल का अभाव है। इस कारण उन्हें बाजार में काम नहीं मिल पाता है। ग्रामीण युवा नशे की गिरफ्त में भी लगातार आता जा रहा है। युवाओं के विकास के लिए सरकार कई किस्म के कार्यक्रम चला रही है किन्तु उसका समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
            विषय विशेषज्ञ के सम्बोधन के उपरांत प्रतिभागियों ने बारी-बारी से अपनी राय रखी। सत्र का संचालन डॉ. आमोद गुर्जर ने किया।

भोजन अवकाश के बाद 'ग्रामीण युवा स्त्रियों की समस्या' विषयक तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए मातृसेवा संघ इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क, नागपुर की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्योति निसवाड़े ने कहा कि युवाओं में लैंगिक स्तर पर भिन्नता मौजूद है। स्त्री और पुरुषों की समस्याओं में भिन्नता है। आज भारत को युवाओं का देश कहा जा रहा है। 2011 की जनगणना भी इसकी पुष्टि करता है। लेकिन इसका सबसे नकारात्मक पहलू यह भी है कि शिशु लिंगानुपात, युवा लिंगानुपात में काफी गिरावट दर्ज की जा रही है। लड़कियों के बाल विवाह में थोड़ी कमी आई दिखाई देती है। महिला साक्षरता दर में भी एक हद तक की वृद्धि हुई है। किन्तु पुरुष साक्षरता दर से यह आज भी कम है। रोजगार कि दृष्टि से महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों से काफी कम है। देश में जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ शिक्षण के अवसर और सुविधाओं का विस्तार हुआ है किन्तु बेरोजगारी के सवाल का हल नहीं हो पा रहा है। एक सर्वे बताता है कि आज युवाओं की नजर में गरीबी और बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है।

उन्होंने कहा कि दुनिया भर में युवाओं को शक्ति का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन युवा आज शक्ति संरचना के केंद्र में नहीं है। युवा समाज व्यवस्था का महत्वपूर्ण घटक है। किन्तु समाज की संरचना युवाओं के कितने अनुरूप है, इसे गहराई में जाकर समझने की जरूरत है। युवाओं के समाजीकरण की प्रक्रिया पर ही युवाओं के व्यक्तित्व का विकास निर्भर करता है। युवाओं में भावुकता और आक्रामकता की भावना उनके तार्किक होने के मार्ग में बाधक होती है। युवा महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक व मानसिक समस्याएं होती है। रोजगार की असुरक्षा, आर्थिक असुरक्षा व सामाजिक असुरक्षा युवा महिलाओं की प्रमुख समस्याएँ हैं।
            आगे उन्होंने कहा कि ग्रामीण युवाओं का अपने सवालों को लेकर देश के ग्रामीण हिस्सों में कोई प्रतिरोध दिखाई नहीं पड़ता। इसकी वजहें सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक संरचना और अशिक्षा में निहित है। युवा महिलाओं को समुचित सामाजिक दर्जा प्राप्त नहीं रहता है। युवा होते ही उनके परिजन उनके विवाह की चिंता करने लगते हैं। इस किस्म की सामाजिक परंपरा भी युवा महिलाओं के विकास में बाधक बनते हैं। युवा महिलाओं को अवसर की समानता नहीं मिलती है, महिलाओं को तरह-तरह का शोषण भी झेलना पड़ता है। ये सभी युवा महिलाओं के सशक्तिकरण में बाधक हैं। स्कूल छोड़ने वाले बच्चों में सबसे ज्यादा लड़कियां ही होती हैं। इस कारण वे शिक्षा से वंचित होकर रोजगार के अवसर से वंचित हो जाती है। ग्रामीण स्कूल में लड़कियों के अनुकूल व्यवस्था / संसाधन का घोर अभाव बना हुआ है। पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था में लिंग के आधार पर महिलाओं की भूमिका निर्धारण कर दी गई है। रूढ़िवादी परंपरा की बेड़ियां आज भी स्त्रियों के विकास में कदम-कदम पर बाधक बनी हुई है। ग्रामीण लड़कियों के लिए शिक्षा से ज्यादा प्राथमिकता घरेलू काम करने की ही होती है। इन कारणों से महिलाओं को आगे आने के लिए एक ही साथ कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ता है। महिलाओं को घरेलू हिंसा का भी शिकार होना पड़ता है। उनकी आजादी को तरह-तरह से प्रतिबंधित किया जाता है। इस कारण भी महिलाओं के व्यक्तित्व के समुचित विकास में बाधाएँ आती हैं। परिवार की निर्णय प्रक्रिया में युवा महिलाओं की भूमिका नाममात्र की ही होती है। ज़्यादातर मौकों पर महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया से अलग-थलग रखा जाता है।
            उन्होंने कहा कि ग्रामीण महिलाओं का एक स्वतंत्र संगठन का होना बहुत आवश्यक है तभी युवा महिलाओं का मुकम्मल सशक्तिकरण मुमकिन हो सकता है। आज ग्रामीण युवा महिलाओं को अपनी क्षमता और कौशल को दिखाने का कोई प्लेटफॉर्म मौजूद नहीं है।
            इस सत्र की चर्चा में प्रतिभागियों ने बालिकाओं की शिक्षा पर विशेष ज़ोर देते हुए कहा कि बालिकाओं को बेहतर शिक्षा के जरिये ही शोषण, विषमता आदि से मुक्ति मिल सकती है। 

कार्यशाला के दूसरे दिन के अंतिम चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. ज्योति निसवाड़े ने 'वृद्धि महिलाओं की समस्या' पर बोलते हुए कहा कि अलग-अलग समाज में वृद्धावास्था की अलग-अलग धारणाएँ हैं।  वृद्धावस्था एक यथार्थ और प्राकृतिक प्रक्रिया है। भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में हम देखते हैं कि वृद्धावस्था अत्यंत ही चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। आज पारिवारिक और सामाजिक तौर पर कई किस्म की चुनौतियां पैदा हुई हैं। 19वीं सदी में उम्र के विभाजन को इतना महत्व नहीं दिया जाता था। वृद्धावस्था में आर्थिक तौर पर उत्पादन क्षमता में कमी आ जाती है। इसके साथ ही और कई बदलाव आते हैं। जीवन प्रत्याशा औसत में बढ़ोतरी हुई है। पूर्व में वृद्धों की निर्णय प्रक्रिया में जिस प्रकार की भूमिका होती थी उसमें आज काफी बदलाव आया है। बढ़ते शहरीकरण ने नाभिक परिवारों को बढ़ावा दिया है। संयुक्त परिवार लगभग खत्म होने के कगार पर हैं। इस वजह से भी वृद्धों की स्थिति में काफी परिवर्तन आया है। आज सामाजिक से ज्यादा आर्थिक तत्व परिवार पर ज्यादा असर डाल रहे हैं। इसने भी वृद्धों की स्थिति में बदलाव लाने में अहम भूमिका अदा की है। भारतीय समाज में इन सारे तत्वों का प्रभाव देखा जा सकता है। वृद्धों में भी महिलाओं की समस्याएँ अलग किस्म की हैं, उन्हें वृद्धावस्था में परिवार के बच्चों का लालन-पालन, घरेलू काम में तो योगदान करना पड़ता ही है साथ ही घर के बाहर के काम भी इन्हें करना पड़ता है।
            सत्र का संचालन डॉ आमोद गुर्जर ने किया धन्यवाद एनसीआरआई के डी.एन. दास ने किया।   

रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, सुधीर कुमार, कुमारी आशु एवं सोनम बौद्ध.

                                                                                                                                                              


Monday, March 19, 2018

ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन


वर्धा, 19 मार्च, 2018  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र और राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय ग्रामीण सहभागिता में संकाय संवर्द्धन कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। जिसमें महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, बिहार, तमिलनाडू, नागपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर विश्वविद्यालय,  कोयंबटूर विश्वविद्यालय एवं हरियाणा के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने की और संचालन डॉ. मिथिलेश कुमार ने किया। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। स्वागत वक्तव्य देते हुए केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि अपेक्षा है कि इन सात दिनों में हम संकाय संवर्द्धन कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा करेंगे। पाठ्यक्रम का सामाजिक सरोकार स्पष्ट होना चाहिए। आज पाठ्यक्रम और समाज एक-दूसरे से जुड़ नहीं पा रहा है। पाठ्यक्रम को समाज की जरूरतों के अनुकूल और समाज को बेहतर दिशा में ले जाने वाला होना चाहिए। 

एनसीआरआई- नेशनल काउंसिल ऑफ रुरल इंस्टीट्यूट के डी.एन. दास ने उक्त अवसर पर कहा कि 1995 से एनसीआरआई कार्यरत है। इसका उद्देश्य ग्रामीण भारत के विश्वविद्यालयों को ग्रामीण जरूरतों से जोड़ना है। इसके अनुरूप पाठ्यक्रम को विकसित करने और ग्रामीण समुदाय के साथ तादात्म्य स्थापित करना ही इसका उद्देश्य है।

 अपने अध्यक्षीय वक्तब्य में प्रतिकुलपति प्रो. आनंदवर्द्धन शर्मा ने कहा कि बड़ी उत्सुकता की बात है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय और एनसीआरआई मिलकर सात दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन कर रही है। आपको बताना चाहूँगा कि यह कार्य बहुत बड़ा है। विश्वविद्यालया में वर्ष भर में बहुत से कार्यक्रम होते हैं जो कि बड़ी छाप छोड़ते हैं। उन्होंने उक्त मौके पर कहा कि महात्मा गांधी और विनोबा की कर्मभूमि पर आयोजित हो रही इस कार्यशाला से ग्रामीण क्षेत्र और ग्रामीण विकास से संबन्धित पाठ्यक्रम विकसित करने में मदद मिलेगी। उन्होंने इस कार्यशाला की सफलता के लिए शुभकामना व्यक्त की। उदघाटन सत्र के अंत में आभार प्रकट करते हुए विश्वविद्यालय के कुलसचिव कादर नवाज खान ने कहा कि उम्मीद है कि देश के विभिन्न हिस्सों से आए समाज कार्य के प्राध्यापक इस कार्यशाला से नए अनुभव लेकर जाएंगे।

'ग्रामीण समुदाय का परिचय और संवेदनशीलता' विषयक प्रथम चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए स्नातकोत्तर समाजशास्त्र विभाग, संत तुकड़ोजी महाराज विश्वविद्यालय, नागपुर के प्रो. अशोक बोरकर ने पुरातात्विक सर्वेक्षणों के हवाले से प्राचीनकालीन सामाजिक संरचना के बारे में विस्तारपूर्वक बताया। पुरातात्विक अवशेषों से हमें उत्पादक जातियों के अवशेष मिलते हैं। मातृदेवी, यक्ष-यक्षणी के भी अवशेष मिलते हैं, इसके बाद वैदिक साहित्य से भी हमें पुराने समाज की जानकारी प्राप्त होती है। वैश्यों-क्षत्रियों के गाँव की भी हमें जानकारी मिलती है। हमें आदिवासी गांवों के बारे में भी अहम जानकारियाँ प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि गोंडों का सामुदायिक बोध और पंचायत व्यवस्था अत्यंत ही सुदृढ़-विकसित व्यवस्था आज भी कायम है। उन्होंने कहा कि गाँव एक समुदाय है, उसमें सामुदायिक भावना है। गाँव के लोग सामान्य जीवन जीते हैं। कृषि उनका प्रमुख व्यवसाय है। ग्रामीण समुदाय में एक्य भाव होता है। भारत में हर दौर में सामाजिक व्यवस्था पर सबसे ज्यादा ज़ोर दिया जाता रहा है। कृषि समस्या पर फोकस नहीं किया जाता रहा है। 18वीं सदी में महात्मा फुले ने ही इस पर मजबूती से अपनी बात रखी है। अंग्रेजों के भारत आने के पूर्व भारत के गाँव को स्वयंपूर्ण इकाई मानते थे। प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे की मान्यता थी कि भारत के गाँव स्वयंपूर्ण नहीं थे। कई मामलों में ये गाँव एक-दूसरे पर निर्भर थे। दुबे ने ग्रामीण व्यवस्था के अपने महत्वपूर्ण अध्ययन के निष्कर्ष के आधार पर उक्त बातें कही थी। पश्चिमी समाजशास्त्री राबर्ट रेडफ़ील्ड के विचारों से एस.सी. दुबे के विचार मेल खाते हैं।

आगे उन्होंने कहा कि परिवार भारतीय गाँव की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। उसके बाद दूसरी सबसे महत्वपूर्ण इकाई जाति व्यवस्था है। गाँव में वर्चस्वशाली परिवार गाँव के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक मसलों को नियंत्रित करता है। इन्के परिवार के रिश्तेदार भी इसमें अहम भूमिका अदा करते हैं। उसी प्रकार जाति संरचना भी कार्य करती है। इसका स्थान परिवार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इस प्रकार वर्चस्वशाली जातियों का ग्रामीण समाज पर पूरी तरह से नियंत्रण रहा है। जाति व्यवस्था की संरचना सीढ़ीनुमा है। जाति-वर्ग की संरचना में ब्राम्हण और अस्पृश्य का स्थान नियत होता है, बाकि जाति-वर्ण का स्थान बदलता रहता आया है। उन्होंने कहा कि सरकार की बहुत सारी योजनाएँ अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाती हैं, इसकी जड़ें भी जाति वयवस्था में निहित हैं। गांवों में आज भी अंधविश्वास, जातीय हिंसा और जजमानी व्यवस्था कायम है। इसी के चलते पहले भी गांवों में श्रमिकों का शोषण किया जाता था। अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व भारत में कृषि के साथ-साथ वस्त्र उद्योग और चर्म उद्योग का जाल बिछा हुआ था। यही कारण है कि हर कोई किसी न किसी प्रकार से जीवित रह लेता था। भारत में संयुक्त परिवार कृषि व्यवस्था के अनुकूल थे। देश के वर्तमान कृषि संकट को इसके आईने में समझने की जरूरत है।
            उन्होंने कहा कि गांधी के आगमन के पूर्व भारत का स्वतंत्रता आंदोलन शहर केन्द्रित था। गांधी ने इस केंद्र को बदलकर गाँव केन्द्रित किया था। गांधी की मान्यता थी कि अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भारत के गाँव समृद्ध व साधन संपन्न थे। गांधी के लिए भारत की स्वतंत्रता का अर्थ गांवों की स्वायत्ता थी। वहीं डॉ. अंबेडकर और नेहरू की गांवों के संबंध में दृष्टि भिन्न थी। इनके अनुसार गांवों में लोगों के कर्त्तब्य तो परिभाषित थे, किन्तु ज़्यादातर लोगों के कोई अधिकार नहीं थे। गाँव गणतन्त्र नहीं था, क्योंकि गाँव पर वर्चस्वशाली जातियों का ही आधिपत्य कायम था। वर्चस्वशाली जातियों का आर्थिक संसाधनों व राजनीतिक व्यवस्था आदि पर वर्चस्व रहा है। नेहरू जाति आधारित श्रेणीक्रम को आधुनिक समाज के लिए अनुपयोगी मानते थे। जाति-व्यवस्था मानवाधिकारों के हनन करने के साथ-साथ अवसरों की असमानता के लिए जिम्मेदार रही है। जबकि डॉ. अंबेडकर राजनीतिक लोकतन्त्र के साथ-साथ सामाजिक लोकतन्त्र की बात करते हैं। डॉ. अंबेडकर ने भारतीय सभ्यता को हिन्दू सभ्यता करार देते हुए कहा कि इसमें अस्पृश्यों के लिए कोई स्थान नहीं था। संविधान सभा का बहुमत चाहता था कि गाँव स्वतंत्र भारत की इकाई बने, अंबेडकर इसके खिलाफ थे।

भोजनावकाश के उपरांत 'ग्रामीण समाज की आर्थिक और राजनीतिक संरचना' विषय पर केन्द्रित चर्चा सत्र प्रारम्भ हुआ। विषय विशेषज्ञ नागपुर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रो. श्रीनिवास खानदेवाला ने कुछ सवालों के जरिये अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि क्या भारतीय समाज का राजनैतिक ढांचा पर्याप्त है? उसी प्रकार क्या भारतीय समाज का आर्थिक ढांचा संतोषजनक है? इस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। राजनैतिक पहलू का निर्माण समाज के नियंत्रण कायम किए जाने की जरूरतों के फलस्वरूप होता है। अनियंत्रित समाज का वांछित विकास नहीं हो पाता है, इसमें बिखराव, दिशाहीनता की संभावना बनी रहती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए राजतंत्र का निर्माण हुआ था। स्वतंत्रता के बाद भारत ने जनतंत्र स्वीकार किया। इससे पूर्व पुराने जमाने में आम लोग राजतंत्र में इतना यकीन रखते थे कि राजा की मृत्योपरांत राजा के छोटे से छोटे बच्चे को राजा के बतौर स्वीकार कर लेते थे। फिर राजा को शिक्षित-प्रशिक्षित करने की व्यवस्था थी। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज अभी पूरी तरह से लोकतान्त्रिक नहीं हुआ है। अमेरिका आदि देशों में राष्ट्रपति को सुझाव देने हेतु अलग-अलग विभागों की अलग-अलग सलाहकार समिति बनी हुई है जिसके सुझावों पर राष्ट्रपति अमल करते हैं।
            भारत में आज भी निर्णय प्रक्रिया में इस किस्म की परिपक्वता का अभाव देखा जा सकता है। इसका परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है। इसलिए लोककल्याण और सरकार के नीति निर्धारण में कमी रह जाती है। इसके बीच तालमेल की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए। जनतंत्र में निर्णय प्रक्रिया में विभिन्न समूहों से आए लोग शामिल होते हैं। लोगों की आकांक्षाएँ और सरकार की ज़िम्मेदारी के बीच भी सुस्पष्ट संबंध है। इन चीजों को संविधान निर्धारित करता है। संविधान देश के भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। भारतीय संविधान के संदर्भ में देखें तो सांस्कृतिक, धार्मिक, जातीय, प्रजातीय बहुलता वाले देश में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सबका कल्याण संविधान में सुनिश्चित किया जा सके। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत यात्रा के दौरान यह व्यक्त किया था कि कैसे अपनी विभिन्नताओं को अपने संविधान में समायोजित किए हुए है। जबकि विश्व के अन्य देशों में ऐसी समस्या नहीं है क्योंकि वहाँ की जनसंख्या कम है। भारतीय राजनेताओं को भी भारतीय संस्कृति, धर्म एवं इतिहास का ज्ञान होना चाहिए तभी वो भारतीय विविधताओं का संयोजन कर सकेंगे।

आगे उन्होंने कहा कि राजनैतिक संरचना कौन बनाता है? इसपर किसका प्रभाव है, क्या सभी इससे संतुष्ट हैं? इसपर भी चर्चा आवश्यक है। क्या सभी संविधान से संतुष्ट हैं इसपर भी चर्चा आवश्यक है। क्योंकि समाज इस पर दबाव डालता है। वर्तमान में राजनीतिक शक्ति का हस्तांतरण बाजार के हवाले होता जा रहा है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी अहम चीजों की कीमत बाजार तय कर रहा है। लोक कल्याण के कार्य आज बाजार की भेंट चढ़ रहे हैं। देश में ऐसे आर्थिक निर्णय लिए जा रहे हैं, जिसे किसी भी मायने में जनतान्त्रिक नहीं कहा जा सकता है। नोटबंदी के जितने फायदे गिनाए गए थे, उस मोर्चे पर विफलता हाथ लगी है। वहीं जीएसटी का मौजूदा स्वरूप आम लोगों के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। आज तमाम महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाएं असहाय प्रतीत हो रही हैं, यह लोकतन्त्र के लिए और जनहित की दृष्टि से अत्यंत ही खतरनाक स्थिति है। 


रिपोर्टिंग टीम : डॉ. मुकेश कुमार, नरेश गौतम, डिसेन्ट साहू, सुधीर कुमार, आशु बौद्ध एवं सोनम बौद्ध.



Thursday, May 18, 2017

'हमारा होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है'

जिन लोगों के जेंडर तथा यौनिक व्यवहारों को लेकर हमारे समाज में ढेर सारी गालियां बनी हो, वहाँ ऐसे लोगों पर उपहास करना, उनके साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार व उन्हें समाज में कलंकित मान लेना अभी भी आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन जब शोषित समूह के लोग स्वयं को छुपाने के बजाए समाज के सामने ढ़ोल की ताल पर थिरकते हुए, लाउडस्पीकर पर अपनी पहचान को समाज के सामने रखते हुए नारा लगाए कि 'हमारा होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है।', 'हमें चाहिए आज़ादी -प्यार करने की आज़ादी, भेदभाव के बिना जीने की आज़ादी।'  तो लोगों को यह दृश्य आश्चर्यचकित कर रही थी। यह मौका था नागपुर में आयोजित दूसरे LGBTQ प्राइड मार्च का जिसमें समूह के लोग तथा देशभर से आए LGBTQ अधिकारों के समर्थक एकत्रित हुए थे। मार्च के द्वारा धारा 377 का विरोध करते हुए स्वीकार्यता, सम्मान, स्वतन्त्रता, शिक्षा, रोजगार, जैसे मानवीय अधिकारों की मांग भी की गई।
बैंगलोर से आए समीर कहते है - 'आज मैं विशेष तौर से इस मार्च में शामिल होने के लिए आया हूँ। मैं इस लड़ाई में अपने लोगों के साथ हूँ। आज इतने सारे लोगों को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। संविधान में हमें जो भी वैयक्तिक अधिकार मिले है वो हमें भी मिलना चाहिए। धारा 377 हटाई जाए और संवैधानिक अधिकार दी जाए, हमें भी जीने का अधिकार है।'
प्राइड मार्च समाज के लिए जरूरी क्यों है? पुछें जाने पर मुख्य अतिथि के रूप में गुजरात से आए मानवेंद्र गोहील ने कहा कि 'जरूरत इसलिए है कि हमें समाज को बताना है कि हमारी संख्या भले ही कम है, लेकिन हमारी उपस्थिती है और हमें गर्व है कि हम क्या है। प्रत्येक इंसान को आज़ादी से जीने का हक है तो हमें क्यों नहीं मिला है? जब भारतीय संविधान में सभी लोगों को समानता और सम्मान से जीने का हक है तो हमें क्यों नहीं? हमें हमारे तरीके से जीने दिया जाए, प्यार करने की आज़ादी हो। हम पैदाइशी ही ऐसे है, हमारा कोई दोष नहीं कि हम ऐसे है। ये हमारे लिए आज़ादी की लड़ाई है।'
आगे उन्होंने कहा कि 'हमें अब दूसरे लोगों का भी सहयोग मिल रहा है, कुछ माँ-बाप भी समझने लगे है कि बच्चों से ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती, उन्हें अपने जीवन साथी चुनने का अधिकार देना होगा।' मीडिया किस तरह से उन्हें अब पेश कर रही है? पुछे जाने पर उन्होंने कहा कि 'LGBTQ समूह को लेकर मीडिया प्रेजेंटेशन में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है। मीडिया काफी सकारात्मक हुई है, अब हमारी समस्याओं के बारे में भी लिख रहे है। युवाओं में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है, अब वे भी इन विविधताओं के बारे में जानना चाहते है।'

पिऊ जो नागपुर की ही है, वे कहती है 'आज पहली बार लड़कियों की तरह तैयार होकर इस मार्च में शामिल हो रही हूँ। थोड़ी सी डरी हुई हूँ कि कहीं घर वालों को पता न चल जाएँ, लेकिन मैं खुश हूँ कि जैसा मैं महसूस करती हूँ उसी रूप में समाज के सामने हूँ।'

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 अप्रैल 2014 को ट्रान्सजेंडर को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता देने तथा उनके स्थिति में सुधार के लिए उचित कदम उठाने के दिशानिर्देश के बावजूद अभी भी सरकारी प्रयास न के बराबर ही है। यही कारण है की पिऊ तथा पिऊ के जैसे हजारों ट्रान्सजेंडर को अपनी पहचान छुपाकर जीवन व्यतित करने के लिए मजबूर हैं।

जब भी LGBTQ अधिकारों की बात की जाती है तो समलैंगिकता को लेकर प्राकृतिक-अप्राकृतिक, नैतिक-अनैतिक, वैध-अवैध कि बहसे तेज हो जाती है। धारा 377 को हटाने के लिए एक लंबी बहस समलैंगिकता के अपराधीकरण को मानव अधिकारों के हनन के रूप में हुई है। संवैधानिक बहसो में जिन अधिकारों को लेकर चर्चा हुई है उनमें समानता, सम्मान, गोपनियता तथा भेदभाव व स्वतन्त्रता शामिल है। इन तमाम बहसों के बाद भी भारतीय कानून समलैंगिकता को अपराध मानता है। भारतीय दंड संहिता, धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) इस प्रकार से है - “जो भी कोई स्वेच्छा से किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध कामुक संभोग करता है, उसे आजीवन कारावास या फिर 10 वर्षों तक बढ़ाई जा सकती है और जुर्माना भी हो सकता था।" धारा यह स्पष्ट नहीं करती कि 'अप्राकृतिक' यौन क्या-क्या है, इसके साथ ही लिंग प्रवेश यौनिक संभोग को स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।' इस व्याख्या के कारण इसमें मुख व गुदा भी शामिल हो जाता है।  

यह कानून औपनिवेशिक काल में 'यौन आनंद' के निषेध के लिए बनाया गया था इस तरह ऐसे सभी यौनिक व्यवहारों को आपराधिक करार देने के लिए बनाया गया था जो प्रजनन प्रक्रिया से जुड़े नहीं है। यह कानून समलिंगी गतिविधियों के साथ विषमलैंगिक व्यवहार वाले जोड़े पर उस दशा में लागू होता है जब वह मुख मैथुन (oral sex), गुदा मैथुन (anal sex) या हस्तमैथुन करते हैं। फिर भी होमोफोबिया (समलैंगिकता के प्रति भय) के कारण हमेशा ही समलैंगिक गतिविधियों वाले लोगों को ही निशाना बनाया जाता रहा है। इसलिए धारा 377 का विरोध सभी नागरिकों को करना चाहिए, इसे सिर्फ समलैंगिक सम्बन्धों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत में समलैंगिकता को लेकर राजनैतिक मांग के रूप में धारा 377 के खिलाफ संघर्ष की शुरुवात वैश्विक परिदृश्य की तुलना में बहुत बाद में 1990 से मान सकते हैं जब पहचान आधारित आंदोलनों के उभार ने हाशिए के समाजों को अपने अधिकारों के लिए संगठित किया।   

डिसेन्ट कुमार साहू
शोधार्थी - समाजकार्य विभाग
म. गां. अं. हि. वि. वि. वर्धा